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अपने दुःख भी अपने होते हैं.............

Posted On: 19 Sep, 2010 Others में

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कुछ समय पूर्व एक पुराने मित्र से मिलना हुआ………….. बड़ा अजीब सा लगा उस से मिलकर……. वो काफी परेशान सा लग रहा था……. बिलकुल चुपचाप सा …… मैंने पूछा क्या हुआ भाई……. तू तो बिलकुल बदल गया है…..

मित्र ने कहा :: हां……. यार . पर तू बिलकुल नहीं बदला…….. सही है भाई……… तुम्हारे जीवन में कोई कष्ट नहीं आया न इसलिए………. मैंने उसको पूछा ……की क्यों तेरे जीवन में ऐसा कौन सा कष्ट है………

वो बोला कुछ नहीं यार रोज दस घंटे की नौकरी फिर……… वही हर जा कर खाओ पियो और सो जाओ…… कोई रस नहीं है जीवन में…….. एक परेशानी ये है की तनख्वाह कम है…… दूसरा ये है की शादी नहीं होती……. अब क्या क्या बताऊँ………… तेरे मजे हैं यार….

फिर मैंने उसको पूछा ………. कैसे …

तो वो बोला आराम की नौकरी है……… कोई झंझट नहीं…….. मजेदार सरकारी पोस्ट है…… और क्या चाहिए……

अब मैं थोडा बदल गया…….. और मैंने उसको पूछा ……. कितना हिस्सा बचत कर पाता है अपनी तनख्वाह का ……… वो बोला कुछ नहीं यार क्या बचता है…….. इतने कम में……..

फिर मैंने कहा न तेरे से बचता है न मेरे से तो अंतर क्या है………… न तेरे शौक रईसो के न मेरे शौक रईसो के ………. तो कुल जमा तो दोनों बराबर ही हैं…….. पर उसको लगा की ये झूठी सांत्वना है…….

फिर एक कहानी मैंने उसको सुनाई …….जो मैं आपके साथ बाटना चाहता हूँ………

एक बार एक आदमी बहुत दुखी था……… उसको यूँ लगता था मानो सारी दुनिया का दुःख उसके ही सर पर है…… हर दूसरा आदमी उसको अपने से अधिक सुखी लगता…….

एक दिन वो मंदिर में भगवान् के पास गया और उसने भगवान् से कहा की किसी का भी दुःख दे दे पर मेरा ये दुःख ख़त्म कर दे……….. उस दिन शायद कोई त्यौहार रहा होगा….. की भगवान् तुरंत प्रसन्न हो गए….. और बोले ठीक है….. आज शाम को सभी लोग अपने अपने दुःख एक पोटली में ले कर आ रहे है तू भी ला वही किसी से बदल लेना……..

वो आदमी ख़ुशी ख़ुशी मंदिर से चला गया……… शाम को वो एक मैदान में पंहुचा …… जहाँ कई लोग पोटलियाँ लेकर जमा थे…… अब सबने अपनी अपनी पोटली एक जगह जमा कर दी …….. और अब आकाशवाणी हुई की जिसकी जो मर्जी वो उस पोटली को उठा कर ले जाये…

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अब तो भगदड़ मच गयी…… हर कोई दौड़ा जा रहा था…. थोड़ी देर बाद जब सारी पोटली ख़तम हो गयी……. तो सबने देखा की हर एक ने अपनी पोटली को ही उठाया है…….. अब भगवान् ने फिर आकाशवाणी के माध्यम से पूछा की ……. क्यों नहीं तुमने मौका मिलने पर भी अपने दुःख दूसरों के साथ बदल लिए…….

तो सब बोले की प्रभु जैसे भी है.. ये दुःख मेरे अपने है…….. और इनकी अब हमको आदत है…. हम सदियों से इनको झेलने का तरीका खोजे हुए है …….. पर नए दुःख के साथ फिर नए सिरे से कौन मेहनत करे………

हम तो यूँ सोचते थे की बाकी लोगों को कोई दुःख नहीं है .. जब सब ही दुखी है……. तो सब अपना अपना दुःख संभालें………..

अब ये कहानी ख़तम हुए….. और मेरा मित्र मुझे देख कर बोला बता क्या परेशानी है तुझे……. अपनी परेशानियाँ सुनाने में मैं तुझसे ये पूछना तो भूल ही गया…….. और मैंने कहा की जैसे भी है मेरी परेशानिया बस मेरी हैं……….

और हम दोनों दोस्त हसने लगे……… आज की इस मुलाकात ने कई बाते याद करा दी……. कुछ शरारतें याद आ गई……… जो कभी की थी और जिनको याद कर आज भी कभी भावुक तो कभी लोटपोट हो जाता हूँ………. आगे आपके साथ उनको भी बाटना चाहूँगा………

धन्यवाद………….



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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

RaJ के द्वारा
September 21, 2010

हमेशा की तरह जीवन को क्शुने वाली रचना देकर आप कुछ प्रसन्नता दे जाते हैं | सुन्दर विचार पन्त जी

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 21, 2010

    आपकी उत्साहित करने वाली प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……

    Keesha के द्वारा
    July 12, 2016

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div81 के द्वारा
September 20, 2010

puष जी  ये कहानी मुझे मेरी दी ने सुनाई थी | मैं जब भी परेशां होती हूँ तो अकसर ये कहानी मुझे याद आ जाती है | बहुत अच्छी पोस्ट बधाई |

    Piyush Pant के द्वारा
    September 20, 2010

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……

आर.एन. शाही के द्वारा
September 20, 2010

सच है पियूष जी, मनुष्य को अपनी परेशानियां और दुख हमेशा दूसरों से बड़े लगते हैं … बधाई ।

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 20, 2010

    आपकी प्रोत्साहन भरी प्रतिक्रिया का शुक्रिया…………

    Johannah के द्वारा
    July 12, 2016

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Aakash Tiwaari के द्वारा
September 20, 2010

पन्त जी आपका ये लेख हम नौजवानों को भविष्य में जरूर मदद करेगा..शिक्षा पर आधारित लेख के लिए हार्दिक शुभकामनाएं.. आकाश तिवारी

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 20, 2010

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया आकाश जी………

daniel के द्वारा
September 20, 2010

शैलेश जी के कथन (जिन्हें हम दुःख का नाम दे देते हैं, वास्तव में समस्याए हैं)से  सहमत हूँ क्या दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति है जो यह कह सके कि उसे कोई समस्या नहीं है ? शायद नहीं ! तो क्या संसार के सभी व्यक्ति दुखी है ? बिलकुल भी नहीं !! हमारे दैनिक जीवन के दुःख का कारण हमारा अपना दुःख नहीं अपितु हमारे पडोसी का सुख सम्पन्नता ही है जो हमसे सहन नहीं होती !!! किसी ने सत्य ही कहा है कि व्यक्ति अपने दुःख से नहीं बल्कि दुसरे के सुख से दुखी होता है ………………………………सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई …………………………….

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 20, 2010

    vastav me hum apni samasyon ko hi badha kar apne liye dukh paida karte hain…… anyatha dukh kuch hai hi nahi…….

Ramesh bajpai के द्वारा
September 20, 2010

पियूष जी ऐसी सोच को यदि व्यक्ति मन में उतार ले तो दुःख जरुर कम होगा बहुत अच्छी पोस्ट बधाई

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 20, 2010

    बाजपाई जी आपका हार्दिक शुक्रिया ……

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
September 19, 2010

प्रिय पियूष जी ! आपने बिलकुल सही लिखा है की, हर किसी के पास दुःख है, और सब लोग अपने दुःख को अरसों से सहते आये है और उनके पास उसने निपटने का अनुभव है, तो दूसरे का दुःख लेकर परेशानी कौन बढ़ाये. अच्छा लेख … परतु मैं यही कहना चाहूंगा की वस्तुतः ये दुःख नहीं हैं ये समस्याएं हैं, जिन्हें हम दुःख का नाम दे देते हैं, समस्याये सापेक्ष हैं, जैसे अगर आज बरसात हो रही है, और एक दैनिक मजदूरी पर काम करने वाले मजदूर को काम नहीं मिला ये उसके लिए समस्या है, लेकिन जिसके पास पहले से पर्याप्र साधन हैं उसके लिए ये प्रकृति का उपहार हो सकता है, ये उसके लिए समस्या नहीं ….. परन्तु दुःख पूर्णतः तो नहीं परन्तु पर्याप्त सीमा तक निरपेक्ष होता है | उदाहरणार्थ किसी बच्चे का मान से बिछड़ जाना, अब देखिये हर बच्चे को दुःख होता है चाहे वो संसाधन संपन्न का बच्चा हो या फिर अभावग्रस्त का बच्चा हो ….. वैसे अच्छे लेख के लिए बधाई …

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 20, 2010

    achchhi pratikriya ………….. aapka shukriya……..


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