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परिवर्तन की ओर…….

बदलें खुद को……. और समाज को…….

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Piyush Kumar Pant


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धृतराष्ट्र न बनें…

Posted On: 12 Jan, 2012  
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जनरल डब्बा में

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तेरा शुक्रिया..

Posted On: 2 Dec, 2011  
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जनरल डब्बा में

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लोकतंत्र में थप्पड़….

Posted On: 24 Nov, 2011  
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जनरल डब्बा में

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खत्म होती नैतिकता……

Posted On: 19 Nov, 2011  
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हिंदी मतलब अशिक्षित…….??

Posted On: 14 Sep, 2011  
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ले मशालें चल पड़े है लोग हिंदुस्तान के…………

Posted On: 21 Aug, 2011  
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जनरल डब्बा में

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जागरण जंक्शन बनाम केंद्र सरकार …

Posted On: 16 Aug, 2011  
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जनरल डब्बा में

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गांधी के बंदर बन जाओ…

Posted On: 14 Aug, 2011  
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जनरल डब्बा में

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भारत महान देश था……

Posted On: 11 Aug, 2011  
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बाबा तुम अपराधी हो….

Posted On: 5 Jun, 2011  
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जागो जागरण जागो……

Posted On: 30 May, 2011  
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काफल पक गए पर मैंने नहीं चखे………….

Posted On: 28 May, 2011  
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जनरल डब्बा में

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परिभाषा सुख ओर दुख की……….

Posted On: 17 May, 2011  
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जनरल डब्बा में

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बोझ लगते ये बूढ़े….

Posted On: 25 Feb, 2011  
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जनरल डब्बा में

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आँखों देखि कानो सुनी सब झूठी… (एक मार्मिक कथा)

Posted On: 21 Feb, 2011  
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जनरल डब्बा में

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कहानी एक मासूम की (एक मार्मिक कथा)……

Posted On: 20 Feb, 2011  
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जनरल डब्बा सोशल इश्यू में

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संता का पत्र रजनीकांत को………..

Posted On: 18 Feb, 2011  
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जनरल डब्बा में

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भिखारी (आदतन भी और मज़बूरी से भी)……..

Posted On: 18 Feb, 2011  
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जनरल डब्बा में

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सड़क पर न्यायमूर्ति……..

Posted On: 16 Feb, 2011  
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जनरल डब्बा में

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प्रेम महापुरुषों की नजर मे…..

Posted On: 14 Feb, 2011  
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जनरल डब्बा में

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आँधी प्रेम की ……

Posted On: 14 Feb, 2011  
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जनरल डब्बा में

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गुमानी पन्त की कविता……

Posted On: 13 Feb, 2011  
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जनरल डब्बा में

12 Comments

दिन दीदी जाग जाग……..

Posted On: 12 Feb, 2011  
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जनरल डब्बा में

32 Comments

कुछ बातें प्रेम के सम्बन्ध में……..

Posted On: 11 Feb, 2011  
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जनरल डब्बा सोशल इश्यू में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

पिता पुत्र और गुरु शिष्य की तुलना नेता से नहीं की गई है........ तुलना आक्रोश की है..... आप आक्रोश के नाम पर गलत को सही नहीं ठहरा सकते इसके लिए ये उदाहरण लिए गए है........ क्योकि आज गुरु शिष्य के सम्बन्धों मे जो कटुता दिखाई देती है उसका मूल भी छात्रों का आक्रोश ही बताया जाता है..... बूढ़े माँ बाप को त्याग करने वाले लोग उनके प्रति अपने पूर्व आक्रोश को ही कारण बताते हैं..... अन्य किसी बात मे तुलना नहीं है पर आक्रोश को अलग अलग नहीं किया जा सकता है.... आप अपने को इस परिस्थिति मे रख कर देखेँ आपको भी स्पष्ट हो जाएगा की आक्रोश आपके प्रति भी कई लोगों मे है........ नाथुराम गोडसे को गलत ठहराने वाले ये भूल जाते हैं की उसके भीतर भी गांधी का पाकिस्तान के प्रति प्रेम आक्रोश का कारण बना था..... ये नेता या जन प्रतिनिधि हमारे लोकतन्त्र के प्रमुख हैं..... और इन्हें इनके कृत्यों का सबक सीखाने के लिए चुनावों की व्यवस्था है..... आप अपना क्रोध वोट से भी दिखा सकते हैं...... तो फिर चोट की क्या आवश्यकता है.... हम यहाँ पर बैठ कर कुछ भी लिख लेते हैं....... पर उस व्यक्ति के आक्रोश की कल्पना भी नहीं कर सकते..... जो की हाड़ कपकपाने वाली ठंड मे बार्डर मे हथियार लिए खड़ा है.... दुश्मन की किसी भी हरकत से निपटने के लिए उसे इन कमजोर नेताओं के आदेश की आवश्यकता है......

के द्वारा: पीयूष पंत

पर आम आदमी खुद कहाँ सुधार रहा है... इस थप्पड़ प्रकरण के बाद संसद मे लोकपाल पर चर्चा नहीं हुई और केंद्र सरकार ने रीटेल कारोबार में एफडीआई को अनुमति भी दे दी है......... पर जनता चाटे से ऊपर नहीं उठ पाई है..... किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा की देश मे क्या क्या हो रहा है सभी चांटे पर अपनी प्रतिक्रिया देने मे व्यस्त हैं...... कसाब को सरकारी खर्च पर पलते हुए आज 3 साल का समय हो गया पर मुद्दा आज चांटे का ही है... कोई भी सरकार की अक्षमता पर प्रश्न नहीं उठा रहा है...... बस चांटे ही पर प्रश्न और उत्तर चल रहे हैं....... आखिर किस तरह एक चांटा देश के लिए इतना महत्वपूर्ण हो गया...... आखिर आक्रोश का अर्थ क्या है...... ये कोई 4 दिन से भूखा व्यक्ति नहीं था जो अपनी लाचारी और सरकार के निकम्मेपन पर आक्रोशित था...... फिर इस व्यक्ति के आक्रोश का क्या अर्थ है........ ये सस्ती लोकप्रियता मात्र है...... और जिस तरह से इसे इनता समर्थन मिला है तो शायद इसे परंपरा बनने मे अब देर न लगे......

के द्वारा: पीयूष पंत

आदरणीय पियूष जी, मै अमिता जी की बात से बिलकुल सहमत हूँ.अगर नेता नहीं सुधरे तो विद्रोह तो होना ही है.हम मोटी मोटी बाते करके, की मास्टरजी ने थप्पड़ मारा और पिताजी ने लप्पड़ मारा जिन बातों का इससे दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है, कुछ साबित नहीं कर पायेंगे. खुद को एक थप्पड़ पडा तो लोकतंत्र याद आ गया, देश की करोड़ों जनता की आवाज को कुचलने के लिए संसद सर्वोच्च हो जाता है. एक थप्पड़ पर सारे सांसद एक हो जाते हैं घडियाली आंसू बहाते हैं.मगर कोई ये नहीं कहता की अपना चरित्र सुधार लो. एक थप्पड़ की तिलमिलाहट में नेताजी कहते हैं मै कौन होता हूँ माफ़ करने वाला.पिछले वर्ष को आप क्या भूल गए जब सारे टीवी चेनल बार बार कह रहे थे नेताजी चुप हो जाओ आपके बोलने से ही महंगाई बढ़ रही है तब भी लाकुआग्रस्त जबान खामोश नहीं रह पायी तो फिर जनता से माफ़ी की उम्मीद भी कैसे कर सकते हो? आज सारे विदेशों में क्रान्ति का बिगुल बज रहा है.मगर तब भी हमारा देश खामोश है क्योंकि हमारे यहाँ यही नेता बार बार कहते हैं कि हमारे यहाँ तो लोकतंत्र है. हमारी परिस्थितियाँ तो उनसे भिन्न है. मगर क्या वाकई भिन्न है? अपने आप को जन प्रतिनिधि कहलाने वाले क्या वाकई जन प्रतिनिधि हैं? कहीं तानाशाह तो नहीं है? विचार करें, सुर में सुर मिला देने से कुछ नहीं होने वाला.

के द्वारा: akraktale

प्रिय पियूष जी आपका लेख मति-भ्रष्ट लोगों की आँखे खोलने के लिए काफी है परन्तु, चले हुए कारतूसों के समान सत्ता से दूर हुए यशवंत सिन्हा जैसे नेताओं को क्या कहा जाए जो यह आह्वान करने से बाज नहीं आते कि महंगाई और बेरोजगारी से परेशां लोग हिंसा पर उतर आयंगे क्या किसी नेता को ऐसा आह्वान करना शोभा देता है - दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मंदिर में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है हमारा सबसे बड़ा हथियार हमारा "मत" या "वोट" कह लीजिये वही है लेकिन जनता को उनकी असली ताकत से रूबरू कराने के स्थान पर नेतागण अपने थोड़े से स्वार्थ के कारण जनता को हिंसा में ही झोकना चाहते है यह खतरनाक एवं आत्मघाती कदम जैसा है --- देश में महंगाई बेरोजगारी होने के बावजूद भी देश क्यों विकास की ओर अग्रसर है नेताओं को इस बात पर भी ध्यान देने की जरूरत होनी ही चाहिए - जब की यह सर्वविदित है की आज दुनिया में जनसँख्या के अनुसार सबसे अधिक युवा भारत में ही हैं फिर भी सरकार और विपक्ष के नेता लोग उनका सार्थक उपयोग करने के स्थान पर उनके हाथ में केवल खाली कटोरा थमाने और भीख मांगने लिए लालायित कर रहे है - और जहाँ तक सिन्हा जैसे राज नेताओं के आह्वान की बात है उनको इस बात पर ध्यान देना होगा की देश के कई हिस्सों में आधुनिकता से दूर और व्यस्था से नाराज कुछ लोग नक्सलवाद के नाम से जो हिंसा फैला रहे है उन पर तो आज तक काबू नहीं पाया गया है -- और अगर शहरी पढ़ा लिखा युवा वर्ग हाथों में हथियार लेकर मैदान में आ गया तो क्या स्तिथि होगी क्या कोई नेता इसकी कल्पना कर सकता है ?

के द्वारा: s.p.singh

पीयूष जी आपको बहुत बहुत बधाई, सही बात सामने को रखने के लिए। मुझे तो इस लेख पर लोगों की प्रतिक्रियाये पढ़कर बहुत आश्चर्य हुआ की अपने को बुद्धिजीवी कहने वाला मीडिया और युवा वर्ग केवल नाक के आगे ही देखता है। हिमांशु भट्ट जी को भी बहुत साधुवाद, जो उन्होने विस्तृत तरीके से आपकी बात को रखा है। कल कोई कांग्रेसी, अन्ना की बातों से आक्रोशित होकर, उन्हें थप्पड़ मारेगा तो क्या कहेंगे? अरबिन्द केजरीवाल के चप्पल या प्रशांत भूषण के थप्पड़ खाने को कैसे हम गलत ठहराएँगे? थप्पड़काण्ड के बीच, जारी मानसून सत्र में रिटेल क्षेत्र में 100% एफ डी आई का बिल पास हो गया। 5 दिनों के सत्र में लोकपाल और महंगाई, पेट्रोल के दाम पर कोई चर्चा तक नहीं हुई। लेकिन जनता खुश। क्या हम सिर्फ नेताओं को दुखी या परेशान करके अपने सारे मुद्दे भूलना चाहते हैं? ये तो नेताओं के हित की बात हुई। जनता का हित कहाँ है? सभी लगभग इस बात पर सहमत हैं की नेता भ्रष्ट हैं, और जनता निर्दोष, दयनीय। क्या नेता मंगल गृह से आए हैं? वो भी इसी समाज का हिस्सा हैं। सच्चाई ये है की हमारा समाज ही भ्रष्ट है। अपने भ्रष्टाचार को मजबूरी, रिवाज, धर्म आदि नामों से सही सिद्ध करता है। केवल नेता को भ्रष्ट, गद्दार दिखाकर अपने को सही साबित करने की कोशिश करता है। आज हर शादी में औसतन लाख रुपया दहेज लिया जाता है, रिवाज या धर्म के नाम पर। कन्या भ्रूण हत्या और दहेज हत्या हो रही है, रिवाज और धर्म की आड़ में। करोड़ों करोड़ों के बेनामी चढ़ावे धर्म के नाम पर क्या खून पसीने से कमाई करने वाला चढ़ा सकता है? पर वो धर्म है। क्या ये सब सिर्फ नेता कर रहे हैं। नेताओं के नाम पर घड़ियाली आँसू बहाने से पहले, निर्दोष, निरीह, धार्मिक, ईमानदार जनता अपने गिरेबान में झांक ले। हम सुधर गए तो देश सुधर जाएगा। लेकिन हम नहीं सुधरेंगे, सिर्फ नेताओं को सुधरेंगे। हम तो निरीह हैं........

के द्वारा: manojjohny

शरद पवार पर थप्पड़ मारे जाने की घटना को मीडिया और कुछ राजनीतिक दलों ने महंगाई से जोड़ दिया। यह एक तरह से इस घटना का औचित्य साबित करने की कोशिश है। अन्ना हजारे भी इस पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करने से खुद को नहीं रोक पाए और बोले ,‘‘ बस!एक थप्पड!!’’ गोया उन्हे उम्मीद रही हो कि शरद पवार पर और थप्पड़ मारे जाने थे। टीम अन्ना ने भी राजनीतिक लाभ उठाने की नीयत से इसे नेताओं की साख की ओर मोड़ दिया। किरन बेदी और कुमार विश्वास की प्रसन्नतायें भी इसी कारण उनके ट्वीट से बाहर छलक रहीं थी। इस पूरे वाकये पर समझदारी और परिपक्वता की जो अपेक्षा मीडिया और राजनेताओं से थी वे पूरी नहीृ हुई। लेकिन गुस्से की इन व्यक्तिगत अभिव्यक्तियों को यदि इनके विस्तार और संक्रामक रुप में देखें तो समझ में आ जाएगा कि भविष्य में एक गैर जिम्मेदार और सनसनी प्रिय मीडिया, साख खोए नेता और अन्ना हजारे जैसे गैर जिम्मेदार आंदोलनकारी देश के लिए कितनी आफत खड़ी कर सकते हैं। इस देश में बड़ी संख्या में लोग मीडिया से नाराज है।। क्या मीडिया पत्रकारों पर होने वाले हमलों का औचित्य इस आधार पर साबित करेगा कि मीडिया की रिपोर्टिंग सही नहीं हो रही है? क्या उन डाॅक्टरों,इंजीनियरों, वकीलों व्यापारियों और उद्योगपतियों पर थप्पड़ नहीं मारे जाने चाहिए जिन्होने आम लोगों का जीवन नर्क बना दिया है? क्या सरकारी अफसरों,एनजीओ के संचालकों को थप्पड़ नहीं मारे जाने चाहिए? अन्ना हजारे शरद पवार की पिटाई पर खुश हो रहे हैं तक प्रशांत भूषण और अन्ना समर्थकों की पिटाई करने का भी तो एक औचित्य भगत सिंह सेना के लोगों के पास है और उन्हे अपने औचित्य पर यकीन रखने का हक है।आप पीटे जांय तो लोकतंत्र को खतरा और दुश्मन पिटे तो लोगों का गुस्सा? यह कैसा कुतर्क है। यदि हरविदर के थप्पड़ का औचित्य है तो माओवादियों की हिंसा का औचित्य क्यों नहीं है? सरकारों ने करोड़ों लोगों का जीवन दूभर कर दिया है तो वे क्यों नहीं हथियार उठायें? एक विचारहीन थप्पड़ का औचित्य साबित करने में मीडिया के दिग्गजों से लेकर राजनीति और समाजशास्त्र,अर्थशास्त्र के सारे दिग्गज 12 घंटे तक न्यूज चैनलों पर जुटे रहे पर इसी दिन अपनी विचारधारा के कारण आदिवासियों के लिए हथियार उठाने वाले किशनजी की प्रतिहिंसा का औचित्य साबित करने के लिए एक भी आगे नहीं आया। क्या मीडिया और विपक्ष को विचारहीन अराजक हिंसा पसंद है और विचारधारा की हिंसा नापसंद है?किशनजी यदि मानते हैं कि क्रांतिकारी बदलाव के लिए हिंसा जरुरी है या राज्य की हिंसा का जवाब हिंसा ही है तो उसका भी औचित्य है। क्रांति का सपना देखने और उसे बंदूक के दम पर हासिल करने का सपना देखने का भी तो औचित्य है। क्या उनके औचित्य पर चर्चा करने से कारपोरेट मीडिया,संसदीय दल और टीम अन्ना इसलिए डरते हैं कि माओवादी उनकी राजनीति के लिए भी खतरनाक हैं? जबकि हरविंदर से शरद पवार के अलावा किसी को भी खतरा नहीं है। इसलिए सभी एक विचारहीन हिंसा का औचित्य साबित करने मंें जुटे हैं। दरअसल टीम अन्ना और भारतीय मीडिया थप्पड़ को जिस तरह से महिमामंडित कर रही है और जिस चालाकी से उसे जनभावनाओं का प्रगटीकरण बता रही है वह एक खतरनाक खेल है। बाबरी ध्वंस को भी इसी तरह अटल विहारी वाजपेयी ने जनभावनाओं का प्रगटीकरण बताया था। इस देश में हर हिंसक घटना का एक औचित्य है। हर वो वर्ग जिसे साथ अन्याय हो रहा है उसे हिंसा के जरिये अपना गुस्सा अभिव्यक्त करने का औचित्य प्रदान करने का मतलब देश को एक अराजकता की ओर धकेलना हैं। ऐसे में तो मतदाता चुनावों में वोट के जरिये अपना गुस्सा व्यक्त करने के बजाय अपने विधायकों और सांसदों पर जूते फेंकेगा और थप्पड़ो उनकी पिटाई करेगा। भारत में एक भी ऐसा राजनेता नहीं है जिस पर लोगों को भरोसा हो,एक भी नेता ऐसा नहीं है जिस पर लोगों को यह यकीन हो कि वह उनकी नियति बदल सकता है। कांग्रेस-भाजपा से लेकर कम्युनिस्ट पार्टियों तक दलों का नेतृत्व कुलीन और कान्वेंटी नेताओं ने हाईजैक कर लिया है। तीन बड़ी राजनीतिक धाराओं में कोई मास लीडर ही नहीं है। भारतीय राजनीति जब इतनी दरिद्रता से गुजर रही है तब जनता में गुस्सा,मोहभंग और क्षोभ भी होगा।यह लगभग वैसे ही हालात हैं जैसे हिटलर के उदय के समय जर्मनी में थे। नाकारा नेताओं के खिलाफ फैली अराजकता के ज्वार पर ही चढ़कर हिटलर आया था। क्या मीडिया से लेकर टीम अन्ना तक नेताओं को गलियाने वाले सारे लोग हिटलर के लिए ही रास्ता तैयार नहीं कर रहे हैं? क्या यह याद नहीं रखा जाना चाहिए कि तानाशाह सिर्फ सैनिक विद्रोहों के चोर दरवाजों से ही नहीं आए हैं बल्कि वे लोकतंत्र के राजमार्ग से भी गाजे-बाजे और गले में फूलमालाओं के साथ भी दाखिल हुए हैं।चैरीचैरा की हिंसा के बाद सत्याग्रह वापस लेने वाले गांधी मूर्ख नहीं थे।वह जानते थे कि भारत जैसे विशाल देश में लोगों को अपनी मर्जी से हिंसक होने की आजादी देना का मतलब अंग्रेजों देश में सैनिक तानाशाही थोपने का अवसर देना होगा। क्या हम नहीं जानते कि हर असहमति यदि थप्पड़ मारने का यह सिलसिला चल पड़ा तो यह तमाचा किसी दिन पत्रकारों के गाल पर भी पड़ेगा तो किसी दिन अन्ना या किरन बेदी के गाल पर भी। इसे बदलाव और संगठित प्रतिरोध की सकारात्मक ऊर्जा में बदलने के बजाय एक अराजक और विचारहीनता की नकारात्मक ऊर्जा की वकालत करना खतरनाक औा सस्ती लोकप्रियता से प्रेरित प्रवृत्ति है। आज जब देश में किसी में इतना नैतिक बल नही है कि राज्य की हिंसा समेत हर हिंसा का विरोध कर सके तब हममें से हर एक को किसी न किसी के हाथ से तमाचा खाने को तैयार रहना होगा। आपके लेख के लिए बधाई .

के द्वारा: HIMANSHU BHATT

बहुत ही गंभीर विषय होता जा रहा है ये आजकल पियूष जी, जिसकी मैं निंदा भले ही न कर पा रहा हूँ क्योंकि लोग परेशान हैं झुंझलाहट मैं हैं और अपनी हर परेशानी का कारण वे आज के नेता को मानते हैं ! लेकिन आपने अपने लेख के माध्यम से जो तथ्य सामने रखे हैं उनसे मैं सहमत हूँ और इस प्रकार की हिंसा की प्रशंशा भी नहीं कर सकता ! दूसरी एक और चीज मुझे चिंतित कर रही है की अभी तक जिस किसी भी राजनेता पर हमला हुआ उसमे प्रहार करने वाले के अतिरिक किसी और पर प्रभाव नहीं पड़ा ! किन्तु शरद पवार के केस मैं देखने मैं आ रहा है की उनके समर्थकों ने सड़कों पर उतर कर हिंसक विरोध शुरू कर दिया है, जिसका खामियाजा भी आम जनता को ही भोगना पड़ रहा है ! और यदि ये परम्परा शुरू हो गई तो शायद ये हमारे देश के लिए और भी खतरनाक होगा !

के द्वारा: allrounder

मुनीश जी.... प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.... भगत सिंह आदि को देखने के बाद देश पर बलिदान होने की परंपरा आज तक नहीं पड़ी है हाँ अहिंसा की परंपरा पद चुकी है…… कृपया इस तरह की हरकतें करने वालों को भगत सिंह से तुलना न करें.. उस बौद्धिक स्तर पर जहाँ भगत सिंह थे आज बड़े बड़े नेता कभी नहीं पहुँच सकते.......... पर आप वर्तमान घटनाओं पर नज़र डालें तो पता चले की वास्तव में ये आक्रोश के नाम पर सस्ती लोकप्रियता पाने का हथकंडा बनता जा रहा है.... और इस लोकप्रियता के नाम पर अरविन्द केजरीवाल को भी निशाना बनाया जा चूका है... जबकि उनके खिलाफ आक्रोश जैसी कोई बात समझ नहीं आती.... जहाँ तक विद्यार्थी वाले उदहारण की बात है तो वो भी आवश्यक है क्योंकि आज भी कई शिक्षक छात्रों के आक्रोश का शिकार बन रहे हैं.... इस लिए उस आक्रोश की बात भी जरुरी थी.......... क्योंकि आक्रोश तो सिर्फ आक्रोश ही है....

के द्वारा: Piyush Kumar Pant

पियूष जी, थप्पड़ वाले प्रसंग को समय.......और परिस्थिति........, के हिसाब से देखा जाए तो शिक्षक और विद्यार्थी वाला उदाहरण गलत है, और दोनों परिस्थितियों को एक सा नहीं माना जा सकता. रही बात थप्पड़ बनने की तो आप चिंता न करें....... ऐसा नहीं होने वाला....... भगत सिंह आदि को देखने के बाद देश पर बलिदान होने की परंपरा आज तक नहीं पड़ी है हाँ अहिंसा की परंपरा पद चुकी है......... मेरा मानना है जब किसी व्यक्ति की समझ में अहिंसा की बात न आ रही हो तो उसकी नाक पर कसके घूँसा जमा दो अहिंसा का महत्त्व अपने आप समझ में आ जाएगा ........ और ये थप्पड़ जो मंत्री जी के गाल पर पड़ा है वाही अहिंसा का महत्त्व समझाने के लिए ही पड़ा है...... अब समझ जाएँ तो ठीक नहीं तो ...........! http://munish.jagranjunction.com/2011/11/25/%e0%a4%a5%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a5%9c-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a5%82%e0%a4%81%e0%a4%9c/

के द्वारा: munish

मैं ही नहीं लगभग सभी परेशां हैं भ्रष्टाचार और बढ़ती महंगाई से....... पर मेरे अनुसार इसके लिए हिंसा की कोई आवश्यकता नहीं.. मैं हर उस शक्श को समर्थन करता हूँ जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाता है... पर अफ़सोस इस तरह के आक्रोशित लोग उन लोगों को भी निशाना बना लेते हैं.... जो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे है..... अरविन्द केजरीवाल इसका उदहारण है..... आपने कहा की ....... इतिहास गवाह है कि कुर्सी पर बैठना वाला कभी भी आम जन को नहीं समझ पाया. चाहे फिर कोई तानाशाह हो..... आप जिस इतिहास का उल्लेख कर रहे हैं.. वो शायद मैंने नहीं पढ़ा ........ चन्द्रगुप्त मौर्या से लेकर ......... अकबर तक कई शासक आये जिन्होंने जनता के लिए उल्लेखनीय कार्य किये....... अल्लाउद्दीन खिलजी की बाज़ार व्यवस्था आम जन के कल्याण के लिए ही बनाई गई थी.....

के द्वारा: Piyush Kumar Pant

जहां तक वर्तमान परिदृश्य की तुलना अँग्रेजी साम्राज्य से करने की है..... तू ये सर्वथा अनुचित है.... तब हमारे पास कोई अधिकार नहीं थे.... पर लोकतन्त्र मे वोट नाम का हथियार आपके पास है.... पहले हम ही किसी को भी अपना मत जाति, धर्म, क्षेत्र, परिवार या किसी दल विशेष के प्रति निष्ठा के चलते व्यर्थ कर देते हैं.... और फिर जब जाति, धर्म, क्षेत्र, परिवार की राजनीति करने वालों के द्वारा छले जाते है तो यही सब करते हैं जो कल हुआ.... एक दिन सारा देश अन्ना के पीछे खड़ा हो जाता है.... और लगता है की कुछ परिवर्तन देश की जनता की सोच मे हुआ है..... फिर ये नेता अन्ना पर ही उंगली उठाते हैं.... और वही सारी भीड़ मिलकर उनपर उंगली उठाने लगती है.... इस सोच के साथ विकास किस अर्थ मे होगा... हम मुद्दों को समझे बिना ही अपनी राय कायम करने के आदि हो गए है... यदि हाथापाई से ही कीमतें घटने बढ्ने लग जाएँ तो फिर सांसदों को संसद मे ही ये सब करने को कहा जाए.... और वहीं से महंगाई कम हो जाए.... अक्सर सही करने वालों के भी कई विरोधी हो जाते है.... आप एक दिन नियम के अनुरूप चल कर देखें और आप पाएंगे की उसी दिन आपके कई विरोधी पैदा हो गए.... और यदि ये आपके खिलाफ हिंसा करते हैं तो एक बड़ा वर्ग उसे आपके विरुद्ध आक्रोश की संज्ञा का नाम देकर इतिश्री कर लेंगे.... जहां आपको अपना आक्रोश प्रकट करना है उस दिन क्यों आप वोट देने से दूर हट जाते है.......

के द्वारा: Piyush Kumar Pant

मान्यवर पियूष जी, सादर. मैं आदरणीय तमन्ना जी की बातों से शत-प्रतिशत या कोई इससे भी अधिक का आंकड़ा हो तो उतने प्रतिशत तक सहमत हूँ. आपने कहा- ""अगर एक बार हम इसे आक्रोश की संज्ञा देकर शांत हो गए तो ये एक परंपरा बन जाएगी…"" मान्यवर, अगर भ्रष्टाचार और घोटाले परम्परा बनेंगे, अगर इन नेताओं का अपने वादे से पलटना परम्परा बनेगा, जनता को लूटना-खसोटना परम्परा बनेगा, भ्रस्टाचारियों को बचाना परंपरा बनेगा, आम जनता को महंगाई की चक्की में पिसते हुए और कराहते हुए देखकर भी असमर्थता जाहिर करना परम्परा बनेगा तो, जनमानस भी तो कोई एक परंपरा बनाएगा. इसपर इतना विवाद क्यों ? एक्शन के प्रतिकूल रि-एक्शन तो होता ही है. सधन्यवाद.

के द्वारा: shashibhushan1959

पियूष जी ,.सादर अभिवादन आपके लेख से मैं थोडा सहमत हूँ ,...थप्पड़ मरने की बजाय वोट की ताकत दिखाना बहुत बेहतर विकल्प है .. मुझे नहीं लगता थप्पड़ परंपरा बन सकता है ,.....हिन्दुस्तान की जनता बहुत ही सहनशील है ,.हम आखिरी तक प्रयास करते हैं ,...लेकिन अब पानी सर के ऊपर से गुजर रहा है ,..ये देश के सौदेबाज नेता आखिर कब तक हमारी सहनशीलता की परीक्षा लेंगे ,. ..अमूल बेबी के चमचे देश के मंत्री जब काले झंडे दिखाने वाले को अपने गुलाम होने का सबूत देने के साथ गाँधी जी को आखिरी कांग्रेसी श्रद्धांजलि दे रहे थे तब हमारी बुद्धिजीविता को क्या हो जाता है ?........और इसे पता नहीं कितने उदहारण हैं ,..जब इन्ही नेताओं ने लोकतंत्र को तार तार किया है ..... यह थप्पड़ केवल एक व्यक्ति का एक नेता को थप्पड़ नहीं मानना चाहिए ,...यह आम जनता का नेताओं की व्यवस्था को एक तमाचा है....इस व्यवस्था को बदलना ही होगा...........सुन्दर विवेकशील लेख के लिए हार्दिक आभार ....आपका प्रतिक्रिया का जबाब न देना अखरता है ,...संभव हो तो कृपया दो चार शब्द लिख दिया करें ,.. आशीर्वाद समझ ग्रहण करेंगे ...पुनः आभार

के द्वारा: Santosh Kumar

प्रिय पियूष भाई ......आदाब ! आप मेरे किसी लेख पर अपना कमेन्ट चाहे न दे लेकिन इसी तरह से अपने लेखो में मेरा नाम शामिल करते हुए मेरी भूख को मिटाते रहे -यही आशा +अपेक्षा और कामना है ..... आपने जो बात कही है उससे हम दोनों ही भली भांति परिचित है ..... क्योंकि स्वामी रामदेव जी के बारे में मत भिन्नता होने के बावजूद हममे सार्थक संवाद हुआ था ..... आदरणीय वाजपेई जी ने ही इस मंच पर पहली बार इस मुद्दे को उठाया है और जागरण द्वारा इसकी रोकथाम के लिए कदम उठाने की बात कहने के साथ वाजपेई जी हम सभी को पीछे छोड़ कर इस मंच मर्यादित की मर्यादा और गरिमा को फिर से स्थापित करके पहले भी कहीं ज्यादा सम्माननीय +इस मंच के इतिहास पुरुष बन गए है -उनको नमन ...... इस विचारोतेजक +विचारणीय लेख पर मुबारकबाद

के द्वारा: Rajkamal Sharma

पियूष जी बहुत समय बाद आपका विचारपूर्ण आलेख अच्छा लगा.निंदक नियरे राखिये बहुत श्रेयस्कर है,परन्तु निंदा के लिए निंदा करना या स्वार्थ पूर्ती हेतु कुछ भी कहना मेरे विचार से पर उपदेश कुशल बहुतेरे को चरितार्थ करता है.निंदा सकारात्मक हो ठोस बिन्दुओं पर हो और निंदक स्वयं निंदा करने वाले विषयों में लिप्त न हो,तभी निंदा का औचित्य है.मंच की गरिमा जैसा कि आदरनीय बाजपेयीजी ने लिखा है,बनाये रखनी आवश्यक है.अमर्यादित भाषा का प्रयोग चाहे प्रतिक्रिया के रूप में हो या फिर किसी भी आलेख के रूप में सर्वथा अनुचित.स्वयं शराब पीने वाला यदि मदिरापान से बचने या जुआरी जुआ न खेलने का उपदेश दे तो न्यायोचित कैसे हो सकता है

के द्वारा: nishamittal

पीयूष भाई, नमस्कार। हम स्वतंत्र तो हो गए मगर हमारी सोच आज भी दासता की बेड़ियों में जकड़ी है। हिंदी केवल राजभाषा नहीं, राष्ट्रभाषा भी है और मेरे लिए तो मातृभाषा भी है। आपकी कहानी के भाव अत्यंत ही सुन्दर हैं। इससे मुझे एक वाक़िया याद आ गया जब मेरा फ़ोन खो गया था और मैं शिक़ायत दर्ज़ कराने कंपनी के ऑफिस पहुंचा तो मुझे अंग्रेज़ी वार्तालाप से जूझना पड़ा। मैं हिंदी में ही बात करता रहा और जवाब अंग्रेज़ी में ही मिलते रहे। दुर्भाग्यवश अधिकतर उत्तर मुझे sorry के रूप में मिले अंततः जाते-जाते अंतिम उत्तर भी जब मुझे अंग्रेज़ी में sorry ही मिला तो विवश हो कर मैं उठ खड़ा हुआ और उन्हें अंग्रेज़ी का ही जवाब दिया कि Whatever I asked or enquired was answered as sorry but you should know that 'a sorry doesn't make a dead man alive.' और इसके बाद उस लड़की का चेहरा देखने लायक था। अन्य मातृभाषाओं वालों को देखें वो जब भी कहीं मिल जाते हैं तो अपनी भाषा में ही बात करते हैं मगर हिंदी भाषी राज्यों में ये चलन नहीं है, बल्कि वे तो अंग्रेज़ी को स्टेटस सिम्बल या प्रतिष्ठा का प्रतीक मानते हैं। शर्म आनी चाहिए ऐसे लोगों को जो अपनी भाषा का तिरस्कार करते हैं बल्कि धिक्कार है उन पर। मैंने कई भाषाओँ का अध्ययन किया है मगर आज भी जब वक़्त होता है तो मैं हिंदी का ही प्रयोग करता हूँ। आपके इस लेख पर हार्दिक बधाई आपको।

के द्वारा: वाहिद काशीवासी

पीयूस जी अभिवादन आपका लेख पडा बदिया लगा और देश भक्ति की परिभाषा भी जच गयी पर हर कोई आपसे सहमत हो यह जरुरी नहीं तो रामदेव के आन्दोलन को कोई भी नकार नहीं सकता क्यों की यह जनता के लिए था पर कुछ तो बात रही होंगी जिनसे उनकी वह इमेज नहीं बन पाई जो अन्ना की थी पर बाद में जो हुआ वह और निदनीय रहा जिसकी हर बर्ग ने आलोचना की है उसी का परिणाम है की अन्ना आज राजघाट पर बेठे है और सफल सञ्चालन चल रहा है रामदेव बाबा को आत्म्लोकन करने दीजिये मीडिया और बुद्धिजीवी बर्ग उनके बिश्लेषण में लगा है क्यों उनके पास साक्ष है देश में दो बर्ग चल रहे है एक कोंग्रेस और दूसरा भा जा पा तीसरा बर्ग है आप जैसे लोगो का जो अपनी बात पूर्ण विश्वाश से कह सकता है बाकी मीडिया भी एक पार्ट है जो सच दिखने का दंभ भरती है सच क्या है वह समय पर छोड़ दीजिये किसी पर हम अपने विचार थोप नहीं सकते है यह ही तो लोकतंत्र है बदिया है बधाई हो.

के द्वारा: shailandra singh

पियूष जी , आपके विचार बहुत अच्छे हैं, परन्तु आप मुर्दों को आवाज क्यों दे रहे हैं? इनकी बीवी पराये मर्दों संग पायी जाए तो भी ये शरीफ लोग उन्हें भाई बहन ही समझेंगे जबकि हकीकत कुछ और होगी। अभी भी कुछ मुर्दे रामदेव के सराहनीय कार्य को हरकत कह रहे हैं। ऐसे देश के नागरिकों से देश को भगवान ही बचाए। इन मुर्दों का दिमाग बस एक ही जगह सेट है की राजनीति सिर्फ राजपरिवार के लोग या इनसे जुड़े लोग ही कर सकते हैं और किसी का इसपर खासकर साधुओं संतों का कोई अधिकार नहीं. राजपरिवारों के पास अधिक संपत्ति हो तो वह वैध, यदि किसी संत ने जड़ी बूटी बेच कर, प्रवचन दे कर दक्षिणा प्राप्त किया तो वह अवैध। उनके कई ऐसे अनुयायी हैं जो उन्हें लाखों करोड़ों रूपये दान में देते है। शायद इन मुर्दों को ये नहीं पता की रामदेव बाबा जैसे संत इन्ही पैसों से गरीब बच्चों को शिक्षा दिला रहे है, इन्ही के औषधालय के द्वारा बेरोजगार युवा अपने परिवार का पेट पाल रहा है। इन मुर्दों से मेरा निवेदन है की रामदेव जैसे संतों पर आरोप मढने से बाज आयें अन्यथा भूत भगाने के सटीक मंत्र हमें भी आते हैं। खैर इन लोगों से उम्मीद भी क्या की जा सकती है इन लोगों को क्रिकेट, रोमांटिक फ़िल्में, डिस्को, गर्लफ्रेंड से फुर्सत कहाँ?

के द्वारा: raj kushwaha

भाई राजकमल जी....... वास्तव मे इस देश का दुर्भाग्य है की यहाँ किसी व्यक्ति विशेष की पोशाक, और उसकी वेषभूषा राष्ट्रहित से अधिक मूल्यवान है.... कई लोगों का इस आंदोलन से विरोध का कारण इसकी अगुवाई बाबा रामदेव के द्वारा किया जाना है.... कई लोग इस लिए नहीं जुड़ना चाहते की खुद बाबा रामदेव एक योगपीठ चला रहे हैं जिसकी कमाई का कोई हिसाब नहीं है.... और ये वो लोग है जो भ्रष्टाचार के विषय पर बोलते समय भ्रष्ट लोगों को फांसी देने की बात तक कर जाते हैं ..... क्योकि वो जानते हैं ऐसा कोई कानून नहीं बनने वाला ..... और अगर बना तो वो खुद भी उसके फेर मे आ सकते हैं..... तो बाबा ऐसे मे काले धन और भ्रष्टाचार के मामलों मे दोषी पाये जाने वालों के लिए मौत की सजा मांग रहे हैं तो इसमे विरोध क्यों.... अगर बाबा रामदेव के पास काला धन है तो वो भी दोषी होंगे.... और मौत की सजा उनको भी दी जाएगी... बाबा ने कहीं ये नहीं कहा की संतों को इस कानून से बाहर रखा जाए... जब तक हम लोग कभी वस्त्रों के रंग को देख कर ... कभी आदमी के स्वरूप को देख कर .... कभी उसकी प्रष्टभूमि को देख कर ऐसे आंदोलनो से खुद को दूर रखेंगे ... ये नेता इसी तरह बहला फुसला कर असली मुद्दों से ध्यान हटा देंगे..... क्या होता अगर आज़ादी के लिए लड़ने वालों ने देश से ऊपर अपने धर्म को रखा होता..... या अपने निजी हितों को रखा होता..... भगत सिंह ने सिक्ख होने के बाद भी अपने केश कटवा दिये... जो देश के लिए शीश कटवाने के लिए तैयार हों उनके लिए केश बहुत छोटी बात है....... तो जाने दें बाबा की नियत को हम बस अपनी नियत साफ रखें और अपने अपने दम पर आंदोलनो को खड़ा करने के योग्य बने ........ अन्यथा जब कोई सार्थक आंदोलन हो उसमे सहभागी बने.......

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

बहुत सटीक विचार पियूष जी,असलियत में स्वयं सरकार को तो खतरा ये है कि उसको अपनी गाड्डी डोलती दिख रही है,तो बौखलाना स्वाभाविक है ,कलई खुलने के भयसे भी येन केन प्रकारेण सत्ता आन्दोलन को कुचलना चाहती है, शेष विरोध करने वाले जैसा कि आपने कहा एक अजीब मानसिकता से ग्रस्त हैं.इसीलिये कहा जा रहा है कि बाबा को राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए.सन्यासी का धर्म क्या राष्ट्र के प्रति नहीं होता?योग से व आयुर्वेदिक दवाओं से पैसा एकत्र करने का आरोप भी लगाया जा रहा है,aisa होना बौखलाहट में आश्चर्यजनक नहीं.दवाओं के निर्माण में लगने वाला धन कहाँ से आएगा ये बात लोगों की समझ में नहीं आती.बहुत अच्छा लेख.बधाई.

के द्वारा: nishamittal

आपके इस समर्थन के लिए जागरण जंक्शन संपादक मंडल का हार्दिक धन्यवाद ......... ये घटना कोई बहुत बड़ी नहीं थी. किन्तु इस पर आदरणीय लेखक महोदय का रुख कुछ अनुचित था. मैंने स्वयं उस कहानी में एक प्रतिक्रिया में स्पष्ट किया था की आप इसे जहाँ चाहे प्रयोग करें .... ताकि लोग इसका लाभ उठाए ताकि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो.. पर इन सज्जन ने कुछ इस तरह का माहौल बनाया जैसे की मैंने इनकी रचना का प्रयोग किया हो.... किन्तु आपके इस स्पष्टीकरण ने कि "आपने इस रचना को जागरण जंक्शन मंच पर अगस्त 2010 में प्रकाशित किया था"... ने मेरा मनोबल बढाया.. यद्यपि इस समय अधिकाँश पूर्व ब्लोगर किसी न किसी कारन से इस मंच पर लेखन से दूर हैं पर अभी भी लोग लगातार एक दुसरे की रचनाये पढ़ते हैं.. भले प्रतिक्रिया न दे पायें... इस तरह के हालत उन ब्लोगर्स को वापस आने से रोक ने का काम करते हैं.... आपकी इस पहल ने सभी ब्लोगर्स का मनोबल अवश्य बढाया होगा..... आपका हार्दिक आभार....

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

आदरणीय पीयूष पंत जी, जागरण जंक्शन मंच मूल रूप से लेखक के आलेख की गुणवत्ता के आधार पर उसे फीचर्ड ब्लॉग की श्रेणी प्रदान करता है और मंच के ब्लॉगर मनोज जायसवाल जी की उक्त रचना को भी इसी आधार पर फीचर ब्लॉग की श्रेणी प्रदान की गयी. मनोज जायसवाल जी ने अपने ब्लॉग स्पॉट पर इस ब्लॉग को अक्टूबर, 2010 में प्रकाशित किया था जबकि खोजबीन से पता चला है कि आपने इस रचना को जागरण जंक्शन मंच पर अगस्त 2010 में प्रकाशित किया था तो इससे पता चलता है कि उक्त रचना मूल रूप से आपकी है. आपको ज्ञात हो कि हालांकि किसी भी चुराई गयी रचना को फीचर की श्रेणी नहीं प्रदान की जाती किंतु मंच के लिए निश्चित रूप से ये एक चुनौती भरा काम होता है कि वह हर ब्लॉगर की पुरानी रचनाओं को याद रख कर नए आने वाले ब्लॉग को फीचर की श्रेणी प्रदान करे, इसलिए कभी-कभार ऐसी समस्या आ खड़ी होती है लेकिन जागरुक ब्लॉगरों से अपेक्षा की जाती है कि यदि ऐसी कोई अवांक्षित गतिविधि नजर आती है तो मंच को समय पर अवगत कराने की अवश्य कोशिश करें ताकि समस्या के निदान की दिशा में कार्यवाही की जा सके. साथ ही सभी अन्य पाठकों को भी ये संदेश जारी किया जाता है कि यदि आपको किसी लेखक की कोई रचना अच्छी लगती है और आप चाहते हैं कि उस रचना का लाभ अन्य लोग उठा सकें तो आप उसे अपने ब्लॉग में प्रकाशित करने के पूर्व लेखकीय धर्म का निर्वाह करते हुए मूल लेखक या मूल स्रोत का नाम अवश्य दें. जागरण जंक्शन मंच को समय पर सूचना भेजने के लिए आपका आभार धन्यवाद जागरण जंक्शन परिवार

के द्वारा: JJ Blog

आदरणीय श्री पियूष जी + राजकमल जी सदार अभिवादन जागरण के लचर रवैये के कारण ऐसे शरारती तत्व उत्साहित होते रहते हैं | एक बार ऐसे लोंगो के पकड़ में आने पर उन्हें बैन कर देना चाहिए क्यों कि जिसके पास मर्यादा नहीं वह साहित्य की सेवा कैसे करेगा | अगर वो साहित्य का रचना भी करेगा तो कलुष से प्रेरित होकर ................क्या फायदा है ऐसे लोंगो को बढ़ावा दे कर ? मेरा पूर्ण विश्वास है की इस मामले में पियूष जी शत प्रतिशत सत्य है .............ऐसे चोर आँखों के सामने न होने का फायदा उठाते है वर्ना सारी चोरी ...............................आगे क्या कहूं, इंटरनेट ने साहित्य का मजाक बना कर रख दिया है ........एक ही रचना के अनेक रचनाकार नजर आते है इधर गब्बर सिंह का चरित्र फसबूक से होकर अंततः जागरण के प्रांगन में भी कई नामों से कई बार उपस्थित हुआ जिसे देखकर वो अनमोल कृति याद आ गयी --------. कितनी नावों में कितनी बार | धन्यवाद एवं विदा |

के द्वारा: Baijnath Pandey

मासूम को सजा (एक मार्मिक कथा.) very nice post manoj ji इन सज्जन कम दुर्जन शख्स के बारे में इक चौंकाने वाली बात और बताना चाहता हूँ की यह अपनी खुद की ही पोस्ट पे खुद ही कमेन्ट करते है वोह भी कई नामो से इसी चक्कर में इनसे असावधानीवश इक महान भूल भी हो गई है ऊपर वाली टिप्पणी इन्होने अपने खुद के ही ब्लाग पर की है लेकिन भूलवश अपनी आई डी से ही खुद अपनी तारीफ ही कर बैठे अगर यह इतने ही सच्चे है तो अपने ब्लॉग पर आई हुई टिप्पणीकर्ता (फर्जी ) के इमेल आई डी बताए यह भी बताए की उन्होंने आज तक क्या -२ ब्लाग लिखे आपके बारे में न केवल मेरा बल्कि बाकि सभी का भी यह पूरा विश्वाश है की आप ही सच्चे है और आप ऐसा कोई भी काम कभी कर ही नहीं सकते है धन्यवाद (मैं आपके साथ हूँ )

के द्वारा: Rajkamal Sharma

के द्वारा: sanjay kumar tiwari

के द्वारा: satish patil

के द्वारा: anurag

घर पहुंचा तो किसी ने कुछ खास ध्यान नहीं दिया…… मैं बड़ा आश्चर्यचकित हो गया …. की ये क्या है….. फिर मैंने अपनी माता जी से कहा की मैं अभी भाग कर वापस आ रहा हूँ………. मुझे कुछ तो तवज्जो दो….. सब लोग हसने लगे……… मैं झेप गया…… मेरी समझ मे नहीं आया की मैं इतनी दूर तक भागा ओर फिर भी मुझे कोई भाव नही दिया……… क्या मैं गलत भागा……. अब मैंने सोचा की क्यों न उस लड़के से भागने का सही तरीका पूछूं…… ओर सही तरह से भागूँ………. फिर मैं उस लड़के से मिला……. मैंने बिना ये बताए की मैं एक बार भागने का असफल प्रयास कर चुका हूँ…… उससे पूछा की भाई तू भागा कैसे ………. ------------------------------------------------------------------------------------- बहुत खूब पियूष जी मजेदार संस्मरण ..... जिसके साथ आपने इसकी नैतिक शिक्षा जोड़कर और अच्छा बना दिया है बधाई :) ------------------------------------------------------------------------------------ हाँ एक बात याद रखिये अब भागने की कोशिश मत करियेगा नहीं तो सत्कार तो मिलाने से रहा .... मार डाट फ्री में मिल जायेगी :) -----------------------------------------------------------------------

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey

के द्वारा: Ramesh bajpai

आदरणीय मिश्रा जी ....... आपने सही बात कही है........ यही मेरा मन्तव्य है की क्यों एक ऐसा माहौल था की जब लोग अपने लेखों को बिना वेलेंटाइन कॉन्टेस्ट लिखे रखने मे डर रहे थे......... क्यों नहीं लोगों ने देश प्रेम से भरे लेख भी इस प्रतियोगिता मे उतारे...... आखिर देश प्रेम क्यों प्रेम की श्रेणी से बाहर हो गया......... एक खूबसूरत लेख पढ़ा था जिसके एक वाक्य ने बड़ा प्रभावित किया.........की......... हमारे विचार लोगों को प्रभावित करते हैं या हम सिर्फ लोगों को प्रभावित करने के लिए विचार करते हैं……. यदि मेरी नजर से देखा जाए तो वो इस कॉन्टेस्ट के दरमियान आये सर्वश्रेष्ठ लेखों मे एक था.......... अगर आप पढ्ना चाहे तो........ लिंक......... http://rahulpriyadarshi.jagranjunction.com/?p=188

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

मैं समझता हूं कि जेजे जैसे प्रतिष्ठित मंच पर इस प्रकार की किसी प्रतियोगिता की कोयी जरूरत नहीं थी । देश आजादी के बाद अपने सबसे भ्रष्टतम कालखण्ड से गुजर रहा है । घोटालों पर घोटाले, देश और देशवासियों का खरबों खरबों रूपया रोज बरबाद हो रहा है । प्रधानमंत्री की स्वच्छ छवि दागदार हो गयी । केन्द्र सरकार स्विस बैंक में जमा कांग्रेसियों के खरबों डालर को बचाने के लिये बहाने पर बहाने किये जा रही है । जेपीसी और पीजे थामस पर बेशर्मी की सारी हदें पार कर दी गयीं और न्यायपालिका को थके और गठबंधन का अधर्म निभाते प्रधानमंत्री हद में रहने की नसीहत दे रहे हों ऐसे वक्त में जेजे ने एक विदेशी, बाजार द्वारा प्रायोजित डे पर एक प्रतियोगिता आयोजित करने का कोयी तुक नहीं बनता । जैसे यह प्रतियोगिता बुद्धिजीवी ब्लागर्स का ध्यान तमाम मुद्दों से भटकाने के लिये की गयी थी । क्या जेजे पर बाजारवाद हावी हो चला है ? क्या जेजे अपनी टी आर पी बढ़ाने के लिये आगे भी ऐसे टोटकों का सहारा लेगी ? कुछ समझ में नहीं आता है । . एक तरफ फेसबुक ने मिस्र में हुस्नी मुबारक की तानाशाही खत्म कर दी तो भारत में जेजे ध्यान भटकाओ प्रतियोगिता आयोजित कर रही है ।

के द्वारा: kmmishra

निखिल जी ...... आपने बिलकुल सही कहा की प्रेम का जो स्वरूप बाजार मे है वो इस मंच पर नहीं दिखा..... इसके विपरीत यहाँ प्रेम के अलग अलग स्वरूप दिखे.......... कहीं आध्यात्मिक तो कहीं सांसारिक...... पर आखिर ऐसा क्या रहा की कई उत्कृष्ट ब्लॉगरों से खुद को इस से दूर ही रखा...... क्यों राष्ट्रवादी विचार धारा वाले जो राष्ट्र प्रेम को ही सबसे बड़ा मानते हैं ........ या वो लोग जो प्रेम को अपने परिवार से जोड़ कर देखते हैं....... इस प्रतियोगिता मे भाग नहीं लिए........ कहीं न कहीं जागरण जंक्शन इस स्तर पर विफल रहा की वो ये यकीन दिला सके की वो केवल प्रेम की बात करना चाहता है......... और प्रेम संस्कृति से या देश से या माता पिता से किसी से भी हो सकता है..... इसका नतीजा ये निकला की कई लोग यहाँ JJ को खुश करने के लिए ये लिखते पाये गए की ...... माँ ओर पुत्र का प्रेम प्रेम नहीं है........ पति पत्नी का प्रेम भी प्रेम नहीं .......... और प्रेम केवल प्रेमी ओर प्रेमिका के बीच ही होता है........... आखिर क्यों ......... ? क्योकि प्रतियोगिता का स्वरूप न तो ठीक ठीक व्यक्त किया गया......... और न ही नियम ............ .आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……… ……

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

चातक जी....... शायद आप सही कह रहे हों ..... पर एक प्रश्न ये उठता है की जो रचना आज फीचर्ड होने के योग्य नहीं है....... कल ऐसे क्या हालत होते है की वही रचना फीचर्ड हो जाती है........ एक बहुत सुंदर लेख का बुरा हाल देख कर आहात हुआ हूँ........... प्रतियोगिता के परिणाम आने के बाद उसको पुनः पटल पर रखने की उक्त ब्लॉगर से मैं मेल पर अनुमति ले चुका हूँ....... वो रचना न हो फीचर्ड हुई और न ही प्रेम से भरे पाठकों द्वारा सराही गयी..... आशा है की JJ आपकी बात का मान रखेगा.......... और सभी ब्लॉगर चाहे वो हर रोज के ब्लॉगर हों अथवा केवल दो ब्लॉग वाले हों अथवा कभी कभी मंच पर अपने विचार रखने वाले को एक समान रूप से आकेगा......... आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया.......

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

पियूष जी मै प्रारंभ में इसपर कुछ भी लिखना नहीं चाहता था.. लेकिन ..मुझे अब लगता है की इस कांटेस्ट को यहाँ एक नया रूप मिल गया ... इसका विदेशी स्वरुप यहाँ पर कही नहीं दिखा और कही था भी तो छुपा था .. सामने थी प्रेम की वही भारतीय व्याख्या जहा भौतिकता को सबसे निकृष्ट समझा जाता है... तो मुझे लगता है की बढ़िया हुआ इसी बहाने.. ये तो स्पष्ट हो गया की बुद्धिजीवी वर्ग अभी तक प्रेम के किस रूप को मान्यता देता है... कांटेस्ट के पीछे जो भी विचार हो... मुझे सबसे अच्छा ये लगा की हमने वैलेंटाइन डे को एक नया रूप दिया वैचारिक स्तर पर ठीक वैसे ही जैसे व्यवहारिक स्तर स्कुलो में बच्चो ने अपने दोस्तों को माता पिता .. को भाई बहन को वैलेंटाइन विश किया ये देख कर तो यही लगा ,,, की इसे स्वीकार करके हमने इसे नई परिभाषा दे दी.. है अर्थ बदल रहे है.. ये और ज्यादा सकारात्मक हो रहे है.. कांटेस्ट का परिणाम चाहे जो हो.. पर मुझे बढ़िया लगा .. लिखकर ..और साथियो की रचनाये पढ़कर..

के द्वारा: nikhil

प्रिय पीयूष जी, आपकी पोस्ट पढ़ कर कई बातों का पता चला| जागरण पर चल रही प्रतियोगिता ने काफी कुछ पढने का मौका दिया परन्तु समयाभाव के कारण सभी की पोस्ट पर कमेन्ट ना कर पाना थोडा खर भी रहा था| कई बार फीचर्ड ब्लॉग और अभी-अभी में आई हुई पोस्ट के चुनाव पर असहमति होती है लेकिन मुझे नहीं लगता कि जे.जे. किसी भी तरह की मुश्किल महसूस करता होगा| हाँ ये अंतर्द्वंद हममें से ज्यादातर ब्लागरों के मन में जरूर होगा क्योंकि कोई भी प्रतियोगिता किसी इम्तिहान की तरह होती है जिसके नतीजे आने तक लगातार प्रतिभागियों के मन में कौतूहल, आशाएं और डर बने रहते है लेकिन परीक्षक और जज के मन में ऐसी कोई बात नहीं होती| ये शायद ब्लागरों के दिल का अंतर्द्वंद है जो 'प्रभाव स्थांतरण' की भांति हमें जे.जे. पर दिखाई दे रहा है जबकि वह तो शायद बिलकुल निर्द्वंद होकर नतीजे निकालने में लगा होगा| एक बेहतर लेख द्वारा ब्लागरों के मन की बात पटल पर रखने के लिए आप बधाई के पात्र हैं!

के द्वारा: chaatak

भाई राजकमल जी....... आपने हमेशा इस मंच पर बिना किसी चिंता की अपनी बात को बखूबी रखा है........ और इसके फलस्वरूप आपको हमेशा जागरण की ओर से उपेक्षा ही मिली है....... कई बार आपके ब्लोगस पर मैंने कहा की ये ब्लॉग निश्चित ही फीचर्ड होने के योग्य है ...... पर जब उसी दिन किसी अन्य साधारण ब्लॉग को फीचर्ड होते देखा तो लगा की शायद यहाँ स्पष्टवादिता का रिवाज नहीं है....... आपकी उस पहल जिसमे लगातार कई ब्लॉग एक साथ आने पर आपने ईसाई आतंकवाद नाम से व्यंग लिखा था........ उसको इनहोने व्यंग मे ही उड़ा दिया....... पर जब आकाश भाई ने आपके समर्थन मे फिर लिखा तो JJ उत्तर देने उतरा...... इसी तरह डॉ आशुतोष जी.... भी बिना किसी प्रतिक्रिया या अन्य पुरस्कार के लोभ मे लगातार ब्लॉग लिखते हैं........ पर कभी ब्लोगस की कमी होने पर ही उनके ब्लोगस फीचर्ड होते हैं......... उनके सामाजिक लेखों को यूं ही जाया कर दिया जाता है....... इस मुहिम मे आपका साथ इसलिए भी आवश्यक था क्योकि इस तरह के लेखन की ये सारी प्रेरणा आप ही से मिली है...... प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया...............

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

प्रिय पियूष भाई ....नमस्कार ! आप तो मेरे से भी बड़े जिगरे वाले निकले .... वाह ! क्या बात है .... इतनी बेबाकी से तो मैंने भी अपना आक्रोश व्यक्त नहीं किया , और वोह भी इतने सुरुचिपूर्ण ढंग से , अकाट्य तर्कों और दलीलों समेत .... भाई मेरे बहुत -२ मुबारकबाद ..... अब तो लगता है की जागरण जंक्शन वाली मेरी बीवी को अपना वोही साढ़े नो गज वाला घूंघट उठा कर आपको अपना दीदार करवाना ही पड़ेगा ...... देखना कहीं आप मेरी तरह उसकी खूबसूरती पर रीझ कर कोई रियायत मत दे देना उसको .... आपकी कोशिशे सफल हो , इस अभियान में कलम से मैं बाकी ब्लागरो की तरह आपके साथ हूँ ... और रही बात धन की तो , आप मेरी हालत जानते ही है , की यहाँ से कितना मिलता है और क्या मिलता है ? धन्यवाद सहित शुभकामनाये

के द्वारा: rajkamal

के द्वारा: आर.एन. शाही

मेरे मित्र ......... आपने अपनी पहचान छुपाई है ये आपकी मजबूरी नहीं कमजोरी कही जानी चाहिए....... और जहां तक मेरे JJ से पंगा लेने का प्रश्न है तो इसमे कुछ गलत नहीं है..... इस मंच पर हमे समाज को बदलने के नारे लगाते हैं ओर मंच पर हो रही अराजकता को केवल पुरस्कार के लोभ से सहे जाएँ तो ऐसी प्रतियोगिताओं से बाहर होने मे कोई बुराई नहीं है........... और वैसे भी हमारे स्तर का प्रेम JJ को पसंद भी नहीं है....... क्योकि यहाँ न प्रेमी है न प्रेमिका......... संस्कारों का तो अब हर तरफ अंतिम संस्कार किया जा चुका है ........ फिर JJ से कोई उम्मीद क्यों........ आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया................ पर एक बात कहना चाहता हूँ........ की नाम बदलकर किसी क्रांति की बातें नहीं की जा सकती.............

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

पियूष जी , इस लेख का हर पैराग्राफ अपने में महत्त्व समेटे हुए व गहन चिंतन के उपरांत लिखा गया सार्थक लेख है वैसे ही आपके सभी लेखों मे अद्भुत जीवन्तता होती है इस लेख की अंतिम पंक्ति पढ़ कर तो में अपनी हंसी भी नहीं रोक सकी....ओखली में सिर दे दिया है.....देखें कितने मूसल पड़ते हैं .....! जब ओखली में सिर दिया है तब तो मूसल पड़े बिना कोई भला कैसे बच सकता है! इसके साथ ही मेरी फॉन्ट सबंधी समस्या का समाधान अगर आप कर सकते है तो मैं आपकी बहुत आभारी होऊँगी पोस्ट लिखते समय HTML पर कोई भी ऑप्शन फॉन्ट के बड़े करने का नहीं है मैने बहुत कोशिश की पर नहीं हो सका अगर दूसरा कोई तरीका हो और आपके लिए संभव हो तो कृपया बताने का कष्ट करे बहुत धन्यवाद !

के द्वारा: Alka Gupta

वाह क्या बात है ......बहुत सुन्दर रचना ! आदरणीय भ्राता श्री प्रणाम ! आपका यह पोस्ट पढके मैंने दो गुस्ताखी कर डाली ...... १- मैंने इसे कॉपी किया और इसे आपने मेमोरी में सुरक्षित रख लिया ...की जब जी करेगा प्रेम के बारे में कुछ पढने की तो इसे ही पढ़ लिया करूँगा ! २-शायद मैं गलत हो सकता हूँ ........,जनाब ग़ालिब और जनाब जिगर मुरादाबादी की निचे वाली पंक्ति शायद एक ही है, या दिनों की थिंकिंग एक ही होगी ! वैसे सभी एक से बढ़ के एक हैं ,,,,,,...लेकिन सबसे सुन्दर पंक्ति ..........खुसरो की लगी …. खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वाकी धार, जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार…. http://amitdehati.jagranjunction.com/2011/02/09/%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%AC%E0%A4%B8-%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%86-%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A4%BE/

के द्वारा: Amit Dehati

दीपक भाई... क्षमा मांगने वाली कोई बात नहीं है... यह तो विचारों का मंच है जब हम एक सार्थक बहस करेंगे तभी कोई दिशा प्राप्त हो सकेगी... यह भी नहीं है की मेरा नजरिया ही सही हो ... लेकिन जब मै कुछ कहूँगा ... तभी आप अपना अर्थ मुझे समझायेंगे...और तभी हम किसी निष्कर्ष पर आयेंगे... मेरे विचार से तो इस मंच पर लिखने का यही उद्देश्य है... सिर्फ एक दुसरे के कमेन्ट पाने के लिए हम असहमत होते हुए भी उपरी सहमती जताएं... तो तात्कालिक रूप से आपको अच्छा तो लगेगा लेकिन यह स्वयं आपके लेखन और विचारों के विकास के लिए घातक होगा... ऐसे लोगों से सावधान रहियगा... लेखन और विचारों पर ध्यान देना ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए... मई अगर ज्यादा कह गया हूँ तो माफ़ी चाहूँगा... मै भी अभी सिख रहा हूँ....

के द्वारा: HIMANSHU BHATT

साहू जी क्षमा चाहूँगा लेकिन एक बात कहे बिना यहाँ से जा नहीं पाऊंगा.... अगर संत वैलेंटाइन आपकी यह कथन पढ़ लें तो वो भी आपना सर फोड़ डालेंगे .... भाई अब आप वैलेंटाइन और प्रेम को ही अलग कर देंगे तो बचा क्या?... भाई कम से कम इतना तो करो की JJ का कांटेस्ट की सुचना ही ढंग से पढ़ लेते उसमे प्रेम विषय पर ही लिखने को बोला है... भाई प्रेम के वृहद् क्षेत्र को संकुचित न करो... प्रेम आपकी सोच से भी अधिक उचाइयां और गहनता लिए हुए है... अब जिनको प्रेम का अर्थ ही समझ में ना आता हो... उनसे क्या कहें.... प्रेम की सार्थकता तो तभी है जब प्रेम है.... माँ से भी प्रेम होता है... कोई भी रिश्ता प्रेम की डोर से ही बंधा होता है... अगर प्रेम नहीं है तो रिश्ता कैसे बचा रहेगा... यह समझना जरुरी है... अगर मुझे कुछ समझाना हो तो आपका स्वागत रहेगा.... दिल पर मत लेना मित्र...

के द्वारा: HIMANSHU BHATT

भ्राता दीपक जी...... मैंने अभी आपका ब्लॉग प्रेम की सार्थकता पुनः पढ़ा..... और अब मैं कह सकता हूँ की मेरा इशारा आपकी हो ओर था.... आप ही ने ये लिखा है की .......... आज प्रेम शब्द का प्रयोग अत्यंत संक्षिप्त हो गया है | इसे हम प्रायः प्रेमी व प्रेमिका के मध्य उत्पन्न प्रेम से ही लगाते है | जबकि इसके भी अनेक रूप है| माता-पुत्र,पिता-पुत्र, व भाई-बहन आदि का प्रेम भी इसकी श्रेणी मे आता है|....... और जहां से आपने बात को छोड़ा है मैंने वही से शुरुवात की है... आपने स्वयं लिखा था की प्रेम शब्द का प्रयोग अत्यंत संक्षिप्त हो गया है | इसे हम प्रायः प्रेमी व प्रेमिका के मध्य उत्पन्न प्रेम से ही लगाते है | जबकि इसके भी अनेक रूप है|  मैं आपकी इस विवशता को ही अपने तरह से इस मंच पर रखने का प्रयास कर रहा हूँ..... की यहाँ सभी ने कुछ इस तरह का प्रेम फैला दिया है की आप जैसे प्रबुद्ध ब्लोगर भी भ्रमित हो जा रहे हैं की आखिर प्रेम पर इस कॉन्टेस्ट का मानक क्या है ..... क्या यहाँ प्रेमी युगल पर ही चर्चा को मापा जाएगा.... या किसी प्रेम कहानी को ...... या नायक नायिका के सौन्दर्य से सजी किसी कविता को...... और आपके मेरे ओर अन्य ब्लोगेर्स के भ्रम का कारण जो चित्र है उसको भी मैंने उल्लेखित किया है..... मैंने कहीं पर भी आपके लेख को गलत नहीं कहा.... पर इतना जरूर कहा की आप भी इस प्रतियोगिता के स्वरूप पर भ्रमित हो गए..., आशा है आप इसे अन्यथा न लें...... इसी लिए मैंने प्राथमिकता से आपकी प्रतिक्रिया का उत्तर दिया .......

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

भाई पियूष जी नमस्कार । तो आप सब लोग वैलेंन्टाईन कांटेस्ट की वैतरणी में जी जान से लगे हुये हो । कोई मित्र ऐसा भी है जो इस तूफानी, लहराती, बलखाती, पहाड़ी नदी में अपनी नाव लेकर नहीं भी उतरा । खैर । अब वापस आ गया हूं तो आप सबके दिल का हाल जो लंबे लंबे लेख में बयां किया गया है पढ़ना पड़ेगा । (लेख बिना पढ़े टिप्पणी की गयी) . "आखिर ये कैसा प्रेम है जो प्रेमिका के बिना शुरू ही नहीं हो रहा" कुछ भ्रम जागरण जंक्शन की ओर से भी रहा . कॉन्टेस्ट के लिये लगाया गया चित्र ये है" (लेख पढ़ने के बाद टिप्पणी) वैसे यह लेख बताता है कि भले ही मैं नहीं था लेकिन मेरे मित्रों ने भारतीय संस्कृति का झंडा थामे रखा । लेख पढ़ कर बहुत खुशी हुयी । बहुत बहुत आभार ।

के द्वारा: kmmishra

पियूष भाई प्रेम को उसके सही अर्थों में साझ पाने और समझा पाने में आप आखिरकार कामयाब हो ही गए हैं.... नहीं तो प्रेम के नाम पर यहाँ अर्थात जागरण के इस मंच पर कुछ भी परोसा जा रहा है... और कुछ लोगों का तो ध्यान विषय की गुणवत्ता से हट कर JJ की बनायी विशेष श्रेणियों में शामिल होने भर का है... चाहे वो कुछ का कुछ लिख आये हों... अर्थ का अनर्थ कर आये हों... इस सर्व व्यापी विषय को लोगों ने इस मंच पर इतना छोटा बना दिया है की अब प्रतिक्रिया भी क्या दें... जिस प्रेम को कबीर...नानक...रैदास...ओशो...चैतन्य... और ना जाने कितने संतों ने व्याख्यित कर हमें समझाने की चेष्टा की... वह प्रेम का स्वरुप हमारी क्षुद्र बुध्धि समझ ही नहीं पाती... अब समझ में आ रहा है की इन लोगों का अपने समय में इतना विरोध क्यों हुआ था.... क्योंकि इंसान कभी बदला ही नहीं है... आप इस मंच के कुछ गिने चुने लोगों में से हैं जो विषय को समझते भी हैं... और प्रस्तुत करने की क्षमता भी रखते हैं.... आपको शुभकामनायें. www.himanshudsp.jagranjunction.com

के द्वारा: HIMANSHU BHATT

प्रिय पियूष जी आपके द्वारा कही हुई बाते अक्सर जीवन में कही न कहीं घटित होती रहती है पर=== \\" मानव का ह्रदय प्रेम की अपार संभावनाओं से भरा है\\"------- ऐसा कथन शायद सही नहीं होगा हृदय तो शरीर का इंजन मात्र ही है यह आप यूँ भी कह सकते हैं हृदय एक पम्पिंग स्टेशन है जो मानव के प्रत्येक अंग को रुधिर का सञ्चालन करता है ...........… अन्यथा प्रेम का सम्बन्ध हृदय से तो बिलकुल नहीं हो सकता हाँ पुस्तकों में और बोल-चल में सब यही कहते है की प्रेम का सम्बन्ध हृदय से है --- यह तो मस्तिष्क की ही करामत है जहाँ से प्रेम के साथ नफरत भी कुलांचे भारती है चूँकि व्यक्ति के पुरे शरीर में केवल मस्तिष्क ही एक ऐसा स्थान है जो पुरे शरीर को संचालित करता है और कंट्रोल भी करता है ------- चूँकि आपने valentine contest के सन्दर्भ में लिखा है तो हो सकता आप ही सही हो ? अच्छे लेख के लिए वधाई

के द्वारा: s.p.singh

प्रिय श्री पियुष पंत जी, पहाड़ी क्षेत्रों में वन्‍य जीव के रिहायशी क्षेत्रों पर ही डाका नहीं डाला जा रहा है अपितु इस देश में तो हर जगह यही हाल है। बेचारा बेजुबान कर भी क्‍या सकता है। आपके जैसे लोगों के माध्‍यम से यह प्‍यार भरी अपील और क्‍या ? वेलेंटाइन कांटेस्‍ट के लिए आपकी सभी रचनाएं बेहतरीन हैं। ■कैसा हो वेलेंटाइन डे ■ये प्रेम क्या है......... ■फिल्मी प्रेम........ ■कैसा ये प्यार है...... ■जादू प्रेम का...........■शर्तों पर प्रेम ...... -Valentine Contest इतना कुछ व स्‍तरीय लिख पानें का आखिर राज क्‍या है? Valentine King का ताज तो केवल एक है और लग रहा है कि दावेदार कुछ ज्‍यादा ही हो गए हैं। खैर आपको मेरी बधाई। इस रचना के शीर्षक के साथ भी आप -Valentine Contest शीर्षक लगा सकते थे आखिर वन्‍य जीव प्रेम की बात है। अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: bhaijikahin by ARVIND PAREEK

प्रिय अनाम भाई साहब ...नमस्कार ! आप पीड़ित है तो जितना दुःख आपको सहना पड़ा है वोह शायद कोई और न समझ सके ...... रही बात इलाज की तो आप मानवाधिकार आफिस में अपनी शिकायत दर्ज करवा करके या फिर किसी अखबार में पाठकों के शिकायती पात्र वाले कालम में अपनी शिकायत भेज करके अपना पक्ष जनता के सामने रख सकते है ..... आज के जमाने में मीडिया से ताकतवर कोई भी नही है ..... इस ब्लाग को लिखकर आपकी समस्या कम हो या फिर हल हो , इसकी संभावना तो कम ही है ..... फिर भी आपके सुखद भविष्य की कामना के साथ प्रिय पियूष भाई ने जितनी भी प्रयास आपके लिए किये है , उनके लिए उनको साधुवाद उनका हौंसला + भावना +जज्बात इसी प्रकार बने रहे , यही कामना है

के द्वारा: rajkamal

आदरणीय पीयूष जी सादर प्रणाम  घर में एक बार एक सांप घुसा। लोगों को सूचना मिली तो लाठी-ठण्डा लेकर उसे मारने के लिए दौ़ड़ पड़े। सांप की जान जाते देख मुझ जैसा इंसान परेशान हो उठा। लोगों से मैंने आग्रह पूर्वक पूछा कि आप  इसे मारने के लिए क्यों आयें हैं तो लोगों ने कहा कि सांप आपके घर में घुसा है। इसे यहां रहने का हक नहीं है। लोगों से मेरा सवाल था कि पहले आप तय करें कि घर मेरा है या सांप का। पहले तो नदी-नाले, जंगल-पहाड़ ही तो थे। जहां पर सांप संग अन्य जंगली जीव जन्तु रहा करते थे। हमने उस स्थान पर कब्जा कर लिया और उनके घर को अपना घर बताने लगे। कभी- कभी तो उन्हें अपने घरों को देख लेने दिया जाय। फिर क्या था लोग बुदबुदाते हुए वापस चले गये और थोड़ी देर में सांप भी खुद ब खुद चला गया। नियति को शायद यहीं मंजूर था। सांप से कहीं अधिक जहरीले इंसान के नाम पर शैतान का आखिर तो कोई इलाज हो। प्रमोद कुमार चौबे   

के द्वारा: pramod chaubey

पीयूषजी नमस्कार , मैं एक छात्र हूँ. मैंने आपके कुछ लेख पढ़े. बस इतना ही कहूँगा कि दिल से आपकी तारीफ करने को दिल छह रहा है. बहुत समय से इन्टरनेट में मैं ऐसा ही कुछ तलाश कर रहा था. लेकिन आज मैं आपसे कुछ और कहना चाहता हूँ. मैंने आपका एक लेख ‘स्वामी विवेकानंद कि प्रासंगिकता’ और ‘मेरा भारत महान था’ पढा.मैं चाहता हूँ कि आप अन्य पुरूषार्थों कि जीवनी पर ऐसे ही प्रेरणादायी लेख लिखें, जिससे हम नवयुवक प्रेरणा ले सकें. जैसे- अब्दुल कलाम, राजेंद्र प्रसाद, शास्त्रीजी, इंदिरा-गाँधी, भगतसिंह, राजगुरु.........मदर टेरेसा, हॉकी के जादूगर ध्यांचाद, पुलेला गोपीचंद, भारतकुमार(अभिनेता मनोज कुमार), गुलशन कुमार, नरेन्द्र मोदी, वगैरह-वगैरह. आप इनकी जीवनी नहीं लिखें बल्कि, इनके बचपन या जीवन के कुछ खास अनछुए पहलुओं को उजागर करें. साथ ही कुछ टॉपिक मैं आपको देना चाहता हूँ...जैसे – सचिन तेंदुलकर बनाम ब्राडमैन, सत्य कि हमेशा जीत होती है- कितना सच. साथ ही इन मुद्दों पर कृपया सिक्के के दूसरे पहलु को उजागर करें-- ओपरेशन ब्लूस्टार (अमृतसर), गोधरा-कांड, गुजरात- दंगे २००२, बाबरी-विध्वंस, अयोध्या में राममंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय, विदोशों में जमा कला-धन............................मैंने ये सारे टॉपिक इसलिए सुझायें हैं क्योंकि मुझे लगा कि शायद ऐसा करके मैं आपके विचारों के दायरों को एक जगह समेटने में कुछ मदद कर सकूँ.......आपके जवाब कि प्रतीक्षा में ......एक नया प्रशंशक व आलोचक ...

के द्वारा: rahul

के द्वारा: Bhagwan Babu

पियूष जी .. गाँधी जी पर दुनिया में .. सबसे ज्यादा तर्क वितर्क हुए है उनके आलोचक और समर्थक दोनों ही अपने तर्कों को सही ठहराते है... जहा तक मेरा व्यक्तिगत मानना है .. गाँधी जितना शक्तिशाली व्यक्ति इस मानव समाज में दूसरा नहीं हुआ .. उनकी आजादी और अन्य योद्धाओ की आजादी का तरीका लक्ष्य सबमे मौलिक भेद था.. यही कारन है की जेल में रहते हुए भगत सिंह ने क्रांतिकारी हिंसक आन्दोलनों की व्यर्थता को समझते हुए गाँधी वादी मत के प्रति सकारात्मक रुख अपनाया था .. और उन्होंने भी आजादी को एक लक्ष्य न मानकर एक प्रक्रिया माना था .. गाँधी जी ने भी स्वतंत्रता को कभी लक्ष्य नहीं माना बल्कि एक प्रक्रिया माना .. जो सतत गतिमान रहे तबतक जबतक की अंतिम व्यक्ति आजाद न हो जाये.. जबकि हमारे आधुनिक भारत के निर्माताओ ने आजादी को एक लक्ष्य मान लिया और 15 अगस्त के बाद इस लक्ष्य की प्राप्ति का उल्लास मानाने में इतने डूब गए... की ये प्रक्रिया जहा की तह रूक गई और अंतिम व्यक्ति कही गहरे दफन हो गया .. जिसका परिणाम हम आज अव्यवस्था भ्रष्टाचार .. और तमाम तरह के समस्याओं के रूप में देख रहे है.. ये विडम्बना है की जह पूरा विश्व गाँधी के विचारो का प्रचार कर रहा है .. वही गाँधी के देश में उनकी आलोचनाये व्यक्ति के निजी जीवन को तोड़ मरोड़ कर रखने और घटिया वक्तव्यों को जोड़कर चरित्र हनन के प्रयासों के निम्नतम स्तर तक जा चुकी है ...आलोचना होनी चाहिए मगर इसकी सार्थकता भी होनी चाहिए.. .... श्रृष्टि का कोई भी मानव पूर्ण नहीं है.. गाँधी जी ने भी नहि कहा की वे महँ है या हम उन्हें महँ माने .. समय परिस्थिति के अनुसार व्यक्ति अपने पास के सर्वोत्तम संसाधनों का प्रयोग करता है गाँधी जी ने भी यथा शक्ति वो किया .. हमें इसका सम्मान करना चाहिए.. गाँधी जी ने जीवन में आम आदमी की लड़ाई लड़ने का जो ब्रह्मास्त्र दिया वह आज भारत ही नहीं पूरी दुनिया के सबसे निडर लोगो का हथ्यार है...वरना आइन्स्टाइन ने यु ही गाँधी को हाड मास का अजूबा नहीं कहा था ... पियूष जी इस बेहतरीन लेख के लिए बधाई ...... शुभकामनाये..

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

रम अन्दर जाती हैं………. तो राम अपने आप बाहर आ जाते हैं priy piyush ji ....nmskaar ! क्या गजब की बात कही है आपने ..... और भैया गाँधी जी किस को अच्छे लगते नही है , है कोई ऐसा इस भूमि पर .....(नोटों पर) और गाँधी जी ने तो अपनी युवा अवस्था में ही दक्षिण अफ्रीका में इसी अहिंसा के हथियार के बल पर लड़ाई जीती थी (विदेश में ).... देश में तो इस लड़ाई की शुरुआत बाद में हुई थी ..... और उन्होंने अपनी वोह लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं बल्कि एक साम्राज्य के खिलाफ लड़ी थी ...... एक हजार बरस की गुलामी को सह रहे दबे हुए लोगों को अपने पीछे लगाना कोई आसान काम नही है ..... आपने अपने विचार बहुत ही सुंदर तरीके से रखे है ..... जिनसे की ज्यादातर लोग सहमत होंगे ... बधाईयाँ

के द्वारा: rajkamal

पियूष जी सादर अभिवादन, आपने सही लिखा कि एक दिन भी हम अहिंसा के विना rah जाए फिर पानी पी पी कर कोसो. aaj हम जिस समाज में रह रहे है वोह स्वार्थ परक है हर इन्सान में दोष ही दोष dikhte है पर क्या कोई दोष रहित इंसान दिखा सकते है बना सकते है तो चुप हो जाते है. एक कहानी याद आ रही है लिख देता हूँ एक कलाकार ने एक तस्बीर बने और चौराहे पर लगा दिया. नीचे लिखा था कि कमिंया निकालिए. अगले ही दिन तमाम लोग गए और टिक करके चले आये कलाकार आया तो दुःख हुआ कि कितनी मेहनत से बनाया था लोगो को पसंद नहीं आया फिर अगले ही दिन उसने साथ में एक और पोस्टर लगाया कि एक अच्छा सा तस्बीर बनाइये जव अगले दिन वह गया तो पोस्टर खाली था? गाँधी जी उस ज़माने के नहीं आज के भी हीरो है और रहेंगे क्यों कि कोई दुसरा गाँधी देश पैदा नहीं कर पाया. जिसका लोहा विदेश वाले मानते रहे है और देश में आलोचना, क्या साथ ले गया अपने साथ देश में ही रह गया सव कुछ. बधाई हो.

के द्वारा: shailandra singh

भाई राजकमल जी......... पर कहीं न कहीं हमारी ये छोटी मानसिकता जो इन महापर्वों को छुट्टी के रूप मे स्वीकार करती है.......... वो इन बच्चों की मानसिकता भी बदल देगी........ बच्चे के लिए ये दिन स्कूल मे कार्यक्रम करने तक ही सीमित न रह जाये ....... इस का ध्यान हमें रखना होगा............ वास्तव मे ये सैनिक परेड आम जन को एक भरोसा दिलाती है की हम अब भी सेफ है.......... पर बात ये नहीं है........  बात ये है की अगर यूं ही लोग इस पर्व को छुट्टी की तरह मानते रहे..... तो क्या कल इन परेडों मे कोई दिखेगा............. क्या ये लगातार महत्वहीन नहीं हो जाएंगे....... जहां हमने अपनी कई पुरानी मान्यताओं को छोड़ दिया कहीं इनसे भी हम किनारा तो नहीं कर लेंगे...........

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

प्रिय पियूष भाई ... नमस्कार ! एक बार फिर से आप हाज़िर है अपने चिर परिचित अंदाज़ मे..... पियूष भाई .....हम तथाकथित बडो के लिए चाहे यह राष्ट्रिय पर्व एक अदद छूटटी से ज्यादा महत्व ना रखता हो .... लेकिन बच्चो के कोमल मन पर तों इसकी कुछ ना कुछ छाप पड़ती ही है ..... और फिर २६ जनवरी को हम पूरी दुनिया को अपनी बढ़ती हुई सैनिक ताकत का एहसास भी तों करवाते है इसी बहाने ..... मैं नही समझता कि इसके सारे नुक्सान ही है ...... अगर कोई सबसे बड़ा नुक्सान हुआ है तों वोह हमारी मानसिकता में आई हुई गिरावट + नेतायों कि कथनी और करनी में अंतर + चाल और चरित्र में गिरावट + नैतिकता कि कमी ..... कमी हम लोगो मैं है ....यह राष्ट्रिय पर्व तों आज भी उतना ही पावन है जितना कि पहले थे .... एक सुंदर लेख पर आपको बधाई

के द्वारा: rajkamal

मैं आपकी बात पूरी तरह से समझ नहीं पाया........ वो किस तरह समझदारी दिखा सकता था..... जब आपके घर पर आर्मी का शासन चलता हो तो आप किस तरह से समझदारी दिखा सकते है.......... जब आपको केवल ऑर्डर ही दिया जाता हो ......... आपकी राय न ली जाती हो....... तो किस तरह से समझदारी दिखाई जाए.............. वास्तव मे कुछ हालत ऐसे भी होते है जहां हमको लगता है की ये इतना मुश्किल नहीं था...... पर जब खुद उन हालातों मे घिर जाते हैं.... तो पता चलता है की ये कितना मुश्किल था........................ मैंने बहुत नजदीक से उसके घर का माहौल देखा है......... एकलौते पुत्र पर जो वजन है...... वो केवल वो ही समझ सकता है......... फिर भी हम लोग पुत्र के स्थान पर तो खुद को ही रखते हैं पर  माँ बाप के स्थान पर भी अपने ही माँ बाप को रख लेते हैं.......... पर जिस तरह हर स्थान की अलग अलग आबो हवा के साथ वहाँ के लोगों के रंग रूप कद काठी बदल जाती है उसी तरह परिवार के माहौल के साथ संस्कार ओर विचार भी बदल जाते हैं.................... आपकी ये प्रतिकृया आपका अपने परिवार के साथ स्नेह प्रदर्शित करती है............ इस विचार के लिए शुक्रिया............

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

भाई शैलेश जी...... आपको अपने मित्र के पक्ष मे बताते बताते मैं इतना बता चुका हूँ.......... की कहीं उसके पिता जी को पता चल गया...... तो.......... ?  पर आपकी हर बात से मैं सहमत हूँ...... वो आज भी जब कोई उसको पूछता है तो अपनी सही सैलरी बोलता है..... ओर उसकी ये बात उसके पिता को गवारा नहीं है........ क्योकि झूठी प्रतिष्ठा पर चोट लगती है..... भले ही लोग बेटे को सत्यवादी कहें पर इसका प्रतिकुल असर पिता पर पड़ेगा........ तो वो आता ही नहीं है........ न आएगा...... न किसी को अपनी नौकरी के बारे मे बताना पड़ेगा ओर न ही उसके पिता के सम्मान को ठेस लगेगी................... आपने एक सपूत की तरह उसके पिता के हर भाव का सम्मान किया........ इसके लिए आप प्रसंशा के पात्र है...

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

पियूष जी मैं इस बारे में भी लिखा था की पिता का ये कार्य गलत था, क्योंकि ये ढांचा कर्तव्य की नीव पर न खड़ा होकर झूठी प्रतिष्ठा दिखाने के दलदल में खड़ा है | और रही बात १०-लाख और ५ लाख वार्षिक वेतन पाने वालों के जीवन स्तर में अंतर की बात तो इतना अधिक अंतर नहीं है | हाँ ये गलत है की पिता की झूठी प्रतिष्ठा को ध्यान में रखकर उसे स्वांग करना पड़ेगा | या सच कहने पर प्रतिष्ठा को थेश लगत है, लेकिन ऐसा कुछ नहीं प्रतिष्ठा को कोई थेश नहीं लगाती झूठ बोलने से प्रतिष्ठा नहीं बनती है , ऐसे में आपके मित्र को नि संकोच अपने घर जाना चाहिए, आपका मित्र अगर ५ लाख पात है और सच कहता हा तो अपराधी नहीं की उसे लोग अस्वीकार करेंगे .......

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey

पर शैलेश भाई........ क्या व्यर्थ के सामाजिक बढप्पन के लोभ वश पुत्र को दूर रखना गलत नहीं है....... जिस तरह पिता के निर्धन होने पर पुत्र को उसकी विवशता को समझते हुए उसके साथ व्यवहार करना चाहिए..... ओर अपनी क्षमता के अनुरूप ही अपनी आदतों को रखना चाहिए......... तो क्या पिता का ये कर्तव्य नहीं की वो पुत्र की सच्चाई को ही प्रकट करे...... आखिर क्या आवश्यकता है....... उसको बड़ा करने की ॥ क्या उसके गुण उसको बड़ा नहीं बनाते.......... ओर इस परिस्थिति मे जब की आप स्वयं अच्छे सरकारी लाभ के पद पर हों...... जबकि आपके पास पैतृक संपत्ति हो ........ तो बच्चे के लिए इस तरह का व्यवहार.............. कई लोग यहाँ ऐसे भी है जो रोजगार के अवसर न होने के कारण दिल्ली मे बेहद विषम परिस्थिति मे जीवन यापन कर रहे हैं......... जिनके घर वालों ने कम उम्र से ही उन्हे पढ़ने के लिए बाहर भेज दिया....... ओर जो आज भी अपने माता पिता से दूर है...... यहाँ बात विवशता की है। किन्तु मेरे मित्र के केस मे विवशता है ही नहीं......... यहाँ अपने अभिमान के लिए पुत्र का बलिदान है....... पुत्र अपना स्कूल खोलने को तैयार था .......... तो कहा नहीं ..... लोग क्या कहेंगे...... बाप के पैसे से स्कूल चला रहा है...... इतना पढ़ कर स्कूल चलना ....... नहीं.......... वो लड़का आज हल्द्वानी नहीं आता क्योकि वो एक 10 लाख के सालाना वेतन वाले की तरह व्यवहार नहीं कर सकता...... जैसा की उसके संबंध मे प्रचारित है..... इसकी आधी सेलरी वो पाता है....... पर पिता का अहं उसको 5 लाख सालाना मे स्वीकार नहीं कर पा रहा है......... क्या जिस स्थान पर आपने जन्म लिया जहाँ आप पाले बढ़े....... वहाँ आने का आपका मन नही होगा..... तो कैसे उसको उस स्थान से दूर करने वाले पिता के प्रति वो लगाव रखे........ लोभ ओर अहंकार सम्बन्धों को समाप्त कर देता है........ झूठी शान के लिए पुत्र का बलिदान किस तरह से न्यायोचित ठहराया जा सकता है............... आपकी निष्पक्ष प्रतिक्रिया के लिए शूक्रिया..........

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

प्रिय पियूष जी, अभिवादन .. आपका लेख पढ़ा अच्छा लगा, पुत्र का पक्ष रखने के लिए बधाई ..... जहाँ तक मैं समझता हूँ, आपके मित्र के पिताजी ने बार - बार आपके मित्र को विदेश भेजने के लिए प्रयाश करने को अगर छोड़ दें तू मुझे लगता है, उन्होंने अपने पिता होने के धर्म का निर्वहन करते हुए उसे अच्छी शिक्षा दी, उसे अपने पैरों पर खड़े होने के लायक बनाया, और अपने पुत्र प्रेम को कर्म के लिए न्योछावर किया ; यद्यपि महानगरों में कार्यालय से आने के बाद अकेलापन महसूश होता है ; किन्तु आप (मैं कोई पुत्र) इसके लिए पिता या परिवार के लोगों को दोषी नहीं ठहरा सकता ; क्योंकि अगर आपका मित्र बाहर नौकरी करने नहीं जाता तो उसे भी सरकारी नौकरी मिल जाती जरूरी नहीं है ; तो ऐसे में यदि परिवार के पास संचित धन नहीं होता तो आर्थिक समस्याओं से जूझते हुए भी वो माता - पिता को दोषी ठहराता | इसलिए पिता का कदम उचित था; और पुत्र को उनके त्याग और दूरदर्शिता का आभारी होना चाहिए | अगर ऐसे में पुत्र माता- पिता से खिन्नता रखता है तो वो गलत है | माता-पिता ऋण कोई चुकता नहीं कर पता है | उलटे ही उन्हें ही दोष लगता है जो की गलत है |

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey

भाई आशुदोष जी........ मेरा मित्र संवेदनाहीन हुआ है तो उसकी वजह वो जीवन है जहां उसको हर पल संघर्ष करना पड़ रहा है....... महानगरों मे वो लोग जो माँ बाप (परिवार) से दूर रह रहे हैं...... उनका जीवन कितना कष्ट प्रद है वो ही जानते हैं.......... बीमारी हो या कोई दुख खुद से ही बाटना पड़ता है...... कोई सहारा नहीं जिसके कंधे पर सर रख कर अपना दुख दूर किया जाए....... सुबह से रात तक नौकरी कर के जब खाली कमरे मे आओ............ तो लगता है की क्या इस जीवन का कोई मूल्य है....... ओर क्या ये जीवन है भी.......... जब कंपनियाँ कर्मचारियो को हर बदलते दिन मे जाने कब बाहर कर दें....... तो नौकरी बचाने के प्रयासों मे सारा जीवन हाथ से छुट जाता है......... ओर आईटी फील्ड तो ओर भी काटों से भरा है....... रोज नए नए सॉफ्टवेर आ रहे है.... आपको हर नए बदलाव के लिए खुद को तैयार करना पड़ता है.......... तो जीवन कैसे जिया जाए............. ओर जहां तक मेरा प्रश्न है ......... मैं शुरू से ही ये मानता हूँ............ की मेरी सफलता मे मेरे घरवालों का हाथ है......... उन्होने जो भरोसा मुझपर दिखाया वो ही मुझे सरकारी नौकरियों तक ले गया..........

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

लेकिन आपके मित्र की माता पिता के प्रति संवेदनशीलता के बारें मैं आप क्या कहेगें उन्होंने तो आपके मित्र की भलाई ही करी क्या आपके मित्र को महसूस नहीं होता जो कुछ उसके माता पिता ने किया वो कुलमिला के उसके लिए अच्छा ही किया भले ही इसमें उनका अहम् हो और उसको अब उन्हें अपने साथ रखना चाहिए मुद्दा पियूष भाई यह है की सब कुछ होते हुए भी लड़का अपने माता पिता को साथ मैं नहीं रख रहा तब जब उसके माता पिता को उसकी बहुत जरूरत है मुद्दा यह है की आप माता पिता से कुछ अनबन होने पर उन्हें साथ रखने से मना कर दे मुद्दा यह नहीं की आपने हल्द्वानी मैं ही अपना करियर बना लिया जहाँ आपके माता पिता रहते है और वो उस शहर को छोड़ना नहीं चाहते है शायद आप कुछ गलत समझ बैठे है वैसे आपके संघर्ष की दाद देने से मैं नहीं चुकूँगा यक़ीनन आपने अपने आप को सिद्ध किया और माता पिता का आशीर्वाद पाया ! यह उनके आशीर्वाद का ही फल है जो आप सरकारी नौकरी पाने मैं सफल रहे ! आशुतोष दा

के द्वारा: ashutoshda

के द्वारा: Aakash Tiwaari

आदरणीय आशुतोष दा ,, जहां तक मेरा प्रश्न है तो मैं बताता हूँ...... की कितना संघर्ष मुझे करना पड़ा....... मैं हाईस्कूल परीक्षा मे अच्छे अंक प्राप्त नहीं कर पाया था.... क्योकि मेरे सामाजिक विषय मे केवल पाससिंग मार्क्स थे........ ये विषय मुझे शुरू से ही उबाऊ लगता था॥ पर जब मैंने सबकुछ छोडकर सरकारी की ओर जाने का फैसला लिया तो  मेरे सामने ये चुनौती थी....... मैं स्नातक मे कम्प्युटर विज्ञान का स्टूडेंट था..... मैंने सबकुछ छोड़ कर इतिहास, भूगोल जैसे बोरिंग विषय पढ़ना शुरू किए........ मैं अक्सर बोर हो जाता था... पर तब मे ये सोच कर ओर मेहनत करता था की अगर बाबर अकबर से दोस्ती नहीं की तो घर से दूर होना होगा..... फिर जब मैं प्रतियोगी परीक्षाओं मे सफल होने लगा तो फिर मुझे इंटरव्यू मे होने वाले खेल से जूझना पड़ा........ फिर किसी ने कहा की एलआईसी ओर बैंक के पेपर मे ऐसा कुछ नहीं होता..... तो मैंने इस ओर रुख किया..... 3 माह लगातार पढ़ने के बाद मैं एलआईसी की विकास अधिकारी ओर एसबीआई क्लर्क के लिए परीक्षा मे सफल हुआ.......... पर दोनों इंटरव्यू मे नहीं........ फिर भी मे लगा रहा ओर तब मैं एलआईसी कैशियर के पद पर चयनित हुआ...... ओर फिर मुझे हल्द्वानी से 100 किमी दूर की ब्रांच मिली....... मैं वहीं रहता ओर शनिवार को वहाँ से आकार सोमवार को मैं वापस जाता .... फिर एक ओर परीक्षा मे मेरा चयन हुआ ओर मैं अपने वर्तमान पद पर पहुंचा........... जहां मैं रोज डेढ़ - डेढ़ घंटे के सफर के बाद घर से आ जा सकता हूँ..... तो मेरा ये मानना है की सारी कोशिश इस सोच के साथ की जाए की ये निर्णय ही जीवन मरण का है.... तो सब कुछ हो जाता है.... इस तरह की कोशिश मे माँ बाप का आशीर्वाद काम आता है.................. आपकी प्रतिकृया के लिए शुक्रिया.............

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

के द्वारा: dr manoj rastogi

अरुणेश जी........... यही सच्चाई है......... की अगर आपका बेटा घर का मतलब पति पत्नी बच्चों ओर इन सामानो से  निकलेगा तो वो अपने घर पर भी इनहि को रखेगा .......... जब तक आप अपने बूढ़े माँ बाप को अपने घर मे जगह नहीं देंगे.......... तब तक आपकी संतान भी आपको कोई स्थान नहीं देगी............. मैं आपको अपना उदहारण दूँ तो..... मेरे दादा दादी हमारे बचपन मे ही गुजर गए थे......... तब हम हल्द्वानी मे ही रहते थे............. क्योकि पिताजी की नौकरी यही थी........ तो आज भी जब कोइ हम से पूछता है की तुम्हारा घर कहाँ है तो हम उसको अपने दादा दादी का घर का पता ही बताते हैं ............. क्योकि हमारे पिताजी ने ये ही बताया है की मक़ान ओर घर मे यही अंतर है की घर माँ बाप से बनता है ओर मकान उसमे रहने वाले से........  पहले तर्क स्वरूप मे ये कह देता था की पर हमारे माता पिता (आप दोनों) तो यही हैं तो ये हमारा घर तो हुआ....... तो उन्होने कहा..... की तो जब ये हमारा घर है ही नहीं तू तुम्हारा कैसे.........

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

पियूष जी, लेख तो आप का निश्चित ही विचारणीय है. यहाँ दोनों बाते समझे लायक है की एक तरफ अपने माता पिता के सेवा कर्त्तव्य से कैसे न विमुख हुआ जाये और जीवन में प्रगति के पथ पर कैसे बढ़ा जाये. हमें नहीं लगता की यह कोई इतना कठिन कम है जो साथ साथ न किया जा सके, बस इक्षाशक्ति की जरूरत है. बहुत लोगो को देखा है उनके ड्राइंगरूम में सोफे/टी वी/फ्रिज को तो जगह मिल जाती है लेकिन माता पिता के बिस्तर के लिए जगह नहीं मिलती, और कारण ये दिया जाता है की घर छोटा है जगह नहीं है इतने लोगो के लिए. लेकिन साथ रहने के लिए घर में जगह से पहले ह्रदय में जगह की जरूरत होती है, जिसकी कई बार कमी दिखती है आज कल भागते समाज में.

के द्वारा: Arunesh Mishra

पियूष जी नमस्कार पियूष जी आपने कई बातें यहाँ पर बहुत ही सही लिखी है जैसे की माता पिता अपने बच्चों के भविष्ये को सुधारने के लिए उन्हें होस्टलों में डाल देते है और पढने के लिए विदेश भेज देते है जिससे माता पिता के प्रति उनकी संवेदन शीलता लगभग समाप्त हो जाती है यही नहीं माता पिता भी उनसे दूर रहने के कारन उसके व्यवहार में आये बदलाव को समझ नहीं पाते और उनकों उसी उम्र का समझते है जिस उम्र में उन्होंने उनकों होस्टल में डाला था ऐसे मैं दोनों का साथ में रहना बहुत मुश्किल हो जाता है क्योकि उनकी आदत वैसी ही पड़ जाती है ज्यादातर माता पिता का परित्याग करने वाले ऐसे ही बच्चे होते है इसलिए हम हमेशा बच्चों को दोष नहीं दे सकते अपवाद सब जगह है ! आपने बहतरीन कहानियों के साथ अपने ब्लॉग को संवारा इसके लिए बंधाई के पात्र है आपकी उम्र से पहले इतनी जानकारी आपमें उपस्तित विलक्षण प्रतिभा को प्रदर्शित करती है ऐसे ही अपने ब्लागों से हमें रूबरू करतें रहे ! धन्यवाद आशुतोष दा

के द्वारा: ashutoshda

आदरणीय निशा जी......... इसी ओर मेरा भी संकेत है........... की हम अक्सर अकेले बूढ़े माँ बाप को देख कर उसके बच्चों के प्रति धारणा बना लेते हैं........ पर अक्सर यही होता है की माँ बाप अपने पुश्तैनी मकान को ओर अपनी संस्कृति ओर अपने लोगों को छोड़ कर बाहर निकालना ही नहीं चाहते........... स्वयं मेरे जानने वालों मे मेरा एक मित्र बंगलोर मे है ओर उसके माता पिता सुदूर पहाड़ी क्षेत्र मे रहते है......... अब वो उनको ले जाने का हर प्रयास कर चुका है ओर वो जाने को राजी नहीं है क्योकि वो उस गाँव को जहा उन्होने अपने बचपन - जवानी के दिन बिताए......... छोड़ कर जाना नहीं चाहते................ तो कैसे उस लड़के को दोषी बताया जाए................. । आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

भाई नीलेश जी...... मैं खुद एक मिडिल क्लास से हूँ....... ओर जहां पर मे आज हूँ .... उससे कहीं आगे हो सकता था..... अगर मैं अपने माँ बाप को छोड़ कर दिल्ली मे ही जॉब कर रहा होता...... पर वास्तव मे मिडिल क्लास वो लोग हैं जिनके पास सब कुछ है पर माँ बाप नहीं है........ ओर जहां तक किसी संस्था का सवाल है तो बस अपने माता पिता को ही खुश रखें............ ओर मेरा मानना ये है की वृदधाआश्रम ओर अनाथ आश्रमों को संयुक्त कर देना चाहिए......... ताकि अनाथ बच्चे दादा दादी का स्नेह ओर बूढ़े नाती पोते का स्नेह पा सकें......... ताकि अनाथ बच्चों को अच्छे संस्कार मिल सकें................. ओर शादी करने न करने से कोई फर्क नहीं पड़ता ............ फर्क आदमी के बदलने से पड़ता है.......... आप शादी करें ओर बहू का सुख भी माता पिता को दें........... पर कभी भी अपनी पत्नी को ये एहसास न होने दें की आपके लिए उसकी अहमियत उसके माता पिता से अधिक है............. बल्कि उसको ये एहसास कराएं की उसके प्रति आपके मन मे प्रेम उतना ही बढ़ता जाता है जितनी इज्जत वो आपके माता पिता की करती जाती है........... आपकी भावनाएं सम्माननीय हैं.................

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

पियूष जी जीवन की वास्तविकता है ये,संतान बुलंदियों पर पहुंचे ,हर माता-पिता का ये स्वप्न रहता है परन्तु स्वप्न पूरा होते -होते एक स्तिथि ये आ जाती है कि बच्चे को परिवार से दूर जाना पड़ता है .माता-पिता जिस स्थान पर प्रारम्भ से रहें हैं वो छोड़ने को तैयार नहीं मै ऐसे कई परिवारों से परिचित हूँ जहाँ ये समस्या है.नौकरी छोड़ना तो संभव नहीं माता-पिता जाने को तैयार नहीं,महानगरों या नगरों का जीवन उनको रास नहीं आता चक्की में पिसता है लड़का थोडा एडजेस्ट तो करना ही होगा .हाँ जहाँ संतान है ही नालायक तो वहां सारी व्यवस्था व्यर्थ हो जाती है,ऐसी संतान भी हैं,जो अपनी आजादी के कारण या बोझ समझ कर माता-पिता से सम्बन्ध समाप्त कर लेते हैं..

के द्वारा: nishamittal

सही कहा आपने वास्तव मे जब आपके भीतर सच्ची श्रद्धा व भक्ति भाव पैदा हो जाता है तो मांग स्वत: समाप्त हो जाती है............. ऐसा ही कुछ विवेकानंद जी के गुरु परमहंस के बारे मे भी है की अंत समय मे जब उन्हे गले का कैंसर हो गया था ओर उनके लिए कुछ भी खाना पीना मुश्किल हो गया तो उनके कुछ भक्तों ने कहा की आप तो माँ  के इतने बड़े भक्त हैं ......... माँ स्वयं आपको दर्शन देती हैं........... तो आप माँ से क्यों नहीं क़हते की वो आपका गला ठीक कर दें........... तो परमहंस ने कहा की शायद माँ चाहती है की मैं अपने इस गले से केवल उसका ही नाम लूँ ओर भोजन तुम्हारे गले से करूँ......... पर भक्तों ने कहा नहीं आप एक बार काली से कहें तो......... तो परमहंस आँख बंद करके बैठ गए ओर बंद आँखों मे ही मुस्कुराने लगे.......... जब भक्तों ने उनसे इसका कारण पूछा तो वो बोले माँ भी यही कह रही है जो मैंने तुम से कहा................

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

आदरणीय पियूष जी, मै दसवी की परीक्षा के समय अपने घर से 4 किलोमीटर दूर संगम क्षेत्र में स्थित बहुत ही प्रसिद्ध "बंधवा के हनुमान" मन्दिर में बजरंगबली से 75 % पाने पर सवा किलो मोतीचूर के लड्डू चढाने का वादा किया था..मगर जब मै ये लक्ष्य पाने में पांच नम्बर से चूक गया तब मै अपने घर से आधा किलोमीटर दूर रामबाग के सिद्ध हनुमान के मन्दिर में आधा किलो लड्डू चढ़ाया और कहा जैसे मेरा पांच नम्बर कंम हुआ वैसे ही मन्दिर की दूरी और लड्डू की मात्रा ...अगली बार ध्यान रखना भगवान नहीं तो ये भी नहीं चढाऊंगा....आज जब भी वो दिन याद करता हूँ हंसी खुद-ब-खुद निकल आती है... शायद मैंने भगवान से कोई रिश्ता बना लिया था....मगर शायद मै गलत था....कर्म करना हमारा काम है...फिर हम अपनी गलती के लिए भगवान को क्यों कोसते है...बहुत अच्छा लेख... आकाश तिवारी

के द्वारा: Aakash Tiwaari

पियूस जी, ’सुख ऒर दु:ख’ तथा’जीवन व मृत्यु’-ये दो ऎसे अहम सवाल हॆं-जिनका जवाब तलाश करने में-आदमी का पूरा जीवन निकल जाता हॆ,लेकिन जवाब नहीं मिल पाता.’सुख ऒर दु;ख’ जॆसे दार्शनिक विषय का-आपने बहुत ही साधारण भाषा में मनोवॆज्ञानिक ढंग से विश्लेश्न किया हॆ.वाकई दु:ख का कारण साधनों की अनुपलब्धता नहीं-हमारी नकारात्मक सोच हॆ.हमारे पास जो कुछ हॆ,उसका आनंद नहीं ले पा रहे,लेकिन जो नहीं हॆ-उसके लिए दुखी हो रहे हॆं-यही तो विडंबना हॆ.सुख ऒर द:ख’जॆसे विषय पर लगभग दो-तीन साल पहले ,मॆंने एक कविता लिखी थी-जिसकी कुछ पंक्तिया नीचे दे रहा हूं.पूरी कविता अपने ब्लाग’दोस्ती’पर शीघ्र ही पोस्ट करूंगा. हम- यह जानकर /बहुत सुखी हॆं कि-दुनिया के ज्यादतर लोग हमसे भी ज्यादा दु:खी हॆं.

के द्वारा: विनोद पाराशर

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

के द्वारा: rajeev dubey

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

पियूष जी नमस्कार बहुत अच्छा लिखा आपने पियूष लगता है आप अपनी कलम फिर से पैनी कर ही आये ! आपके समर्थन में एक कहानी जोड़ना चाह रहा हूं एक बार दो साधू गंगा तट पर नहा रहे थे दोनों ही ब्रहमचारी थे तभी एक महिला के डूबने की आवाज आई उनमें से एक साधू तो इसलिए नहीं कूदा क्योकि उसकों बचाने में उसका ब्रहमचर्य व्रत टूट जाता किसी भी लड़की या महिला को छुना उनके लिए पाप था पर दूसरा साधू नदी में कूद कर उस महिला को बचा लाया और किनारे पर लाकर अपनी चादर भी उसकों देदी सभी ने उसकी तारीफ करी और लड़की को बचाने पर उसका धन्यवाद् किया लेकिन पहले वाले साधू को उसकी ये तारीफ बड़ी खली उसने जाकर गुरूजी से उसके इस कृत्य की शिकायत कर दी और ब्रहमचर्य टूटने की बात कही गुरूजी ने उस साधू को बहुत लताड़ा कहा की वास्तव में उसने मन से ब्रहमचर्य का पालन किया है तभी तो उसे डूबती महिला में केवल मानवता दिखाई दी लड़की या महिला नहीं , जबकि तुमने उसमें केवल महिला को देखा मानवता को नहीं यही नहीं वो तो अपने इस कृत्य को भूल गया लेकिन तुमारे दिमाग में वो कृत्य इतना बस गया की तुम उसको आश्रम तक ले आये वास्तव में अपराधी वो नहीं तुम हो ब्रहमचर्य तुम्हारा टुटा हुआ है ! लेकिन मेरे या आपके इस तरह से लिख देने से उन व्यक्तिओं द्वारा उठाई गयी आवाज दब नहीं जाएगी बात केवल असभ्य पोषक पहनने तक की नहीं बल्कि इस तरह की पोशाकों को पहन कर लडको को तरह तरह की भाव भंगिमा से आकर्षित करने की भी है जिसकों नाकारा नहीं जा सकता ताली दोनों हाथ से बजती है ! आशुतोष दा

के द्वारा: ashutoshda

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

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के द्वारा: eljcupzuv

राजकमल भाई ......... मैं दाडी मे बहुत ही भयानक दिखता हूँ.......... ओर मेरे पिताजी ओर भाई मुझे दाडी मे देखना पसंद नहीं करते ........ पर जब कभी वो मेरी किसी बात से नाराज हो जाते हैं तो मैं दाडी रख लेता हूँ.......... ओर फिर हार कर वो बोल ही पड़ते हैं........... की  दाडी तू कटवाएगा या आग लगानी है............ ओर फिर मैं कहता हूँ........... ओर उनका सारा गुस्सा छु हो जाता है............ वो हर बार जब भी नाराज होते हैं वो कह देते हैं अबकी दाड़ी का नाटक मत करना हमको कोई फर्क नहीं पड़ेगा......... ओर फिर हर बार मेरा यही तीर चलता है.......... ओर जहां तक आपके हनीमून वाले लेख का सवाल है लोग इसपर शायद ही लिखें ................. जिनको इस का अनुभव है वो यहाँ कुछ कहें तो अमर्यादित ही होगा......... ओर जिनको नहीं है......... उनकी कलपनशीलता आपकी जैसी हो नहीं सकती.............

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

आदरणीय अरुण जी............ यहाँ कमेन्ट के मामले में चूजी होने वाली जैसी कोई बात नहीं है.......... मैं जानता हूँ की हम लोग प्रतिक्रिया देते समय संबन्धित लेख को अपनी दृष्टि से आकलित करते हैं....... ओर जितनी मेहनत लेखक करते हैं उतनी ही प्रतिक्रिया देने वाले भी............ ऐसे मे यदि आपकी टिप्पणी डिलीट कर दी जाए तो आपका गुस्सा जायज है......... इसी लिए मैंने ऐसा कुछ नहीं किया........ आपलोगों मे से किसी की भी प्रतिक्रिया डिलीट नहीं की गयी.......... पर उसको छुपा दिया गया............... इसका एक मात्र कारण ये था.......की सभी की टिप्पणियाँ एक जैसी नहीं थी.......... मतलब राजकमल जी की प्रतिक्रिया उनके व्यंगात्मक लहजे मे थी.......... किन्तु क्योकि शब्दों के कोई भाव नहीं होते तो...... पढ़ने वाले को अपने भाव ही उसमे दिखायी देते हैं.......... इस लिए मैंने उनकी टिप्पणियों को हटा दिया........ अब केवल उनकी ही टिप्पणी हटाई जाती....... तो उनको अधिक बुरा लगता......... इस लिए आपकी प्रतिकृया को भी छुपना पड़ा.................... आपको बुरा लगा इसके लिए हार्दिक क्षमा चाहता हूँ..................

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

पीयूष भाई , मुझे नहीं मालूम था कि कमेंट्स के मामले में आप इतने चूजी हैं और वे आपको इतने बुरे लगते हैं तथा आपकी भावनाओं का दायरा इतना तंग है कि वे तुरंत आहत हो जाती हैं | आदरणीय शाही जी ने लिखा है कि "हटा कर अच्छा ही किया" | क्या आपने और उन्होंने मेरा कमेन्ट पढ़ा था या फिर आप दोनों किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं , यदि ऐसा है तो शायद विचारों के आदान प्रदान और मंथन के लिये ठीक नहीं है | वैसे आप लोग इस मंच पर वरिष्ठ हैं और मैं नया हूँ , इसलिए कुछ कह नहीं सकता हूँ | वैसे तो इस बार भी मैंने किसी की भावनाएं आहत नहीं की थीं , पर भविष्य में ऐसा न हो इसकी पूरी सावधानी बरतूँगा | आप लोगों के प्यार और स्नेह के लिये धन्यवाद |

के द्वारा: अरुण कान्त शुक्ला \'आदित्य\' \\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\'

के द्वारा: आर.एन. शाही

के द्वारा: अरुण कान्त शुक्ला \'आदित्य\' \\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\'

काश की उस ब्लोगर ने मुस्लिम धर्म में जन्म लिया होता तो अब तक आटे दाल तो क्या इतने वाहियात सवालों पे मौत और जिंदगी का भी अर्थ भली भांति चल पता चल जाता .... आज उनके सर पर 81 करोड़ के इनाम वाला फतवा कब का जारी हो गया होता ... गनीमत है की वोह हिंदू धर्म के बारे में इस धर्म निरपेक्ष देश में अर्नगर्ल प्रलाप कर रहे है .... अगर किसी मुस्लिम देश में भी होते तो ज़मीनी हकीकत का पता चल जाता ... और आज मैं अल्प ज्ञानी उन सभी को यह चुनोती देता हूँ की अगर हिम्मत है तो बिलकुल ऐसी बाते मुस्लिम धर्म के बारे में भी कह कर देखो .... फिर न तुम रहोगे और न यह तुम्हारी नामुराद शंकाए .... लानत है उनके समर्थकों पर ...अगर घर में माँ बहन यह सवाल उठाये तो उन बेचारियो की शामत ही आ जाये ...और यहाँ पर झंडाबरदार बनते है ....

के द्वारा: rajkamal

पियूष जी , नमस्कार | रंज की क्या बात है | हर काल में उस समय की सामाजिक स्थिति , सांस्कृतिक दशा और दर्शन के अनुसार पौराणिक ग्रंथों और पात्रों का चरित्र विश्लेषण होता आया है | वर्तमान सन्दर्भों में भी मैथिलीशरण गुप्त से लेकर अनेक विद्वान साहित्यकारों ने महाभारत और रामायण के नायकों से लेकर अनेक चरित्रों का वर्तमान दर्शन और तर्कों के आधार पर वृहद विश्लेषण किया है | भारत में यदि महान ज्ञानी ऋषी मुनियों की परम्परा है तो चार्वाक जैसा ज्ञानी भी हुआ है | तर्कों की टकराहट से ही विचार पैदा होते हैं और समाज आगे बढता है | इसमें पलायन को कोई स्थान नहीं है | डटे रहिये , सुनते रहिये , कहते रहिये , कभी न कभी कोई न कोई परिणाम अवश्य निकलेगा और विश्वास रखिये वह अवश्य ही अच्छा होगा | बस विचारों की टकराहट मन के स्टार पर न हो , बुद्धि के स्टार तक ही रहे , तभी चीजें सकारात्मक होंगी | आज जो कुछ भी समाज में व्यथित कर रहा है वह बुद्धि द्वंद के कारण नहीं है बल्कि हठ बुद्धि के कारण है | बस सभी को इससे बचने की जरुरत है | विचारोत्तक प्रस्तुति के लिये हार्दिक बधाई | कुछ ज्यादा लिख गया हो तो क्षमा प्रार्थी |

के द्वारा: अरुण कान्त शुक्ला \'आदित्य\' \\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\'

पियूष जी आपका यह शंका समाधान वाला लेख भी पिछले की भांति ही अतुलनीय है । भाई हों अथवा बहन, सभी से अपील ही की जा सकती है कि दूसरों की भावनाएं आहत करने वाले संदर्भों की व्याख्या, विशेष कर धार्मिक प्रकरणों को छूने से बचें । जब ज्ञानी संत समाज इनको छूकर विवादों से नहीं बच पाता, तो हम और आप इस विषय में कितना ज्ञान रखते हैं? पियूष जी आप भी कृपया व्यथित न हों । मंच सार्वजनिक है, हर कोई अपने विचार ही तो रखेगा । रीडर ब्लागिंग की ज्वाइनिंग का कोई क्वालीफ़ाइंग मार्क तो है नहीं, खुला मंच है । विचारों पर बहस चलती है, तर्क़ रखे जाते हैं । इससे अन्यथा किसी बात को लेना कहीं से मुनासिब नहीं है । साधुवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

मित्र राजकमल जी...शब्दों के अपने कोई भाव नहीं होते........ आपकी ये प्रतिक्रिया का भाव सभी नहीं समझ सकते.......... आपने ये प्रतिक्रिया सुबह ही कर दी थी........... किन्तु इस लेख मे भगवान श्री राम के ऊपर लगे उस आरोप पर चर्चा थी........... जिसमे कहा गया था की उन्होने माता सीता से अग्निपरीक्षा क्यों ली....... ओर उनको नारी प्रधानता के विरुद्ध दिखाया गया था........ उस पर आपकी ये आदतन व्यंगतमक टिप्पणी..... जोकि इस लेख के माहौल को देख कर कुछ भारी लगी....... तो कुछ लोग इनको अन्यथा न लें इस लिए सुबह ही इसको छुपा गया था..... ताकि जब इस पर जवाब आए तो लोगों को आपकी मंशा का पता चल जाए..... की ये केवल एक व्यंग है ..............पर आपने ऊपर एक ओर मिलती जुलती प्रतिक्रिया दे दी......... आजकल के लोगों पर जो अपनी तर्कों की कसौटी पर भगवानों को भी कस लेते हैं..........

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

के द्वारा: आर.एन. शाही

पियूष जी काफी अच्छा लिखा है आपने वैसे आज के प्रगतिशील समाज के पारंपरिक कार्यो को करने से पूर्व किसी के पास यह समझने का समय नहीं की अमुक कार्य क्यों होता है खास कर युवाओं में जैसे बहु ने सास से यह कभी नहीं पूछा की वह बिल्ली को क्यों ढकती है अगर उस समय यह सवाल का उत्तर बहु को मिल जाता तो आज समाज समाज में फैली कई पारंपरिक भ्रांतियों को निस्तारण हो गया होता अतेह सभी लोग मिलजुल कर समाज में फैली भ्रन्तिओं के निस्तारण का बीड़ा उठाए तो संभव है एक भ्रान्ति मुक्त समाज हम आने वाली पीडी को दे सके जैसे आपने जैन समाज में फैली एक भ्रान्ति को दूर करके किया ! वैसे मेरे कई जैन मित्र इसका पालन नहीं करते उम्मीद करते है की आने वाले लेखो में कुछ और भ्रान्ति का निस्तारण करेंगे आशुतोष

के द्वारा: ashutosh

जहाँ तक अन्धविश्वास की बात है............. मेरा मत आपसे कुछ भिन्न है......... मेरा मानना है की विश्वास प्रारंभ में हमेशा अँधा ही होता है........ फिर वो धीरे धीरे विश्वास में परिवर्तित होता है........... विश्वास का जन्म अन्धविश्वास से ही होता है.......... एक बात पढ़ी थी की दोस्ती में दोस्तों के बीच विश्वास ठीक उस तरह होना चाहिए जैसे उस बच्चे में होता है............जिसको की उसका पिता हवा में उछालता है और वो बच्चा हँसता है............. क्योकि वो जानता है की नीचे उसका पिता उसको पकड़ने के लिए मौजूद है............ पर क्या उसके पिता से चुक नहीं हो सकती..... अर्थात वो अपने पिता पर आँख मूंद कर विश्वास कर लेता है......... आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया .....

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

के द्वारा: div81

पियूष जी हमारी तथा औरों की भी बहुत सारी परम्परागत रीतियां कुछ ऐसी ही हैं, जो वर्तमान संदर्भों में कोई आधार नहीं रखतीं और महत्वहीन हैं । परन्तु उनके साथ तर्क़ की बजाय आस्था जुड़े होने के कारण कोई हाथ नहीं लगाना चाहता । देखा गया है, कि बिल्ली के गले में परिस्थितियों वश या हिम्मत के साथ जब कोई घंटी बांधने की हिम्मत कर जाता है, यानि इनको तोड़ने की पहल करता है, तो थोड़े द्वंद्व और नुक्ताचीनी के बाद समाज भी साथ हो लेता है, क्योंकि सबको इनको तोड़ने का फ़ायदा समझ में आ जाता है । आज बहुत सारी पुरानी रीतियों-कुरीतियों का अस्तित्व नहीं रहा, तो कुछ हमने नई भी गढ़ डाली हैं । गिफ़्ट और मामूली नेग के तौर पर शुरू की गई दहेज़ प्रथा किस विद्रूप स्वरूप के साथ आज विषबेल बन चुकी है, इसका उदाहरण आज हमारे सामने है । इन्हें उखाड़ फ़ेंकने के लिये समाज की सामूहिक ताक़त की दरकार है । आप ही के शब्दों में, अकेला चना भाड़ कैसे फ़ोड़े? साधुवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

अश्विनी जी........ सही कहा आपने एक वक्तव्य सुना था मैंने जिस में एक धर्मगुरु कह रहे थे..... की यदि परमेश्वर को पाना है तो जीवन में सदैव सत्य बोलो............ और इसका यदि सही अर्थों में अनुसरण करना हो तो भविष्य के सन्दर्भ में कुछ मत कहो ............. अगर आप ये कहो की कल से मैं शराब का सेवन समाप्त कर दूंगा......... तो इसका अर्थ है की आप झूट बोल रहे हैं............ क्योकि आप जानते ही नहीं की कल आप होंगे या नहीं............. और कल आप हों भी तो शराब हो गी या नहीं................. मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हो गया .......... और तभी थोड़ी देर बाद जैसे ही उन्होंने कहा की कल आप सबसे फिर यहीं मिलूँगा............ तो समझ गया की हाथी के दांत खाने के और और दिखने के और ................... और वो झूठे साबित हुए कियोंकि दुसरे दिन मैंने उन्हें सुना ही नहीं और उनका सबसे कल मिलने का वादा झूठा साबित हो गया.............. सबको समझाते हुए वो खुद वही कर गए..................

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

यही बात मैं अपने एक ब्लॉग में जो 15 अगस्त के आस पास लिखा था....... उस में कह चूका हूँ..... की हम चाहते हैं की भगत सिंह जैसे लोग फिर आये पर आये पडोसी के घर........... वास्तव में मुझेस पूर्व और अभी भी........... मेरे पिताजी भी यूँ ही विरोध करते रहते हैं......... वे भारतीय सेना एक सेवानिवृत फौजी हैं.... जब से मुझे याद है मैंने उनको हमेशा गलत का विरोध करते ही देखा....... और जब मैं थोडा बड़ा हुआ और अपने विचार रखने में सक्षम हुआ तो मैंने हमेशा उनको रोका ये सब करने से............. बात बात पर उनका आग बबूला हो जाना मुझे बुरा लगता था......... और अक्सर मैं कहता था की आप ही क्यों जिस जिस को परेशानी हो वो कहें........... पर अब वही काम मैं कर रहा हूँ....... और वो मुझसे पूछते हैं की क्यों अब दूसरों को क्यों नहीं बोलने देता............. फिर मैं कहता हूँ की मैं करता वही काम हो जो आपने किया पर आप क्रोध से बात को बढ़ा देते थे............... और मैं शांति से समझने का प्रयास करता हूँ........... फिर कोई माने तो ठीक न माने तो एक और प्रयास................. तो ये जरोर कहूँगा की खुद मुझे भी कभी ये लगा था की मेरे पिताजी ही क्यों हंगामा करते फिरें......... पर अब लगता है........... की वो सही थे और अब भी सही हैं............. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया..............

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

और जब मैंने बात की बदलाव की तो एक हुजूम साथ पाया पर जब मैंने पहल की बदलाव की तो खुद को अकेला पाया वाह-वाह क्या खूब लिखी है आपने ये लाइन मन प्रशन्न हो गया ये लाइन पढ़ कर .......... सच्चाई के करीब लिखा है आपने ............ मै ही नहीं हर वो इन्सान जो समाज को बदलने के लिए छोटा सा भी कदम आगे बढ़ाता है उसे यही झेलना पड़ता है ....... मैंने भी अपने जीवन में कई बार ये झेला है ..........आपके अनुभव पढने के बाद मेरा मन भी कर रहा है की अपने अनुभव बांटू इस मंच पर मेरा मन भी हल्का हो जाएगा ........ ऐसे समय पर अपने साथ किसी को न पाकर मन तो दुखता ही है क्योंकि ऐसे समय पर किसी एक व्यक्ति का भी साथ मन को हौसला तो पहुंचता ही है............ शुभ रात्रि.......

के द्वारा: priyasingh

प्रिय पीयूष जी, उपरोक्त घटना हमारी गिरती हुई नैतिकता की ही परिचायक है| आपने जिस साहस के साथ भीड़ की भेड़-चाल से अपने आपको अछूता रखते हुए बुरी मानसिकता का सामना किया वह काबिले-तारीफ़ है| आपके जज्बे की दिल से प्रशंसा करता हूँ| समाज बदलेगा और जरूर बदलेगा बस आप जैसे कुछ युवाओं की जरूरत है जो पथभ्रष्ट लोगों को समझा सकें कि समाज को किस बदलाव की जरूरत है- मानवीय होकर लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखने की या फिर पाश्चात्य सभ्यता की नंगई ओढ़कर आधुनिक दिखने की| श्रध्येय अदम जी के शब्दों में- 'जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ खुलासा देखिये, आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिये |" अच्छी पोस्ट पर बधाई!

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: Munish

के द्वारा: harishbhatt

पियूष जी नमस्कार ,हमारे देश में इस तरह की मामले भरे -पड़े हैं और इस तरह की घटनाये प्रत्येक दिन होती रहती हैं . यदि कोई V I P आ रहा होता हैं तो आपातकालीन सेवा को भी रोक दिया जाता हैं. यदि उस समय किसी की मौत होती हैं तो इसकी जिम्मेवारी कोई लेने को तैयार नहीं होता हैं. दक्षिण भारत में एक जवान जो वीरप्पन को मारने वाले दल में शामिल था उसे किसी गैंग के सदस्य ने घायल कर दिया था वहा से एक वरिष्ठ नेता जी का काफिला गुजरा लेकिन उन्होंने उस जवान को अस्पताल पहुचाने की जोहमत नहीं उठाई . आपने अति संवेदनशील मुद्दे को उठाया हैं. इसके लिए बधाई .मैंने भारत में बैंकिंग सेवा नाम से एक लेख लिखा हैं यदि फुर्सत मिले तो पढ़कर अपने विचारो से मुझे अवगत करावे. www.amitkrgupta.jagranjunction.com

के द्वारा: Amit kr Gupta

पियूष जी, आप ने जो बात लिखी वो बिलकुल ठीक हैं, मैंने सबके comments भी पढ़े, पर प्रश्न यह है की आप मैं या अन्य लोग जो केवल कलम चला रहे हैं और आपस मैं एक दुसरे को वाहवाही दे रहें हैं, वास्तव में धरातल पर क्या कर रहे हैं. क्या हुम इस नई पीड़ी के नहीं हैं हमारे समाज में blogs पढ़ते कितने प्रतिशत लोग हैं जो इन बातों का कुछ असर हो, हम अपनी संस्कृति, भाषा, और देश के प्रति कितने सकारात्मक रूप से कार्य कर रहे हैं, इस सब में नई पीड़ी का कोई दोष नहीं है जब उनको सिखाया पढाया ही ये है की पाश्चात्य संस्कृति तुम्हारी अपनी संकृति से श्रेष्ठ है, जब उसे अपनी भाषा में बोलने पर हीन भावना से देखा जाएगा तो क्यों वो इन सांस्कृतिक मूल्यों की चिंता करेगा, जो आज के युवा को विरासत में मिला है ये उसी का असर है, अब या तो कलम छोड़कर समाज में कुछ काम किया जाए या फिर इसी तरह लेख लिख लिख कर संकृति पतन को कोसें और इन लेखों पर एक दुसरे को बधाई देते रहें ..............बढ़िया ..............वाह वाह ..... बहुत खूब ... आदि आदि

के द्वारा: Munish

प्रिय पियूष भाई ..नमस्कार ! अरे भाई यह हम लोगो को कहाँ फसा दिया है ... ना तो हाँ करते बनता है और ना ही .... आप किस बात पे राज़ी हो सकते हो ... यह बात मेरी समझ से तो बाहर है.... पता नहीं की यह कथा कितनी पुरातन है .... पहले यह बुजुर्गो का खज़ाना हुआ करती थी .... फिर शायद इनको जब लिपिबद्ध करने में कुछ उंच नीच की संभावना हो सकती है ... या फिर एक बात एक पीढ़ी से दूसरी तक आते -२ अपना कुछ ना कुछ मूल स्वरूप खो देती है ...वक्त के अनुसार और अपनी सहूलियतो के मुताबिक उनमे घटा और बढा दिया जाता है ... इसलिए इस मामले में मैं ना तो किसी को भी खुश करने वाली बात कहूँगा और ना ही नाराज़ करने वाली .... *********************************************************************** फिर भी एक अच्छी कथा को हमसे साँझा करने के लिए धन्यवाद ... ब्लॉग फीचर्ड की बधाई ...और आगे भी ऐसी कथाओ से हमको रूबरू करवाते रहे ...

के द्वारा: rajkamal

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

के द्वारा: Tufail A. Siddequi

प्रिय पियूष जी, आप ने अपनी व्‍यथा अलग तरीके से ब्‍यां कि है और मैने अलग तरीके से, समानता मात्र आधुनिकता में बहने वाली ही बात उठाई है। आप जिसे ऐपण बता रहे है उस का प्रदेश के बदलते ही नाम बदल गया उसे रंगोली भी कहा जाता है जिस पर पैरों के निशान बने है इस तरह के चित्र मैने बंगाल में भी देखे है। आप का कहना सही है कुछ दिन बाद यह नई पिढी गेरू आदि सब भूल जाएगी। आज आधुनिकता का यह आलम है कि इस नए जमाने के बच्‍चों ने सुराही या मटका भी नही देखा क्‍योंकी घरों में अब फ्रिज जो आ गए है। तो मेरे भाई यह आधुनिकता की आंधी से बचते हुए कुछ पुरानी पंरंपराओं को हम और आप को जीवित रखने के लिए कुछ प्रयास करने होगें ताकि हमरी अगली जनरेशन यदि उन संस्‍कारों को देखेगी तो ही आगे चला पाएगी। -दीपकजोशी63

के द्वारा: deepak joshi

नंदा दीप जलाना होगा| अंध तमस फिर से मंडराया, मेधा पर संकट है छाया| फटी जेब और हाँथ है खाली, बोलो कैसे मने दिवाली ? कोई देव नहीं आएगा, अब खुद ही तुल जाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा|| केहरी के गह्वर में गर्जन, अरि-ललकार सुनी कितने जन? भेंड, भेड़िया बनकर आया, जिसका खाया,उसका गाया| मात्स्य-न्याय फिर से प्रचलन में, यह दुश्चक्र मिटाना होगा| नंदा-दीप जलाना होगा| नयनों से भी नहीं दीखता, जो हँसता था आज चीखता| घरियालों के नेत्र ताकते, कई शतक हम रहे झांकते| रक्त हुआ ठंडा या बंजर भूमि, नहीं, गरमाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा ||..................................मनोज कुमार सिंह ''मयंक'' प्रिय मित्र पियूष जी, आपको और आपके सारे परिवार को ज्योति पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं || वन्देमातरम

के द्वारा: atharvavedamanoj

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

के द्वारा: Ritambhara tiwari

पियूष जी , आपने बहुत अच्छे ढंग से अपना विचार व्यक्त किया हैं l जो बिलकुल सही हैं l क्योंकि शादी के बाद कोई रहस्य बाकि नहीं बचा रहता जिसके कारण अक्सर विवाह असफल होते देखा गया हैं l मगर कई बाते ऐसी भी होती हैं जो व्यक्ति -व्यक्ति के ऊपर निर्भर करता हैं l कई समझदार जोड़े भी हैं जो हालत अनुसार स्वयं को बदल कर बेहतर जिंदगी जी रहे हैं l पर इसकी तादात बहुत कम हैं l ऐसी बात नहीं कि परिवार द्वारा देखे गए सभी रिश्ते शत -प्रतिशत सही होते हैं l मेरी बचपन की सहेली की अरेंज मेरिज हुई थी ,परन्तु दोनों में अलगाव होने के कारण अलग हो गए हैं l पति-पत्नी में मनमुटाव से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं बच्चे जो चिंता का विषय है l

के द्वारा: rita singh 'sarjana'

यादों के गलियारे में पंहुचा दिया आपने... मेरे पिताजी सरकारी नौकरी में हैं, तो एक जगह से दूसरी जगह तबादले होना स्वाभाविक है, और हम सहेलियों को उन्ही चिठ्ठियों ने जोड़ रखा था... हम जब भी किसी जगह से नई जगह जाते और पुराणी सहेलियों के ख़त आते तो घर में सभी चिढ़ाते, "लो, आ गया मैडम की चिट्ठी" और मै बड़े चाव से उन्हें पढ़ती, फिर अपने यहाँ का हाल लिखती, यूंही हम सभी एक-दुसरे से जुड़े रहते... यहाँ तक की मैंने आज भी वो ख़त संभाल कर रखे हैं, और जब भी उन सहेलियों से मिलने का मन होता है तो उन्हें पढ़ लेती हूँ... न जाने क्यूं, चिट्ठियों में अजीबा-सा अपनापन होता है जो e-mails में तो कतई नहीं होता... आज आपका लेख पढने के बाद फिर वो संदूक खोलने का मन हो रहा है जहाँ मेरी सहेलियां और वो यादें रखीं हैं... धन्यवाद...

के द्वारा: Pooja

निखिल जी....... हर बार अपने लिए हम मंगाते ही रहते हैं .......... जब हम पर मुसीबत आती है तो हम जनता का सहयोग मंगाते हैं पर जब हमको सहयोग करना चाहिए तो हम पीछे हट जाते हैं........... ये तो इंसानियत नहीं है........ आप के सामाजिक कार्य और मेरे सामाजिक कार्य में शायद एक अंतर हो की आप समाज कार्य की नियत से आगे आये और मैं इस डर से........... की आज जो इन लोगों के साथ हो रहा है वो शायद कल मेरे साथ भी हो........... फिर मैं समझ गया की मेरे जैसे कई हैं जो बस सोचते ही है कर कुछ नहीं पाते ........... और तब एक प्रयास किया मामूली सफलता मिली है ........... पर आप लोगों से कुछ सीख कर शायद कुछ आगे भी कर पायें.......... प्रोत्साहन भरी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया...............
पीयूष जी, सर्वप्रथम तो आप बधाई के पात्र हैं कि आप इतने पुनीत कार्य के लिए आगे आते रहे हैं. परन्तु समाज के रुख की गलती तो इसलिए नहीं बताई जा सकती क्योंकि आज समाज में आप जैसे लोग कम तथा बहरूपिये अधिक हैं जिनसे क्षुब्ध हो मैंने भीख दे अपाहिज ............वाली पोस्ट लिखी थी. परन्तु रामलीला वाली जो घटना आपने बताई है या फिर मंत्री महोदय वाली तो मत भूलिए मंत्रीजी को अगला चुनाव जीतना है उनको वोट आपके अभियान में भाग लेकर नहीं भीड़ से मिलेंगें. ऐसे पुनीत कार्यों में ऐसी समस्याएँ तो आती ही हैं.परन्तु आप जैसे लोग उससे विचलित नहीं होते. मेरा बहुत पुराना अनुभव है देहरादून का.मै एक संस्था से जुडी हुई थी ऐसी जो ऐसी आपदाओं के समय सदा अपना योगदान देती थी.बहुत से कटु-मधुर अनुभव जुड़ें हैं उस समय के.

के द्वारा: nishamittal

के द्वारा: Ramesh bajpai

पन्त जी आपकी देशभक्ति के जज्बे को सलाम . यह भावना उस व्यक्ति की भावना से बहुत अच्छी जो केवल अपने खाने पीने के लिए जिन्दा है . पर एक नंगा सच यह भी है कि जब दो देशों का युद्ध हो अपने देश का सैनिक मरता है तो शहीद व दूसरे का कायर कहलाता है . मेरा दिल नहीं मानता कि विभिन्न काल खंडो विभिन्न विश्व मैं जगह जगह एक से एक बड़े दार्शनिक वैज्ञानिक समाज सुधारक न रहे हों . यह भी उतना ही सच है कि कभी दुनिया का कोई हिस्सा चिरकाल तक सम्रद्ध नहीं रह सके .यूनान भी हिंदुस्तान कि तरह कभी दर्शन वास्तुकला का केंद्र रहा होगा पर बर्बाद भी हुए . गाँधी जैसे लोग अपनी प्रकार अकेले होते हैं उनकी तुलना किसी नहीं हो सकती पर कई अन्य प्रकार स्वतंत्र ता दिलाने वाले चमत्कारिक लोग विश्व मैं हुए है जो अपनी जगह महान हो सकते हैं पुनः बधाई

के द्वारा: RaJ

पियूष जी अच्छे लेख के लिए बधाई स्वीकार करें , ऐसा ही एक प्रेरक प्रसंग है जो हम सभी ने बचपन में सुना था मगर आज बच्चो को ये सब बातें नहीं बताई जाती ये बहत ही दुखद है नाव गंगा के पार खड़ी थी। लगभग सभी यात्री बैठ चुके थे। नाव के बगल में ही एक युवक खड़ा था। नाविक उसे पहचानता था। इसलिए उस दिन भी नाविक ने उससे कहा- खड़े क्यों हो? नाव में आ जाओ। क्या रामनगर नहीं जाना है? युवक बोला- जाना तो है किंतु आज मैं तुम्हारी नाव से नहीं जा सकता। नाविक ने पूछा- क्यों भैया, आज क्या बात हो गई? युवक बोला- आज मेरे पास उतराई देने के लिए पैसे नहीं हैं। नाविक ने कहा- अरे, यह भी कोई बात हुई। आज नहीं तो कल दे देना, किंतु युवक ने सोचा कि मां बड़ी मुश्किल से मेरी पढ़ाई का खर्च जुटाती है। कल भी यदि रुपए की व्यवस्था न हुई तो कहां से दूंगा? उसने नाविक को इंकार कर दिया और अपनी कॉपी-किताबें लेकर छपाक से नदी में कूद गया। नाविक देखता ही रह गया। पूरी गंगा नदी पार कर युवक रामनगर पहुंचा। वहां तट पर कपड़े निचोड़कर भीगी अवस्था में ही घर पहुंचा। मां रामदुलारी बेटे को इस दशा में देख चिंतित हो उठी। कारण पूछने पर सारी बात बताकर युवक बोला- तुम्हीं बताओ मां, अपनी मजबूरी मल्लाह के सिर पर क्यों ढोना? वह बेचारा खुद गरीब आदमी है। बिना उतराई दिए उसकी नाव में बैठना उचित नहीं था। इसलिए गंगा पार करके आ गया। मां ने पुत्र को सीने से लगाते हुए कहा- बेटा! तू एक दिन जरूर बड़ा आदमी बनेगा। वह युवक लालबहादुर शास्त्री थे, जो भविष्य में देश के प्रधानमंत्री बने और मात्र अठारह माह में देश को प्रगति की राह दिखा दी। वस्तुत: ईमानदारी महान गुण है। जो व्यक्ति अपने विचार और आचरण में नैतिक सिद्धांतों के प्रति ईमानदार रहता है वही सही अर्थो में बड़ा बनता है।

के द्वारा: div81

पियूष जी, आपका सवाल बिलकुल वाजिब है मैं यहां यह और जोड़ना चाहता हूँ ------ शास्त्री जी का कार्यकाल तो बहुत ही थोडा था परन्तु उनकी वाणी में बहुत ओज था मैं यहां यह बताना चाहूँगा कि उनके कार्य काल में जब विश्व खाद्य संगठन के द्वारा यह कहा गया कि भारत में गेहुं कि पैदावार बहुत कम हो जायगी तथा अकाल जैसी स्तिथि हो जायगी उस समय शास्त्री जी ने एक आह्वान किया था भारतीय जानता से कि व सप्ताह में केवल एक बार सोमवार को केवल गेहूं से बने पदार्थ न खायं उसका इतना व्यापक असर हुआ था कि किसी भी होटल में भी गेहूं से बनी रोटी या अन्य वस्तु नहीं मिलती थी यह उनकी वाणी का ही ओज था जिसे सभी ने मन से स्वीकार किया था और इस विषय में इतिहास गवाह है कि गेहूं के विषय हम आत्म-निर्भर हो गए हैं | इसी प्रकार से उनकी वाणी का ही असर था कि १९६५ में हमारे सैनिकों ने पाकिस्तान को कैसा सबक सिखाया था | अत शास्त्री जी के जन्म दिन को व्यापक स्तर पर मानाने के लिए सरकार को व्यस्था करनी चाहिए ...............

के द्वारा: s.p.singh

प्रिय पीयूष जी, महात्मा गांधी एक ऐसे महापुरुष हैं जिनकी आलोचना करने में एक विचारहीन पशु सरीखे प्राणी से लेकर विद्वता की खान बने मूढ़ राजनेता तक अपनी शान समझते हैं परन्तु गांधी जी को वास्तविक जीवन में ढाल पाने का साहस किसी भी आलोचक में नज़र नहीं आता | वे तर्क वादी जो विभिन्न मुद्दों पर गांधी जी की आलोचना करते हैं उनसे अगर सिर्फ एक सवाल किया जाय कि गांधी जी की जो गलतियाँ मानते हो उन्हें अब आप अपने तरीके से सुधार लो तो बेचारे १ तर्क के १००० कुतर्क देने के बाद भी सिर्फ हकलाते रह जाते हैं| जिन मुद्दों को गांधी जी की गलतियाँ कहते हो वो एक ही आदमी की गलतियाँ तो थी और आप भी एक आदमी हैं क्यों न उसे आप बा नए सिरे से दुरुस्त कर लो क्योंकि सभी मुद्दे अभी भी ज्यों के त्यों बरकरार हैं | मैं स्वयं जब अपने आप से सवाल करता हूँ तो कुछ और नहीं सूझता और सिर्फ उनके सामने नतमस्तक होकर इतना स्वीकार कर पाटा हूँ कि गांधी व्यक्ति नहीं एक सम्पूर्ण दर्शन हैं और मैं एक अदना व्यक्ति भी मुश्किल से पूरा हूँ | गांधीजी ने कभी भी असत्य का विरोध करने में सुस्ती नहीं दिखाई और उनके आलोचक शायद ही कभी असत्य का विरोध करने का साहस कर पाते हों| जिस जुबान में है जुर्रते इज़हार नहीं, वो कुछ भी हो मगर साहिबे किरदार नहीं! गांधी जी को एक बार फिर नमन! अच्छी पोस्ट पर बधाई! वन्दे-मातरम!

के द्वारा: chaatak

प्रिय पियूष जी ! आपकी कहानी पढ़कर एक आघात सा लगा, साथ ही साथ आज के अति भौतिकता वादी, एवं स्वार्थी समाज पर क्षोभ ही हुआ ................. सब गलत पढ़ता है…………….. टीचर बोलता है की जीवन सबसे कीमती है………… झूठ है सब जब कल अपनी माँ के जीवन ने लिए पैसे मांगे तो केवल डेढ़ सौ रुपए मिले……… और आज जब कफ़न के लिए मांगे तो देखो पंद्रह सौ से भी ज्यादा जमा हो गए……….. वो भी बिना किसी के सवाल का जवाब दिए……… तो क्या मतलब मौत कीमती या जीवन……….. इन लाइनों ने जैसे झकझोर ही दिया .......... और मन ही मन ऐसा लगा की अगर बाध्यता को छद्म रूप देकर इसका वृत्तिकरण न किया जाता तो बाध्यता और वृत्ति में भेद न कर पाने की असमर्थता का आवरण न होता ........... कभी कभी ऐसा होता है जब हम ये भांप ही नहीं पाते की, बाध्यता किसकी है, वृत्ति किसकी है | मेरा मानना है, बाध्यता की स्थिति में असहाय की हर तरह से सहायता की जानी चाहिए ........... इतने अच्छे लेख के लिए बहुत बहुत आभार

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey

पर ये आकलन कैसे हो की कौन जरूरत मंद है और कौन नहीं......... प्रश्न ये है.......... जिसे हम हट्टा कट्टा इंसान कह रहे हों कहीं वो ही सबसे अधिक मजबूर तो नहीं............ यहाँ बरसात में कई बार मजदूर पूरी तरह से बेरोजगार हो जाते हैं............. साल भर कमर तोड़ मेहनत करने वाले ये लोग....... अपने घरों से दूर यहाँ काम करते है..... पर बरसात में ये क्या करें और अगर कभी भूख के मारे दो रोटी मांगे तो हम ये कह दें की हट्टे कट्टे हो कुछ काम करो........ ये गलत है.......... इसकी जगह हम दो रोटी तो दे सकते हैं...... पैसे की मदद में सोचना जरूरी है....... क्योकि इसका गलत इस्तेमाल हो सकता है पर रोटी और कपडा तो दिया जा सकता है........... आपकी प्रतिक्रिया पर इतना लम्बा भाषण देने के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ.... प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया.............

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

राजकमल भाई...... आपका कथन बिलकुल सही है.............. की हर कोई एक ही विषय पे अगर लिखने लग जाए … या सबकी सोच एक ही दिशा में मुड़ जाए ..यह तो संभव ही नहीं है … पर मेरा ये लेख था उन लोगों के लिए जो व्यर्थ में राष्ट्रमंडल खेलों पर और अयोध्या मसले पर बिना वजह अपनी राय दे रहे है.......... जैसा की आदरणीय बाजपाई जी के महत्वपूर्ण व सारगर्भित लेख पर एक टिपण्णी ........ द्वारा किसी ने अपने बेबुनियाद विचार उनके लेख पर प्रतिक्रिया के तौर पर दिए........... हालाँकि मिश्रा जी द्वारा उसका खंडन किया गया............. और तथ्य सामने आये........... … और सही कहा आपने हम तो अपने दिलो दिमाग में उनकी क़ुरबानी की शमा को रोशन रखे ... आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया… तो इस तरह के लोग जो अनर्गल लेख वहां लिख रहे है.............

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

पियूष भाई ..घर में अगर थोडा सा भी कही कोई अंग कट जाये तो कितना दुःख होता है .......लेकिन युद्ध भूमि में सैनिक / योद्धा अनगिनत ज़ख्म खाते हुए + सहते हुए भी हँसते -२ अपनी मात्रभूमि पर कुर्बान हो जाता है .... कुछ इसी से मिलता जुलता ज़ज्बा हमारे स्वतंत्रता सैनानियो में भी था .... उन्होंने लासानी कुर्बानी किसी के याद रखने की मोहताज नहीं है .... उनका रुतबा हमेशा ही ऊँचा रहेगा ...... हर कोई एक ही विषय पे अगर लिखने लग जाए ... या सबकी सोच एक ही दिशा में मुड़ जाए ..यह तो संभव ही नहीं है .... आपका कहना सही है .... अब आने वाले समय में उनको याद करने वाले और भी कम होते जायेंगे ... लेकिन हम तो अपने दिलो दिमाग में उनकी क़ुरबानी की शमा को रोशन रखे ...

के द्वारा: rajkamal

के द्वारा: pankaj mishra

के द्वारा: Tufail A. Siddequi

पियूष जी, इस बात से हम सभी सहमत है की कन्या भ्रूण हत्या एक सामाजिक बुराई है! .......................मैं इसके मूल में ,अधिकांश मामलो में, स्वयं स्त्री की ही, कन्या भ्रूण के प्रति भावशून्यता व् असंवेदनशीलता को उत्तरदाई समझता हूँ ................................जबकि ,संभवत: आप पुरुषों की स्त्रियों के प्रति उत्पीड़नात्मक व् दमनात्मक प्रवृत्ति को उत्तरदाई समझते है!! .........................क्या आप अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करेंगे ?............................................एक बात और, भले ही हमारे दृष्टिकोण अलग अलग हो ,मुझे विश्वास है कि हम कही न कही अवश्य ही सहमत होंगे ..........................................................................कोई दो रेखाए भी जो अलग अलग दिशाओ में खिंची हो, कही न कहीं अवश्य ही मिलती है!! .......................................................विज्ञान भी कहता है कि यदि रेखाएं सामानांतर हो तो भी मिलेंगी ...........................अनंत पर अवश्य मिलेंगी!!!! ..............................................शुभकामनाओ सहित .........................................................डैनियल

के द्वारा: daniel

पियूष जी ! आप सदैव ही सुंदर लिखते है ................यह लेख भी बहुत सुंदर है !! .........यह कैसी विडम्बना है की आज हमारे समाज में जितनी भी कन्या भ्रूण हत्याएं हो रही है.......... उनमे स्त्रियाँ ही आगे आकर निर्णय ले रही है ................... जिस स्त्री के २ या ३ लड़के होते है वह सदैव गर्व से सर ऊंचा करके यह बताती है की उसके इतने लड़के है ................. सामान्यतः एक स्त्री को लड़की की कमी नहीं खलती, ..........................लेकिन जिस स्त्री के केवल लड़कियां ही होती है उसे एक लड़के की कमी कितनी महसूस होती है यह कहने की ज़रूरत नहीं ..........................जब एक स्त्री से कन्या भ्रूण गर्भपात के लिए कहा जाता है तो वह अबला बन कर हाँ कर देती है ...........................लेकिन वही स्त्री जब परिवार में उसके स्वाभिमान को कोई चोट लगाता है तो विद्रोह कर देती है पति से अलग होने को भी तैयार हो जाती है ........काश ऐसा ही जज्बा उस समय पैदा हो, उसे अपने स्वाभिमान पर आघात महसूस हो जब कोई उस से उसकी गर्भस्थ बच्ची की हत्या के लिए कहे ................................ आज कानून ने गर्भपात करने या न करने का पूरा अधिकार केवल स्त्री को ही दिया है..................................... इस अधिकार का प्रयोग करने के लिए उसे अपनी मानसिकता बदलनी ही होगी ...................................................................................लड़का होने पर उसे गर्व न करने के सुख का त्याग करना ही होगा तभी इस देश की तस्वीर बदल पाएगी.............................क्या यह बदलाव कभी आएगा ?

के द्वारा: daniel

प्रिय पियूष जी ! आपने बिलकुल सही लिखा है की, हर किसी के पास दुःख है, और सब लोग अपने दुःख को अरसों से सहते आये है और उनके पास उसने निपटने का अनुभव है, तो दूसरे का दुःख लेकर परेशानी कौन बढ़ाये. अच्छा लेख ... परतु मैं यही कहना चाहूंगा की वस्तुतः ये दुःख नहीं हैं ये समस्याएं हैं, जिन्हें हम दुःख का नाम दे देते हैं, समस्याये सापेक्ष हैं, जैसे अगर आज बरसात हो रही है, और एक दैनिक मजदूरी पर काम करने वाले मजदूर को काम नहीं मिला ये उसके लिए समस्या है, लेकिन जिसके पास पहले से पर्याप्र साधन हैं उसके लिए ये प्रकृति का उपहार हो सकता है, ये उसके लिए समस्या नहीं ..... परन्तु दुःख पूर्णतः तो नहीं परन्तु पर्याप्त सीमा तक निरपेक्ष होता है | उदाहरणार्थ किसी बच्चे का मान से बिछड़ जाना, अब देखिये हर बच्चे को दुःख होता है चाहे वो संसाधन संपन्न का बच्चा हो या फिर अभावग्रस्त का बच्चा हो ..... वैसे अच्छे लेख के लिए बधाई ...

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey

चातक जी..... आपकी भावनाओं का मैं पूरी तरह से सम्मान करता हूँ........ अच्छा लगा जिस बेबाकी से आपने अपनी बात रखी....... पर कभी कभी इस तरह का सम्मान बोझ लगने लगता है..... जैसे आपने आरती में खड़े रहने की बात की........ तो धर्म में शिथिलता को पूरा स्थान दिया गया है...... यदि आप बीमार है तो आप बैठे बैठे भी हाथ जोड़ कर आरती में सम्मलित हो सकते हैं........ एक घटना जिस ने बड़ा द्रवित किया था और जो राष्ट्रगान से सम्बंधित है.. वो आप के साथ बताना चाहता हूँ............ यहाँ एक प्राइवेट स्कूल में एक बार राष्ट्रगान शुरू हुए अभी कुछ सेकेण्ड हुए थे की एक लड़के को मिर्गी का दौरा पड़ा ............. पर कोई उसको उठाने नहीं गया क्योकि ये राष्ट्रगान का अपमान था..... ये क्या है.......... ऐसे ही एक बार राष्ट्रगान के समय एक बालक अपनी पीठ खुजाने लगा और उसके हाथ पर डंडे का प्रहार हुआ की राष्ट्रगान के समय हिलना मना है............ पर जिसने डंडा मारा वो कैसे हिला.... इस लिए मैं सुचारू रूप से चल रही व्यवस्था को छेड़ने का पक्षधर हूँ की इतनी शिथिलता तो दी ही जाये........ जब झंडे के सम्बन्ध में शिथिलता दी जा सकती है तो इस में क्यों नहीं .......... कम से कम उस में तो जिस में गुलामी की बू आती हो......... बहुत अधिक के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ............. चातक जी.....

के द्वारा: Piyush Pant

पीयूष जी, मुझे इस्लाम और ईसाइयत के बारे में तो नहीं पता लेकिन सनातन धर्म में जब हम अपनी आराधना समाप्त करते हैं तो आराधना के सबसे महत्वपूर्ण अंश निराजन (आरती या आरारतिक) के समय सभी अपने आराध्य के सम्मान में खड़े होकर ही आरती करते हैं | हाँ ये बात अलग है कि वे सावधान मुद्रा में न खड़े होकर किसी भी आसान मुद्रा में हाथ जोड़ कर या करतल बजाते हुए महावाद्यों के साथ निराजन करते हैं | राष्ट्रगान में यदि सीधे सावधान मुद्रा में खड़े होने की परम्परा है तो इसमें क्या हर्ज़ है ? यह मुद्रा हमें आराम से राष्ट्रगान करने में मदद भी देती है और देखने और सुनने वाले को भी अच्छा लगता है| और अगर ये मान लें कि ये पूरी तरह से अंग्रेजियत ही है तो भी ये अच्छी है और अच्छी बात तो किसी से भी सीखी जा सकती है वो चाहे किसी भी धर्म, जाति या राष्ट्र से ताल्लुक रखता हो| हो सकता है आप मुझसे सहमत न हों लेकिन सुचारू रूप से चल रही एक व्यवस्था को छेड़ने का औचित्य ही हास्यास्पद लगता है खासकर तब जबकि उससे कोई हानि नहीं बल्कि लाभ मिल रहा हो| शुभम-मंगलम!

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: R K KHURANA

आपकी इस पोस्ट के लिये आपको अपनी एक कविता सादर ... कानों में गुनगुनातीं हैं वो माँ की लोरियाँ। बचपन में ले के जाती हैं वो माँ की लोरियाँ। लग जाये जो कभी किसी अनजान सी नज़र, नजरें उतार जाती हैं वो माँ की लोरियाँ। भटकें जो राह हमारा कभी अपनों के साथ से, आके हमें मिलाती हैं वो माँ की लोरियाँ। हो ग़मज़दा जो दिल कभी करता है याद जब, हमको बड़ा हँसाती हैं वो माँ की लोरियाँ। अफ़्सुर्दगी कभी हो या तनहाई हो कभी, अहसास कुछ दिलाती है वो माँ की लोरियाँ। पलकों पे हाथ फ़ेरके ख़्वाबों में ले गइ, मीठा-मधुर गाती हैं वो माँ की लोरियाँ। दुनिया के ग़म को पी के जो हम आज थक गये, अमृत हमें पिलाती हैं वो माँ की लोरियाँ। माँ ही हमारी राहगीर ज़िंदगी की है, जीना वही सिखाती है वो माँ की लोरियाँ। अय “राज़” माँ ही एक है दुनिया में ऐसा नाम, धड़कन में जो समाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

के द्वारा: razia mirza

निष्पक्ष हो कर विचार किया जाये तो धर्म विवाद नहीं सिखाता .धर्म का स्वरुप विकृत करने वाले भी हम ही हैं.पर अपनी सोच को एक ही रूप देकर दूसरा पक्ष न सोचना अपनी सोच को संकुचित बनाना है.निसंदेह हिन्दू धर्म व्यापक ,सनातन तथा सहिष्णुता का दूसरा नाम है, जिसका साक्षी हमारा इतिहास है .परन्तु इस सहिष्णुता का खामियाजा हमने इतना भुगता है की जिसको आश्रय दिया वही स्वामी बन बैठा.लेकिनं अगर विचार करें तो समझ में आता है की हमारी कमजोरी थी हमारी फूट, जिसका लाभ सबने उठाया ,परन्तु हमने अपनी गलतियों से नहीं सीखा और हमारा बटवारा और व्यापक हो गया.न जाने कितनी शाखाओं में हम विभक्त होते गए और आज तक हमारा देश पिछड़ों की श्रेणी में खड़ा है.आवश्यकता एकता की है न जाने ऐसा सुयोग कब होगा.

के द्वारा: nishamittal

के द्वारा: Piyush Pant

के द्वारा: Ajay Pal

पियूष जी आजकल ऐसा ही चल रहा है लोग अपनी छोड़ दुसरे के गिरहबान में झांक रहे हैं. एक दोहा याद आ रहा है ----- बुरा जो खोजन मैं चला, बुरा न मिलया कोई. जो मन खोजा आपना तो मुझसे बुरा न कोई. लोग इधर उधर की बातों को गलत तरीके से ले कर बैठे हुए हैं. वोह यह नहीं समझते के यह सब एक ही मालिक तक पहुँचने के रस्ते हैं. हाँ कुछ लोग इस मंच को लेकर इससे गलतफहमी फैला रहे हैं या इसका दुरूपयोग कर रहे हैं, जो जितना जल्दी बंद हो जाए उतना ही अच्छा है. हमें एक दुसरे के प्रति इंसानियत के नज़रिए से बर्ताव करना चाहिए. लोग रोज़ी रोटी के पीछे लगे रहते हैं. अभी आपने जैसा कहा की कश्मीर से हिन्दू पंडितों को भगाया गया जो बिलकुल गलत है. इसी तरह गुजरात से हिन्दुओं ने भी मुस्लिम लोगों को भगाया है वोह भी बिलकुल गलत है. आज यह देख कर बड़ा दुःख होता है की लोग बस अपने जात वालों को ही देखना चाहते है चाहे इसके लिए दुसरे को तकलीफ ही क्यूँ न देना पड़े. आज के हर आदमी को चाहे हिन्दू हो या मुस्लिम ऐसे बातों का कभी भी साथ नहीं देना चाहिए. देश तो पहले बंट चूका है अब और कितना बांटेंगे. अब तो हमें इसे एक ही रखना है. इतना तो मैं समझता हूँ और भी लोग समझ जाए तो मेरा मकसद पूरा हो गया समझें. आपका बंधू

के द्वारा: jalal

abuzar osmani ji, देखिये जहा तक बात दुर्व्यवहार की है तो वो किसी के साथ भी कभी भी कोई भी कर देता है............. पर इसका मतलब ये नहीं की वो उसके साथ उसके धर्म के कारण हुआ .. केवल उसके साथ हुई घटना को धर्म से जोड़ना पुरे धर्म के प्रति दुर्भावना नहीं है. जब शबाना आज़मी, इमरान हाश्मी, शाहरुख़ खान आदि अपने निजी हित के लिए अपने मुसलमान होने का मुद्दा उठाते हैं तो करोड़ों मुस्लिम्स उनके प्रति सहानुभूति प्रकट करने लगते हैं.......... इस बारे में हमे सोचना होगा.............. अगर दाउद इब्राहीम ये कहे की उसको आतंकवादी करार दिया क्योकि वो मुस्लिम था तो ये करोड़ों भारतीय मुसलमानों के प्रति दुर्भावना का विषय नहीं बन सकता ............ आपको किसी विशेष स्थान पर क्यों घर नहीं मिला ..... या आपके बच्चे को किसी विशेष स्कूल में एडमिसन क्यों नहीं मिला ये धर्म का मुद्दा नहीं है...................... अगर आप इसे धर्म से जोड़ते है...... तो आपको बेशक चर्चा मिले पर करोड़ों आपके धर्मावलम्बियों में अन्य धर्म के लोगो के प्रति दुर्भावना फ़ैल सकती है............... आपकी प्रतिक्रिया सार्थक थी..................... बहुत शुक्रिया...............

के द्वारा: Piyush Pant

जी मुनीश जी मेरे भी कुछ ऐसा ही मानना है.............. वास्तव में ये एकमात्र ऐसा धर्म है............. जिसने व्यापक सुधार की संभावना से कभी इंकार नहीं किया........ यही एक वजह है की इस धर्म को मानने वालों की संख्या बढ़ी ही है............. धर्म ये अवश्य ये कहता है की अधर्म के खिलाफ आवाज़ उठाना धर्म है....... पर वो ये नहीं कहता की दुसरे के धर्म की बुराइयों को उजागर कर आप अधर्म के खिलाफ आवाज़ उठा रहे है............ जबकि आप ये भी नहीं जानते की क्या उन बिन्दुओं पर कोई विचार कर भी रहा है की नहीं.......... अगर कुरान पढ़ कर लोग हिन्दुओं के खिलाफ हो जाते हो............. तो वीर अब्दुल हमीद, और कई मुस्लिम सैनिक जो सरहद पर अपने वतन के लिए लड़ रहे हैं वो कौन सी कुरान पढ़ते है.............. ये देश जिस रूप में है अच्छा है............. यदि मुस्लिम अपनी परेशानी का कारण अपने मुस्लिम होने को कहेंगे (जैसा मैंने अपने ब्लॉग हंगामा है क्यों बरपा में कहा है.) तो ये देश अपनी सहिष्णुता को बरक़रार नहीं रख पायेगा......... और न ही तब जब की हिन्दू कुरान पर सवाल करें......... आपकी प्रतिक्रिया के लिए फिर शुक्रिया..............

के द्वारा: Piyush Pant

पियूष जी, जब हम पंथ निरपेक्षता की बात करते हैं तो जाने अनजाने हम तथाकथित हिन्दू (सनातन) धर्म की ही बात करते हैं, क्योंकि केवल हिन्दू धर्म के ग्रंथों में ही किसी अन्य धर्मों से सम्बंधित कोई तथ्य नहीं है, वहां धर्मं का अर्थ मानवता से है, सत्य से है. किसी भी धर्म ग्रन्थ में न हिन्दुओं का वर्णन है, न क्रिश्च्यानो का, न मुसलमानों का, केवल वर्णन है तो सत्य का, जो मानवता के हित में है वो धर्म है, जो अहित में है वो अधर्म है. इस मान्यता में यदि किसी की धार्मिक भावनाओं को चोट लगती है, तो जरूरत है उस व्यक्ति को आत्म मंथन की, अपने धर्म की विवेचना की, ये किसी के धर्म को गाली देना या बुराई करना नहीं है, कोई भी व्यक्ति यदि ये सोच कर सच बोलने से घबरा रहा है की किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचेगी तो वो भी धर्म का पालन नहीं कर रहा है और अधर्म का समर्थन मौन रहकर कर रहा है. स्वामी विवेकानंद, उक्त परिभाषित धर्म का ही प्रचार प्रसार करते हैं तथा धर्म को राष्ट्रवाद से जोड़ते हैं, उनके अनुसार राष्ट्रहित में किया गया कार्य सबसे बड़ा धर्म है. वो फिर लोगों की व्यक्तिगत धार्मिक भावनाओं को राष्ट्रभाव के बाद में रखते हैं.

के द्वारा: Munish

बंधुओं, पियूषजी ने जो लिखा है सत्य है, ये गीत सर्वप्रथम जार्ज पंचम के स्वागत गान के रूप मैं ही गाया गया था तथा दिसम्बर १९११ में कांग्रेस ने अपने सम्मलेन में anthem के रूप में स्वीकार कर लिया था, वास्तव में anthem उस गीत को कहते हैं जो चर्च में सुबह और शाम को गाया जाता है, खासतौर से इंग्लैंड के चर्चों में, हमारे देश के आकाओं ने जब देखा की ज्यादातर लोग वन्दे मातरम के पक्ष में हैं तो तथाकथित पंथ निरपेक्ष लोग (जो आजतक हमारे देश को बांटकर पंथ निरपेक्षता फैला रहे हैं) वन्दे मातरम के विरोध में खड़े हो गए, और उसको दरकिनार करते हुए, तथा इंग्लैंड के प्रति अपनी अंधभक्ति को दिखाते हुए, national anthem इजाद कर दिया, नीलम जी, आप कहती हैं की जब इसको राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार कर लिया है तो हमें इसका सम्मान करना चाहिए, ऐसे तो हमारे संविधान में article ४४ के अनुसार सामान नागरिक अधिनियम बनाने के विषय में कहा गया है तो आजतक हम वो क्यों अमल में नहीं लाया गया, संविधान के अनुसार जाती प्रथा समाप्त होनी चाहिए, फिर भी नए प्रकार की जाती व्यवस्था ( genral, SC ST OBC आदि ) में बाँट दिया क्या ये सही है, आरक्षण का प्रावधान केवल १० वर्ष के लिए था ये क्यों निरंतर बढ़ता जा रहा है, बात केवल राष्ट्रगान के विषय में, इस लेख में लेखक की किसी छोटी या बड़ी सोच का पता नहीं चलता, उन्होंने एक ऐसा सच लिखा है जो बहुत कम लोग जानते हैं, जैसे एक सच ये भी है की भारत की कोई राष्ट्रभाषा भी नहीं है जानिये http://www.bharatvoice.com/2009/06/16/national-language-of-india/ तो क्या इस जानकारी से किसी की सोच छोटी या बड़ी हो गयी, आप यदि पियूष जी से सहमत नहीं हैं तो ठोस तर्कों के साथ उनका जवाब दें और इस लेख को सारगर्भित बनाने में सहयोग दें

के द्वारा: Munish

पन्त जी,, आप के लेख सकारात्मक होते है और ऐसे ही लेख आज की ज़रुरत है,, आप ने बिलकुल सही लिखा है की धर्म के बारे में लेख लिखने के योग्य हम लोग नहीं है खास कर नकारात्मक लिखने के तो एकदम पता नहीं क्यों लोग धर्म का सहारण लेकर नफरत फैलाते हैं !! पन्त जी मेरा मानना है की धर्म एक व्यक्तिगत मामला है और संस्कृति एक सामाजिक,, आप देखे की एक स्थान के रहने वाले सब एक ही तरह की वेश भूषा ,, खान पान ,, शकल सूरत के दीखते है चाहे किसी धर्म के क्यों न हो,, यहाँ तक की जब तक आप उनका नाम आदि ना पूछें आप जान ही नहीं सकते की वह किस धर्म को मानने वाले है,, फिर सिर्फ धर्म के आधार पर नफरत फैलाने के क्या तात्पर्य रह जाता है जब हमारा सब कुछ एक सा है !! कृपया अपने लेखो से हमारा मार्गदर्शन करते रहे... राशिद http://rashid.jagranjunction.com

के द्वारा: RASHID - Proud to be an INDIAN

चातक जी, अब कुछ आपके संदेहों का समाधान करना चाहता हूँ........ पर प्रश्न का उत्तर दीजियेगा जरूर....... जहा तक आपका ये कहना है की सन्यासी सभी धर्मों में होते हैं....... तो मैंने कहीं भी अपने लेख में नहीं लिखा की वो हिन्दू सन्यासी था..... और जहाँ तक प्रश्न इस बात का है की मैंने लिखा है................. हिन्दू धर्म में वो माँ बाप जिन्हें भगवान् से उंचा दर्ज़ा मिला हो क्या उनको छोड़ कर भगवान् मिल सकते है…....................... तो ये केवल इसलिए की मैं नहीं जनता की अन्य धर्मों में ये दर्ज़ा प्राप्त है या नहीं............ आप उसकी के बारे में बता सकते है जिसका आपको पता हो.............. जहाँ तक आपका ये कथन है की ...................धर्म भगवान् को प्राप्त करने का नहीं अपितु इंसान बनने की राह है| भगवान् को तो आप कहीं भी प्राप्त कर सकते है, बिना किसी धर्म को अपनाए हुए भी|..................... तो बिना इंसान बने आप कैसे भगवान् को पा सकते हैं.............. आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद............. आपने कुछ और लिखने के लिए प्रेरित किया है........जिसमे आपके सरे सवालों का हल मिल सके

के द्वारा: Piyush Pant

प्रिय पीयुष जी, एक बार पड़ने पर तो ऐसा ही लगता है जैसे आपकी सारी बाते सही हों लेकिन सन्यासी की बात कहते हुए (इरादतन) हिन्दू जोड़ना शायद आपकी कमजोरी बन रही है इस पर ध्यान दें| ये पुनरावृत्ति आपकी उत्कृष्ट लेखन शैली को तो प्रभावित कर ही रही है साथ ही साथ कहीं न कहीं 'हिन्दुओं पर और उनकी आस्था पर चोट करना कितना सुरक्षित है' वाली मानसिकता को भी दर्शा रही है | शायद आपने हिन्दू सन्यासी के बारे में अपना संस्मरण लिखा लेकिन क्या आपको पता है की सन्यासी हर धर्म में पाए जाते हैं और सभी की हालत एक जैसी ही है क्योंकि सन्यासी का धर्म से नहीं अपने निहित स्वार्थ या मुक्ति से सम्बन्ध होता है | अंत में लिखा भाग भी आपके शेष लेख से दूर भागता दिख रहा है जहाँ आप पहले हिस्से में कथित सन्यासी से असहमति दर्शा रहे हैं वहीँ अंतिम भाग में इसे भगवान् से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं जो बिलकुल गलत है क्योंकि धर्म भगवान् को प्राप्त करने का नहीं अपितु इंसान बनने की राह है| भगवान् को तो आप कहीं भी प्राप्त कर सकते है, बिना किसी धर्म को अपनाए हुए भी| आशा है आप बात को समझने की कोशिश करेंगे और एक सहिष्णु धर्म की आलोचना का लाभ उठाने की मानसिकता से भी| आगे तर्क-वितर्क आपकी मर्जी |

के द्वारा: chaatak

मुनीश जी, आप लिखते हैं की...................... जिस विषय पर आपको लिखना अच्छा नहीं लगता, उसी विषय को लेकर स्वामी विवेकानंद सारे विश्व में उसकी अलख जागते हैं, उसी धर्म की स्थापना के लिए कृष्ण महाभारत कराते हैं, शिवाजी अलग राज्य की स्थापना करते हैं............ स्वामी विवेकानंद ने हिंदुत्व पर तब बोला जब वो उस अवस्था में थे जब बोल सके........... जो जान ले वो कुछ बोल सके........... कुछ ....... सब कुछ नहीं.......... क्योकि धर्म जो की बंधन रहित है वो कैसे शब्दों में बंध सकता है... जहा तक आपका अधर्म के खिलाफ आवाज़ उठाने का सवाल है........ तो कौन तय करेगा की क्या धर्म और क्या अधर्म ....... क्या दुसरे धर्म को गाली देना धर्म है............ आप जब तक अपने धर्म की कुरीतियों को दूर करने की बात करते है ठीक है........... पर क्यों आप दुसरे के धर्म में हस्तक्षेप करते है........... और जहाँ तक सकारात्मक होकर चीन से युद्ध की बात है तो मैं ये भी कहता हूँ की.......... ऐसे समय के लिए ही गीता का ज्ञान अपनाना पड़ेगा... पर जबरन नहीं............. मैं धर्म पर लिखना नहीं चाहता क्योकि ये अपनाने वाली भावना है........... पर कुछ अब जरूर लिखूंगा.................. प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद .............

के द्वारा: Piyush Pant

समता जी , जैसा की आपने कहा है की ............भीड़ इसीलिए न्याय करती है कि उसे पुलिस [न्याय लागू करनेवाले] और न्याय-पालिका पर भरोसा नहीं है,........... पर क्या भीड़ भी कभी न्याय कर सकती है.......... भीड़ हमेशा हत्या करती है.......... अब इस कहानी को कुछ और तरीके से पढ़ें की ...... ये लड़के की माँ गाड़ी चला रही थी...... और अचानक ब्रेक फेल हो गए और एक आदमी को छूट लग गयी ............. और क्रुद्ध भीड़ ने उस गाड़ी को आग लगा दी पत्थर मार मार कर उसमे स्वर लोगों को मार दिया..................... हमारा कानून कमजोर नहीं है बस हम चाहते है की वो हमारे अनुसार चले............. अगर मेरे भाई की शादी है तो D.J. बजने की अनुमति रात १२ बजे तक हो और दुसरे की हो तो रात 10 के बाद बंद............. क्यों............... आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद..........

के द्वारा: Piyush Pant

पियूष जी, आप बहुत अच्छा लिखते हैं, परन्तु जिस तथाकथित दबाव को आप पुलिस पर महसूस करते हैं, जिसके कारन वो बेरहम होकर निर्दोषों की पिटाई करता है वो ही तथाकथित दबाव धर्म के उपर वाद विवाद, करवाता है, जिस विषय पर आपको लिखना अच्छा नहीं लगता, उसी विषय को लेकर स्वामी विवेकानंद सारे विश्व में उसकी अलख जागते हैं, उसी धर्म की स्थापना के लिए कृष्ण महाभारत कराते हैं, शिवाजी अलग राज्य की स्थापना करते हैं, और इन सब महापुरुषों पर भी धर्म की पुनह स्थापना का दबाव था, उन्होंने ये सब कार्य इसलिए नहीं किये की वो महापुरुष थे बल्कि इसलिए किये क्योंकि अधर्म के खिलाफ आवाज़ उठाना उन्होंने अपना कर्त्तव्य समझा, और कर्म को प्रमुखता देकर ही वो महान हुए, आप लिखते हैं की हमें किसी अन्यान्य धर्मों की बुराई नहीं करनी चाहिए, बिलकुल ठीक बात है, लेकिन यदि कोई बात मानवता के विरुद्ध हो चाहे वो किसी भी धर्म में ही क्यों न हो उसको सर्व विदित होना ही चाहिए और सुधारना भी चाहिए, जैसे बाल विवाह, सती प्रथा, वैसे भी आप स्वयं गांधीजी वाले लेख में लिखते हैं की, उजाले का महत्त्व तभी है जब अँधेरे का ज्ञान हो, अहिंसा का महत्त्व तभी है जब हिंसा के विषय में जानकारी हो. हर विषय के दो पहलु होते हैं, और आप हमेशा सकारात्मक रुख अपनाते हैं ये बहुत अच्छी बात है, समाज को ऐसा ही होना चाहिए, परन्तु कभी कभी ऐसी सकारात्मकता चीन से आक्रमण करवा देती हैं और हम नेहरु जी की तरह देखते रहते हैं, तो कभी सोमनाथ का दंश दे जाती है जो आज तक एक सहिष्णु समाज पर बर्बरता की निशानी है आप अपनी लेखनी के लिए साधुवाद के पात्र हैं लेकिन धर्म के उपर जो न लिखने की कसम खायी है वो गलत है क्योंकि ये एक ऐसा विषय है जिसको कोई भी नकार कर आगे नहीं बढ़ सकता.

के द्वारा: munish

पियूष जी पुलिस तो हमारी पुलिस है तथा बाकी दफ्तरों में कम करने वाले बाबु और अधिकारी भी हमारे ही है परन्तु वह लोग जिस व्यस्था के अंतर्गत कार्य कर रहे हैं वह हमारी नहीं है . स्वतंत्रता के बाद सब कुछ स्वतंत्र है पर इस देश में रहने वाला गरीब नागरिक स्वतंत्र नहीं है उसे हर कदम पर कानून का पालन करने के लिए बाध्य किया जाता है परन्तु पैसे वाला एवं सक्षम व्यक्ति किसी कानून का पाबन्द नहीं है. चूँकि हमारी सारी की सारी सरकारी मशीनरी की व्यस्था मैकाले के द्वारा बनायीं गई व्यस्था पर ही निर्भर है | आपने लिखा की उत्तराखंड की पुलिस उत्तराखंड मित्र पुलिस के नाम से जानी जायगी तो आश्चर्य हुआ इसलिए की नाम में क्या रखा है अगर मै अपने बच्चे का नाम बिल्क्लिटन रख लूं तो क्या मै किसी अमेरिकी का बाप हो जाऊंगा, नहीं इसलिए सबसे पहले हमारे प्रदेश एवं देश की सरकारों को उन गुलामी के कानूनों को बदलना होगा जो हमें अंग्रेजो से विराशत में मिले है , केवल संविधान बना लेने से हम स्वतंत्र नहीं हो गए जब तक अपना कानून नहीं होगा तब तक इस देश के गरीब अवं अक्षम नागरिकों के जीवन स्तर कभी भी ऊपर नहीं हो सकता और न ही हम अपनी सरकारों पर भरोसा कर सकते हैं /////////एस०पी सिंह, मेरठ

के द्वारा: s.p.singh

प्रिय श्री पीयुष पंत जी, आपनें यह कहावत तो सुनी ही होगी कि एक मछली सारे तालाब को गंदा करती है । बस इसी तर्ज पर आपनें एक सरकारी कर्मचारी की बुराई व एक पुलिस वालें (जबकि वह भी सरकारी कर्मचारी होता है) की अच्‍छाई बताई हैं । यदि आप प्रत्‍येक चौराहे पर रिश्‍वत लेते पुलिस वालों के बारें में लिखते तो लगता कि आप उनकी बुराई कर रहे हैं । समस्‍या यह है कि गंदी मछलियां सब जगह हैं प्रत्‍येक क्षेत्र में । जहां गंदी मछलियां ज्‍यादा होंगी उस क्षेत्र को लोग ज्‍यादा गंदा समझतें हैं । गंदगी का दूसरा पैमाना जो पब्लिक के ज्‍यादा निकट है वह उतना ही जल्‍दी अच्‍छे बूरें की तराजु पर तौल लिया जाता हैं । जबकि प्रत्‍येक क्षेत्र में इंसान ही काम करते हैं । तथापि एक अच्‍छी प्रस्‍तुति के लिए बधाई । अरविन्‍द पारीक (भाईजी कहिन)

के द्वारा: ARVIND PAREEK

Abuzar osman जी, ये पूरा लेख मैंने आवेश में ही नहीं लिखा है.... बीच में इन ब्लोग्स में काफी कुछ पढ़ा पुलिस के बारे में .............. सारा नकारात्मक ही था....... क्यों हम किसी के बारे में कुछ भी बोलने से पूर्व कुछ नहीं सोचते.......... जैसा की मेने अपने ब्लॉग एक और मार्मिक कथा में साबित किया है की कई बार आँखों देखि और कानो सुनी बातें भी गलत हो सकती हैं.. मेरे पुरे परिवार में कोई भी पुलिस में नहीं है............ मैंने एक बार जब दरोगा की परीक्षा देने की तैयारी की तो सब लोग मेरे खिलाफ थे...... जैसे मैं अंडर वर्ल्ड की दुनिया में जा रहा हूँ......... तब मैंने जानने की कोशिश की कि क्यों पुलिस कि नौकरी ख़राब मानी जाती है. होली में होली नहीं , न दीवाली में दिवाली, अपराधी और नेता में कोई अंतर नहीं....... जिसको पकड़ कर लाये वो ही सस्पेंड करने कि धमकी दे देता है और कई बार करवा भी देता है.... जितनी जनता अपराध में लिप्त है कही न कही राजनीती से जुडी है........... कहते है कि पुलिस अंधी कमाई करती है. पर क्या फायदा जब उसका उपभोग करने को न मिले......... अगर आपको लगता है ........ पुलिस अँधा पैसा कमाती है तो एक बार जरूर भर्ती होकर देखें.......... आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया.........

के द्वारा: Piyush Pant

रशीद भाई, कभी आपने एक दो ढाई साल के छोटे से बच्चे को देखा है. जो किसी बात पर नाराज़ होता है तो अपनी माँ को अपने छोटे छोटे हाथों से मारने लगता है.. या जब कभी आप कही ऐसे इंसान की जली कटी सुनकर आते हैं जो आपसे पद में बड़ा है और आप उसे कुछ जवाब नहीं दे पाते, तो आपका गुस्सा आपका क्षोभ अपने घर वालों व मित्रो पर ही निकलता है... क्योकि आप जानते है वो उसका कोई प्रतुत्तर नहीं देंगे..... वैसे ही जब एक पुलिस वाला अपराधियों के हाथों या नेताओं के (वैसे दोनों में कोई अंतर तो नहीं है.) अपनी ड्यूटी करने का पुरुस्कार तिरस्कार के रूप में पता है तो उसका क्षोभ उस गरीब पर उतरता है जो उसका प्रतिरोध नहीं कर सकता ............. और सरकारी दफ्तरों के बाबु हाथ नहीं उठाते पर कलम से ही आदमी को मार डालते हैं............. उस पुलिस की हालत आप तभी समझ सकते है जब खुद को आप उस जगह रख कर देखें. बेशकीमती प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया..............

के द्वारा: Piyush Pant

पियूष भाई ,, आप की बात तो एकदम सही है,, पुलिस इतनी बदनाम इस लिए होती है की उसका पब्लिक से सीधा मामला रहता है ,, लेकिन एक बात और भी है,, ज्यादा तर पुलिस वाले अपनी वर्दी के नशे में इतना चूर रहते है की किसी को भी अपमानित कर देते है,, मुझे याद है कई साल पहले जब मैं काफी छोटा था ,, अपनी माँ के साथ रिक्शे से जा रहा था, उस रिक्शे वाले ने गलती से दूसरी तरफ मोड़ दिया बस वह खड़ा सिपाही लाठी से उस बूढ़े रिक्शे वाले को मारने लगा,, अब आप सोचे की एक कमज़ोर और बूढ़े व्यक्ति को लाठी से पीटना कहा की शराफत है ,, क्या उस सिपाही के मन में एक बार भी नहीं आया की इस बेचारे को मत मारे ,, कभी कभी लगता है हमारे समाज के यह प्रवृत्ति है की कमज़ोरो को दबाव और ताक़त्वार की चापलूसी करो !! राशिद http://rashid.jagranjunction.com

के द्वारा: RASHID

के द्वारा: Abuzar osmani

yeh kahani aapne nahi likhi ya kisi ke saath hua hai baat bahut marmik hai bahut se log gaadi chalteyCAR,MOTORCYCLE,heavy vichles)ho paidal chalney wale inssan ko bhul jaatey hain aur koi unki gaadi ke nichey ke aajaye unhey koi fark nahi kaun kin halat meie unkey dawara accident ka shikar ho jata hai woh log pakdey jaaney gaadiyon ki tankinki karan accident hona bacha kar bachna nikltey hain kanoon bhi unki iss bajahy ko mannta har per swal yeh hai ki kaisey inko akal aaye abhi kai badey filmistar bade gharon ke ladke/ladkiyan accident kardeytey hain aur unlogon ke maa-baap apne bachhon ko bachney lagtey hain accident meie marney waley aur ghyal ka kohi dookh unjholi meie nahi afoss karna bhi unhey aisey lageyga ki unohney koi gunaha kar diya aaj kal ke bachey kya bade kya vichles chaleytey waqt yeh nahin chotey ki ghar per unka koi intezar kar raha hai unki tej gati se gaadichalney aur per batth kar mobile se baateiney karney ka alg andaz hai koi samjha to kaisey bahut se ladke/ldkiyon ko khuleaam dekh saktey kaano meie ganney sunn rahey hain ya kisi se baat kar rahe hon unke upper koi fark nahin chhaye sadak paar kartey waqt accident bhaley ho jaye, per jab kisi garib ka accident ho jaye tab vastav meie dil ropadta hai per majboori hai kanoon ke pachodon meie kyun padajaye ab woh zamana nahi kr bhala ho bhala, bas haathpariono se jo bhala ho kardo uss baat ke andar jayada mat ghuso manvta ka nata matt jodo ,aakhir meie iss baat ka yehi nicod hai samjha jaya ja sakta varna jaya kahana bhisis ke aagey bin bajana hai bahut news iss prakar ki padta hoon aise dardnak dekhta bhi hoon aankho ke aansu nikltey hain apne hi rumal se uchh kar mann shant karna padata ki bhagwan vechiles chaleywale ko akal dey byddhi dey aur yeh kisi dhook jan payein itna inko dil dey

के द्वारा: brijdangayach

के द्वारा: Piyush Pant

आदरणीय खुराना जी आपने कहा है की यह एक अच्छा व्यंग हो सकता था पर मैं इस विषय को व्यंग नहीं बनाना चाहता हूँ... भगवान् है और हर इंसान को उसको जानने का अधिकार है. व्यंग को हम हँसकर भुला देते पर मेरा प्रयास विचार करने के लिए प्रेरित करना है......... आखिर क्यों 3 -4 साल का छोटा सा बच्चा भगवान् की मूर्ति के आगे सर झुका देता है........ वो भगवान् है उसको सर झुका कर प्रणाम करना है ये कौन सिखा रहा है.......... ये हम लोग ही हैं हमे खुद नहीं पता की क्या भगवान् है .......... और हम अपनी आने वाली पीढ़ी को सिखाने की कोशिश कर रहे है की वो पत्थर में भगवान् है............... और जहाँ तक आपका ये कहना है की .............. एटीएम् से भी तभी पैसे निकलते हैं यदि आपके खाते में पैसे हों ! वरना वो भी “बच्चों” को पैसे देने से इंकार कर देगा ! फिर बड़ा कौन होगा ? तो मैं इतना ही कहूँगा की यहाँ हम जानते हैं की हमको कुछ करके अपना खाता भरना होगा और हमारा एटीएम् हमेशा हमारी मनोकामना पूरी करने को तैयार........... मगर मंदिर में जाने वाले बच्चे को तो हम खुद नहीं बता पाते की वो क्या करे की उस भगवान् की करुना पा सके ............ शीघ्र ही एक नए विषय पर लिखने की इच्छा है और उसके लिए आपके व शाही जी जैसे पाठकों के सहयोग की आवश्यकता होगी जो मेरे त्रुटियों पर ध्यानाकर्षण कर सकें. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…………..

के द्वारा: Piyush Pant

सर आपसे ये कहना बहुत छोटी बात होगी पर छोटे ही छोटी बात करते हैं. और बड़े उनमें सुधार करते है..... जहाँ तक मेरी बात है में बहुत आस्तिक हूँ पर मेरा पूरा विश्वाश है की परमात्मा या भगवान् जैसी कोई शक्ति है. पर मैं इस बात पर यकीन करता हूँ की अगर ऐसा है तो हर इंसान को उसकी खुद खोज करनी चाहिए... अगर हम पत्थर की मूर्ति में भगवान् पा लें तो हमको अपने बच्चों से कहना चाहिए की मैंने अपनी श्रद्धा से इस पत्थर में भगवान् को पा लिया है.. और तेरे अन्दर अगर श्रद्धा है तो तू भी पा लेगा नहीं तो ये केवल पत्थर ही है. तो उसके अन्दर शायद वो श्रद्धा वो भाव पैदा हो जायेगा जो उसको भी उस परमात्मा तक पंहुचा दे.. अगर हम ये कहें की भगवान् ये है जो मांगो वो देता है ........ या लोग उसका उपवास रख कर उसको पा सकते हैं...... तो हम अपने छोटों को भटका रहे है........... वो उस मूर्ति को श्रद्धा नहीं दे पायेगा................. क्योकि उसका भाव तो सिर्फ याचक का है......... और जिसको भगवान् ने मानव जीवन दिया हो वो याचक नहीं हो सकता............. और जहाँ तक मंदिर, मस्ज़िद, गुरुद्वारा या चर्च के रूप में उद्दीपन का कोई लक्ष्य निर्धारित करने की बात है तो जो यत्र तत्र सर्वत्र है उसको किसी सीमा या स्थान में कैसे रख सकते हैं। प्रहलाद ने जिसे खम्भे में पा लिया उसको कई लोग वर्षों मंदिर में नहीं पा सके............... आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया..............

के द्वारा: Piyush Pant

पियूष आपके लेख से दोनों विचार झलकते हैं । एक तो ये कि आप नास्तिकता पर यकीन नहीं करते, और ये भी कि सचमुच वही भगवान नहीं है, जैसा हमारे पुरखे हमें समझाते आए हैं । देखिये भगवान का मतलब वास्तव में कुछ नहीं है सिवाय आस्था के । आस्था ही ईश्वर है, और सीधे जीवन-पद्धति से जुड़ी हुई है । यदि विज्ञान और आधुनिकता के तर्कों के आधार पर ईश्वरीय सत्ता पर विश्वास-अविश्वास का आधार तय करें, तो सबसे पहले पश्चिमी देश, जो हमसे अधिक आधुनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उन्नत हैं, उन्होंने भी तर्कों के आधार पर 'चर्च ही क्यों?' का प्रश्न खड़ा कर लिया होता, और किसी दूसरे भगवान की तलाश में भटक रहे होते । उन्होंने ऐसा इसलिये नहीं किया, क्योंकि जानते थे कि सवाल चर्च का नहीं, बल्कि आस्था का है, जो सिर्फ़ टीवी का नारा मात्र नही बल्कि सचमुच जीवन का आधार है । आस्था ही है जिसने हमें यहाँ ब्लाँग पर एकदूसरे से जोड़कर रखा हुआ है, घर में माता-पिता से जोड़कर रखा हुआ है, देश और समाज को जोड़कर रखा हुआ है । यही आस्था ईश्वर है । किसी विशिष्ट मनीषि को मूर्ति का प्रसाद खाते चूहों को देखकर बोध हुआ तो उन्होंने अपने अनुसंधान से आस्था को खोज निकाला, लेकिन सबके पास इतनी फ़ुर्सत कहाँ है? सभी आस्था का अलग-अलग आधार खोजने निकलेंगे तो पूरा समाज ही उसी में संलग्न हो जाएगा और बाक़ी के सारे काम रुक जाएंगे । जबकि जीने के लिये आस्था का आधार सबको चाहिये । इसीलिये अपनी परम्पराओं से बँधे रहना हमारी बाध्यता होती है । जिसने इस अनुशासन को तोड़ा, वो कभी सुखी नहीं रह पाया । ईश्वर की मूर्तियाँ पत्थर नहीं, उद्दीपन होती हैं, और आस्था के एहसास को प्राप्त करने का ज़रिया होती हैं । हर धर्म का अपना-अपना उद्दीपन होता ही है, कहाँ कोई मैदान में पूजा-पाठ कर पाता है? मंदिर, मस्ज़िद, गुरुद्वारा या चर्च, उद्दीपन का कोई न कोई लक्ष्य तो निर्धारित करना ही पड़ता है ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

के द्वारा: jalal

प्रिय बंधू चातक जी, आप सबसे पहले लिखते हैं की आपको जातियों का बहुत ज्यादा ज्ञान नहीं है तो बड़ी ख़ुशी होती है की ऐसे लोग है जो जाति व्यवस्ता से अपरिचित है. लेकिन जैसे ही अंतिम लाइन पर पहुचते है तो घोर निराशा होती है. जब आप कहते है की मैं ब्रह्मण भले नहीं और आप मेरी जाति के नहीं लेकिन आपको भाई जरूर कह सकता हूँ, है न? आपके इस वक्तव्य से अपने पुरे लेख पर दुःख होता है की जब इसे आप जैसा बुद्धिजीवी नहीं समझ पाया तो एक आमजन से इसको समझने की उम्मीद बेमानी है. आप इस पुरे लेख को शायद ऊपर ऊपर ही पढ़ गए. आपने शब्द पकड़ लिए और भाव नहीं समझ सके. ये पूरा लेख केवल ब्राह्मणों को कोसने के लिए नहीं था. ये उन सभी के लिए था जो अपने अपने अन्दर अपनी जाति में श्रेष्ठ होने का अहं पाले हुए है. आपने शायद ब्राह्मन शब्द का अर्थ नहीं समझा, इस सम्पूर्ण जगत में हर जीवित प्राणी के भीतर जो आत्मा है उसे हिन्दू धर्म में कई जगह ब्रह्म कहा गया है. और जो इस ब्रह्म को जान ले वो ही ब्राह्मण है. जो ये बात समझ ले की उसमे और एक हर किसी जीवित पेड़ पोधे अथवा जानवर में शरीर से परे जो चीज है वो समान है. और जब कोई इंसान इस ब्रह्म को जान लेता है तो वो किसी भी जीवात्मा में अंतर नहीं कर पाता उसके भीतर से अपने पराये, मित्र शत्रु जैसे हीन बाते समाप्त हो जाती है. इस लिए मैंने जोर देकर कहा था की वे लोग जो जनम से ब्राह्मण नहीं है वो ख्याल रखे की इन तथाकथित ब्राह्मणों की बातो को ध्यान न दे कर खुद को ब्राह्मण बनाने का प्रयास करे. तो मैंने ये नहीं कहा की आप ब्राह्मन बने जैसे अभी कई है. मैंने कहा है की आप चाहे हिन्दू हों मुस्लिम सिख इसाई या फिर क्षत्रिय समाज, कोरी समाज, पासी समाज या अन्य किसी भी समाज से जुड़े हो. आप केवल हर इन्सान के प्रति प्रेम रखे जीवो पर दया करें आपके कर्म आपके संप्रदाय को उसी तरह बुलंदी पे पंहुचा दे जैसे जुलाहे का काम करने वाले कबीर ने, जूते बनाने का काम करने वाले रैदास ने ब्राह्मन होने का ढोंग नहीं ओढा लेकिन आज भी बड़े बड़े ब्राह्मन कबीर की वाणी को भजनों के रूप में सुनते है.. उसी तरह गुरु को गुरु दक्षिणा में अपना अंगूठा देने वाला भील एकलव्य किसी भी क्षत्रिय से ऊपर है. महात्मा बुद्ध से बड़ा क्षत्रिय और ब्राह्मन कोई नहीं है. वो अपने क्षत्रिय होने की सार्थकता सिद्ध करते हैं जब वो सम्पूर्ण वैभव को ठुकरा कर उस मार्ग पर चल पड़ते हैं जिस पर चलने की कोई ब्राह्मण भी हिम्मत नहीं कर पता है. और वो ब्राहमण है क्युकी वो उस ब्रह्म को पा लेते है जो बड़े बड़े ब्राहमणों की पहुच से बहार है. आपके कथन ..........""आपने क्षत्रिय समाज, कोरी समाज, पासी एकता मंच का नाम नहीं सुना है लेकिन उनमे कोई बैर भाव तो नहीं है वे अपने हितों के लिए संघर्ष कर रहे है और राजनैतिक मंच पर सारे बहुजन बनकर और ज्यादा शशक्त होकर उभरते हैं| राजनीती में इन्हें दबाव समूह के नाम से जाना जाता है"" पर मैं कहना चाहता हु की जब आप ये कहते है की उनमे कोई बैर भाव तो नहीं है वे अपने हितों के लिए संघर्ष कर रहे है तो ये स्पष्ट हो जाता है की उनके हित की जब वो बात कर रहे है, तो वो दुसरे से अपने हित अलग कर रहे है. ये वही स्थिति है जो कश्मीर में है. वह भी कश्मीरी ब्राह्मण भले एक जुट थे पर दबाव समूह नहीं थे इस लिए बेघर कर दिए गए. और ऐसा होता रहेगा जब तक हम बाते रहेंगे. क्यों नहीं हर कोई हर किसी के हित की बात करे. जब आप ये कहते है की एकता बुरी बात नहीं है तो क्यों नहीं राष्ट्रीय एकता हो. क्यों नहीं हम भारतीय होकर एकजुट हो. जब ताकत बड़े वर्ग में है तो हम ऐसा समूह बनाये जिसमे अधिकतम लोग हो. और वो राष्ट्रीय समूह या अन्तराष्ट्रीय समूह बनने में है. आपसे ये कथन की "" हाँ अगर आप ये समझाएं कि ब्रह्मण या किसी भी जाति की एकता विखंडन का कारण कैसे हो सकती है तो आपका ये लिख सार्थक जरूर बन सकता है"" पर मैं बस इतना ही कहना चाहता हु की ये कह कर आप राज ठाकरे की और से आँख हटा रहे है. एकता विखंडन का कारण कैसे हो सकती है इसका उदहारण वो लोग हैं वो भी मराठी एकता के नाम पर देश बाट रहे है. और अंत में जो आपने कहा है ..........."""ब्रह्मण बनने के बाद बताइयेगा कि क्या आपका अपनी जाति के लोगों में मिल जाना अन्य जातियों से आपके अच्छे संबंधों में बाधक है?""""............ तो अगर आप मेरे ब्राह्मण की परिभाषा देखेंगे तो आप खुद ही समझ जायेंगे की वैसा ब्राह्मण बनने के बाद आप जाति, वर्ण संप्रदाय तो दूर आप पशु-पक्षी, पेड़ पोधों में भी फरक करना भूल जायेंगे... चातक भाई, उम्मीद है ऐसे ही कमियों की और ध्यान दिलाते रहेंगे......... धन्यवाद.............

के द्वारा: Piyush

पीयुष जी, मुझे जातियों का बहुत ज्यादा ज्ञान तो नहीं है लेकिन आपकी भावना जानकार बड़ी ख़ुशी हुई कि आप जातिगत द्वेष से परे रहना पसंद करते हैं| पर माफ़ करियेगा कहीं न कहीं आप भी उसी श्रेणी में जुड़े रहना चाहते हैं जिसमे वो ऑरकुट की कमुनिटी बस अंतर इतना है कि उसके जोड़ने का ढंग अलग और आपका अलग है थोडा सा झांकिएगा अपने ही विचारों में 'किन्तु मेरा मानना है की में अभी कुछ नहीं हु और मुझे ब्राह्मण बनना है' बुरा मत मानना दोस्त कोई भी जाती यदि अपने परवार या वंश को आपस में जोड़े रखना चाहती है तो इसमें हर्ज ही क्या है सिर्फ ब्राह्मणों को नहीं हर एक वंश और परम्परा को हक़ है कि वह अपने ऊपर गर्व करे और अपने लोगों को सम्मान और स्नेह दे| ये गलत तब हो जाता है जब कोई एक जाति संगठित होकर दूसरी जाति के दमन की बात करे अगर कोई कमुनिटी किसी जाति विशेष का विरोध नहीं कर रही तो आपको भी उसकी बुराई नहीं करनी चाहिए| क्या आपने क्षत्रिय समाज, कोरी समाज, पासी एकता मंच का नाम नहीं सुना है लेकिन उनमे कोई बैर भाव तो नहीं है वे अपने हितों के लिए संघर्ष कर रहे है और राजनैतिक मंच पर सारे बहुजन बनकर और ज्यादा शशक्त होकर उभरते हैं| राजनीती में इन्हें दबाव समूह के नाम से जाना जाता है और सभी राजनीती-शाश्त्र के जानकार इस एकमत से लोकतंत्र का एक अभिन्न और आवश्यक हिस्सा मानते हैं| हाँ अगर आप ये समझाएं कि ब्रह्मण या किसी भी जाति की एकता विखंडन का कारण कैसे हो सकती है तो आपका ये लिख सार्थक जरूर बन सकता है| वैसे ब्राह्मण बनने के आपके प्रयासों में मेरी शुभकामनाये आपके साथ हैं| प्रयास बीच में न छोड़ियेगा और ब्रह्मण बनने के बाद बताइयेगा कि क्या आपका अपनी जाति के लोगों में मिल जाना अन्य जातियों से आपके अच्छे संबंधों में बाधक है? (किसी बात का बुरा न मानियेगा भाई मैं ब्रह्मण भले नहीं और आप मेरी जाति के नहीं लेकिन आपको भाई जरूर कह सकता हूँ, है न?) शुभकामनाओं सहित!

के द्वारा: chaatak

पीयूष जी, आपका लेख पढ़कर दिल में कितनी तरंगे उत्पन्न हुईं इस बात का अंदाजा सिर्फ मैं लगा सकता हूँ | ये पढना इतना सुखद है की आपने गाँधी का मर्म सोचा और उसके दर्शन को समझा | मेरी नज़र में गांधी न तो एक महात्मा है न ही राजनेता, वह एक ऐसा ओज है जिसकी आलोचना करने वाले सिर्फ अपने मुखमंडल को नारद के वानर मुख के सामान लोगों के सामने दिखा-दिखा कर विभिन्न भाव भंगिमाओं में अपना ही उपहास करते हैं | मुझे वे सारे ही लोग नारद के सामान एक विद्वान् परन्तु भटके हुए वासनाओं में लिपटे लोग प्रतीत होते हैं, या शायद वे किसी कुंठा वश ऐसा करते हैं | गाँधी तो स्वयं एक परिपूर्ण दर्शन है जिसे सिर्फ वही समझ सकता है जिसके अन्दर अंतरात्मा जीवित हो | आप समझ सकते है की उपभोक्तावादी समाज में अंतरात्मा कब बिक चुकी होती है इसका अंदाजा लोगों को खुद नहीं होता | कुछ की अंतरात्मा तो आत्मा शब्द सुनने से पहले ही मर चुकी होती है | आपने जो विरोधी तर्क की बात कही वह सिर्फ कुतर्क है जिसे हमारी भाषा में कहते हैं - "न जानब, ना मानब" लेकिन कोई भी व्यक्ति यदि सचमुच इमानदारी से गाँधी विरोधी है और सत्य को परखना चाहता है तो मेरे पास उसका स्वागत है वो मेरे समक्ष साबित करे की गांधी कहीं भी गलत थे और मैं उसको प्रयोग करे दिखाऊंगा की गाँधी २००% सत्य है | इतना अच्छा लिखने पर आपको बधाई और बधाई इस बात की कि आपकी अंतरात्मा अभी जीवित है |

के द्वारा: chaatak




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