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आखिर पुलिस वाले भी तो इंसान ही हैं..........

Posted On: 23 Aug, 2010 Others में

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पुलिस ………. खौफ का पर्याय …………. भ्रष्टाचार का बीभत्स रूप………… और ना जाने क्या क्या……
इन सब के उलट उत्तराखंड में पुलिस को एक अलग नाम मिला…………… मित्र पुलिस..…….. जैसे ही उत्तराखंड सरकार ने उत्तराखंड पुलिस को नाम दिया उत्तराखंड पुलिस मित्र पुलिस तो, तत्क्षण ये प्रश्न मेरे मस्तिष्क में ये आया की आखिर किस की मित्र…………..
बेइमानो की ………… अपराधियों की…. या किस की क्यों की हर किसी का ये मानना है की पुलिस इनकी ही मित्र है….. आम आदमी की पुलिस को कहाँ फ़िक्र है…….

पर पुलिस को कोसने से पहले हम ये बिलकुल भूल जाते हैं, की वो भी हमारी और आपकी तरह एक इंसान है…….
उसको कोसने से पहले हमें ये याद रखना चाहिए की क्या हम पाक साक हैं…….. क्या हमें हक़ है किसी को कोसने का…………
क्या कभी आपने सोचा है की क्यों एक अच्छा खासा आदमी पुलिस में जाते ही उपरोक्त श्रेणीओं में गिना जाने लगता है………..
आखिर कैसे वो भ्रष्टाचार का पर्याय बन जाता है…….. आखिर हम आमजन की जान माल की सुरक्षा करने वाले को क्यों इतना बुरा भला कहते हैं………

जरा अपने आपको उस अवस्था में रख कर देखिये………. उसका कार्यक्षेत्र, उसपर पड़ने वाला दबाव और अन्य परिस्थितयां …………………..

मैं आपको एक सरकारी कर्मचारी और एक पुलिस वाले के बीच तुलना कर के दिखता हूँ.. फिर आप खुद निर्णय लें की क्या ये पुलिस वाले वास्तव में गलत हैं……. क्या हम इनके साथ कोई न इंसाफी नहीं कर रहें हैं…………

एक सरकारी कर्मचारी का वार्षिक रिपोर्ट कार्ड ………………….

सुबह 11 बजे ऑफिस में प्रवेश ………………… मुह में पान भरा है………. आते ही पास की दिवार पर पान थूक कर चपरासी को चाय लाने का आर्डर दिया गया…………..
सामने एक बुढा  आदमी खड़ा है जो 10 बजने से 10 मिनट पहले आ गया था ताकि यहाँ से जल्दी निपट कर कुछ और काम भी निपटा ले……. अब वो  बुढा आदमी कर्मचारी से कहता है……
साहब थोडा काम से आया था. गरीबी रेखा से नीचे का राशन कार्ड बनवाना है……….
साहब :: अबे आते ही तू तो सर पे चढ़ गया……….. अभी काम शुरू होने में समय है…..
बुढा: पर साहब मैं सुबह 10 बजे से यहाँ आके खड़ा हूँ………….
साहब : अबे तू सुबह 7 बजे आ जाता तो क्या मैं 8 बजे से ही काम शुरू कर दूंगा………..तू तो खाली है…. मगर हमारे तो 50 काम हैं……. थोड़ी देर में आना तब तक दुसरे काम निपटा ले……………
बुढा : साहब दूसरा काम भी सरकारी ऑफिस में ही है……….
साहब: साले कहना क्या चाहता है, की सरकारी कर्मचारी काम नहीं करते……. जा अब नहीं करते तेरा काम …….. करले जो करना है….
बुढा: माफ़ी साहब, मैं ऐसा नहीं कह रहा था… साहब खेती बाड़ी रही नहीं ….. शरीर में मजदूरी लायक बल नहीं रहा है…. अगर गरीबी रेखा से नीचे का राशन कार्ड हो जाये तो मुफ्त आनाज से बुढा, बुढिया का बुढ़ापा कट जाये……….
साहब: एक बार बोल दिया न की अब नहीं करूँगा …….. साले ने सुबह सुबह पूरा मूड ख़राब कर दिया…. ये साला चपरासी पता नहीं चाय लेने कहा चला गया…………….
बुढा: साहब क्या आज हो नहीं पायेगा……….
साहब: साले एक बार बोल दिया न अबकी ज्यादा दिमाग खायेगा तो कभी नहीं होगा……..
बुढा चला गया…………..
अब साहब चले दूसरी मेज पर गप्प मारने ……………… फिर एक सूट पहने आदमी आया……..
आदमी : सर …… मुझे गरीबी रेखा से नीचे का राशन कार्ड चाहिए………..
साहब: आपकी वार्षिक कमाई कितनी है………
दमी: सर वो तो 3 लाख से ऊपर है………
साहब (दांत दिखाते हुए.) : पर वो कार्ड तो 22 हज़ार से कम सालाना कमाई वालों को ही मिलता है…………
आदमी: वो तो मुझे पता है पर आप अगर कुछ कर सकें तो वो जरा सरकारी नियम में गरीबी रेखा से नीचे वालों के बच्चों को डॉक्टर की पढाई में छुट मिल रही है तो ……….
साहब: नहीं ये तो सरकार ने नियम बनाया है उसको तो हमको मानना ही पड़ता है. आखिर हम सरकारी कर्मचारी जो हैं…….
आदमी: ये तो आप शर्मिंदा कर रहे हैं…… सरकार के नियम तो केवल बहाना ही हैं … सरकार तो आप ही है आप चाहिए तो रतन टाटा तक को गरीबी रेखा से नीचे का कार्ड बनवा दें….. आदमी 500 रुपए उसकी जेब में रखते हुए…….. बाकि सेवा कल कार्ड ले जाते समय कर दूंगा………..
साहब: ठीक है आप कल आइये.. अब आपके लिए तो करना ही पड़ेगा…… हम तो हैं ही लोगों की सेवा के लिए…… . …….
अब दुसरे दिन फिर वो बूढ़ा आदमी वही समय पर आया और 11 बजे आये साहब से बोला साहब आज तो बनवा दीजिये मेरा राशन कार्ड ……….
साहब : पहले अपने वार्ड मेम्बर से लिखवा कर लाओ की तुम उस वार्ड में रहते हो……….. जाओ अब ज्यादा सर मत खाओ……
दिन के 2 बजे बूढ़ा कागज़ ले कर आ गया……… और बोला साहब आपने जो आगाज़ कहे थे वो ले आया हूँ……….
साहब : अभी लंच हो रहा है ………. फिर आना …..
बूढ़ा: साहब आपको शायद कुछ गलत फहमी हो रही है…….. लंच तो 1 से 2 होता है. अब तो ढाई बज गया है……
साहब: अब तू हमको टाइम सिखाएगा…………. सालो लंच के समय पर अगर तुम्हारा काम करेंगे तो क्या उस दिन खाना नहीं खायेंगे. तुम लोगो का काम ही कर रहा था 1 से 2 के बीच इसलिए खाना नहीं खा पाया और अब तू मेरा सर खा रहा है …… जा कल आना………
तभी वो सूट पहने युवक का प्रवेश हुआ…………. वो साहब के पास आया और बोला
सर मेरा काम हुआ क्या……..
साहब: अरे सर आपके काम के लिए ही आज का लंच ब्रेक बर्बाद कर दिया है…….
आदमी: चलिए आज आपका खाने पीने का इंतजाम हमारी और से………………
और साहब चल दिए……… और जाते हुए चोकीदार को 10 का नोट देकर बोले सुन कोई पूछे तो बोलना की ऑफिस के काम से बाहर गए हैं…… और कुछ ज्यादा जरूरी काम हो तो फ़ोन कर लेना नहीं तो कल तो आऊंगा ही तब देख लेंगे……..
अगले दिन फिर बूढ़ा आया और फिर एक नए कागज़ बनाने के लिए उसको भेज दिया गया…………
ये क्रम कुछ माह तक चलता रहा ……… फिर कुछ समय बाद जब कई दिनों तक वो बूढ़ा नहीं आया तो साहब को जिज्ञासा हुई और उन्होंने चपरासी से पूछा की वो बूढ़ा आजकल आ नहीं रहा क्या बात है…………..
चपरासी: साहब उसकी और उसकी बीबी की लाश 5 दिन पहले उनके ही घर में मिली थी . सुना कई दिनों से कुछ खाने को नहीं मिला था….
साहब: साला बूढ़ा था ही इस लायक, अरे मैंने कहा था पुरे कागज़ कर दे तो तुझे गरीबी रेखा से नीचे का कार्ड दिलवा दूँ.. पर नहीं कागज़ जमा ही नहीं किये ………. चलो मुक्ति मिली साले को………….

अब एक पुलिस वाले का वार्षिक रिपोर्ट कार्ड ………………….

समय सुबह के 8 बजे…….. स्थान: पुलिस थाना……….

एक आदमी आता है और एक आदमी के खिलाफ मारपीट की शिकायत करता है……….
पुलिस वाला साथ चलता है………. पुलिस को अपने साथ लाते हुए देख कर दूसरा आदमी उसे जोर जोर से गाली देने लगता है………
अब पुलिस वाला उसको पकड़ कर ले जाने लगता है……. और तब वो पुलिस वाले से कहता है……. साले अपनी औकात में रह ……..2 मिनट में वर्दी उतरवा दूंगा तेरी…. जनता नहीं है कौन हूँ मैं……..
पुलिस वाले के अहं को ठेस लगी और पुलिस वाला उस आदमी को पकड़ कर थाने ले गया. उसको थाने ले जाने तक थाने का माहौल बदल चूका था. वह पहुचते ही कोतवाल ने उस पुलिस वाले को डांटा और बोला क्या तुम नहीं जानते तुम किसको पकड़ कर ले आये हो…… पुलिस वाला बोला सर ये चौराहे पर फसाद कर रहा था शराब पी कर लोगो से मार पीट कर रहा था. इसके मुह से अब भी शराब की बू आ रही हैं……….
कोतवाल लगभग चिल्लाते हुए बोला जानते हो ये कौन हैं…….. मंत्री जी का रिश्तेदार हैं ये…..
चलो माफ़ी मांगो इस से, कब से मंत्री जी के लगातार फ़ोन पे फ़ोन आ रहे हैं……. तुम्हे सस्पेंड करने के लिए कहा हैं उन्होंने………
पुलिस वाला बोला पर किस बात के लिए …….. कोतवाल बोला मुझ से इस तरह से सवाल जवाब करने के लिए भी तुम सस्पेंड किये जा सकते हो…..
अब वो पुलिस वाला चुपचाप बाहर चला आया . दुसरे दिन उसे पता चला की उसकी ड्यूटी उस मंत्री के घर पर लगा दी गयी हैं. अब सुबह शाम वो आदमी शराब पी पर उसको गाली देता हुआ अन्दर जाता और बाहर आता..
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क्या एक सरकारी कर्मचारी जो ऑफिस के समय में घर के सारे काम निपटा देता हैं.. और जिसकी ड्यूटी 10 से 5 की जगह 11 या 12 बजे से 3 या कभी कभी 4 बजे तक ही होती हैं……. और जो पुलिस की तरह जोकि उन लोगों से जो कुछ गलती करते हुए पकडे जाते हैं , घूस लेने की जगह उन लोगों से घूस मांगते हैं जो अपने साधारण काम को करवाना चाहते हैं. और उनसे भी सीधे सीधे घूस मांगने की जगह उनको प्रताड़ित कर कर के आखिर घूस देने को विवश कर देतें हैं…. और जो नहीं दे पता वो उस बूढ़े की तरह मारा जाता हैं…….
आप एक बार खुद को पुलिस की जगह रख कर तो देखें ………..

होली वाले दिन जब सब रंग खेलें तब लोगों को हुडदंग से रोकें…………… दिवाली पर जुआ खेलने व शराब पीकर हंगामा करने वालों पे नज़र रखो…….. नेताओं के दौरों पर रात रात भर नौकरी करो……………अपराधी को पकडे तो वो नेता का रिश्तेदार निकाल जाये…………. और फिर इनाम स्वरूप किसी मंत्री के गेट पर सन्तरी बनो…… न पकड़ो तो मीडिया कहे की पुलिस अपराधियों से मिल गयी हैं…….. इस सारे दवाब के बीच जो उनकी मानसिक हालत होती हैं, जो उनके अन्दर गुस्सा भरा होता हैं वो उस आम आदमी पे निकलता हैं जो ऐसे नेता और ऐसे सरकारें बनता हैं………………. क्या ये सब एक आदमी को जानवर बनाने के लिए काफी नहीं हैं………..

जब एक आदमी अपने अधिकारी का गुस्सा अपने बीबी बच्चों पर निकाल कर भी खुद को जस्टिफ़ाई कर लेता है तो आखिर पुलिस क्या करे,, उसे तो बीबी बच्चों के साथ समय बिताने का मौका तक नहीं मिलता है…

हम पुलिस वालो को गलियां देकर वास्तव में इस सिस्टम को और बिगाड़ रहें हैं… पुलिस वालों के प्रति लोगों की दुर्भावना के कारण ही एक अच्छा आदमी पुलिस में जाने से डरता है… क्योकि उसको पता है की अगर वो कुछ करता है तो नेताओं की गलियां सुनने को मिलेंगी , और नहीं करता है तो जनता तो है ही गाली देने के लिए…… और अगर वो सिस्टम को छोड़ कर कुछ मजबूत कदम उठाता है, जिससे अपराध व अपराधिओं की कमर टूटे तो, उसके खिलाफ नेता व अपराधी तो हो ही जायेंगे पर जनता भी उसका साथ देने से इंकार कर देगी……….. इन सारी परिस्थितियों के बीच जिस तरह एक पुलिस वाला अपनी पूरी नौकरी बिता देता है वो उस के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जानी चाहिए….

सभी पाठकों से मेरा निवेदन है की यदि आप मेरे इस लेख से सहमत न हों और आपको अभी भी लगे की पुलिस वास्तव में पुलिस ………. खौफ का पर्याय …………. भ्रष्टाचार का बीभत्स रूप………… और ना जाने क्या क्या….. है तो आपका स्वागत है….. एक मैत्री पूर्ण माहौल में विचारों का आदान प्रदान हो सकता है……… और यदि आप इस से सहमत हों तो पक्ष में जरूर कुछ लिखें ताकि उन लोगों को जो इस प्रकार पुलिस कर्मियों के प्रति दुर्भावना रखते हों उनको कुछ सीख मिले. और यदि आप वास्तव में पुलिस के प्रति अभी भी दुर्भावना से ग्रस्त हैं तो भी जरूर लिखें की क्यों… अलग अलग ब्लोग्स में पुलिस के प्रति काफी कुछ पढ़ा तो समझ में आये की ये केवल एक तरफ़ा सोच वालों का काम है. ………..
……………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………..
उम्मीद है इस लेख पर कुछ सार्थक विचार व प्रतिक्रियां जरूर मिलेंगी….
शुभकामनाओं के साथ …………………………………..
पियूष कुमार पन्त………………………………………..
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363 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
January 23, 2014

आदरणीय पियूष जी, आप बहुत अच्छा लिखते हैं, सचमुच बहुत अच्छा लिखते हैं और आज इस पुराने पोस्ट को पुन: प्रकाशित करने का मतलब भी समझ सकता हूँ. आप जरूर लिखें ताकि हैम सभी आपसे प्रेरणा ले सकें फेसबुक और ब्लॉग में यही तो अंतर है …वहाँ हम क्षणिक विचार प्रस्तुत कर देते हैं या किसी कथ्य पर अपनी प्रतिक्रया दे देते हैं पर वहाँ उस समय के मनोभाव पर निर्भर करता है ब्लॉग पर आदमी पूरी तरह सोच समझ कर लिखता भी है और पर्तिक्रिया भी उसी तरह दिया जाता है या नहीं दिया जाता है. आपके इस ब्लॉग पर मिले स्टार की संख्या बतलाती है कि आप का यह ब्लॉग कितने लोगों को प्रभावित कर सका है. आप पुन:आयें सर, अपना विचार रखें… सादर!

SUMIT PRATAP SINGH के द्वारा
January 20, 2011

वास्तविकता का वर्णन करने के लिए पियूष जी आपको साधुवाद…

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 20, 2011

    सुमित जी….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…………

Preeti Mishra के द्वारा
January 20, 2011

सही कहा आपने पुलिसवाले भी इंसान होते हैं.वह भी हमारे समाज से ही आते हैं.उनके भी माँ-बाप,बीबी बच्चे होते हैं.अपर्याप्त साधन,अपर्याप्त हथियार,रोजमर्रा की जरूरतों को न पूरी करने वाली तनख्वाह के साथ वह आधुनिक हथियारों से लैस अपराधियों से जूझते रहते हैं.फिर कोई पुलिस में नौकरी कर रहा इसलिए वह खराब है कहना गलत है.अच्छे-बुरे इंसान हर क्षेत्र में होते हैं.अच्छा लगा कि किसी ने पुलिसवालों के लिए सकारात्मक लेख लिखा. बधाई.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 20, 2011

    वास्तव मे मजबूरी ओर कमजोरी ही आदमी से कुछ भी करवा देती है……….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…………

Ajay Pal के द्वारा
August 31, 2010

सही कहा आपने अक्सर पुलिस वालो को गली देते वत हम भूल जाते है की वो इन्सान है.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 20, 2011

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…………

Munish के द्वारा
August 29, 2010

पियूष जी, जब हम पंथ निरपेक्षता की बात करते हैं तो जाने अनजाने हम तथाकथित हिन्दू (सनातन) धर्म की ही बात करते हैं, क्योंकि केवल हिन्दू धर्म के ग्रंथों में ही किसी अन्य धर्मों से सम्बंधित कोई तथ्य नहीं है, वहां धर्मं का अर्थ मानवता से है, सत्य से है. किसी भी धर्म ग्रन्थ में न हिन्दुओं का वर्णन है, न क्रिश्च्यानो का, न मुसलमानों का, केवल वर्णन है तो सत्य का, जो मानवता के हित में है वो धर्म है, जो अहित में है वो अधर्म है. इस मान्यता में यदि किसी की धार्मिक भावनाओं को चोट लगती है, तो जरूरत है उस व्यक्ति को आत्म मंथन की, अपने धर्म की विवेचना की, ये किसी के धर्म को गाली देना या बुराई करना नहीं है, कोई भी व्यक्ति यदि ये सोच कर सच बोलने से घबरा रहा है की किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचेगी तो वो भी धर्म का पालन नहीं कर रहा है और अधर्म का समर्थन मौन रहकर कर रहा है. स्वामी विवेकानंद, उक्त परिभाषित धर्म का ही प्रचार प्रसार करते हैं तथा धर्म को राष्ट्रवाद से जोड़ते हैं, उनके अनुसार राष्ट्रहित में किया गया कार्य सबसे बड़ा धर्म है. वो फिर लोगों की व्यक्तिगत धार्मिक भावनाओं को राष्ट्रभाव के बाद में रखते हैं.

    Piyush Pant के द्वारा
    August 29, 2010

    जी मुनीश जी मेरे भी कुछ ऐसा ही मानना है………….. वास्तव में ये एकमात्र ऐसा धर्म है…………. जिसने व्यापक सुधार की संभावना से कभी इंकार नहीं किया…….. यही एक वजह है की इस धर्म को मानने वालों की संख्या बढ़ी ही है…………. धर्म ये अवश्य ये कहता है की अधर्म के खिलाफ आवाज़ उठाना धर्म है……. पर वो ये नहीं कहता की दुसरे के धर्म की बुराइयों को उजागर कर आप अधर्म के खिलाफ आवाज़ उठा रहे है………… जबकि आप ये भी नहीं जानते की क्या उन बिन्दुओं पर कोई विचार कर भी रहा है की नहीं………. अगर कुरान पढ़ कर लोग हिन्दुओं के खिलाफ हो जाते हो…………. तो वीर अब्दुल हमीद, और कई मुस्लिम सैनिक जो सरहद पर अपने वतन के लिए लड़ रहे हैं वो कौन सी कुरान पढ़ते है………….. ये देश जिस रूप में है अच्छा है…………. यदि मुस्लिम अपनी परेशानी का कारण अपने मुस्लिम होने को कहेंगे (जैसा मैंने अपने ब्लॉग हंगामा है क्यों बरपा में कहा है.) तो ये देश अपनी सहिष्णुता को बरक़रार नहीं रख पायेगा……… और न ही तब जब की हिन्दू कुरान पर सवाल करें……… आपकी प्रतिक्रिया के लिए फिर शुक्रिया…………..

RASHID - Proud to be an INDIAN के द्वारा
August 28, 2010

पन्त जी,, आप के लेख सकारात्मक होते है और ऐसे ही लेख आज की ज़रुरत है,, आप ने बिलकुल सही लिखा है की धर्म के बारे में लेख लिखने के योग्य हम लोग नहीं है खास कर नकारात्मक लिखने के तो एकदम पता नहीं क्यों लोग धर्म का सहारण लेकर नफरत फैलाते हैं !! पन्त जी मेरा मानना है की धर्म एक व्यक्तिगत मामला है और संस्कृति एक सामाजिक,, आप देखे की एक स्थान के रहने वाले सब एक ही तरह की वेश भूषा ,, खान पान ,, शकल सूरत के दीखते है चाहे किसी धर्म के क्यों न हो,, यहाँ तक की जब तक आप उनका नाम आदि ना पूछें आप जान ही नहीं सकते की वह किस धर्म को मानने वाले है,, फिर सिर्फ धर्म के आधार पर नफरत फैलाने के क्या तात्पर्य रह जाता है जब हमारा सब कुछ एक सा है !! कृपया अपने लेखो से हमारा मार्गदर्शन करते रहे… राशिद http://rashid.jagranjunction.com

    Piyush Pant के द्वारा
    August 29, 2010

    प्रोत्साहित करने के लिए धन्यवाद……. रशीद भाई………. कुछ नया लिखना चाह रहा हूँ………. उसपर आपकी राय जरूर मांगूंगा…… उम्मीद है निराश नहीं करेंगे……………

Rakesh के द्वारा
August 28, 2010

जी हाँ बिलकुल सही कहा की पुलिस वाले भी आखिर इंसान है . और अगर आपको लगता है की उनकी नौकरी इतने अच्छी है तो आप भी ज्वाइन कर लें. आपकी प्रतिक्रिया नहीं होती तो में ये सोचता की आप भी पुलिस में है. बढ़िया लिखा है.

    Piyush Pant के द्वारा
    August 29, 2010

    चलिए आपको ये तो पता चला की मैंने पुलिस में न होकर इस लेख को लिखा…………… किसी के हालत को समझने के लिए ये जरूरी नहीं की वो हालत आप पर भी गुजरें ………….. आप यु भी उनको कोशिश करें तो महसूस कर सकते हैं……………. धन्यवाद…………

    Jodie के द्वारा
    July 12, 2016

    My ex used to talk about how her dad stank after he came off a diesel boat back in the 70s. She loved the smell, though, &#;ca93use it meant her Daddy was home…

s.p.singh के द्वारा
August 27, 2010

पियूष जी पुलिस तो हमारी पुलिस है तथा बाकी दफ्तरों में कम करने वाले बाबु और अधिकारी भी हमारे ही है परन्तु वह लोग जिस व्यस्था के अंतर्गत कार्य कर रहे हैं वह हमारी नहीं है . स्वतंत्रता के बाद सब कुछ स्वतंत्र है पर इस देश में रहने वाला गरीब नागरिक स्वतंत्र नहीं है उसे हर कदम पर कानून का पालन करने के लिए बाध्य किया जाता है परन्तु पैसे वाला एवं सक्षम व्यक्ति किसी कानून का पाबन्द नहीं है. चूँकि हमारी सारी की सारी सरकारी मशीनरी की व्यस्था मैकाले के द्वारा बनायीं गई व्यस्था पर ही निर्भर है | आपने लिखा की उत्तराखंड की पुलिस उत्तराखंड मित्र पुलिस के नाम से जानी जायगी तो आश्चर्य हुआ इसलिए की नाम में क्या रखा है अगर मै अपने बच्चे का नाम बिल्क्लिटन रख लूं तो क्या मै किसी अमेरिकी का बाप हो जाऊंगा, नहीं इसलिए सबसे पहले हमारे प्रदेश एवं देश की सरकारों को उन गुलामी के कानूनों को बदलना होगा जो हमें अंग्रेजो से विराशत में मिले है , केवल संविधान बना लेने से हम स्वतंत्र नहीं हो गए जब तक अपना कानून नहीं होगा तब तक इस देश के गरीब अवं अक्षम नागरिकों के जीवन स्तर कभी भी ऊपर नहीं हो सकता और न ही हम अपनी सरकारों पर भरोसा कर सकते हैं /////////एस०पी सिंह, मेरठ

    Piyush Pant के द्वारा
    August 27, 2010

    एस०पी सिंह जी, जैसा की आपने कहा है.. की सबसे पहले हमारे प्रदेश एवं देश की सरकारों को उन गुलामी के कानूनों को बदलना होगा जो हमें अंग्रेजो से विराशत में मिले है , केवल संविधान बना लेने से हम स्वतंत्र नहीं हो गए जब तक अपना कानून नहीं होगा तब तक इस देश के गरीब अवं अक्षम नागरिकों के जीवन स्तर कभी भी ऊपर नहीं हो सकता, तो आपको ये समझना होगा की अगर ऐसा हो गया तो इन नेताओं का क्या होगा………. ये चुने ही इन कुरीतियों के कारण ही है…………….. खुबसूरत टिपण्णी के लिए धन्यवाद………..

    Bardo के द्वारा
    July 12, 2016

    Don’t the Egyptians in fact make those themselves under license?  Or is it just the A1M1?  Too late and too many Bear Republic Racer 5 IPAs to bother looking it up myself.  So&ny. rrbsp; 0 likes

ARVIND PAREEK के द्वारा
August 25, 2010

प्रिय श्री पीयुष पंत जी, आपनें यह कहावत तो सुनी ही होगी कि एक मछली सारे तालाब को गंदा करती है । बस इसी तर्ज पर आपनें एक सरकारी कर्मचारी की बुराई व एक पुलिस वालें (जबकि वह भी सरकारी कर्मचारी होता है) की अच्‍छाई बताई हैं । यदि आप प्रत्‍येक चौराहे पर रिश्‍वत लेते पुलिस वालों के बारें में लिखते तो लगता कि आप उनकी बुराई कर रहे हैं । समस्‍या यह है कि गंदी मछलियां सब जगह हैं प्रत्‍येक क्षेत्र में । जहां गंदी मछलियां ज्‍यादा होंगी उस क्षेत्र को लोग ज्‍यादा गंदा समझतें हैं । गंदगी का दूसरा पैमाना जो पब्लिक के ज्‍यादा निकट है वह उतना ही जल्‍दी अच्‍छे बूरें की तराजु पर तौल लिया जाता हैं । जबकि प्रत्‍येक क्षेत्र में इंसान ही काम करते हैं । तथापि एक अच्‍छी प्रस्‍तुति के लिए बधाई । अरविन्‍द पारीक (भाईजी कहिन)

    Piyush Pant के द्वारा
    August 25, 2010

    अरविन्‍द पारीक जी, आपने कहा है की जहां गंदी मछलियां ज्‍यादा होंगी उस क्षेत्र को लोग ज्‍यादा गंदा समझतें हैं । तो क्या आम जन इन गन्दी मछलियों में नहीं हैं…… पुलिस फिरोती नहीं मांगती है…… आप जब कानून तोड़ते है तो पुलिस आपसे पैसा लेती है……. आप गलती न करें तो इनको मौका न मिले………. तो आमजन जो नियम से चलता है उस के लिए तो पुलिस बुरी है ही नहीं……….. पर अन्य विभागों में आप चाहे कोई भी हों चाहे कैसे भी नियम से काम करने वाले हों पर आपको उनको भोग लगाना ही पड़ेगा………. आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद………………

Abuzar osmani के द्वारा
August 24, 2010

आपने जो लिखा वो हकीक़त है,जाने हकीक़त इतनी कडवी क्यूँ होती है?पुलिस वाली बात भी सही है….अच्छे लोग इसी लिए पुलिस की नौकरी से घबराते हैं,……वैसे रेफोर्म इसी तरह से हो सकती है की हम अपने भर कोशिश से न चूकें . जय हिंद

    Piyush Pant के द्वारा
    August 24, 2010

    Abuzar osman जी, ये पूरा लेख मैंने आवेश में ही नहीं लिखा है…. बीच में इन ब्लोग्स में काफी कुछ पढ़ा पुलिस के बारे में ………….. सारा नकारात्मक ही था……. क्यों हम किसी के बारे में कुछ भी बोलने से पूर्व कुछ नहीं सोचते………. जैसा की मेने अपने ब्लॉग एक और मार्मिक कथा में साबित किया है की कई बार आँखों देखि और कानो सुनी बातें भी गलत हो सकती हैं.. मेरे पुरे परिवार में कोई भी पुलिस में नहीं है………… मैंने एक बार जब दरोगा की परीक्षा देने की तैयारी की तो सब लोग मेरे खिलाफ थे…… जैसे मैं अंडर वर्ल्ड की दुनिया में जा रहा हूँ……… तब मैंने जानने की कोशिश की कि क्यों पुलिस कि नौकरी ख़राब मानी जाती है. होली में होली नहीं , न दीवाली में दिवाली, अपराधी और नेता में कोई अंतर नहीं……. जिसको पकड़ कर लाये वो ही सस्पेंड करने कि धमकी दे देता है और कई बार करवा भी देता है…. जितनी जनता अपराध में लिप्त है कही न कही राजनीती से जुडी है……….. कहते है कि पुलिस अंधी कमाई करती है. पर क्या फायदा जब उसका उपभोग करने को न मिले……… अगर आपको लगता है …….. पुलिस अँधा पैसा कमाती है तो एक बार जरूर भर्ती होकर देखें………. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………

RASHID के द्वारा
August 24, 2010

पियूष भाई ,, आप की बात तो एकदम सही है,, पुलिस इतनी बदनाम इस लिए होती है की उसका पब्लिक से सीधा मामला रहता है ,, लेकिन एक बात और भी है,, ज्यादा तर पुलिस वाले अपनी वर्दी के नशे में इतना चूर रहते है की किसी को भी अपमानित कर देते है,, मुझे याद है कई साल पहले जब मैं काफी छोटा था ,, अपनी माँ के साथ रिक्शे से जा रहा था, उस रिक्शे वाले ने गलती से दूसरी तरफ मोड़ दिया बस वह खड़ा सिपाही लाठी से उस बूढ़े रिक्शे वाले को मारने लगा,, अब आप सोचे की एक कमज़ोर और बूढ़े व्यक्ति को लाठी से पीटना कहा की शराफत है ,, क्या उस सिपाही के मन में एक बार भी नहीं आया की इस बेचारे को मत मारे ,, कभी कभी लगता है हमारे समाज के यह प्रवृत्ति है की कमज़ोरो को दबाव और ताक़त्वार की चापलूसी करो !! राशिद http://rashid.jagranjunction.com

    Piyush Pant के द्वारा
    August 24, 2010

    रशीद भाई, कभी आपने एक दो ढाई साल के छोटे से बच्चे को देखा है. जो किसी बात पर नाराज़ होता है तो अपनी माँ को अपने छोटे छोटे हाथों से मारने लगता है.. या जब कभी आप कही ऐसे इंसान की जली कटी सुनकर आते हैं जो आपसे पद में बड़ा है और आप उसे कुछ जवाब नहीं दे पाते, तो आपका गुस्सा आपका क्षोभ अपने घर वालों व मित्रो पर ही निकलता है… क्योकि आप जानते है वो उसका कोई प्रतुत्तर नहीं देंगे….. वैसे ही जब एक पुलिस वाला अपराधियों के हाथों या नेताओं के (वैसे दोनों में कोई अंतर तो नहीं है.) अपनी ड्यूटी करने का पुरुस्कार तिरस्कार के रूप में पता है तो उसका क्षोभ उस गरीब पर उतरता है जो उसका प्रतिरोध नहीं कर सकता …………. और सरकारी दफ्तरों के बाबु हाथ नहीं उठाते पर कलम से ही आदमी को मार डालते हैं…………. उस पुलिस की हालत आप तभी समझ सकते है जब खुद को आप उस जगह रख कर देखें. बेशकीमती प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…………..

    munish के द्वारा
    August 27, 2010

    पियूष जी, आप बहुत अच्छा लिखते हैं, परन्तु जिस तथाकथित दबाव को आप पुलिस पर महसूस करते हैं, जिसके कारन वो बेरहम होकर निर्दोषों की पिटाई करता है वो ही तथाकथित दबाव धर्म के उपर वाद विवाद, करवाता है, जिस विषय पर आपको लिखना अच्छा नहीं लगता, उसी विषय को लेकर स्वामी विवेकानंद सारे विश्व में उसकी अलख जागते हैं, उसी धर्म की स्थापना के लिए कृष्ण महाभारत कराते हैं, शिवाजी अलग राज्य की स्थापना करते हैं, और इन सब महापुरुषों पर भी धर्म की पुनह स्थापना का दबाव था, उन्होंने ये सब कार्य इसलिए नहीं किये की वो महापुरुष थे बल्कि इसलिए किये क्योंकि अधर्म के खिलाफ आवाज़ उठाना उन्होंने अपना कर्त्तव्य समझा, और कर्म को प्रमुखता देकर ही वो महान हुए, आप लिखते हैं की हमें किसी अन्यान्य धर्मों की बुराई नहीं करनी चाहिए, बिलकुल ठीक बात है, लेकिन यदि कोई बात मानवता के विरुद्ध हो चाहे वो किसी भी धर्म में ही क्यों न हो उसको सर्व विदित होना ही चाहिए और सुधारना भी चाहिए, जैसे बाल विवाह, सती प्रथा, वैसे भी आप स्वयं गांधीजी वाले लेख में लिखते हैं की, उजाले का महत्त्व तभी है जब अँधेरे का ज्ञान हो, अहिंसा का महत्त्व तभी है जब हिंसा के विषय में जानकारी हो. हर विषय के दो पहलु होते हैं, और आप हमेशा सकारात्मक रुख अपनाते हैं ये बहुत अच्छी बात है, समाज को ऐसा ही होना चाहिए, परन्तु कभी कभी ऐसी सकारात्मकता चीन से आक्रमण करवा देती हैं और हम नेहरु जी की तरह देखते रहते हैं, तो कभी सोमनाथ का दंश दे जाती है जो आज तक एक सहिष्णु समाज पर बर्बरता की निशानी है आप अपनी लेखनी के लिए साधुवाद के पात्र हैं लेकिन धर्म के उपर जो न लिखने की कसम खायी है वो गलत है क्योंकि ये एक ऐसा विषय है जिसको कोई भी नकार कर आगे नहीं बढ़ सकता.

    Piyush Pant के द्वारा
    August 27, 2010

    मुनीश जी, आप लिखते हैं की…………………. जिस विषय पर आपको लिखना अच्छा नहीं लगता, उसी विषय को लेकर स्वामी विवेकानंद सारे विश्व में उसकी अलख जागते हैं, उसी धर्म की स्थापना के लिए कृष्ण महाभारत कराते हैं, शिवाजी अलग राज्य की स्थापना करते हैं………… स्वामी विवेकानंद ने हिंदुत्व पर तब बोला जब वो उस अवस्था में थे जब बोल सके……….. जो जान ले वो कुछ बोल सके……….. कुछ ……. सब कुछ नहीं………. क्योकि धर्म जो की बंधन रहित है वो कैसे शब्दों में बंध सकता है… जहा तक आपका अधर्म के खिलाफ आवाज़ उठाने का सवाल है…….. तो कौन तय करेगा की क्या धर्म और क्या अधर्म ……. क्या दुसरे धर्म को गाली देना धर्म है………… आप जब तक अपने धर्म की कुरीतियों को दूर करने की बात करते है ठीक है……….. पर क्यों आप दुसरे के धर्म में हस्तक्षेप करते है……….. और जहाँ तक सकारात्मक होकर चीन से युद्ध की बात है तो मैं ये भी कहता हूँ की………. ऐसे समय के लिए ही गीता का ज्ञान अपनाना पड़ेगा… पर जबरन नहीं…………. मैं धर्म पर लिखना नहीं चाहता क्योकि ये अपनाने वाली भावना है……….. पर कुछ अब जरूर लिखूंगा……………… प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद ………….

    Kellsie के द्वारा
    July 12, 2016

    Grave erro Jose; os paxaros que vivían nesa illa, ata que os matou o gato, eran os mellor preparados para sobrevivir nese entorno (selección naa.)tlruOutra cousa diferente é que estaban obrigados a reproducirse entre os poucos que eran e a pouca variedade xenética os levou á endogamia. Pero eran os mellor preparados para vivir nese entorno.Eu quería que me esplicárades como a selección natural actuou neste caso para crear paxaros non voadores.


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