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भगवान् से बड़ा A.T.M.

Posted On: 18 Aug, 2010 Others में

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भगवान् से बड़ा एटीएम
इस लेख का शीर्षक थोडा अजीब जरूर है. पर सच्चाई के काफी नजदीक है……. अगर हम अपने आस पास देखें तो ये बिलकुल सही लगेगा. क्या भगवान् और एटीएम में कोई सम्बन्ध संभव है. नहीं फिर भगवान् से एटीएम को बड़ा कैसे कह दिया……….. थोडा अपने आसपास देखें तो उत्तर खुद आपको खोज लेगा……..
भगवान् जानते सब हैं पर कोई नहीं जानता…….. अर्थात कहते सब है की वो जानते है न केवल जानते हैं अपितु मानते भी हैं. मगर वास्तव में जानता कोई नहीं है. हमने बचपन में अपने माता पिता से सुना की ये जो मूर्ति है ये मूर्ति पत्थर नहीं भगवान् है………. आपने पूछा की क्या हर पत्थर भगवान होता है तो उत्तर मिला नहीं ये मूर्ति के रूप में जो पत्थर है वो ही भगवान् है……
अब आज जिस पत्थर को उठा कर आपने इसलिए फेक दिया था की वो रस्ते में आकर लोगो को चोट पंहुचा रहा था, कल जैसे ही मूर्तिकार ने उसे मूर्ति का रूप दिया वो भगवान् हो गया………..आपको शक हुआ की सबको कल तक चोट पहुचना वाला आज भगवान् कैसे हो गया…….
तो कही आप इन सवालों में उलझ कर धर्मभ्रष्ट व पथभ्रष्ट न हो जाओ तो आपको नया पाठ पढाया गया की इनसे जो मांगो वो मिल जाता है…. बस यही पर अब उस छोटे से बच्चे ने समर्पण कर दिया….. आदमी की फितरत है की जैसे ही उसको किसी चीज़ का फायदा बता दो उसके तर्क वही पर समाप्त हो जाते है…….. अब उस बच्चे के तर्क भी ख़त्म हो गए………..
पर जब उसने भगवान् से साइकिल मांगी तो भगवान् नहीं दे सके. जब उसने अच्छे नंबर मांगे तो भगवान् नहीं दे सके ……………. उसने जो जो माँगा वो कुछ भी भगवान् नहीं दे सके ……………..
अब वो परेशान है ये कैसा भगवान् है. इस से अच्छा तो एटीएम मशीन है जो जब मांगो पैसे दे देती है. और पैसे आपको सबकुछ दिलवा सकते है……….

तो ये हम है जो बच्चों को भगवान् को ये इच्छा पूरी करने की मशीन की तरह दिखा रहे है. और जब उस मासूम की इच्छा पूरी नहीं होती तो उस भगवान् पर से उसका भरोसा उठ जाता है……तब वो उस परमात्मा से भी नहीं मिलना चाहता है जिसको वो पा सकता था… और फिर हम कहते है की नए पीढ़ी नास्तिक है…….

तो आगे से पूरा प्रयास करे की किसी बच्चे का सर मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे या चर्च के आगे आपके दवाब के कारन न झुके ……. अन्यथा उस परमात्मा पर से उसकी श्रद्धा ख़त्म हो जाएगी……… उसको जानने का मौका दे …. उसके अन्दर जिज्ञासा जागने का मौका दें की आखिर ये है क्या शक्ति है जो इस पूरी धरा का संचालन कर रही है……… आखिर परमात्मा जैसे चीज़ है क्या……………..

तब शायद वो जान ले क्यों की बिना प्रश्न के जवाब का कोई लाभ नहीं, बुद्ध ने ज्ञान पाया क्योकि उसको जवानी, बुढ़ापा, बीमारी तक के बारे में कुछ सिखाया नहीं गया था… उनके ह्रदय में प्रश्न उठा और उन्होंने पा लिया उस परमात्मा को जिसे लोग सालों पत्थरों में नहीं खोज पाए………………………..
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19 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Ajay Pal के द्वारा
August 31, 2010

मैं इस चर्चा में कुछ नहीं कह सकता क्योकि इसमें मेरा बोलना गलत होगा.

Ajay Pal के द्वारा
August 31, 2010

हा हा हा. बिलकुल ठीक कहा इस भगवन से तो ATM बढ़िया है.

Rakesh के द्वारा
August 24, 2010

बहुत उम्दा कभी हिंदुत्व के रखवाले, कभी भगवान् से बड़ा ATM कभी बोझ लगते ये बूढ़े और कभी दो मार्मिक कथाएं. हर बार एक नए रूप में आपके विचार आंदोलित कर रहे हैं. नए ब्लॉग की प्रतीक्षा में.

    Piyush Pant के द्वारा
    August 25, 2010

    दोस्त अच्छा लगा की आप मेरे ब्लॉग को इतनी तल्लीनता से पढ़ते हो………… आपने जितने भी ब्लोग्स का उल्लेख किया है वो सभी मेरे पसंदीदा हैं………… धन्यवाद………………

    Rakesh के द्वारा
    August 28, 2010

    naye blog me fir dharm kya baat. kkuch dharmik ho gye ho kya.

    Piyush Pant के द्वारा
    August 29, 2010

    आत्मा से चिपकी चीज़ है ये धर्म ……….. ऐसे नहीं छोट सकता है……. पर शब्दों में तो आजकल के ब्लॉग पढ़ कर ढालना पड़ा….धन्यवाद………………

anushri के द्वारा
August 22, 2010

piyush i have read your bloag, i dont believe that its your. coz how can you compare an ATM with GOD. do you want to say that money is god. its very poor. i didnt like this blog.

    Piyush Pant के द्वारा
    August 23, 2010

    Aushri जी, मैंने ATM को भगवान् से तुलना नहीं किया है….मैं केवल ये सन्देश देना चाहता हूँ की हमे बच्चों को भगवान् कुछ देने वाले की तरह नहीं दिखाना चाहिए.. भगवान् याचक का हो ही नहीं सकता जो अपना सब कुछ ताक पर रख कर उसको पूजता है वो उसे पा लेता है……….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……

Ajay kumar के द्वारा
August 19, 2010

पियूष जी आपके इस लेख से में ये समझ नहीं पा रहा की आप कोई मजाक कर रहे है या वास्तव में आप इस सिस्टम पर जो हमने भगवान् के लिए बनाया है उस का विरोध कर रहे हैं…..

    Piyush Pant के द्वारा
    August 19, 2010

    अजय जी आपको क्या लगता है ये मजाक है. ये ही तो दुख का विषय है की हमने भगवान् को एक सिस्टम बना दिया है. उसकी पूजा केवल दिनचर्या का एक हिस्सा बन कर रह गयी है…… श्रधा के बिना हम भगवान् को माने या न माने एक ही बात है……

rakesh joshi के द्वारा
August 19, 2010

सर आपकी बात से में सहमत हूँ हम भगवान् भगवान् के कर दौड़ते है पर होता कुछ नहीं है……….. इस से अच्छा है कहो पियो मस्त रहो……… बढ़िया है……..

    Piyush Pant के द्वारा
    August 19, 2010

    राकेश जी आपने मेरे बात को गलत ढंग से लिया है. ये ही हमारा दुर्भाग्य हे की हम एक साधारण इंसान की बात को तो समझ नहीं सकते और गीता के महा ज्ञान का अपने अपने लिए अर्थ निकल लेते हैं……….. मर्म को समझो ……… हमे बच्चों के ऊपर भगवान् को थोपना नहीं है…… उसके अन्दर श्रद्धा जगानी है…. उसको दीन बनाकर पत्थर के आगे माँगने को नहीं कहना है………. ये मेरा भाव है………..

    Lorrie के द्वारा
    July 12, 2016

    Dear Mr. Mitchell: Hmmmmm, you made some good and interesting points about “medical tourism.” What infuriates me about Barrycare (or &#12n0;Moro2care․ as I also sometimes call the so called ACA) is the sheer needless waste, inefficiency, and lessened freedom it brings. Simple tort law reform would have done far more REAL good. Sincerely, Sean M. Brooks

sanjeev के द्वारा
August 19, 2010

आपका ये लेख भगवान् से बड़ा एटीएम एक तरह से भगवान को मानने वालों पर कटाक्ष है… और वो भी उस देश में जहाँ धर्म को सबसे बड़ा मन जाता है….. ये कोई धार्मिक व्यक्ति का काम नहीं है…….. इस लेख के लिए आपको क्षमा मंगनी चाहिए……

    Piyush Pant के द्वारा
    August 19, 2010

    sanjeev जी…….. kisi ko neend se jagane ka prayas karna yadi us par kataksh hai to main is kataksh ke liye maafi chahta hun…… par maujhe aisa nahi lagta hai………

आर.एन. शाही के द्वारा
August 18, 2010

पियूष आपके लेख से दोनों विचार झलकते हैं । एक तो ये कि आप नास्तिकता पर यकीन नहीं करते, और ये भी कि सचमुच वही भगवान नहीं है, जैसा हमारे पुरखे हमें समझाते आए हैं । देखिये भगवान का मतलब वास्तव में कुछ नहीं है सिवाय आस्था के । आस्था ही ईश्वर है, और सीधे जीवन-पद्धति से जुड़ी हुई है । यदि विज्ञान और आधुनिकता के तर्कों के आधार पर ईश्वरीय सत्ता पर विश्वास-अविश्वास का आधार तय करें, तो सबसे पहले पश्चिमी देश, जो हमसे अधिक आधुनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उन्नत हैं, उन्होंने भी तर्कों के आधार पर ‘चर्च ही क्यों?’ का प्रश्न खड़ा कर लिया होता, और किसी दूसरे भगवान की तलाश में भटक रहे होते । उन्होंने ऐसा इसलिये नहीं किया, क्योंकि जानते थे कि सवाल चर्च का नहीं, बल्कि आस्था का है, जो सिर्फ़ टीवी का नारा मात्र नही बल्कि सचमुच जीवन का आधार है । आस्था ही है जिसने हमें यहाँ ब्लाँग पर एकदूसरे से जोड़कर रखा हुआ है, घर में माता-पिता से जोड़कर रखा हुआ है, देश और समाज को जोड़कर रखा हुआ है । यही आस्था ईश्वर है । किसी विशिष्ट मनीषि को मूर्ति का प्रसाद खाते चूहों को देखकर बोध हुआ तो उन्होंने अपने अनुसंधान से आस्था को खोज निकाला, लेकिन सबके पास इतनी फ़ुर्सत कहाँ है? सभी आस्था का अलग-अलग आधार खोजने निकलेंगे तो पूरा समाज ही उसी में संलग्न हो जाएगा और बाक़ी के सारे काम रुक जाएंगे । जबकि जीने के लिये आस्था का आधार सबको चाहिये । इसीलिये अपनी परम्पराओं से बँधे रहना हमारी बाध्यता होती है । जिसने इस अनुशासन को तोड़ा, वो कभी सुखी नहीं रह पाया । ईश्वर की मूर्तियाँ पत्थर नहीं, उद्दीपन होती हैं, और आस्था के एहसास को प्राप्त करने का ज़रिया होती हैं । हर धर्म का अपना-अपना उद्दीपन होता ही है, कहाँ कोई मैदान में पूजा-पाठ कर पाता है? मंदिर, मस्ज़िद, गुरुद्वारा या चर्च, उद्दीपन का कोई न कोई लक्ष्य तो निर्धारित करना ही पड़ता है ।

    Piyush Pant के द्वारा
    August 18, 2010

    सर आपसे ये कहना बहुत छोटी बात होगी पर छोटे ही छोटी बात करते हैं. और बड़े उनमें सुधार करते है….. जहाँ तक मेरी बात है में बहुत आस्तिक हूँ पर मेरा पूरा विश्वाश है की परमात्मा या भगवान् जैसी कोई शक्ति है. पर मैं इस बात पर यकीन करता हूँ की अगर ऐसा है तो हर इंसान को उसकी खुद खोज करनी चाहिए… अगर हम पत्थर की मूर्ति में भगवान् पा लें तो हमको अपने बच्चों से कहना चाहिए की मैंने अपनी श्रद्धा से इस पत्थर में भगवान् को पा लिया है.. और तेरे अन्दर अगर श्रद्धा है तो तू भी पा लेगा नहीं तो ये केवल पत्थर ही है. तो उसके अन्दर शायद वो श्रद्धा वो भाव पैदा हो जायेगा जो उसको भी उस परमात्मा तक पंहुचा दे.. अगर हम ये कहें की भगवान् ये है जो मांगो वो देता है …….. या लोग उसका उपवास रख कर उसको पा सकते हैं…… तो हम अपने छोटों को भटका रहे है……….. वो उस मूर्ति को श्रद्धा नहीं दे पायेगा…………….. क्योकि उसका भाव तो सिर्फ याचक का है……… और जिसको भगवान् ने मानव जीवन दिया हो वो याचक नहीं हो सकता…………. और जहाँ तक मंदिर, मस्ज़िद, गुरुद्वारा या चर्च के रूप में उद्दीपन का कोई लक्ष्य निर्धारित करने की बात है तो जो यत्र तत्र सर्वत्र है उसको किसी सीमा या स्थान में कैसे रख सकते हैं। प्रहलाद ने जिसे खम्भे में पा लिया उसको कई लोग वर्षों मंदिर में नहीं पा सके…………… आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…………..

R K KHURANA के द्वारा
August 18, 2010

प्रिय पियूष जी, आपने ए टी एम् को भगवान् से बड़ा दर्शाने का प्रयास किया है ! यह एक अच्छा व्यंग हो सकता था परन्तु आपने व्योंग नही लिखा ! आपको यह बात भी याद रखनी चाहिए की एटीएम् से भी तभी पैसे निकलते हैं यदि आपके खाते में पैसे हों ! वरना वो भी “बच्चों” को पैसे देने से इंकार कर देगा ! फिर बड़ा कौन होगा ? खुराना

    Piyush Pant के द्वारा
    August 18, 2010

    आदरणीय खुराना जी आपने कहा है की यह एक अच्छा व्यंग हो सकता था पर मैं इस विषय को व्यंग नहीं बनाना चाहता हूँ… भगवान् है और हर इंसान को उसको जानने का अधिकार है. व्यंग को हम हँसकर भुला देते पर मेरा प्रयास विचार करने के लिए प्रेरित करना है……… आखिर क्यों 3 -4 साल का छोटा सा बच्चा भगवान् की मूर्ति के आगे सर झुका देता है…….. वो भगवान् है उसको सर झुका कर प्रणाम करना है ये कौन सिखा रहा है………. ये हम लोग ही हैं हमे खुद नहीं पता की क्या भगवान् है ………. और हम अपनी आने वाली पीढ़ी को सिखाने की कोशिश कर रहे है की वो पत्थर में भगवान् है…………… और जहाँ तक आपका ये कहना है की ………….. एटीएम् से भी तभी पैसे निकलते हैं यदि आपके खाते में पैसे हों ! वरना वो भी “बच्चों” को पैसे देने से इंकार कर देगा ! फिर बड़ा कौन होगा ? तो मैं इतना ही कहूँगा की यहाँ हम जानते हैं की हमको कुछ करके अपना खाता भरना होगा और हमारा एटीएम् हमेशा हमारी मनोकामना पूरी करने को तैयार……….. मगर मंदिर में जाने वाले बच्चे को तो हम खुद नहीं बता पाते की वो क्या करे की उस भगवान् की करुना पा सके ………… शीघ्र ही एक नए विषय पर लिखने की इच्छा है और उसके लिए आपके व शाही जी जैसे पाठकों के सहयोग की आवश्यकता होगी जो मेरे त्रुटियों पर ध्यानाकर्षण कर सकें. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…………..


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