परिवर्तन की ओर.......

बदलें खुद को....... और समाज को.......

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Piyush Kumar Pant


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कितना जरूरी फ्रेंडशिप डे…..

Posted On: 3 Aug, 2014  
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सच्चा सपूत……

Posted On: 26 May, 2014  
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शिक्षा व्यवसाय नहीं ज़िम्मेदारी…

Posted On: 5 Sep, 2013  
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खंतोली जहां मंगलकामनाओं का पर्व है होली….

Posted On: 23 Mar, 2013  
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इतना हंगामा क्यों है……

Posted On: 23 Dec, 2012  
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पुजारा पुजारा हैं द्रविड़ नहीं…..

Posted On: 23 Nov, 2012  
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दिवाली पर शुक्रिया बिजली….

Posted On: 12 Nov, 2012  
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बस एक सपना था……

Posted On: 27 Sep, 2012  
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कल आएगा क्या..?

Posted On: 15 Sep, 2012  
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ये हिन्दी है…….

Posted On: 12 Sep, 2012  
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कहीं खो गया वो बचपन…….

Posted On: 6 Sep, 2012  
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जीवन बहती धारा सा है…

Posted On: 2 Sep, 2012  
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हिंदुस्तान जलता है…

Posted On: 24 Aug, 2012  
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कुछ ऐसी है ज़िन्दगी…

Posted On: 21 Aug, 2012  
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आओ मनाएं आज़ादी….

Posted On: 14 Aug, 2012  
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सरकारें………

Posted On: 11 Aug, 2012  
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यंगिस्तान अभी व्यस्त है……..

Posted On: 31 Jul, 2012  
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काफल पक गए पर मैंने नहीं चखे………….

Posted On: 28 May, 2012  
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क्या लेकर जाना है…….

Posted On: 21 May, 2012  
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खुद को खुद ही बचाना होगा……

Posted On: 12 May, 2012  
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क्या सत्यमेव जयते…….. ?

Posted On: 7 May, 2012  
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कैसे कैसे मंजर सामने आने लगे हैं…..

Posted On: 5 May, 2012  
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समझें सदन की गरिमा को….

Posted On: 4 May, 2012  
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लोकपाल विरोधी कलाम…..

Posted On: 3 May, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

शरीराचे आतले भाग जास्त मह्तवाचे ही गोष्ट ऑलवेज इग्नोर केली जाते केवळ चांगले कपडे, à¤Â ²Ã Â¤Â¿Ã¤ªà¥à¤¤¸Ã Â¥ÂÃ Â¤ÂŸÃ Â¥Â€Ã Â• , वगैरे लावल्याने आपण सुंदर दिसतो असे नाही. माझे वय १७ आहे, आता हे पोस्ट वाचल्यावर पिंपल्स वर विचार करणे सो्डणार आहे…

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आदरणीय पियूष जी, आप बहुत अच्छा लिखते हैं, सचमुच बहुत अच्छा लिखते हैं और आज इस पुराने पोस्ट को पुन: प्रकाशित करने का मतलब भी समझ सकता हूँ. आप जरूर लिखें ताकि हैम सभी आपसे प्रेरणा ले सकें फेसबुक और ब्लॉग में यही तो अंतर है ...वहाँ हम क्षणिक विचार प्रस्तुत कर देते हैं या किसी कथ्य पर अपनी प्रतिक्रया दे देते हैं पर वहाँ उस समय के मनोभाव पर निर्भर करता है ब्लॉग पर आदमी पूरी तरह सोच समझ कर लिखता भी है और पर्तिक्रिया भी उसी तरह दिया जाता है या नहीं दिया जाता है. आपके इस ब्लॉग पर मिले स्टार की संख्या बतलाती है कि आप का यह ब्लॉग कितने लोगों को प्रभावित कर सका है. आप पुन:आयें सर, अपना विचार रखें... सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

पर क्या ये सच है… लोग कह रहे हैं की वस्त्रों का और महिलाओं से हो रहे दुर्व्यवहार की बढ़ती घटनाओं का कोई संबंध नहीं है…. पर क्या ये सही है……. यदि ये सही है तो फिर क्यों दिल्ली में एक लड़की के साथ दुर्व्यवहार होता है, और अगले दिन सड़क पर उतरने वाली लड़कियां सरकार से अपनी सुरक्षा, अपराधियों को कठोर दंड जैसे मुद्दों के साथ एक तख्ती लेकर उतरती हैं की ……… “नज़र तेरी बुरी, और पर्दा मैं करूँ… “ इसका स्पष्ट अर्थ है की वो भी जानती हैं की कहीं न कहीं इस घटना के बाद जब इस तरह की घटनाओं के कारणों की बात होगी तो उनके कपड़ों की भी बात होगी……. “कई लड़कियों का कथन है की इस देश में नारी को देवी का दर्जा है हमें देवी का दर्जा नहीं चाहिए हमें हमारा सम्मान चाहिए…यह सर्वविदित है कि यदि किसी भी महिला से बलात्कार हुआ तो जाहिर है कि वह महिला किसी न किसी रूप में शारीरिक दृष्टि में उस बलात्कारी पुरुष से कमजोर साबित हुई है। इसके अलावा गैंग रेप के केस में तो जाहिर है कि उस महिला के साथ दुराचार करने वालों की संख्या एक से अधिक रही होगी। यह भी तथ्य विचारणीय है कि बलात्कार किसी न किसी रूप में अकेले में किसी जाने वाला दुराचार है, यह चोरी, डकैती, हत्या आदि की तरह से खुलेआम किये जाने वाला अपराध कतई नहीं है। ऐसे में यदि बलात्कार की सजा फांसी हो जाती है तो बहुत हद तक सम्भावना है कि सम्बन्धित महिला को दुराचारी लोग जीवित ही न छोड़ें। आखिर उन बलात्कारियों को पहचानने वाला, उनकी शिकायत करने वाला, उनके विरुद्ध गवाही देने वाला यदि कोई होगा तो सिर्फ और सिर्फ वह महिला ही। ऐसे में उन दुराचारियों के द्वारा उसको जीवित छोड़ देने की सम्भावना न्यूनतम होने की आशंका है।

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय पीयूष जी, सादर अभिवादन! आपने फेसबुक पर भी अपने संक्षिप्त विचार व्यक्त किये हैं! यहाँ आपने ज्यादा विश्लेषण किया है! मैं भी यही जोड़ना चाहूँगा कि क्रिसमस और नए साल के जश्न के लिए अनेक होटल बुक किये गए हैं जहाँ शराब और शबाब दोनों की जमकर नुमाईश होगी करोड़ों के वारे न्यारे होंगे!... क्या दिल्ली की हलचल के बाद क्या लोग यह प्रतिज्ञा लेंगे कि नए साल के जश्न में वही सब नहीं करेंगे जिसका आपने जिक्र किया है!...फिर भी अनाचार, अत्याचार और नृशंसता का विरोध होना चाहिए और समाधान भी निकल कर आना चाहिए! आज लगभग सभी न्यूज़ चैनेल्स पर इसी विषय पर बहस कराई जा रही है ...पर संसद का सत्र बुलाने की कोई तैयारी नहीं हो रही है. देश को चलनेवाले मौन हैं ... प्रदर्शनकारियों और मीडिया पर बल प्रयोग जायज नहीं कहा जा सकता! आपके विचार उचित हैं इस पर बहस होनी चाहिए!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: jagojagobharat jagojagobharat

के द्वारा: jlsingh jlsingh

पीयूष जी, नमस्कार! क्या कहें! बाबा रामदेव का आन्दोलन अंत में प्रभावशाली हो गया था, पर संसद ने कुछ भी कारगर कदम नहीं उठाया. जागरूकता बहुत हद तक आई है ... बाबा के अन्दोलन को समर्थन करने वाली पार्टियाँ भी सरकार को समर्थन कर रही हैं ... सरकार का मनोबल बढ़ता ही जा रहा है. सभी आज्ञाकारी पशु की भांति १० जनपथ के आगे सर झुकाते हैं. बाबा ने भी पहले दिन सोनिया माता की खूब स्तुति की (भले ही वो व्यंग्यात्मक हो!) भले हे अंतिम दिन कांग्रेस को खरी खोटी सुनायी, पर अब अनशन नहीं करेंगे , क्या करेंगे वह भी खुलकर नहीं बताई. हम सभी जनता सरकार चुनते हैं. विकल्प सूझता नहीं, अच्छे लोग केवल आलोचना करते हैं समाधान नहीं बतलाते न ही खुलकर सामने आते हैं. हम भी उतने ही दोषी हैं! आपको भी स्वतंत्रता दिवस की बधाई!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: ilaagupta ilaagupta

पियूष जी बहुत निष्पक्ष और प्रेरक पोस्ट निश्चित रूप से किसी भी सकारात्मक कार्य को समर्थन मिलना चाहिए.अफ़सोस आज की लड़कियां वस्त्र विन्यास और अश्लीलता को ही आधुनिकता कला पर्याय मान अंधानुकरण कर रही हैं. इस देश को कल्पना चावला, साइना नेहवाल, किरण बेदी, टेसी थॉमस जैसी महिलाओं को आदर्श मनाने वाली लड़कियों की खेप एक नई दिशा दे सकती है.. पर वर्तमान मे केटरीना, मल्लिका, करीना और अन्य कारणो से चर्चा मे रहने वाली लड़कियों (यथा पूनम पांडे, राखी सावंत) की तादात बढ़ रही है.. जिस तरह मीडिया ने पूनम पांडे और एक नई सनसनी जिस्म-2 की नायिका को चर्चा दी है.. ये एक बड़ी मुसीबत बन सकती है. अश्लीलता को चर्चा पाने का एक शॉर्ट कट बना दिया गया है…. और यहाँ हर किसी को चर्चा मे बना रहना ही पसंद है…. मैं अपनी तरफ से एक बात कहना चाहता हूँ ! ये दौर परिवर्तन का दौर है - इसमें लडकिय अधिकांश तौर पर ये मान बैठती हैं की परिवर्तन का मतलब सिर्फ फ़शिओनबल कपड़ों तक ही सीमित है बल्कि परिवर्तन हर क्षेत्र में हो रहा है ! बहुत सही और सटीक लेखन !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय पियूष जी, नमस्कार बहुत ही बड़ी बात लिखी है आपने और बहुत ही सुन्दर ढंग से समझाया है हम भारत के लोग धक्का खाय बिना कुछ नहीं समझते ......और आमिर का सो वही धक्का देने का कार्य कर रहा है हाँ एक सार्थक कोशिश की गई है निश्चय ही किन्तु एक बात कहना चाहूँगा याद राखिय आमिर खान हो चाहे और कोई आप क्या कर रहे हैं आपको पता होना चाहिए यहाँ "जो दिखता है वो बिकता है" वाला हिसाब चल रहा है आज जनता ऐसी बातों को सुनना चाह रही है और पैसा बन रहा है टीआरपी मिल रही है बस सब कुछ अच्छा है देखना होगा की आगे क्या होता है जब शो की रेटिंग गिरेगी ................दूसरी बात यह तो बहुत अच्छा लगता है की आमिर खान ऐसे शो को कर रहें है किन्तु जब नजर इस बात पर पड़ती है की इस शो को करने का दाम वो आज तक के सबसे ज्यादा इ रहें है तो सुन दिल टूट जाता है और संकाएँ स्वय दिमाग में बैठ जाती है...............फिर भी सकारात्मकता को स्थान अवस्य देना chaahiy आगे आगे देकिये होता है क्या

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

के द्वारा: abhilasha shivhare gupta abhilasha shivhare gupta

पर सवाल अभी भी अपनी जगह ही है.......भले ही ये सोची समझी मार्केटिंग थी पर क्या ये मुद्दा गलत था........ ? मैं कहता हूँ की लाख अन्ना भ्रष्ट हों....... भले बाबा रामदेव के पास काला धन हो पर क्या ये मुद्दा गलत है...... अगर आपको या हमें लगता है की मुद्दा सही है बस इसे उठाने वाला गलत है तो आगे आयें और खुद उठाएँ इस मुद्दे को........ जब हम घर पर बैठ कर व्यर्थ समालोचना करने के आदि हो चुके हैं तो फिर हमें कोई अधिकार नहीं है की किसी की सार्थक पहल पर आघात करने का........ हम खुद कुछ करना नहीं चाहते पर जब कोई समाज को आईना दिखाता हैं तो हम उसको दूसरा आईना दिखाने लगते हैं... यदि हम ईमानदार है इस देश के प्रति तो हमें खुद आगे बढ़कर परिवर्तन के प्रयास करने चाहिए...... हम में खुद ये कहने का साहस होना चाहिए की अन्ना (या बाबा या आमिर या कोई भी अन्य जिससे किसी को आपत्ति हो।) आप इस आंदोलन को करने के योग्य नहीं है......... आप जाएँ ये आंदोलन हम करेंगे........ क्योंकि हम स्वच्छ हैं....... हमने कोई पाप नहीं किया..... पर नहीं हम सब जानते हैं की हमारी नैतिकता केवल हमारे शब्दों तक ही रह गई है....... हम उस मक्खी के समान हो गए हैं जो इंसान के सुंदर शरीर पर भी केवल घाव को खोज कर उसपर ही बैठती है........

के द्वारा:

भाई राहुल जी.... जहां तक आपका कथन है की शाहरुख छोटे पर्दे से बड़े पर्दे पर गए... पर फिर वो फिल्मों मे ही रहे छोटे पर्दे से उन्होने अलविदा कह दिया था। यहाँ पर इसका जिक्र इसलिए है की अमिताभ ने अपने व्यक्तित्व से छोटे पर्दे पर केबीसी से को न केवल एक मशहूर कार्यक्रम बनाया अपितु छोटे पर्दे से बड़ा पैसा कमाये जा सकने का संकेत भी दिया... तब फिर कई बड़े सितारे पैसे और शोहरत के लिए यहाँ वापस आए.... जहां तक बात आमिर के नर्मदा आंदोलन या किसान आंदोलन से जुडने की और उसे भूल जाने की है तो मेरा सीधा सीधा मानना है की ये देश जितना अन्ना का है या रामदेव का है या आमिर खान का है उतना ही एक साधारण आदमी का है...... हम खुद घरों मे छुपे बैठे हैं... पर कोई थोड़ा सा भी कुछ कोशिश करे तो हम चाहते हैं की वो उसे अंजाम तक भी पहुंचाए... जबकि ये बात भी हम जानते हैं की इन कलाकारों का इस तरह के आंदोलनों से जुड़ना उनके लिए घातक है... जब ओमपुरी अन्ना के अनशन मे बोलकर आए तो उनको सरकार ने घेरा... पर कोई आवाज़ उनके समर्थन मे नहीं उठी.... फिर क्यों कोई हमारे लिए लड़े.... किसी के घर के क्या हालत रहे ... पति पत्नी के बीच किस तरह के सबंध है और क्यों हैं..... कई बार अपने संबंधों पर खुद पति पत्नी ही नहीं कुछ बोल पाते....... इनपर किसी भी तरह की कोई चर्चा का महत्व नहीं है..... जहां तक सत्यमेव जयते कार्यक्रम के उद्देश्यों के विरोध न होने की बात है तो सीधा प्रश्न ये उठता है की तब आमिर के खिलाफ कुछ लिखा या बोला नहीं गया जब की आमिर ने किरण राव से शादी की....... पर जब सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध कुछ कहा तो फिर विरोध शुरू हो गया.... शाहरुख न जाने कितनी बार खुद को मुस्लिम बता कर चर्चा लेने का प्रयास करते हैं कभी एयरपोर्ट पर तो कभी कहीं और.... पर इनकी ओर से कभी कोई सामाजिक प्रयास होते नहीं दिखे.... भले ही वो मुस्लिम उत्थान के लिए हुए होते .... अगर मुस्लिम परेशान है तो उनके लिए क्या कुछ इनहोने किया हम नहीं पूछते..... पर कल को शाहरुख हमारे समाज को आईना दिखाएगे तो उनपर उंगली शायद हम तब ही उठाएंगे.......

के द्वारा:

पियूष भाई नमस्कार,एक सार्थक उद्देश्य के लिए लिखे गए लेख पर आपको बधाई,यह बात पूरी तरह सही है की अच्छी बातें जहां से भी मिले ग्रहण करना चाहिए,लेख में कुछ तथ्य ऐसे हैं जिनपर पुनर्विचार किया जा सकता है,जैसे बहुत बड़े सितारे अमिताभ जी की सफलता से प्रभावित होकर छोटे परदे पर उतरे,लेकिन उनमें शाहरुख़ खान का नाम भी है,लेकिन शाहरुख़ ने तो अपना कैरियर ही छोटे परदे से शुरू किया था,फौजी,सर्कस और दिल दरया धारावाहिकों में उनके काम ने उन्हें बड़े परदे पर जगह दिलाई थी. जब आमिर खान की फिल्म 'फना' आनेवाली थी,उस समय उन्होंने नर्मदा बचाओ आन्दोलन और किसान के मुद्दों को भी उठाया था,जिसे शायद बाद में वो भूल गए और अब उस बारे में कही कुछ नहीं कहते हैं. जिस प्रकार कुछ सांसदों को गलत कहने का अर्थ संसद को झूठा कहना नहीं होता,उसी प्रकार आमिर खान के विरोध को 'सत्यमेव जयते' कार्यक्रम का विरोध नहीं मानना चाहिए.यह सही है की अंगुलिमाल डाकू भी वाल्मीकि बनकर रामायण की रचना कर सकने में सक्षम हुए थे,लेकिन इसके लिए उन्होंने अपनी पुरानी जिंदगी का पूरी तरह परित्याग कर दिया था. आमिर ने अपनी पहली पत्नी को किसी मनमुटाव के चलते नहीं छोड़ा,बल्कि लगान की शूटिंग के दौरान किरण राव उनके ज्यादा करीब आ गयी थी,इसलिए उन्होंने सद्भावपूर्ण माहौल में अपनी पहली पत्नी रीना से अलग होने का फैसला लिया.यदि कोई आम मुसलमान ऐसा करता तो लोग 'लव जिहाद' और जाने कितने प्रकार के आरोप लगाते.लेकिन चूँकि आमिर सामजिक सरोकारों से जुड़े अभिनता-निर्माता हैं,इसलिए यह सहज स्वीकार्य है.इन तथ्यों से सत्यमेव जयते कार्यक्रम के उद्देश्यों का किसी तरह से विरोध नहीं होता लेकिन निश्चित रूप से अगर कोई समाज में सकारात्मक बदलाव चाहता है,चरित्र निर्माण का जिम्मा लेता है तो उसका चरित्र भी शीशे की तरह साफ़ होना चाहिए,जैसे कि बाबा रामदेव,अन्ना हजारे या फिर बालकृष्ण पर आरोप लगाकर उन्हें गलत साबित नहीं किया जा सकता,क्यूंकि उनपर लगाये आरोप मिथ्या और बेबुनियाद हैं,अगर उनलोगों में थोड़ी भी कमी होती तो आज उनके साथ इतना बड़ा जनसमर्थन कभी नहीं होता.किन्तु आमिर खान के साथ ऐसा नहीं है,उनके साथ कमियों के बावजूद भी बहुत समर्थन है.खैर कमियां अपनी जगह है,किन्तु सार्थक उद्देश्य से जुड़ा हुआ यह शो समाज में सार्थक सकारात्मक बदलाव ले आने की दिशा में अपनी तरह का पहला प्रयास है,मैं इसकी धरातल पर सफलता की कामना करता हूँ.

के द्वारा: rahulpriyadarshi rahulpriyadarshi

युवावस्था से प्रेम शारीरिक प्रेम नहीं वासना है ये बात सभी भली भांति जानते हैं..... पर यहाँ पर यह वाक्य उन लोगों के लिए प्रयुक्त किया गया है जो इसे ही प्रेम का नाम दे बैठे हैं। उनलोगों को केवल ये समझाने का प्रयास है की जो प्रेम वे रूप रंग व शारीरिक सौन्दर्य से कर रहे है वो प्रेम नहीं है अन्यथा वो इन अवस्थाओं के समाप्त होने पर समाप्त नहीं हो जाता। क्योकि प्रेम शाश्वत हैं........ वो कभी समाप्त नहीं हो सकता॥ आपके विचार किसी भी दृष्टिकोण से धृष्टता नहीं कहे जा सकते है....... यहाँ सभी लोग अपने लेखों मे अपने विचार रखते हैं...... और आवश्यक नहीं की सभी उस विचार से सहमत हों..... पर उस विचार से असहमति व्यक्त कर हम न केवल अपनी बात रखते हैं॥ अपितु उस विचार को विस्तार देने मे सहायता करते हैं जिसे लिखने से लिखने वाला कहीं छुट गया।

के द्वारा: Piyush Kumar Pant Piyush Kumar Pant

आदरणीय पियूष जी नमस्कार, बहुत सुन्दर आलेख किन्तु कई जगह असहमति रही, रंग रूप पर प्रेम क्षणिक हो सकता है क्योंकि जब वह रंग रूप ही नहीं तो फिर प्रेम किससे? किन्तु युवावस्था से प्रेम शारीरिक प्रेम ये आप क्या कह रहे हैं ये प्रेम नहीं वासना है और दोनों भिन्न हैं.क्या उम्र ढलने के साथ प्रेम कम हो जाता है?किसी बुजुर्ग से पूछो की उसका अपनी पत्नी से प्रेम उम्र की ढलान पर बढ़ा है या घटा है. पत्थर की मूर्ति में भगवान् देखनेवालों ने कभी अपने मन में ही झाँक कर देखा होता भगवान् वहीँ नजर आ जाता और गुड से प्रेम का उदाहरण देकर आपने प्रेम के भौतिक स्वरुप को भी मान्यता दी है.अन्य जगह तो आपने प्रेम के सुन्दरतम उदाहरण प्रस्तुत किये हैं. मैंने अपने विचार रखे हैं यदि द्र्श्तता लगे तो क्षमा करें.

के द्वारा: akraktale akraktale

आदरणीय पन्त जी, सादर अभिवादन ये बड़ा विचित्र प्रश्न है…… की जब आपकी परीक्षा मे केवल आपको ही जाना होता है… और आपके इंटरव्यू मे केवल आप ही अपनी बात रख सकते हैं ….. तो फिर वोटिंग के लिए स्टार प्रचारकों पर निर्भर नेता हमारे प्रतिनिधि क्यों हैं…. जो अपनी बात पुरजोर तरीके से खूद जनता को नहीं समझा सकते वो आपका प्रदेश कैसे चलाएँगे……. विधानसभाओं मे आपके विधायक महोदय ही होंगे जिन्हें आपकी आवाज़ सदन मे रखनी हैं…….. सोनिया गांधी, राहुल गांधी, नितिन गडकरी, लाल कृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, हेमा मालनी, मायावती या अन्य कोई भी स्टार प्रचारक उनकी बात सदन मे नहीं रख सकता……. तो परखिये अपने नेता को की क्या वो अपने स्तर पर भी कुछ ज्ञान रखता है….. या एक वैचारिक पंगु को आप अपना प्रतिनिधि चुन रहे हैं….. आपका सही वोट ही भ्रष्ट नेताओं के लिए तमाचा बन सकता है… सुन्दर प्रस्तुति. बधाई.

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

पिता पुत्र और गुरु शिष्य की तुलना नेता से नहीं की गई है........ तुलना आक्रोश की है..... आप आक्रोश के नाम पर गलत को सही नहीं ठहरा सकते इसके लिए ये उदाहरण लिए गए है........ क्योकि आज गुरु शिष्य के सम्बन्धों मे जो कटुता दिखाई देती है उसका मूल भी छात्रों का आक्रोश ही बताया जाता है..... बूढ़े माँ बाप को त्याग करने वाले लोग उनके प्रति अपने पूर्व आक्रोश को ही कारण बताते हैं..... अन्य किसी बात मे तुलना नहीं है पर आक्रोश को अलग अलग नहीं किया जा सकता है.... आप अपने को इस परिस्थिति मे रख कर देखेँ आपको भी स्पष्ट हो जाएगा की आक्रोश आपके प्रति भी कई लोगों मे है........ नाथुराम गोडसे को गलत ठहराने वाले ये भूल जाते हैं की उसके भीतर भी गांधी का पाकिस्तान के प्रति प्रेम आक्रोश का कारण बना था..... ये नेता या जन प्रतिनिधि हमारे लोकतन्त्र के प्रमुख हैं..... और इन्हें इनके कृत्यों का सबक सीखाने के लिए चुनावों की व्यवस्था है..... आप अपना क्रोध वोट से भी दिखा सकते हैं...... तो फिर चोट की क्या आवश्यकता है.... हम यहाँ पर बैठ कर कुछ भी लिख लेते हैं....... पर उस व्यक्ति के आक्रोश की कल्पना भी नहीं कर सकते..... जो की हाड़ कपकपाने वाली ठंड मे बार्डर मे हथियार लिए खड़ा है.... दुश्मन की किसी भी हरकत से निपटने के लिए उसे इन कमजोर नेताओं के आदेश की आवश्यकता है......

के द्वारा:

पर आम आदमी खुद कहाँ सुधार रहा है... इस थप्पड़ प्रकरण के बाद संसद मे लोकपाल पर चर्चा नहीं हुई और केंद्र सरकार ने रीटेल कारोबार में एफडीआई को अनुमति भी दे दी है......... पर जनता चाटे से ऊपर नहीं उठ पाई है..... किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा की देश मे क्या क्या हो रहा है सभी चांटे पर अपनी प्रतिक्रिया देने मे व्यस्त हैं...... कसाब को सरकारी खर्च पर पलते हुए आज 3 साल का समय हो गया पर मुद्दा आज चांटे का ही है... कोई भी सरकार की अक्षमता पर प्रश्न नहीं उठा रहा है...... बस चांटे ही पर प्रश्न और उत्तर चल रहे हैं....... आखिर किस तरह एक चांटा देश के लिए इतना महत्वपूर्ण हो गया...... आखिर आक्रोश का अर्थ क्या है...... ये कोई 4 दिन से भूखा व्यक्ति नहीं था जो अपनी लाचारी और सरकार के निकम्मेपन पर आक्रोशित था...... फिर इस व्यक्ति के आक्रोश का क्या अर्थ है........ ये सस्ती लोकप्रियता मात्र है...... और जिस तरह से इसे इनता समर्थन मिला है तो शायद इसे परंपरा बनने मे अब देर न लगे......

के द्वारा:

आदरणीय पियूष जी, मै अमिता जी की बात से बिलकुल सहमत हूँ.अगर नेता नहीं सुधरे तो विद्रोह तो होना ही है.हम मोटी मोटी बाते करके, की मास्टरजी ने थप्पड़ मारा और पिताजी ने लप्पड़ मारा जिन बातों का इससे दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है, कुछ साबित नहीं कर पायेंगे. खुद को एक थप्पड़ पडा तो लोकतंत्र याद आ गया, देश की करोड़ों जनता की आवाज को कुचलने के लिए संसद सर्वोच्च हो जाता है. एक थप्पड़ पर सारे सांसद एक हो जाते हैं घडियाली आंसू बहाते हैं.मगर कोई ये नहीं कहता की अपना चरित्र सुधार लो. एक थप्पड़ की तिलमिलाहट में नेताजी कहते हैं मै कौन होता हूँ माफ़ करने वाला.पिछले वर्ष को आप क्या भूल गए जब सारे टीवी चेनल बार बार कह रहे थे नेताजी चुप हो जाओ आपके बोलने से ही महंगाई बढ़ रही है तब भी लाकुआग्रस्त जबान खामोश नहीं रह पायी तो फिर जनता से माफ़ी की उम्मीद भी कैसे कर सकते हो? आज सारे विदेशों में क्रान्ति का बिगुल बज रहा है.मगर तब भी हमारा देश खामोश है क्योंकि हमारे यहाँ यही नेता बार बार कहते हैं कि हमारे यहाँ तो लोकतंत्र है. हमारी परिस्थितियाँ तो उनसे भिन्न है. मगर क्या वाकई भिन्न है? अपने आप को जन प्रतिनिधि कहलाने वाले क्या वाकई जन प्रतिनिधि हैं? कहीं तानाशाह तो नहीं है? विचार करें, सुर में सुर मिला देने से कुछ नहीं होने वाला.

के द्वारा: akraktale akraktale

प्रिय पियूष जी आपका लेख मति-भ्रष्ट लोगों की आँखे खोलने के लिए काफी है परन्तु, चले हुए कारतूसों के समान सत्ता से दूर हुए यशवंत सिन्हा जैसे नेताओं को क्या कहा जाए जो यह आह्वान करने से बाज नहीं आते कि महंगाई और बेरोजगारी से परेशां लोग हिंसा पर उतर आयंगे क्या किसी नेता को ऐसा आह्वान करना शोभा देता है - दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मंदिर में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है हमारा सबसे बड़ा हथियार हमारा "मत" या "वोट" कह लीजिये वही है लेकिन जनता को उनकी असली ताकत से रूबरू कराने के स्थान पर नेतागण अपने थोड़े से स्वार्थ के कारण जनता को हिंसा में ही झोकना चाहते है यह खतरनाक एवं आत्मघाती कदम जैसा है --- देश में महंगाई बेरोजगारी होने के बावजूद भी देश क्यों विकास की ओर अग्रसर है नेताओं को इस बात पर भी ध्यान देने की जरूरत होनी ही चाहिए - जब की यह सर्वविदित है की आज दुनिया में जनसँख्या के अनुसार सबसे अधिक युवा भारत में ही हैं फिर भी सरकार और विपक्ष के नेता लोग उनका सार्थक उपयोग करने के स्थान पर उनके हाथ में केवल खाली कटोरा थमाने और भीख मांगने लिए लालायित कर रहे है - और जहाँ तक सिन्हा जैसे राज नेताओं के आह्वान की बात है उनको इस बात पर ध्यान देना होगा की देश के कई हिस्सों में आधुनिकता से दूर और व्यस्था से नाराज कुछ लोग नक्सलवाद के नाम से जो हिंसा फैला रहे है उन पर तो आज तक काबू नहीं पाया गया है -- और अगर शहरी पढ़ा लिखा युवा वर्ग हाथों में हथियार लेकर मैदान में आ गया तो क्या स्तिथि होगी क्या कोई नेता इसकी कल्पना कर सकता है ?

के द्वारा:

पीयूष जी आपको बहुत बहुत बधाई, सही बात सामने को रखने के लिए। मुझे तो इस लेख पर लोगों की प्रतिक्रियाये पढ़कर बहुत आश्चर्य हुआ की अपने को बुद्धिजीवी कहने वाला मीडिया और युवा वर्ग केवल नाक के आगे ही देखता है। हिमांशु भट्ट जी को भी बहुत साधुवाद, जो उन्होने विस्तृत तरीके से आपकी बात को रखा है। कल कोई कांग्रेसी, अन्ना की बातों से आक्रोशित होकर, उन्हें थप्पड़ मारेगा तो क्या कहेंगे? अरबिन्द केजरीवाल के चप्पल या प्रशांत भूषण के थप्पड़ खाने को कैसे हम गलत ठहराएँगे? थप्पड़काण्ड के बीच, जारी मानसून सत्र में रिटेल क्षेत्र में 100% एफ डी आई का बिल पास हो गया। 5 दिनों के सत्र में लोकपाल और महंगाई, पेट्रोल के दाम पर कोई चर्चा तक नहीं हुई। लेकिन जनता खुश। क्या हम सिर्फ नेताओं को दुखी या परेशान करके अपने सारे मुद्दे भूलना चाहते हैं? ये तो नेताओं के हित की बात हुई। जनता का हित कहाँ है? सभी लगभग इस बात पर सहमत हैं की नेता भ्रष्ट हैं, और जनता निर्दोष, दयनीय। क्या नेता मंगल गृह से आए हैं? वो भी इसी समाज का हिस्सा हैं। सच्चाई ये है की हमारा समाज ही भ्रष्ट है। अपने भ्रष्टाचार को मजबूरी, रिवाज, धर्म आदि नामों से सही सिद्ध करता है। केवल नेता को भ्रष्ट, गद्दार दिखाकर अपने को सही साबित करने की कोशिश करता है। आज हर शादी में औसतन लाख रुपया दहेज लिया जाता है, रिवाज या धर्म के नाम पर। कन्या भ्रूण हत्या और दहेज हत्या हो रही है, रिवाज और धर्म की आड़ में। करोड़ों करोड़ों के बेनामी चढ़ावे धर्म के नाम पर क्या खून पसीने से कमाई करने वाला चढ़ा सकता है? पर वो धर्म है। क्या ये सब सिर्फ नेता कर रहे हैं। नेताओं के नाम पर घड़ियाली आँसू बहाने से पहले, निर्दोष, निरीह, धार्मिक, ईमानदार जनता अपने गिरेबान में झांक ले। हम सुधर गए तो देश सुधर जाएगा। लेकिन हम नहीं सुधरेंगे, सिर्फ नेताओं को सुधरेंगे। हम तो निरीह हैं........

के द्वारा: manojjohny manojjohny

शरद पवार पर थप्पड़ मारे जाने की घटना को मीडिया और कुछ राजनीतिक दलों ने महंगाई से जोड़ दिया। यह एक तरह से इस घटना का औचित्य साबित करने की कोशिश है। अन्ना हजारे भी इस पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करने से खुद को नहीं रोक पाए और बोले ,‘‘ बस!एक थप्पड!!’’ गोया उन्हे उम्मीद रही हो कि शरद पवार पर और थप्पड़ मारे जाने थे। टीम अन्ना ने भी राजनीतिक लाभ उठाने की नीयत से इसे नेताओं की साख की ओर मोड़ दिया। किरन बेदी और कुमार विश्वास की प्रसन्नतायें भी इसी कारण उनके ट्वीट से बाहर छलक रहीं थी। इस पूरे वाकये पर समझदारी और परिपक्वता की जो अपेक्षा मीडिया और राजनेताओं से थी वे पूरी नहीृ हुई। लेकिन गुस्से की इन व्यक्तिगत अभिव्यक्तियों को यदि इनके विस्तार और संक्रामक रुप में देखें तो समझ में आ जाएगा कि भविष्य में एक गैर जिम्मेदार और सनसनी प्रिय मीडिया, साख खोए नेता और अन्ना हजारे जैसे गैर जिम्मेदार आंदोलनकारी देश के लिए कितनी आफत खड़ी कर सकते हैं। इस देश में बड़ी संख्या में लोग मीडिया से नाराज है।। क्या मीडिया पत्रकारों पर होने वाले हमलों का औचित्य इस आधार पर साबित करेगा कि मीडिया की रिपोर्टिंग सही नहीं हो रही है? क्या उन डाॅक्टरों,इंजीनियरों, वकीलों व्यापारियों और उद्योगपतियों पर थप्पड़ नहीं मारे जाने चाहिए जिन्होने आम लोगों का जीवन नर्क बना दिया है? क्या सरकारी अफसरों,एनजीओ के संचालकों को थप्पड़ नहीं मारे जाने चाहिए? अन्ना हजारे शरद पवार की पिटाई पर खुश हो रहे हैं तक प्रशांत भूषण और अन्ना समर्थकों की पिटाई करने का भी तो एक औचित्य भगत सिंह सेना के लोगों के पास है और उन्हे अपने औचित्य पर यकीन रखने का हक है।आप पीटे जांय तो लोकतंत्र को खतरा और दुश्मन पिटे तो लोगों का गुस्सा? यह कैसा कुतर्क है। यदि हरविदर के थप्पड़ का औचित्य है तो माओवादियों की हिंसा का औचित्य क्यों नहीं है? सरकारों ने करोड़ों लोगों का जीवन दूभर कर दिया है तो वे क्यों नहीं हथियार उठायें? एक विचारहीन थप्पड़ का औचित्य साबित करने में मीडिया के दिग्गजों से लेकर राजनीति और समाजशास्त्र,अर्थशास्त्र के सारे दिग्गज 12 घंटे तक न्यूज चैनलों पर जुटे रहे पर इसी दिन अपनी विचारधारा के कारण आदिवासियों के लिए हथियार उठाने वाले किशनजी की प्रतिहिंसा का औचित्य साबित करने के लिए एक भी आगे नहीं आया। क्या मीडिया और विपक्ष को विचारहीन अराजक हिंसा पसंद है और विचारधारा की हिंसा नापसंद है?किशनजी यदि मानते हैं कि क्रांतिकारी बदलाव के लिए हिंसा जरुरी है या राज्य की हिंसा का जवाब हिंसा ही है तो उसका भी औचित्य है। क्रांति का सपना देखने और उसे बंदूक के दम पर हासिल करने का सपना देखने का भी तो औचित्य है। क्या उनके औचित्य पर चर्चा करने से कारपोरेट मीडिया,संसदीय दल और टीम अन्ना इसलिए डरते हैं कि माओवादी उनकी राजनीति के लिए भी खतरनाक हैं? जबकि हरविंदर से शरद पवार के अलावा किसी को भी खतरा नहीं है। इसलिए सभी एक विचारहीन हिंसा का औचित्य साबित करने मंें जुटे हैं। दरअसल टीम अन्ना और भारतीय मीडिया थप्पड़ को जिस तरह से महिमामंडित कर रही है और जिस चालाकी से उसे जनभावनाओं का प्रगटीकरण बता रही है वह एक खतरनाक खेल है। बाबरी ध्वंस को भी इसी तरह अटल विहारी वाजपेयी ने जनभावनाओं का प्रगटीकरण बताया था। इस देश में हर हिंसक घटना का एक औचित्य है। हर वो वर्ग जिसे साथ अन्याय हो रहा है उसे हिंसा के जरिये अपना गुस्सा अभिव्यक्त करने का औचित्य प्रदान करने का मतलब देश को एक अराजकता की ओर धकेलना हैं। ऐसे में तो मतदाता चुनावों में वोट के जरिये अपना गुस्सा व्यक्त करने के बजाय अपने विधायकों और सांसदों पर जूते फेंकेगा और थप्पड़ो उनकी पिटाई करेगा। भारत में एक भी ऐसा राजनेता नहीं है जिस पर लोगों को भरोसा हो,एक भी नेता ऐसा नहीं है जिस पर लोगों को यह यकीन हो कि वह उनकी नियति बदल सकता है। कांग्रेस-भाजपा से लेकर कम्युनिस्ट पार्टियों तक दलों का नेतृत्व कुलीन और कान्वेंटी नेताओं ने हाईजैक कर लिया है। तीन बड़ी राजनीतिक धाराओं में कोई मास लीडर ही नहीं है। भारतीय राजनीति जब इतनी दरिद्रता से गुजर रही है तब जनता में गुस्सा,मोहभंग और क्षोभ भी होगा।यह लगभग वैसे ही हालात हैं जैसे हिटलर के उदय के समय जर्मनी में थे। नाकारा नेताओं के खिलाफ फैली अराजकता के ज्वार पर ही चढ़कर हिटलर आया था। क्या मीडिया से लेकर टीम अन्ना तक नेताओं को गलियाने वाले सारे लोग हिटलर के लिए ही रास्ता तैयार नहीं कर रहे हैं? क्या यह याद नहीं रखा जाना चाहिए कि तानाशाह सिर्फ सैनिक विद्रोहों के चोर दरवाजों से ही नहीं आए हैं बल्कि वे लोकतंत्र के राजमार्ग से भी गाजे-बाजे और गले में फूलमालाओं के साथ भी दाखिल हुए हैं।चैरीचैरा की हिंसा के बाद सत्याग्रह वापस लेने वाले गांधी मूर्ख नहीं थे।वह जानते थे कि भारत जैसे विशाल देश में लोगों को अपनी मर्जी से हिंसक होने की आजादी देना का मतलब अंग्रेजों देश में सैनिक तानाशाही थोपने का अवसर देना होगा। क्या हम नहीं जानते कि हर असहमति यदि थप्पड़ मारने का यह सिलसिला चल पड़ा तो यह तमाचा किसी दिन पत्रकारों के गाल पर भी पड़ेगा तो किसी दिन अन्ना या किरन बेदी के गाल पर भी। इसे बदलाव और संगठित प्रतिरोध की सकारात्मक ऊर्जा में बदलने के बजाय एक अराजक और विचारहीनता की नकारात्मक ऊर्जा की वकालत करना खतरनाक औा सस्ती लोकप्रियता से प्रेरित प्रवृत्ति है। आज जब देश में किसी में इतना नैतिक बल नही है कि राज्य की हिंसा समेत हर हिंसा का विरोध कर सके तब हममें से हर एक को किसी न किसी के हाथ से तमाचा खाने को तैयार रहना होगा। आपके लेख के लिए बधाई .

के द्वारा: HIMANSHU BHATT HIMANSHU BHATT

बहुत ही गंभीर विषय होता जा रहा है ये आजकल पियूष जी, जिसकी मैं निंदा भले ही न कर पा रहा हूँ क्योंकि लोग परेशान हैं झुंझलाहट मैं हैं और अपनी हर परेशानी का कारण वे आज के नेता को मानते हैं ! लेकिन आपने अपने लेख के माध्यम से जो तथ्य सामने रखे हैं उनसे मैं सहमत हूँ और इस प्रकार की हिंसा की प्रशंशा भी नहीं कर सकता ! दूसरी एक और चीज मुझे चिंतित कर रही है की अभी तक जिस किसी भी राजनेता पर हमला हुआ उसमे प्रहार करने वाले के अतिरिक किसी और पर प्रभाव नहीं पड़ा ! किन्तु शरद पवार के केस मैं देखने मैं आ रहा है की उनके समर्थकों ने सड़कों पर उतर कर हिंसक विरोध शुरू कर दिया है, जिसका खामियाजा भी आम जनता को ही भोगना पड़ रहा है ! और यदि ये परम्परा शुरू हो गई तो शायद ये हमारे देश के लिए और भी खतरनाक होगा !

के द्वारा: allrounder allrounder

मुनीश जी.... प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.... भगत सिंह आदि को देखने के बाद देश पर बलिदान होने की परंपरा आज तक नहीं पड़ी है हाँ अहिंसा की परंपरा पद चुकी है…… कृपया इस तरह की हरकतें करने वालों को भगत सिंह से तुलना न करें.. उस बौद्धिक स्तर पर जहाँ भगत सिंह थे आज बड़े बड़े नेता कभी नहीं पहुँच सकते.......... पर आप वर्तमान घटनाओं पर नज़र डालें तो पता चले की वास्तव में ये आक्रोश के नाम पर सस्ती लोकप्रियता पाने का हथकंडा बनता जा रहा है.... और इस लोकप्रियता के नाम पर अरविन्द केजरीवाल को भी निशाना बनाया जा चूका है... जबकि उनके खिलाफ आक्रोश जैसी कोई बात समझ नहीं आती.... जहाँ तक विद्यार्थी वाले उदहारण की बात है तो वो भी आवश्यक है क्योंकि आज भी कई शिक्षक छात्रों के आक्रोश का शिकार बन रहे हैं.... इस लिए उस आक्रोश की बात भी जरुरी थी.......... क्योंकि आक्रोश तो सिर्फ आक्रोश ही है....

के द्वारा: Piyush Kumar Pant Piyush Kumar Pant

पियूष जी, थप्पड़ वाले प्रसंग को समय.......और परिस्थिति........, के हिसाब से देखा जाए तो शिक्षक और विद्यार्थी वाला उदाहरण गलत है, और दोनों परिस्थितियों को एक सा नहीं माना जा सकता. रही बात थप्पड़ बनने की तो आप चिंता न करें....... ऐसा नहीं होने वाला....... भगत सिंह आदि को देखने के बाद देश पर बलिदान होने की परंपरा आज तक नहीं पड़ी है हाँ अहिंसा की परंपरा पद चुकी है......... मेरा मानना है जब किसी व्यक्ति की समझ में अहिंसा की बात न आ रही हो तो उसकी नाक पर कसके घूँसा जमा दो अहिंसा का महत्त्व अपने आप समझ में आ जाएगा ........ और ये थप्पड़ जो मंत्री जी के गाल पर पड़ा है वाही अहिंसा का महत्त्व समझाने के लिए ही पड़ा है...... अब समझ जाएँ तो ठीक नहीं तो ...........! http://munish.jagranjunction.com/2011/11/25/%e0%a4%a5%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a5%9c-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a5%82%e0%a4%81%e0%a4%9c/

के द्वारा: munish munish

मैं ही नहीं लगभग सभी परेशां हैं भ्रष्टाचार और बढ़ती महंगाई से....... पर मेरे अनुसार इसके लिए हिंसा की कोई आवश्यकता नहीं.. मैं हर उस शक्श को समर्थन करता हूँ जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाता है... पर अफ़सोस इस तरह के आक्रोशित लोग उन लोगों को भी निशाना बना लेते हैं.... जो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे है..... अरविन्द केजरीवाल इसका उदहारण है..... आपने कहा की ....... इतिहास गवाह है कि कुर्सी पर बैठना वाला कभी भी आम जन को नहीं समझ पाया. चाहे फिर कोई तानाशाह हो..... आप जिस इतिहास का उल्लेख कर रहे हैं.. वो शायद मैंने नहीं पढ़ा ........ चन्द्रगुप्त मौर्या से लेकर ......... अकबर तक कई शासक आये जिन्होंने जनता के लिए उल्लेखनीय कार्य किये....... अल्लाउद्दीन खिलजी की बाज़ार व्यवस्था आम जन के कल्याण के लिए ही बनाई गई थी.....

के द्वारा: Piyush Kumar Pant Piyush Kumar Pant

जहां तक वर्तमान परिदृश्य की तुलना अँग्रेजी साम्राज्य से करने की है..... तू ये सर्वथा अनुचित है.... तब हमारे पास कोई अधिकार नहीं थे.... पर लोकतन्त्र मे वोट नाम का हथियार आपके पास है.... पहले हम ही किसी को भी अपना मत जाति, धर्म, क्षेत्र, परिवार या किसी दल विशेष के प्रति निष्ठा के चलते व्यर्थ कर देते हैं.... और फिर जब जाति, धर्म, क्षेत्र, परिवार की राजनीति करने वालों के द्वारा छले जाते है तो यही सब करते हैं जो कल हुआ.... एक दिन सारा देश अन्ना के पीछे खड़ा हो जाता है.... और लगता है की कुछ परिवर्तन देश की जनता की सोच मे हुआ है..... फिर ये नेता अन्ना पर ही उंगली उठाते हैं.... और वही सारी भीड़ मिलकर उनपर उंगली उठाने लगती है.... इस सोच के साथ विकास किस अर्थ मे होगा... हम मुद्दों को समझे बिना ही अपनी राय कायम करने के आदि हो गए है... यदि हाथापाई से ही कीमतें घटने बढ्ने लग जाएँ तो फिर सांसदों को संसद मे ही ये सब करने को कहा जाए.... और वहीं से महंगाई कम हो जाए.... अक्सर सही करने वालों के भी कई विरोधी हो जाते है.... आप एक दिन नियम के अनुरूप चल कर देखें और आप पाएंगे की उसी दिन आपके कई विरोधी पैदा हो गए.... और यदि ये आपके खिलाफ हिंसा करते हैं तो एक बड़ा वर्ग उसे आपके विरुद्ध आक्रोश की संज्ञा का नाम देकर इतिश्री कर लेंगे.... जहां आपको अपना आक्रोश प्रकट करना है उस दिन क्यों आप वोट देने से दूर हट जाते है.......

के द्वारा: Piyush Kumar Pant Piyush Kumar Pant

मान्यवर पियूष जी, सादर. मैं आदरणीय तमन्ना जी की बातों से शत-प्रतिशत या कोई इससे भी अधिक का आंकड़ा हो तो उतने प्रतिशत तक सहमत हूँ. आपने कहा- ""अगर एक बार हम इसे आक्रोश की संज्ञा देकर शांत हो गए तो ये एक परंपरा बन जाएगी…"" मान्यवर, अगर भ्रष्टाचार और घोटाले परम्परा बनेंगे, अगर इन नेताओं का अपने वादे से पलटना परम्परा बनेगा, जनता को लूटना-खसोटना परम्परा बनेगा, भ्रस्टाचारियों को बचाना परंपरा बनेगा, आम जनता को महंगाई की चक्की में पिसते हुए और कराहते हुए देखकर भी असमर्थता जाहिर करना परम्परा बनेगा तो, जनमानस भी तो कोई एक परंपरा बनाएगा. इसपर इतना विवाद क्यों ? एक्शन के प्रतिकूल रि-एक्शन तो होता ही है. सधन्यवाद.

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

पियूष जी ,.सादर अभिवादन आपके लेख से मैं थोडा सहमत हूँ ,...थप्पड़ मरने की बजाय वोट की ताकत दिखाना बहुत बेहतर विकल्प है .. मुझे नहीं लगता थप्पड़ परंपरा बन सकता है ,.....हिन्दुस्तान की जनता बहुत ही सहनशील है ,.हम आखिरी तक प्रयास करते हैं ,...लेकिन अब पानी सर के ऊपर से गुजर रहा है ,..ये देश के सौदेबाज नेता आखिर कब तक हमारी सहनशीलता की परीक्षा लेंगे ,. ..अमूल बेबी के चमचे देश के मंत्री जब काले झंडे दिखाने वाले को अपने गुलाम होने का सबूत देने के साथ गाँधी जी को आखिरी कांग्रेसी श्रद्धांजलि दे रहे थे तब हमारी बुद्धिजीविता को क्या हो जाता है ?........और इसे पता नहीं कितने उदहारण हैं ,..जब इन्ही नेताओं ने लोकतंत्र को तार तार किया है ..... यह थप्पड़ केवल एक व्यक्ति का एक नेता को थप्पड़ नहीं मानना चाहिए ,...यह आम जनता का नेताओं की व्यवस्था को एक तमाचा है....इस व्यवस्था को बदलना ही होगा...........सुन्दर विवेकशील लेख के लिए हार्दिक आभार ....आपका प्रतिक्रिया का जबाब न देना अखरता है ,...संभव हो तो कृपया दो चार शब्द लिख दिया करें ,.. आशीर्वाद समझ ग्रहण करेंगे ...पुनः आभार

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

प्रिय पियूष भाई ......आदाब ! आप मेरे किसी लेख पर अपना कमेन्ट चाहे न दे लेकिन इसी तरह से अपने लेखो में मेरा नाम शामिल करते हुए मेरी भूख को मिटाते रहे -यही आशा +अपेक्षा और कामना है ..... आपने जो बात कही है उससे हम दोनों ही भली भांति परिचित है ..... क्योंकि स्वामी रामदेव जी के बारे में मत भिन्नता होने के बावजूद हममे सार्थक संवाद हुआ था ..... आदरणीय वाजपेई जी ने ही इस मंच पर पहली बार इस मुद्दे को उठाया है और जागरण द्वारा इसकी रोकथाम के लिए कदम उठाने की बात कहने के साथ वाजपेई जी हम सभी को पीछे छोड़ कर इस मंच मर्यादित की मर्यादा और गरिमा को फिर से स्थापित करके पहले भी कहीं ज्यादा सम्माननीय +इस मंच के इतिहास पुरुष बन गए है -उनको नमन ...... इस विचारोतेजक +विचारणीय लेख पर मुबारकबाद

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

पियूष जी बहुत समय बाद आपका विचारपूर्ण आलेख अच्छा लगा.निंदक नियरे राखिये बहुत श्रेयस्कर है,परन्तु निंदा के लिए निंदा करना या स्वार्थ पूर्ती हेतु कुछ भी कहना मेरे विचार से पर उपदेश कुशल बहुतेरे को चरितार्थ करता है.निंदा सकारात्मक हो ठोस बिन्दुओं पर हो और निंदक स्वयं निंदा करने वाले विषयों में लिप्त न हो,तभी निंदा का औचित्य है.मंच की गरिमा जैसा कि आदरनीय बाजपेयीजी ने लिखा है,बनाये रखनी आवश्यक है.अमर्यादित भाषा का प्रयोग चाहे प्रतिक्रिया के रूप में हो या फिर किसी भी आलेख के रूप में सर्वथा अनुचित.स्वयं शराब पीने वाला यदि मदिरापान से बचने या जुआरी जुआ न खेलने का उपदेश दे तो न्यायोचित कैसे हो सकता है

के द्वारा: nishamittal nishamittal

के द्वारा: Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता ) Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता )

पीयूष भाई, नमस्कार। हम स्वतंत्र तो हो गए मगर हमारी सोच आज भी दासता की बेड़ियों में जकड़ी है। हिंदी केवल राजभाषा नहीं, राष्ट्रभाषा भी है और मेरे लिए तो मातृभाषा भी है। आपकी कहानी के भाव अत्यंत ही सुन्दर हैं। इससे मुझे एक वाक़िया याद आ गया जब मेरा फ़ोन खो गया था और मैं शिक़ायत दर्ज़ कराने कंपनी के ऑफिस पहुंचा तो मुझे अंग्रेज़ी वार्तालाप से जूझना पड़ा। मैं हिंदी में ही बात करता रहा और जवाब अंग्रेज़ी में ही मिलते रहे। दुर्भाग्यवश अधिकतर उत्तर मुझे sorry के रूप में मिले अंततः जाते-जाते अंतिम उत्तर भी जब मुझे अंग्रेज़ी में sorry ही मिला तो विवश हो कर मैं उठ खड़ा हुआ और उन्हें अंग्रेज़ी का ही जवाब दिया कि Whatever I asked or enquired was answered as sorry but you should know that 'a sorry doesn't make a dead man alive.' और इसके बाद उस लड़की का चेहरा देखने लायक था। अन्य मातृभाषाओं वालों को देखें वो जब भी कहीं मिल जाते हैं तो अपनी भाषा में ही बात करते हैं मगर हिंदी भाषी राज्यों में ये चलन नहीं है, बल्कि वे तो अंग्रेज़ी को स्टेटस सिम्बल या प्रतिष्ठा का प्रतीक मानते हैं। शर्म आनी चाहिए ऐसे लोगों को जो अपनी भाषा का तिरस्कार करते हैं बल्कि धिक्कार है उन पर। मैंने कई भाषाओँ का अध्ययन किया है मगर आज भी जब वक़्त होता है तो मैं हिंदी का ही प्रयोग करता हूँ। आपके इस लेख पर हार्दिक बधाई आपको।

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

पीयूस जी अभिवादन आपका लेख पडा बदिया लगा और देश भक्ति की परिभाषा भी जच गयी पर हर कोई आपसे सहमत हो यह जरुरी नहीं तो रामदेव के आन्दोलन को कोई भी नकार नहीं सकता क्यों की यह जनता के लिए था पर कुछ तो बात रही होंगी जिनसे उनकी वह इमेज नहीं बन पाई जो अन्ना की थी पर बाद में जो हुआ वह और निदनीय रहा जिसकी हर बर्ग ने आलोचना की है उसी का परिणाम है की अन्ना आज राजघाट पर बेठे है और सफल सञ्चालन चल रहा है रामदेव बाबा को आत्म्लोकन करने दीजिये मीडिया और बुद्धिजीवी बर्ग उनके बिश्लेषण में लगा है क्यों उनके पास साक्ष है देश में दो बर्ग चल रहे है एक कोंग्रेस और दूसरा भा जा पा तीसरा बर्ग है आप जैसे लोगो का जो अपनी बात पूर्ण विश्वाश से कह सकता है बाकी मीडिया भी एक पार्ट है जो सच दिखने का दंभ भरती है सच क्या है वह समय पर छोड़ दीजिये किसी पर हम अपने विचार थोप नहीं सकते है यह ही तो लोकतंत्र है बदिया है बधाई हो.

के द्वारा:

पियूष जी , आपके विचार बहुत अच्छे हैं, परन्तु आप मुर्दों को आवाज क्यों दे रहे हैं? इनकी बीवी पराये मर्दों संग पायी जाए तो भी ये शरीफ लोग उन्हें भाई बहन ही समझेंगे जबकि हकीकत कुछ और होगी। अभी भी कुछ मुर्दे रामदेव के सराहनीय कार्य को हरकत कह रहे हैं। ऐसे देश के नागरिकों से देश को भगवान ही बचाए। इन मुर्दों का दिमाग बस एक ही जगह सेट है की राजनीति सिर्फ राजपरिवार के लोग या इनसे जुड़े लोग ही कर सकते हैं और किसी का इसपर खासकर साधुओं संतों का कोई अधिकार नहीं. राजपरिवारों के पास अधिक संपत्ति हो तो वह वैध, यदि किसी संत ने जड़ी बूटी बेच कर, प्रवचन दे कर दक्षिणा प्राप्त किया तो वह अवैध। उनके कई ऐसे अनुयायी हैं जो उन्हें लाखों करोड़ों रूपये दान में देते है। शायद इन मुर्दों को ये नहीं पता की रामदेव बाबा जैसे संत इन्ही पैसों से गरीब बच्चों को शिक्षा दिला रहे है, इन्ही के औषधालय के द्वारा बेरोजगार युवा अपने परिवार का पेट पाल रहा है। इन मुर्दों से मेरा निवेदन है की रामदेव जैसे संतों पर आरोप मढने से बाज आयें अन्यथा भूत भगाने के सटीक मंत्र हमें भी आते हैं। खैर इन लोगों से उम्मीद भी क्या की जा सकती है इन लोगों को क्रिकेट, रोमांटिक फ़िल्में, डिस्को, गर्लफ्रेंड से फुर्सत कहाँ?

के द्वारा:

भाई राजकमल जी....... वास्तव मे इस देश का दुर्भाग्य है की यहाँ किसी व्यक्ति विशेष की पोशाक, और उसकी वेषभूषा राष्ट्रहित से अधिक मूल्यवान है.... कई लोगों का इस आंदोलन से विरोध का कारण इसकी अगुवाई बाबा रामदेव के द्वारा किया जाना है.... कई लोग इस लिए नहीं जुड़ना चाहते की खुद बाबा रामदेव एक योगपीठ चला रहे हैं जिसकी कमाई का कोई हिसाब नहीं है.... और ये वो लोग है जो भ्रष्टाचार के विषय पर बोलते समय भ्रष्ट लोगों को फांसी देने की बात तक कर जाते हैं ..... क्योकि वो जानते हैं ऐसा कोई कानून नहीं बनने वाला ..... और अगर बना तो वो खुद भी उसके फेर मे आ सकते हैं..... तो बाबा ऐसे मे काले धन और भ्रष्टाचार के मामलों मे दोषी पाये जाने वालों के लिए मौत की सजा मांग रहे हैं तो इसमे विरोध क्यों.... अगर बाबा रामदेव के पास काला धन है तो वो भी दोषी होंगे.... और मौत की सजा उनको भी दी जाएगी... बाबा ने कहीं ये नहीं कहा की संतों को इस कानून से बाहर रखा जाए... जब तक हम लोग कभी वस्त्रों के रंग को देख कर ... कभी आदमी के स्वरूप को देख कर .... कभी उसकी प्रष्टभूमि को देख कर ऐसे आंदोलनो से खुद को दूर रखेंगे ... ये नेता इसी तरह बहला फुसला कर असली मुद्दों से ध्यान हटा देंगे..... क्या होता अगर आज़ादी के लिए लड़ने वालों ने देश से ऊपर अपने धर्म को रखा होता..... या अपने निजी हितों को रखा होता..... भगत सिंह ने सिक्ख होने के बाद भी अपने केश कटवा दिये... जो देश के लिए शीश कटवाने के लिए तैयार हों उनके लिए केश बहुत छोटी बात है....... तो जाने दें बाबा की नियत को हम बस अपनी नियत साफ रखें और अपने अपने दम पर आंदोलनो को खड़ा करने के योग्य बने ........ अन्यथा जब कोई सार्थक आंदोलन हो उसमे सहभागी बने.......

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

बहुत सटीक विचार पियूष जी,असलियत में स्वयं सरकार को तो खतरा ये है कि उसको अपनी गाड्डी डोलती दिख रही है,तो बौखलाना स्वाभाविक है ,कलई खुलने के भयसे भी येन केन प्रकारेण सत्ता आन्दोलन को कुचलना चाहती है, शेष विरोध करने वाले जैसा कि आपने कहा एक अजीब मानसिकता से ग्रस्त हैं.इसीलिये कहा जा रहा है कि बाबा को राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए.सन्यासी का धर्म क्या राष्ट्र के प्रति नहीं होता?योग से व आयुर्वेदिक दवाओं से पैसा एकत्र करने का आरोप भी लगाया जा रहा है,aisa होना बौखलाहट में आश्चर्यजनक नहीं.दवाओं के निर्माण में लगने वाला धन कहाँ से आएगा ये बात लोगों की समझ में नहीं आती.बहुत अच्छा लेख.बधाई.

के द्वारा: nishamittal nishamittal

आपके इस समर्थन के लिए जागरण जंक्शन संपादक मंडल का हार्दिक धन्यवाद ......... ये घटना कोई बहुत बड़ी नहीं थी. किन्तु इस पर आदरणीय लेखक महोदय का रुख कुछ अनुचित था. मैंने स्वयं उस कहानी में एक प्रतिक्रिया में स्पष्ट किया था की आप इसे जहाँ चाहे प्रयोग करें .... ताकि लोग इसका लाभ उठाए ताकि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो.. पर इन सज्जन ने कुछ इस तरह का माहौल बनाया जैसे की मैंने इनकी रचना का प्रयोग किया हो.... किन्तु आपके इस स्पष्टीकरण ने कि "आपने इस रचना को जागरण जंक्शन मंच पर अगस्त 2010 में प्रकाशित किया था"... ने मेरा मनोबल बढाया.. यद्यपि इस समय अधिकाँश पूर्व ब्लोगर किसी न किसी कारन से इस मंच पर लेखन से दूर हैं पर अभी भी लोग लगातार एक दुसरे की रचनाये पढ़ते हैं.. भले प्रतिक्रिया न दे पायें... इस तरह के हालत उन ब्लोगर्स को वापस आने से रोक ने का काम करते हैं.... आपकी इस पहल ने सभी ब्लोगर्स का मनोबल अवश्य बढाया होगा..... आपका हार्दिक आभार....

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

आदरणीय पीयूष पंत जी, जागरण जंक्शन मंच मूल रूप से लेखक के आलेख की गुणवत्ता के आधार पर उसे फीचर्ड ब्लॉग की श्रेणी प्रदान करता है और मंच के ब्लॉगर मनोज जायसवाल जी की उक्त रचना को भी इसी आधार पर फीचर ब्लॉग की श्रेणी प्रदान की गयी. मनोज जायसवाल जी ने अपने ब्लॉग स्पॉट पर इस ब्लॉग को अक्टूबर, 2010 में प्रकाशित किया था जबकि खोजबीन से पता चला है कि आपने इस रचना को जागरण जंक्शन मंच पर अगस्त 2010 में प्रकाशित किया था तो इससे पता चलता है कि उक्त रचना मूल रूप से आपकी है. आपको ज्ञात हो कि हालांकि किसी भी चुराई गयी रचना को फीचर की श्रेणी नहीं प्रदान की जाती किंतु मंच के लिए निश्चित रूप से ये एक चुनौती भरा काम होता है कि वह हर ब्लॉगर की पुरानी रचनाओं को याद रख कर नए आने वाले ब्लॉग को फीचर की श्रेणी प्रदान करे, इसलिए कभी-कभार ऐसी समस्या आ खड़ी होती है लेकिन जागरुक ब्लॉगरों से अपेक्षा की जाती है कि यदि ऐसी कोई अवांक्षित गतिविधि नजर आती है तो मंच को समय पर अवगत कराने की अवश्य कोशिश करें ताकि समस्या के निदान की दिशा में कार्यवाही की जा सके. साथ ही सभी अन्य पाठकों को भी ये संदेश जारी किया जाता है कि यदि आपको किसी लेखक की कोई रचना अच्छी लगती है और आप चाहते हैं कि उस रचना का लाभ अन्य लोग उठा सकें तो आप उसे अपने ब्लॉग में प्रकाशित करने के पूर्व लेखकीय धर्म का निर्वाह करते हुए मूल लेखक या मूल स्रोत का नाम अवश्य दें. जागरण जंक्शन मंच को समय पर सूचना भेजने के लिए आपका आभार धन्यवाद जागरण जंक्शन परिवार

के द्वारा: JJ Blog JJ Blog

आदरणीय श्री पियूष जी + राजकमल जी सदार अभिवादन जागरण के लचर रवैये के कारण ऐसे शरारती तत्व उत्साहित होते रहते हैं | एक बार ऐसे लोंगो के पकड़ में आने पर उन्हें बैन कर देना चाहिए क्यों कि जिसके पास मर्यादा नहीं वह साहित्य की सेवा कैसे करेगा | अगर वो साहित्य का रचना भी करेगा तो कलुष से प्रेरित होकर ................क्या फायदा है ऐसे लोंगो को बढ़ावा दे कर ? मेरा पूर्ण विश्वास है की इस मामले में पियूष जी शत प्रतिशत सत्य है .............ऐसे चोर आँखों के सामने न होने का फायदा उठाते है वर्ना सारी चोरी ...............................आगे क्या कहूं, इंटरनेट ने साहित्य का मजाक बना कर रख दिया है ........एक ही रचना के अनेक रचनाकार नजर आते है इधर गब्बर सिंह का चरित्र फसबूक से होकर अंततः जागरण के प्रांगन में भी कई नामों से कई बार उपस्थित हुआ जिसे देखकर वो अनमोल कृति याद आ गयी --------. कितनी नावों में कितनी बार | धन्यवाद एवं विदा |

के द्वारा:

मासूम को सजा (एक मार्मिक कथा.) very nice post manoj ji इन सज्जन कम दुर्जन शख्स के बारे में इक चौंकाने वाली बात और बताना चाहता हूँ की यह अपनी खुद की ही पोस्ट पे खुद ही कमेन्ट करते है वोह भी कई नामो से इसी चक्कर में इनसे असावधानीवश इक महान भूल भी हो गई है ऊपर वाली टिप्पणी इन्होने अपने खुद के ही ब्लाग पर की है लेकिन भूलवश अपनी आई डी से ही खुद अपनी तारीफ ही कर बैठे अगर यह इतने ही सच्चे है तो अपने ब्लॉग पर आई हुई टिप्पणीकर्ता (फर्जी ) के इमेल आई डी बताए यह भी बताए की उन्होंने आज तक क्या -२ ब्लाग लिखे आपके बारे में न केवल मेरा बल्कि बाकि सभी का भी यह पूरा विश्वाश है की आप ही सच्चे है और आप ऐसा कोई भी काम कभी कर ही नहीं सकते है धन्यवाद (मैं आपके साथ हूँ )

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

के द्वारा:

के द्वारा:

घर पहुंचा तो किसी ने कुछ खास ध्यान नहीं दिया…… मैं बड़ा आश्चर्यचकित हो गया …. की ये क्या है….. फिर मैंने अपनी माता जी से कहा की मैं अभी भाग कर वापस आ रहा हूँ………. मुझे कुछ तो तवज्जो दो….. सब लोग हसने लगे……… मैं झेप गया…… मेरी समझ मे नहीं आया की मैं इतनी दूर तक भागा ओर फिर भी मुझे कोई भाव नही दिया……… क्या मैं गलत भागा……. अब मैंने सोचा की क्यों न उस लड़के से भागने का सही तरीका पूछूं…… ओर सही तरह से भागूँ………. फिर मैं उस लड़के से मिला……. मैंने बिना ये बताए की मैं एक बार भागने का असफल प्रयास कर चुका हूँ…… उससे पूछा की भाई तू भागा कैसे ………. ------------------------------------------------------------------------------------- बहुत खूब पियूष जी मजेदार संस्मरण ..... जिसके साथ आपने इसकी नैतिक शिक्षा जोड़कर और अच्छा बना दिया है बधाई :) ------------------------------------------------------------------------------------ हाँ एक बात याद रखिये अब भागने की कोशिश मत करियेगा नहीं तो सत्कार तो मिलाने से रहा .... मार डाट फ्री में मिल जायेगी :) -----------------------------------------------------------------------

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey Shailesh Kumar Pandey

आदरणीय मिश्रा जी ....... आपने सही बात कही है........ यही मेरा मन्तव्य है की क्यों एक ऐसा माहौल था की जब लोग अपने लेखों को बिना वेलेंटाइन कॉन्टेस्ट लिखे रखने मे डर रहे थे......... क्यों नहीं लोगों ने देश प्रेम से भरे लेख भी इस प्रतियोगिता मे उतारे...... आखिर देश प्रेम क्यों प्रेम की श्रेणी से बाहर हो गया......... एक खूबसूरत लेख पढ़ा था जिसके एक वाक्य ने बड़ा प्रभावित किया.........की......... हमारे विचार लोगों को प्रभावित करते हैं या हम सिर्फ लोगों को प्रभावित करने के लिए विचार करते हैं……. यदि मेरी नजर से देखा जाए तो वो इस कॉन्टेस्ट के दरमियान आये सर्वश्रेष्ठ लेखों मे एक था.......... अगर आप पढ्ना चाहे तो........ लिंक......... http://rahulpriyadarshi.jagranjunction.com/?p=188

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

मैं समझता हूं कि जेजे जैसे प्रतिष्ठित मंच पर इस प्रकार की किसी प्रतियोगिता की कोयी जरूरत नहीं थी । देश आजादी के बाद अपने सबसे भ्रष्टतम कालखण्ड से गुजर रहा है । घोटालों पर घोटाले, देश और देशवासियों का खरबों खरबों रूपया रोज बरबाद हो रहा है । प्रधानमंत्री की स्वच्छ छवि दागदार हो गयी । केन्द्र सरकार स्विस बैंक में जमा कांग्रेसियों के खरबों डालर को बचाने के लिये बहाने पर बहाने किये जा रही है । जेपीसी और पीजे थामस पर बेशर्मी की सारी हदें पार कर दी गयीं और न्यायपालिका को थके और गठबंधन का अधर्म निभाते प्रधानमंत्री हद में रहने की नसीहत दे रहे हों ऐसे वक्त में जेजे ने एक विदेशी, बाजार द्वारा प्रायोजित डे पर एक प्रतियोगिता आयोजित करने का कोयी तुक नहीं बनता । जैसे यह प्रतियोगिता बुद्धिजीवी ब्लागर्स का ध्यान तमाम मुद्दों से भटकाने के लिये की गयी थी । क्या जेजे पर बाजारवाद हावी हो चला है ? क्या जेजे अपनी टी आर पी बढ़ाने के लिये आगे भी ऐसे टोटकों का सहारा लेगी ? कुछ समझ में नहीं आता है । . एक तरफ फेसबुक ने मिस्र में हुस्नी मुबारक की तानाशाही खत्म कर दी तो भारत में जेजे ध्यान भटकाओ प्रतियोगिता आयोजित कर रही है ।

के द्वारा: kmmishra kmmishra

निखिल जी ...... आपने बिलकुल सही कहा की प्रेम का जो स्वरूप बाजार मे है वो इस मंच पर नहीं दिखा..... इसके विपरीत यहाँ प्रेम के अलग अलग स्वरूप दिखे.......... कहीं आध्यात्मिक तो कहीं सांसारिक...... पर आखिर ऐसा क्या रहा की कई उत्कृष्ट ब्लॉगरों से खुद को इस से दूर ही रखा...... क्यों राष्ट्रवादी विचार धारा वाले जो राष्ट्र प्रेम को ही सबसे बड़ा मानते हैं ........ या वो लोग जो प्रेम को अपने परिवार से जोड़ कर देखते हैं....... इस प्रतियोगिता मे भाग नहीं लिए........ कहीं न कहीं जागरण जंक्शन इस स्तर पर विफल रहा की वो ये यकीन दिला सके की वो केवल प्रेम की बात करना चाहता है......... और प्रेम संस्कृति से या देश से या माता पिता से किसी से भी हो सकता है..... इसका नतीजा ये निकला की कई लोग यहाँ JJ को खुश करने के लिए ये लिखते पाये गए की ...... माँ ओर पुत्र का प्रेम प्रेम नहीं है........ पति पत्नी का प्रेम भी प्रेम नहीं .......... और प्रेम केवल प्रेमी ओर प्रेमिका के बीच ही होता है........... आखिर क्यों ......... ? क्योकि प्रतियोगिता का स्वरूप न तो ठीक ठीक व्यक्त किया गया......... और न ही नियम ............ .आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……… ……

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

चातक जी....... शायद आप सही कह रहे हों ..... पर एक प्रश्न ये उठता है की जो रचना आज फीचर्ड होने के योग्य नहीं है....... कल ऐसे क्या हालत होते है की वही रचना फीचर्ड हो जाती है........ एक बहुत सुंदर लेख का बुरा हाल देख कर आहात हुआ हूँ........... प्रतियोगिता के परिणाम आने के बाद उसको पुनः पटल पर रखने की उक्त ब्लॉगर से मैं मेल पर अनुमति ले चुका हूँ....... वो रचना न हो फीचर्ड हुई और न ही प्रेम से भरे पाठकों द्वारा सराही गयी..... आशा है की JJ आपकी बात का मान रखेगा.......... और सभी ब्लॉगर चाहे वो हर रोज के ब्लॉगर हों अथवा केवल दो ब्लॉग वाले हों अथवा कभी कभी मंच पर अपने विचार रखने वाले को एक समान रूप से आकेगा......... आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया.......

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

पियूष जी मै प्रारंभ में इसपर कुछ भी लिखना नहीं चाहता था.. लेकिन ..मुझे अब लगता है की इस कांटेस्ट को यहाँ एक नया रूप मिल गया ... इसका विदेशी स्वरुप यहाँ पर कही नहीं दिखा और कही था भी तो छुपा था .. सामने थी प्रेम की वही भारतीय व्याख्या जहा भौतिकता को सबसे निकृष्ट समझा जाता है... तो मुझे लगता है की बढ़िया हुआ इसी बहाने.. ये तो स्पष्ट हो गया की बुद्धिजीवी वर्ग अभी तक प्रेम के किस रूप को मान्यता देता है... कांटेस्ट के पीछे जो भी विचार हो... मुझे सबसे अच्छा ये लगा की हमने वैलेंटाइन डे को एक नया रूप दिया वैचारिक स्तर पर ठीक वैसे ही जैसे व्यवहारिक स्तर स्कुलो में बच्चो ने अपने दोस्तों को माता पिता .. को भाई बहन को वैलेंटाइन विश किया ये देख कर तो यही लगा ,,, की इसे स्वीकार करके हमने इसे नई परिभाषा दे दी.. है अर्थ बदल रहे है.. ये और ज्यादा सकारात्मक हो रहे है.. कांटेस्ट का परिणाम चाहे जो हो.. पर मुझे बढ़िया लगा .. लिखकर ..और साथियो की रचनाये पढ़कर..

के द्वारा:

प्रिय पीयूष जी, आपकी पोस्ट पढ़ कर कई बातों का पता चला| जागरण पर चल रही प्रतियोगिता ने काफी कुछ पढने का मौका दिया परन्तु समयाभाव के कारण सभी की पोस्ट पर कमेन्ट ना कर पाना थोडा खर भी रहा था| कई बार फीचर्ड ब्लॉग और अभी-अभी में आई हुई पोस्ट के चुनाव पर असहमति होती है लेकिन मुझे नहीं लगता कि जे.जे. किसी भी तरह की मुश्किल महसूस करता होगा| हाँ ये अंतर्द्वंद हममें से ज्यादातर ब्लागरों के मन में जरूर होगा क्योंकि कोई भी प्रतियोगिता किसी इम्तिहान की तरह होती है जिसके नतीजे आने तक लगातार प्रतिभागियों के मन में कौतूहल, आशाएं और डर बने रहते है लेकिन परीक्षक और जज के मन में ऐसी कोई बात नहीं होती| ये शायद ब्लागरों के दिल का अंतर्द्वंद है जो 'प्रभाव स्थांतरण' की भांति हमें जे.जे. पर दिखाई दे रहा है जबकि वह तो शायद बिलकुल निर्द्वंद होकर नतीजे निकालने में लगा होगा| एक बेहतर लेख द्वारा ब्लागरों के मन की बात पटल पर रखने के लिए आप बधाई के पात्र हैं!

के द्वारा: chaatak chaatak

भाई राजकमल जी....... आपने हमेशा इस मंच पर बिना किसी चिंता की अपनी बात को बखूबी रखा है........ और इसके फलस्वरूप आपको हमेशा जागरण की ओर से उपेक्षा ही मिली है....... कई बार आपके ब्लोगस पर मैंने कहा की ये ब्लॉग निश्चित ही फीचर्ड होने के योग्य है ...... पर जब उसी दिन किसी अन्य साधारण ब्लॉग को फीचर्ड होते देखा तो लगा की शायद यहाँ स्पष्टवादिता का रिवाज नहीं है....... आपकी उस पहल जिसमे लगातार कई ब्लॉग एक साथ आने पर आपने ईसाई आतंकवाद नाम से व्यंग लिखा था........ उसको इनहोने व्यंग मे ही उड़ा दिया....... पर जब आकाश भाई ने आपके समर्थन मे फिर लिखा तो JJ उत्तर देने उतरा...... इसी तरह डॉ आशुतोष जी.... भी बिना किसी प्रतिक्रिया या अन्य पुरस्कार के लोभ मे लगातार ब्लॉग लिखते हैं........ पर कभी ब्लोगस की कमी होने पर ही उनके ब्लोगस फीचर्ड होते हैं......... उनके सामाजिक लेखों को यूं ही जाया कर दिया जाता है....... इस मुहिम मे आपका साथ इसलिए भी आवश्यक था क्योकि इस तरह के लेखन की ये सारी प्रेरणा आप ही से मिली है...... प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया...............

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

प्रिय पियूष भाई ....नमस्कार ! आप तो मेरे से भी बड़े जिगरे वाले निकले .... वाह ! क्या बात है .... इतनी बेबाकी से तो मैंने भी अपना आक्रोश व्यक्त नहीं किया , और वोह भी इतने सुरुचिपूर्ण ढंग से , अकाट्य तर्कों और दलीलों समेत .... भाई मेरे बहुत -२ मुबारकबाद ..... अब तो लगता है की जागरण जंक्शन वाली मेरी बीवी को अपना वोही साढ़े नो गज वाला घूंघट उठा कर आपको अपना दीदार करवाना ही पड़ेगा ...... देखना कहीं आप मेरी तरह उसकी खूबसूरती पर रीझ कर कोई रियायत मत दे देना उसको .... आपकी कोशिशे सफल हो , इस अभियान में कलम से मैं बाकी ब्लागरो की तरह आपके साथ हूँ ... और रही बात धन की तो , आप मेरी हालत जानते ही है , की यहाँ से कितना मिलता है और क्या मिलता है ? धन्यवाद सहित शुभकामनाये

के द्वारा: rajkamal rajkamal

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

मेरे मित्र ......... आपने अपनी पहचान छुपाई है ये आपकी मजबूरी नहीं कमजोरी कही जानी चाहिए....... और जहां तक मेरे JJ से पंगा लेने का प्रश्न है तो इसमे कुछ गलत नहीं है..... इस मंच पर हमे समाज को बदलने के नारे लगाते हैं ओर मंच पर हो रही अराजकता को केवल पुरस्कार के लोभ से सहे जाएँ तो ऐसी प्रतियोगिताओं से बाहर होने मे कोई बुराई नहीं है........... और वैसे भी हमारे स्तर का प्रेम JJ को पसंद भी नहीं है....... क्योकि यहाँ न प्रेमी है न प्रेमिका......... संस्कारों का तो अब हर तरफ अंतिम संस्कार किया जा चुका है ........ फिर JJ से कोई उम्मीद क्यों........ आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया................ पर एक बात कहना चाहता हूँ........ की नाम बदलकर किसी क्रांति की बातें नहीं की जा सकती.............

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

पियूष जी , इस लेख का हर पैराग्राफ अपने में महत्त्व समेटे हुए व गहन चिंतन के उपरांत लिखा गया सार्थक लेख है वैसे ही आपके सभी लेखों मे अद्भुत जीवन्तता होती है इस लेख की अंतिम पंक्ति पढ़ कर तो में अपनी हंसी भी नहीं रोक सकी....ओखली में सिर दे दिया है.....देखें कितने मूसल पड़ते हैं .....! जब ओखली में सिर दिया है तब तो मूसल पड़े बिना कोई भला कैसे बच सकता है! इसके साथ ही मेरी फॉन्ट सबंधी समस्या का समाधान अगर आप कर सकते है तो मैं आपकी बहुत आभारी होऊँगी पोस्ट लिखते समय HTML पर कोई भी ऑप्शन फॉन्ट के बड़े करने का नहीं है मैने बहुत कोशिश की पर नहीं हो सका अगर दूसरा कोई तरीका हो और आपके लिए संभव हो तो कृपया बताने का कष्ट करे बहुत धन्यवाद !

के द्वारा: