परिवर्तन की ओर.......

बदलें खुद को....... और समाज को.......

117 Posts

24194 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 1372 postid : 36

उच्च कुलीन मानसिकता.........

Posted On: 9 Aug, 2010 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

उच्च कुलीन मानसिकता………
आज अचानक एक मित्र का वक्तव्य सुनकर हैरानी हुई. उसने कहा की कम से कम तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी. बड़ी हैरानी हुई. साधारणतः अपने निकटस्थ लोगो की उम्मीद के विरुद्ध कार्य करना मेरे लिए असंभव सा है. ऐसा कुछ मै यू ही नहीं करता जो मेरे आचरण के प्रतिकूल हो. मैंने बिना कारण जाने तर्क दिया की हो सकता है की उसके पीछे कोई ठोस कारण हो. उसने कहा नहीं …. इस के लिए कोई ठोस कारण का बहाना हो ही नहीं सकता है…… अब जिज्ञासा हुई की आखिर ऐसा मैने क्या कर दिया जिसकी मेरा मित्र मुझसे कल्पना भी नहीं कर सकता था.

काफी देर उलझाये रखने के बाद वो बोला की social networking site ऑरकुट पर तुने उच्च कुलीन ब्राह्मण नाम की कम्युनिटी को प्रोमोट किया है. तुम कब से उच्च कुलीन हो गए. मै थोडा हैरान था क्योकि इस नाम की कम्युनिटी का प्रोमोशन एक बार मेरे प्रोफाइल मै डिस्प्ले हुआ था और जिसने इसे बनाया था उसको मैंने इस विषय पर कमेन्ट भी किया था. मै अनभिज्ञ था की आखिर इस को मैंने प्रोमोट किया कब.

ऑरकुट में जब भी आप किसी प्रोमोशॉन को प्रोमोट करते है तो वो आपके सभी मित्रो के होम पेज पर डिस्प्ले होने लगता है. अब न चाहते हुए भी न जाने कैसे वो प्रोमोट हो गया. लेकिन अपने मित्र की बात से मुझे इस विषय पर लिखने का विचार आया. ये मात्र उन तथा कथित लोगो के लिए है जो हर जगह अपने उच्च कुलीन होने का दंभ भरते नजर आते है.

* * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * *
ये विषय बड़ा हास्यास्पद है ….. उच्च कुलीन…. ये शब्द अहं का प्रतिक है…… इंसान का ह्रदय विरोधाभासो से भरा है. किसी संपन्न व्यक्ति की जोकि अपनी पैत्रिक संपत्ति से अमीर बना हो की चर्चा आने पर वो भी जब की वो अनिल अम्बानी या मुकेश अम्बानी जैसा कोई हो तो हमारी प्रतिक्रिया होती है की इसमें बड़ा क्या है खुद की मेहनत का तो है नहीं पैत्रक सम्पति है. खुद से कोई इतना बड़ा बने तो बात है. मगर जब कोई स्वयं से बड़ा बन जाता है तो हम उसकी मेहनत को किस्मत का नाम दे देते है. और कहते है की इसकी किस्मत थी जो इसे वहा तक ले गयी.

लेकिन जैसे ही धर्म की बात आती है तो ये तथाकथित उच्च कुलीन लोग कहते है की हमारे पूर्व जनम के कर्मो का फल है की हम इस कुल में जन्मे. अर्थात स्वयं ही सिद्ध कर दिया की हम पिछले जनम में कोई बहुत भले और सुकर्मी इंसान थे. ये अहं ही है जिसे अलग अलग रूप में संतुष्ट किया जा रहा है.

अपने को उच्च कुलीन सिद्ध करने की होड़ में हम भूल जाते है की वास्तव में जनम से खुद को उच्च कुलीन कह कर हम उस कुल की गरिमा को ख़तम करते है जिस में हम जन्मे. क्या जनम किसी की श्रेष्टता का मानक हो सकता है. ये तथाकथित जन्मजात ब्राह्मन अपने को उच्च कुलीन बताने में इतना व्यस्त है की जहा मौका मिले ये खुद को उच्च कुलीन बताने का मौका नहीं छोड़ते है. और दूसरी और कबीर, दादू, रैदास, चैतन्य, मीरा जैसे न जाने कई लोग खुद को हर संप्रदाय हर वर्ण से दूर रख कर सभी के लिए एक आदर्श बन जाते है.
दूसरी और उच्च ब्राह्मन कुल में जन्मा रावन हमेशा राक्षशो में गिना गया. जबकि रावन केवल जनम से ही ब्राहमण नहीं था उसने ब्रह्म को जाना भी था. उस समय कुछ गिने चुने ब्रह्म ज्ञानियो में उसका नाम था. लेकिन उसको उसके अहम् ने राक्षश बना दिया. और उसके अहम् के कारणों में उसकी माता के गुणों को जोकि रक्षशी थी को वजह बताया जाता है. तो जो लोग बिना ब्रह्म को जाने ब्राहमण बने है वो क्या रावन के उन राक्षशी गुणों से ही भरे नहीं है.

वास्तव में ब्राहमण जैसी कोई जाती है ही नहीं. जिस तरह बालक पढ़ते पढ़ते स्नातक, स्नातकोत्तर, चिकित्सक, इंजिनीयर आदि की उपाधि लेता है. उसी तरह ब्राहमण मात्र एक उपाधि है. जिसने ब्रह्म को जाना वो ब्राहमण. लेकिन हर बार इंसान अपने अहं को तृप्त करना चाहता है. तो जब ब्राहमणों के बच्चे उनकी ब्रह्म तक पहुचने की परंपरा को निभाने में समर्थ नहीं रहे तो उन्होंने इसे जाति का रूप दे दिया. अब जो ब्राह्मन का बच्चा वो ब्राहमण ये कटु सत्य है. की अगर चिकित्सक का बच्चा बिना चिकित्सा विज्ञानं को जाने चिकित्सक नहीं हो सकता है तो ब्रह्म को जाने बिना किसी का ब्राह्मन होना संभव नहीं है. और ब्रह्म को जानने के लिए जनम नहीं कर्म पर जोर होना आवश्यक होना है.

दधिची जैसे त्याग की कल्पना भी नहीं की जा सकती किन्तु किसी जरूरत मंद की मद्दत अपने किसी जरुरी काम को रोक कर अगर कोई गैर ब्राहमण भी करे तो उसे ब्राहमण कहलाने का अधिकार है. किन्तु जो ऐसा त्याग करता है उसे ब्रह्मण कहलाने में कोई दिलचस्पी नहीं रहती.

अपने अहम को तृप्त करने के लिए ये तथाकथित उच्च कुलीन लोग और आगे बढ़ जाते हैं. फिर एक ही घर मे भी बटवारा हो जाता हैं. बड़े भाई के अग्रगामी बड़े पंडित और छोटे भाई के छोटे पंडित. मगर नयी पीडी के लोगो से ये सुनना अजीब सा लगता हैं की जब एक लड़का जो जींस टी-शर्ट पहने घूमता हैं और खुद को ऊँची धोती वाला पंडित कहता हैं . पहले ये तो सीखो के धोती पहनी कैसे जाती हैं. और संभाली कैसे जाती हैं, एक रुमाल संभलने का ज्ञान नहीं और बात ऊँची धोती सँभालने की.

अब इस पुरे लेखन के बाद एक और बात में जोड़ना चाहता हु इसके बिना शायद मेरे शब्दों को अर्थहीन बताने के तर्क दिए जा सकते है. जब इस कम्युनिटी को प्रोमोट करने वालो से मैंने संपर्क किया तो उनका तर्क था की वो केवल उच्चकुलीन ब्राहमणों को एकजुट करना चाहते है. और इस पर मेरा तर्क था की ये एकजुट करना नहीं बिखराव लाना है. जब आप एक जैसे लोगो को एक जुट करते है तो इसका सीधा अर्थ है की आप बाकी लोगो से अलग होना चाहते है. जो आपको ओरो से अलग करे ऐसे एकजुटता का कोई अर्थ नहीं है. तब एक उत्तर मेरे पास आया था की i think you are not eligible for this community so you are making arguments . लेकिन क्या उस कम्युनिटी को ज्वाइन करने से में उच्च कुलीन ब्रह्मण हो जाता. यदि ऐसा हो सकता है तो फिर उच्च कुलीन निम्न कुलीन का अर्थ क्या सभी लोग आ आ कर ये कम्युनिटी ज्वाइन करे और उच्च कुलीन ब्रह्मण बन जाये.
अगर इस सोच को आप ब्राह्मण कहते है तो में ब्राह्मण नहीं हु. और अगर आपको लगता है की जनम से ब्राह्मण होना संभव है तो इस कम्युनिटी के बड़े बड़े ब्राह्मणों में मेरा नाम होना चाहिए कियो की जन्म से में उच्च कुलीन हु. किन्तु मेरा मानना है की में अभी कुछ नहीं हु और मुझे ब्राह्मण बनना है.

सभी लोग जो जनम से ब्राह्मण नहीं है वो ख्याल रखे की इन तथाकथित ब्राह्मणों की बातो को ध्यान न दे कर खुद को ब्राह्मण बनाने का प्रयास करे. ब्रह्म को पाने के लिए किसी योग्यता की जरूरत नहीं. वो सभी के अंतरतम में वियाप्त है. उसको पाने के लिए किसी कुल विशेष में जनम लेने की नहीं अपितु ह्रदय में भाव की जरूरत है. वो भाव भक्ति का हो तो उसके बनाये हर प्राणी में उसको पाया जा सकता है.

| NEXT

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (53 votes, average: 4.96 out of 5)
Loading ... Loading ...

7 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Maryland के द्वारा
July 12, 2016

Hi Chris,Hope you are well, mate – and of course you are forgiven, thanks for the diamond link. I do hope that your darling lady isn’t insisting that you accompany her to this &#8l26;fi2m᾵, but I would imagine it’s really not her style. Tell me I am right, please?

jalal के द्वारा
August 20, 2010

प्रिय बंधू पियूष, आपका जाती से ऊपर उठ कर ज्ञान और कर्म को प्राथमिकता देना साड़ी बात बता देता है एक इंसान के लिए. वोही हमारा उद्देश्य होना भी चाहिए. ऐसे सामाजिक भेद भाव को मिटाकर हम सचमुच में मानव सा रह पायेंगे. जो की हमारे लिए काफी है. बहुत बहुत धन्यवाद.

    Piyush Pant के द्वारा
    August 22, 2010

    जलाल भाई लेख के मर्म को समझने के लिए आप बधाई के पात्र है………

pramod के द्वारा
August 20, 2010

sir, Please see the bhagwat gita.Bhagwan says KARMA is everything.I also agree with the writer that it is degree not a bybirth cast. Pramod

    Piyush Pant के द्वारा
    August 20, 2010

    प्रमोद जी, दरअसल यहाँ हर किसी ने गीता के अपनी अपनी सहूलियतों के हिसाब से अलग अलग मतलब निकाल लिए हैं………….. इसलिए गीता के महाज्ञान का इन लोगों पर कोई फर्क नहीं पड़ता………..

chaatak के द्वारा
August 9, 2010

पीयुष जी, मुझे जातियों का बहुत ज्यादा ज्ञान तो नहीं है लेकिन आपकी भावना जानकार बड़ी ख़ुशी हुई कि आप जातिगत द्वेष से परे रहना पसंद करते हैं| पर माफ़ करियेगा कहीं न कहीं आप भी उसी श्रेणी में जुड़े रहना चाहते हैं जिसमे वो ऑरकुट की कमुनिटी बस अंतर इतना है कि उसके जोड़ने का ढंग अलग और आपका अलग है थोडा सा झांकिएगा अपने ही विचारों में ‘किन्तु मेरा मानना है की में अभी कुछ नहीं हु और मुझे ब्राह्मण बनना है’ बुरा मत मानना दोस्त कोई भी जाती यदि अपने परवार या वंश को आपस में जोड़े रखना चाहती है तो इसमें हर्ज ही क्या है सिर्फ ब्राह्मणों को नहीं हर एक वंश और परम्परा को हक़ है कि वह अपने ऊपर गर्व करे और अपने लोगों को सम्मान और स्नेह दे| ये गलत तब हो जाता है जब कोई एक जाति संगठित होकर दूसरी जाति के दमन की बात करे अगर कोई कमुनिटी किसी जाति विशेष का विरोध नहीं कर रही तो आपको भी उसकी बुराई नहीं करनी चाहिए| क्या आपने क्षत्रिय समाज, कोरी समाज, पासी एकता मंच का नाम नहीं सुना है लेकिन उनमे कोई बैर भाव तो नहीं है वे अपने हितों के लिए संघर्ष कर रहे है और राजनैतिक मंच पर सारे बहुजन बनकर और ज्यादा शशक्त होकर उभरते हैं| राजनीती में इन्हें दबाव समूह के नाम से जाना जाता है और सभी राजनीती-शाश्त्र के जानकार इस एकमत से लोकतंत्र का एक अभिन्न और आवश्यक हिस्सा मानते हैं| हाँ अगर आप ये समझाएं कि ब्रह्मण या किसी भी जाति की एकता विखंडन का कारण कैसे हो सकती है तो आपका ये लिख सार्थक जरूर बन सकता है| वैसे ब्राह्मण बनने के आपके प्रयासों में मेरी शुभकामनाये आपके साथ हैं| प्रयास बीच में न छोड़ियेगा और ब्रह्मण बनने के बाद बताइयेगा कि क्या आपका अपनी जाति के लोगों में मिल जाना अन्य जातियों से आपके अच्छे संबंधों में बाधक है? (किसी बात का बुरा न मानियेगा भाई मैं ब्रह्मण भले नहीं और आप मेरी जाति के नहीं लेकिन आपको भाई जरूर कह सकता हूँ, है न?) शुभकामनाओं सहित!

    Piyush के द्वारा
    August 11, 2010

    प्रिय बंधू चातक जी, आप सबसे पहले लिखते हैं की आपको जातियों का बहुत ज्यादा ज्ञान नहीं है तो बड़ी ख़ुशी होती है की ऐसे लोग है जो जाति व्यवस्ता से अपरिचित है. लेकिन जैसे ही अंतिम लाइन पर पहुचते है तो घोर निराशा होती है. जब आप कहते है की मैं ब्रह्मण भले नहीं और आप मेरी जाति के नहीं लेकिन आपको भाई जरूर कह सकता हूँ, है न? आपके इस वक्तव्य से अपने पुरे लेख पर दुःख होता है की जब इसे आप जैसा बुद्धिजीवी नहीं समझ पाया तो एक आमजन से इसको समझने की उम्मीद बेमानी है. आप इस पुरे लेख को शायद ऊपर ऊपर ही पढ़ गए. आपने शब्द पकड़ लिए और भाव नहीं समझ सके. ये पूरा लेख केवल ब्राह्मणों को कोसने के लिए नहीं था. ये उन सभी के लिए था जो अपने अपने अन्दर अपनी जाति में श्रेष्ठ होने का अहं पाले हुए है. आपने शायद ब्राह्मन शब्द का अर्थ नहीं समझा, इस सम्पूर्ण जगत में हर जीवित प्राणी के भीतर जो आत्मा है उसे हिन्दू धर्म में कई जगह ब्रह्म कहा गया है. और जो इस ब्रह्म को जान ले वो ही ब्राह्मण है. जो ये बात समझ ले की उसमे और एक हर किसी जीवित पेड़ पोधे अथवा जानवर में शरीर से परे जो चीज है वो समान है. और जब कोई इंसान इस ब्रह्म को जान लेता है तो वो किसी भी जीवात्मा में अंतर नहीं कर पाता उसके भीतर से अपने पराये, मित्र शत्रु जैसे हीन बाते समाप्त हो जाती है. इस लिए मैंने जोर देकर कहा था की वे लोग जो जनम से ब्राह्मण नहीं है वो ख्याल रखे की इन तथाकथित ब्राह्मणों की बातो को ध्यान न दे कर खुद को ब्राह्मण बनाने का प्रयास करे. तो मैंने ये नहीं कहा की आप ब्राह्मन बने जैसे अभी कई है. मैंने कहा है की आप चाहे हिन्दू हों मुस्लिम सिख इसाई या फिर क्षत्रिय समाज, कोरी समाज, पासी समाज या अन्य किसी भी समाज से जुड़े हो. आप केवल हर इन्सान के प्रति प्रेम रखे जीवो पर दया करें आपके कर्म आपके संप्रदाय को उसी तरह बुलंदी पे पंहुचा दे जैसे जुलाहे का काम करने वाले कबीर ने, जूते बनाने का काम करने वाले रैदास ने ब्राह्मन होने का ढोंग नहीं ओढा लेकिन आज भी बड़े बड़े ब्राह्मन कबीर की वाणी को भजनों के रूप में सुनते है.. उसी तरह गुरु को गुरु दक्षिणा में अपना अंगूठा देने वाला भील एकलव्य किसी भी क्षत्रिय से ऊपर है. महात्मा बुद्ध से बड़ा क्षत्रिय और ब्राह्मन कोई नहीं है. वो अपने क्षत्रिय होने की सार्थकता सिद्ध करते हैं जब वो सम्पूर्ण वैभव को ठुकरा कर उस मार्ग पर चल पड़ते हैं जिस पर चलने की कोई ब्राह्मण भी हिम्मत नहीं कर पता है. और वो ब्राहमण है क्युकी वो उस ब्रह्म को पा लेते है जो बड़े बड़े ब्राहमणों की पहुच से बहार है. आपके कथन ……….”"आपने क्षत्रिय समाज, कोरी समाज, पासी एकता मंच का नाम नहीं सुना है लेकिन उनमे कोई बैर भाव तो नहीं है वे अपने हितों के लिए संघर्ष कर रहे है और राजनैतिक मंच पर सारे बहुजन बनकर और ज्यादा शशक्त होकर उभरते हैं| राजनीती में इन्हें दबाव समूह के नाम से जाना जाता है”" पर मैं कहना चाहता हु की जब आप ये कहते है की उनमे कोई बैर भाव तो नहीं है वे अपने हितों के लिए संघर्ष कर रहे है तो ये स्पष्ट हो जाता है की उनके हित की जब वो बात कर रहे है, तो वो दुसरे से अपने हित अलग कर रहे है. ये वही स्थिति है जो कश्मीर में है. वह भी कश्मीरी ब्राह्मण भले एक जुट थे पर दबाव समूह नहीं थे इस लिए बेघर कर दिए गए. और ऐसा होता रहेगा जब तक हम बाते रहेंगे. क्यों नहीं हर कोई हर किसी के हित की बात करे. जब आप ये कहते है की एकता बुरी बात नहीं है तो क्यों नहीं राष्ट्रीय एकता हो. क्यों नहीं हम भारतीय होकर एकजुट हो. जब ताकत बड़े वर्ग में है तो हम ऐसा समूह बनाये जिसमे अधिकतम लोग हो. और वो राष्ट्रीय समूह या अन्तराष्ट्रीय समूह बनने में है. आपसे ये कथन की “” हाँ अगर आप ये समझाएं कि ब्रह्मण या किसी भी जाति की एकता विखंडन का कारण कैसे हो सकती है तो आपका ये लिख सार्थक जरूर बन सकता है”" पर मैं बस इतना ही कहना चाहता हु की ये कह कर आप राज ठाकरे की और से आँख हटा रहे है. एकता विखंडन का कारण कैसे हो सकती है इसका उदहारण वो लोग हैं वो भी मराठी एकता के नाम पर देश बाट रहे है. और अंत में जो आपने कहा है ………..”"”ब्रह्मण बनने के बाद बताइयेगा कि क्या आपका अपनी जाति के लोगों में मिल जाना अन्य जातियों से आपके अच्छे संबंधों में बाधक है?”"”"………… तो अगर आप मेरे ब्राह्मण की परिभाषा देखेंगे तो आप खुद ही समझ जायेंगे की वैसा ब्राह्मण बनने के बाद आप जाति, वर्ण संप्रदाय तो दूर आप पशु-पक्षी, पेड़ पोधों में भी फरक करना भूल जायेंगे… चातक भाई, उम्मीद है ऐसे ही कमियों की और ध्यान दिलाते रहेंगे……… धन्यवाद………….


topic of the week



latest from jagran