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भिटोली की कहानी..........

Posted On: 22 Sep, 2010 Others में

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मेरे द्वारा पूर्व में लिखी जा चुकी लोक कथा काफल पाको मैं नि चाखो…….. और इस कहानी में एक छोटी सी समानता है………… और यहाँ की लोक कथाओं में अक्सर इस तरह की ये समानता आपको मिलेगी…………
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हमारे यहाँ शायद ये माना जाता है की….. यदि कोई अपनी भूल के प्रायश्चित के दुःख से मृत्यु को प्राप्त होता है तो वो चिड़िया बन जाता है……………. और वो अपने द्वारा की गयी भूल को गा गा कर कहता है……. इसलिए हर बार ये समरूपता दिखाई देगी………….
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इस बार इस कहानी का विषय उत्तराखंड में मनाया जाने वाला एक त्यौहार भिटोली है………. वास्तव में ये कोई त्यौहार नहीं है…….. अपितु एक पूरा महीना (चैत का) भिटोली के महीने के तौर पर मनाया जाता है…….. इस महीने भाई अपनी बहिन को भिटोली देता है…….. भिटोली ………….लड़की को मायके की और से पकवान और वस्त्र व भेंट के तौर पर दिए जाने वाले अन्य सामान है………..
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ये कहानियां मैंने बहुत पहले सुनी थी और पहाड़ी भाषा में सुनी थी………..इस लिए इसमें शब्द मेरे ही हैं पर भाव मूल कथा का ही है……….
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बहुत पहले एक गांव में एक परिवार रहता था ………. जिसमे माता पिता व एक भाई व एक बहिन थे…… भाई संभवत: छोटा ही रहा होगा………. (पूरी कहानी पढ़ कर आपको भी शायद ये महसूस हो)…….. बहिन की शादी हो गयी……….. अब शादी के बाद पहली बार भिटोली का महीना आया…….
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पहली भिटोली को लेकर घर में बड़ा उत्साह था………… बहिन का ससुराल बहुत दूर था……… और उस समय में गाड़ियाँ केवल गिनी चुनी जगहों तक ही सिमित थी……. और सुदूर इलाकों में लोग पैदल मिलो चला करते थे…………. उस लड़की का ससुराल बहुत दूर था…. पैदल जाने में सात से आठ घंटे लग जाते थे………
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अब तय हुआ की भाई सुबह तडके भिटोली लेकर बहिन के ससुराल जायेगा….. और शाम अँधेरा होने से पहले ही घर लौट आएगा……….. क्यूंकि रस्ते में घना जंगल है और जंगली जानवर हमला कर सकते हैं…………. भाई भी बहिन से मिलने और भिटोली देने की ख़ुशी में रात को सो गया…………….
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सुबह तडके उठ कर माँ ने पकवान बना दिए ……….. और कुछ भेंट रखकर एक पोटली बना दी……. और लड़के को विदा कर दिया………….. अपनी मस्ती में गाता झूमता लड़का चला जा रहा था……….. और दोपहर होते होते वो अपनी बहिन के घर पहुच गया…………..
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पहाड़ में महिलाओं का जीवन कठिन संघर्ष से भरा है……… सुबह उठ कर नहाना धोना…… गाय व अन्य जानवरों को चारा देना………. उनके गोठ (जहाँ जानवरों को बंधते हैं) को साफ़ करना……… जंगल से लकड़ी लाना…….. घास काटना…… घर की साफ़ सफाई …. चूल्हा चोका………. लगातार काम ही काम होता है……… आराम का कोई पता नहीं………
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ऐसे ही सुबह से काम करते करते थकी हुए……… वो लड़के की बहिन भी अपने भाई के इंतजार में दरवाज़े पर बैठे बैठे सो गयी…….. भाई जब उसके घर पर पंहुचा….. तो दरवाजे पर सोयी बहिन को देखा और आवाज़ लगायी …….. पर बहिन नहीं उठी………. फिर उसने सोचा की सुबह से थकी बहिन को कुछ देर सोने देता हूँ……….
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और वो भी दरवाजे पर बैठकर बहिन के उठने का इंतजार करने लगा……. सूरज अब उतार पर था…… लड़के को छह घंटे का सफ़र और करना था……. रास्ता जंगल से भरा था…… पर भाई बहिन को उठाने की हिम्मत नहीं कर सका…….. वो गहरी नींद में सो रही कठिन परिश्रम से थकी अपनी बहिन को पूरा आराम करने देना चाहता था……. क्योकि उसको पता था की उसकी बहिन को फिर अभी उतना ही काम और करना है………. क्योकि दिन आधा ही हुआ है……….
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अब उसको अपनी माँ व पिता जी की चिंता सताने लगी ………..वो इंतजार कर रहे होंगे…… और क्योकि रास्ता जंगल का है……. और आते हुए वो बहुत थक चूका था और सुबह का भूखा भी था…….. तो उसने बिना बहिन को उठाये वापस जाने का फैसला किया……….
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उसने भिटोली से भरी वो पोटली बहिन के पास राखी और चुपचाप चला गया…….. भिटोली का ये त्यौहार भाई व बहिन दोनों के लिए समान महत्व का विषय है……… तो जितना इसके प्रति भाइयों में प्रेम है उतना ही बहिनों में भी………..
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अब बहिन की सास जब घर लौटी तो उसने देखा की बहु दरवाजे पर सो रही है………… और उसके पैरों के पास भिटोली की पोटली है……….. तो उसने बहु को आवाज लगा कर उठाया……. और कहा उठ बहु देख तेरा भाई आ कर चला गया है…………
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लड़की ने जैसे ही वो पोटली देखी…….. वो दुःख के मारे रोने लगी की मेरा भाई उतने दूर से मुझसे मिलने के लिए और ये भिटोली देने के लिए आया और मैं सोयी रह गयी………. बहिन भाई के प्रति हमेशा भाई की तुलना में अधिक संवेदना रखती है…… और जब भाई भी इतना संवेदनशील हो तो ………… बहिन का दुःख समझा जा सकता है…………
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बहिन इस दुःख में की मेरा भाई…… यहाँ तक आया और उसने मुझे सोते देख कर न जाने कितनी आवाजें लगायी होंगी…….. पर मैं आभागी नहीं उठी……… और मेरा भाई उतनी दूर से आया और भूखा प्यासा ही वापस चला गया………… रोते रोते शाम होने तक वही पर मर गयी………….
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उस प्रायश्चित में मरी बहिन ने भी चिड़िया का रूप लिया और वो भी भिटोली के महीने में जंगलों में एक दर्द भरी आवाज़ में कहती है……..की…………. मेरे भाई आ कर चला गया और मैं अभागी सोयी रह गयी…………. वो इसको पहाड़ी भाषा में कहती है……….. और अगर आप मिलाने की कोशिश करेंगे तो एक एक अक्षर मिलता हुआ पाएंगे…………
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505 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

mohit chanyal के द्वारा
May 29, 2011

dhanyavaad peeyush ji.. aapka prayaas kaafi achha laga, aajkal ye lok kathayen sunne ko nahi milti. Maine bachpan main ma se suni the, purani yaad taaza ho gayi.

opveerendrasingh के द्वारा
September 24, 2010

पुरानी कहानियों , किस्सों में जो आत्मीयता होती है , उसकी कुछ गहराई भी हम पा लें तो बहुत अच्छा हो. पर इन कहानियों को संजो कर रखना और आज के जनमानस तक पहुँचाना भी एक जीवट का काम है. आप यह लगातार कर रहे हैं . बहुत – बहुत बधाई

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 24, 2010

    सही कहा आपने हम इनके द्वारा कुछ थोडा ही सही पा लें ये सोच कर ही हमें ये कहानियां सुनाई जाती हैं…………….. जब तक आपलोग इन कथाओं को पसंद करते रहेंगे………… मैं प्रस्तुत करता रहूँगा…………… आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…

rita singh 'sarjana' के द्वारा
September 24, 2010

पियूष जी , पुन : एक अच्छी कहानी पढने को मिली l भाई -बहन का स्नेह को मैं अच्छी तरह महसूस कर सकती हूँ l अच्छी पोस्ट बधाई

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 24, 2010

    सही कहा आपने इसको आप महसूस कर सकती हैं………….. और वैसे भी ये रिश्ता अब बहिनों की और ही ज्यादा रह गया है……… भाई तो प्रेम भूल ही गए,,,,,,,,,,,

rajkamal के द्वारा
September 23, 2010

लगता है की भाई कुंवारा ही होगा .. अगर शादीशुदा होता तो शायद बात ही कुछ दूसरी होती … फिर भी …भाई बहन के आत्मा की गहराई से निभाए गए प्यार को हम सबके सामने रखने का शुक्रिया …

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 24, 2010

    नहीं राज कमल भाई…………….. भावना होनी चाहिए…….. शादीशुदा भाई और कुवारें भाई का कोई मतलब नहीं होता………… बहुत भावुक रहा होगा वो भाई…………… आपकी अच्छी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……………..

daniel के द्वारा
September 23, 2010

भाई बहन के अदभुद प्रेम को दर्शाने वाली एक अनोखी कहानी है ! ………………………………………………………बहुत सुंदर पियूष जी !!

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 23, 2010

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया………….

Devendra Singh Bisht के द्वारा
September 23, 2010

पियूष जी कहानी अदुतिय है, भाई-बहन के दुःख और सुख का अनूठा सामंजस्य इस कहानी मे स्पस्ट झलकता है.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 23, 2010

    बिष्ट जी आप जैसे विद्वानों की प्रतिक्रिया से बहुत ब़ल मिलता है………. वो थोडा थोडा कह कर आप बहुत कह जाते हैं………. आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया………….

    Rusty के द्वारा
    July 12, 2016

    (Persze,látom,hogy a képen nem "UFO"-ég ) Ilyen edény (állítólag) 2700 db. van a városban ( évi 2 alkalommal a tisztítása ingyenes (bár az is milliókba kerül a BIOKOM-nak) Új adatom nincs ! (2007) – addig 55 db.(!) "UFO" égett le!- 400 ezer Ft/db.)- minden alkalommal feljelentést tettek, a tettesek többségét "elfogták" ( állítólag többségük &quoa;fittal")-és a kárt meg kellett téríteni. ( Úgy legyen!-mondom én…)(ma pedig – szerda/11.hét = Zöldjárat! :-)

Vipin Joshi के द्वारा
September 23, 2010

जी पियूष जी वाकई सर काया लिखा है आपने वेसे सर वो थोडा सा ठीक है सर

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 23, 2010

    सर आप भी वाकई अच्छी प्रतिक्रिया देते हैं……… आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया………….

HIMANSHU BHATT के द्वारा
September 23, 2010

चिड़िया पहाड़ी भाषा में क्या कहती है यह भी लिख देते तो मजा ही आ जाता. वैसे कहानी वाकई बहुत अच्छी है. बस वो थोडा सा सर अगर आप वो चिड़िया क्या कहती है बता देते तो वो थोडा सा मजा दोगुना हो जाता लेकिन फिर भी कहानी वाकई में अच्छी है .

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 23, 2010

    सर वो थोडा हाथ तंग है पहाड़ी भाषा में पर शीघ्र ही पता कर के लिखूंगा………. आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया………….

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 3, 2010

    सर वो चिड़िया कहती है की ………………… “भै भूका में सीती” “भै भूका में सीती”…………..

    Marden के द्वारा
    July 12, 2016

    this is the greatest commercial since the old Hamm Beer colrsmicame, absolutely love it, can’t wait to see it again and againtotally fascinated by the ingenuity and creative minds that produced it

Aakash Tiwaari के द्वारा
September 23, 2010

दिल भर आया पन्त जी ..आजकल भाई-बहन का ये प्यार कहा गया ,,शायद हम सब बहुत आगे निकल चुके हैं….. आकाश तिवारी…

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 23, 2010

    माफ़ी चाहूँगा तिवारी जी ….. पर मुझे लगता है की हम आगे नहीं निकले अपितु बहुत पिछड़ गए हैं…………

आर.एन. शाही के द्वारा
September 23, 2010

पियूष जी भिटोली ने भी मानवीय रिश्तों के नाज़ुक पहलुओं को छुआ … बधाई ।

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 23, 2010

    आदरणीय शाही जी……………आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया………….

Ramesh bajpai के द्वारा
September 23, 2010

पियूष जी रिश्तो की प्रगाढ़ चासनी से पगी लोक कथा को यहाँ पहुचाने का शुक्रिया सवेदना भरी ये कथाये कितनी सरलता और सहजता से मानवीय मूल्यों को अपने में समेटे, समाज को शिक्षा दे रही है

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 3, 2010

    आदरणीय बाजपाई जी……….आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…

navneet k srivastava के द्वारा
September 22, 2010

पीयूष जी..। दिलचस्प और सधी हुई कहानी..। अच्छा विषय और अच्छे प्रस्तुतिकरण के लिए बधाई..। 

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 3, 2010

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…


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