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रिक्शे वाले का धर्म........

Posted On: 27 Sep, 2010 Others में

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आज जब हर ओर राम मंदिर का जोर है……….. हर कोई राम के नाम की धुन में मगन है……. ऐसे माहौल में आज एक ऐसे इंसान से मिला जिसने कई सवाल खड़े कर दिए……… जिनका जवाब देना शायद मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है…………. कम से कम मेरे लिए तो है ही……..

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आज रविवार का दिन था…………… तो छुट्टी के दिन किसी काम से बाज़ार जाना हो गया……… बाज़ार से लौटते समय जब ऑटो नहीं मिला तो रिक्शा करके ही आ गया…… मैं रिक्शे में कई कारणों से नहीं बैठता हूँ…….. एक तो मुझे यूँ लगता है की हर कोई मुझे देख रहा है………. तो बड़ा संकोच सा होता है………. और दूसरा मेरा घर काफी चढाई पर है तो वहां जाते जाते रिक्शावाला थक जाता है…….. और सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण बात ये है की ऑटो सस्ता भी पड़ता है और समय भी बचाता है………….

rikshawala_Main

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पर आज कोई कारण काम नहीं आया और रिक्शे पर बैठना ही पड़ा…….. बरसात हो रही थी…. इसलिए सड़क पर लोग भी कम ही थे……… तो कम से कम संकोच की भावना तो नहीं थी…… और रिक्शा वाला भी मुझे ले जाने को तैयार था……. हालाँकि वो उतनी दूर की सवारियां नहीं ले जाता था……… और रिक्शा चल पड़ा……….अब जैसे ही रिक्शा चौराहे के पास से गुजरा तो स्वाभाववश वहां पड़ने वाले मंदिर पर मैंने सर झुका लिया…… और जय हो प्रभु का उच्चारण किया….. जो की मेरी आदत है……… तो रिक्शे वाला बोल पड़ा………. साहब राम मंदिर पर फैसला टल गया क्या….?……… मैं थोडा चौंका……. और मैंने उसको पूछा आपका भी ध्यान है इस मुद्दे पर……….. तो वो बोला हमारे लिए तो इ जीवन मरण का प्रसन है बाबु जी……

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मैं फिर चौका की यार मैं इस मुद्दे से दूर हूँ और एक रिक्शे वाला भगवान् श्री राम के नाम पर मरने को तैयार है…………. सकुचाते हुए मैंने पूछा………. तुम क्या चाहते हो ………. क्या हो फैसला……… तो वो बोला कुछो फैसला कर लो पर हमऊं और हमार परिवार को जीने दो…. एक और झटका लगा………. अपने ऊपर क्रोध आया की आधी बात सुनकर ही इस रिक्शे वाले को कैसे मैंने राम भक्त सोच लिया………… अब लगा शायद ये कोई मुसलमान हो….. इसलिए ऐसा कह रहा है……. मैंने कहा की नहीं ऐसा कुछ नहीं होगा इस बार…………

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प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद है ……. दंगा फसाद नहीं होने देंगे………….. पर दोनों पक्षों को शांति बनाये रखनी पड़ेगी……… वो हंस कर बोला तो क्या कर्फु और बंद नहीं होंगे……….

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मैंने कहा नहीं कर्फ्यू तो लग सकता है पर वो केवल एतिहात के लिए होगा………. और शायद बाज़ार भी कुछ दिन बंद रहे………. ये तो जरूरी है दंगा फसाद रोकने को………. क्योकि दोनों पक्षों के लोग कुछ करें या ना करें ………. पर कुछ असामाजिक लोग भड़काने की नियत से कुछ भी कर सकते हैं…………..

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वो बोला तो मौत तो तय है………… मैं फिर चौंका ……….. मैंने कहा अब कर्फ्यू में कौन किसी को मार सकता है……….. तो वो एक लम्बे से मौन के बाद बोला………….. भूख……….
साब क्या कर्फु में भूख छोड़ देगी……. जब बाज़ार बंद रहेगा तो ये रिक्शा मा कौन बैठेगा…… आपके पास तो पैसा है …….. आप लोग लड़ लेंगे कर्फु में भी भूख से पर हम तो मर जायेंगे………. गहरी सांस लेकर मैंने कहा ……. हां. ये तो है पर किया क्या जा सकता है….

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फिर उसने पूछा हम भगवान् के बच्चे हैं न…… मैंने कहा मैं कुछ समझा नहीं……….. तो वो बोला की हम सारे इंसान उस भगवान् के ही तो बच्चे है न……….. मैंने कहा हाँ ……… फिर वो बोला तो क्या कोई बाप अपने घर के लिए अपने बच्चों की लाश से बुनियाद डाल सकता है……… इ तो वही राम चंदर हैं न जो आपन बाबु जी के कहे पर घर छोड़ दिए थे…… मैंने कहा हाँ….. तो क्या ……… वो फिर बोला की तो का उ राम चंदर इहां ऐसन मंदिर में रहेंगे…

और जब उ जगह मस्जिद थी……….. तो जो उ समय खुद को नहीं बचा सकी उ की का जरोरत है दुबारा…… का फायदा बाबू इ बार बार का फसाद से……..

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मैंने समझाया नहीं………… ये तो एक निशानी है की यहाँ राम चन्द्र जी पैदा हुए थे तो इसलिए उनका मंदिर बना दिया जाये…………… जो की बाबर ने मस्जिद बनाकर कब्ज़ा रखा था…. एक छोटा सा बात और पूछें बाबू……… मैं चौंकाऊ प्रश्न की अगली किश्त के लिए तैयार था…….. वो बोला बाबू हनुमान ने रामायण में राम चंदर जी की भक्ति साबित करने को क्या किये थे……. तो मैं बोला की उन्होंने छाती चीर कर दिखा दी…….. और वहां रामचंद्र और सीता मैय्या की छवि दिखाई…….

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क्यों …… उ भी तो एठ्ठो बड़ा सा मंदिर बना कर दिखा सकते थे……मैंने कहा अरे मन से बड़ा कोई मंदिर है क्या……….. तो वो बोला तो अयोध्या में का बनवाओगे…….? अब मै झल्लाने की स्थिती में पहुँच चूका था ……. रिक्शा वाला मेरे सब्र की परीक्षा ले रहा था……. फिर भी मैंने सब्र से काम लिया…….. मैंने कहा की वो हमारा अधिकार है………. ये हमारे स्वाभिमान का प्रश्न है …… इसलिए हमको चाहिए……….

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रिक्शा वाला भी पूरी तैयारी से था……… और सुबह से मुझ सा कोई अल्प ज्ञानी शायद उसको मिला नहीं था इस लिए वो मुझ पर अपनी प्रतिभा साबित करना चाह रहा था….. वो बोला की साब इ देश मा न रोजगार मिल रहा है न रोटी कपडा और मकान जो की हमार अधिकार है तो फिर इ मंदिर का ही अधिकार काहे मांगे…….आपका स्वाभिमान गरीबन की जान से बड़ा है का…….

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मांगो तो हमार खातिर २ जून का रोटी भी मांग लो……… हमार बच्वाओं की खातिर कपडा लत्ता भी मांग लो……….. आप पैसे वाला लोग भगवान् का ले लो……… पर हमको इ आम चीज़े तो दई दो…. बाबु जिन मंदिर का खातिर तुम लोग लड़त हो उ का आगे ही हम गरीब लोग आपन धरम पूरा करे का खातिर हिन्दू मुसलमान मिल कर भीख मांगते हैं……… मैंने कहा ये कौन सा धर्म है…….. वो बोला बाप होने का धरम…………. पति होने का धरम………. बाबू…… उ मंदिर का आगे जिसका खातिर तुम सब लोग लड़त हो ……. सारे भिखारी आपन धरम भूल कर इ पेट का धरम पूरा करत हैं……..

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अब मैं कुछ कहने की हालत में नहीं था मैंने उतरना ही सही समझा ……….. मैंने उसको बीस का नोट दिया और कुछ सोचता हुआ आगे बढ़ गया…………. तभी वो वापस आया और बोला बाबू………… मैं फिर चौंका की जाने अब क्या कहने आ गया……….. वो बोला आपके दस ही रुपए होत हैं…………. इ लो रखो दस रुपए…………

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मैंने उससे पूछा की आपका नाम क्या है…………. उसने बोला धरम सीधा सीधा कर के पूछ लो…….. नाम भी तो उ का खातिर ही पूछत हो…… सोहन लाल है हमार नाम……….. पर बाबु एक भूख नाम पूछ का नहीं न मारे है……….. और वो कई प्रश्न छोड़ता हुआ चल दिया……….

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एक सवाल मेरे मन में उठता है की………. क्या कोर्ट के फैसले को बिना किसी फसाद के स्वीकार नहीं किया जा सकता…….. ताकि इस रिक्शे वाले जैसे कई लोग जो रोज कुवां खोदते हैं……… और रोज पानी पीते हैं….. वो अपना धरम निभा सकें……….. ये पहल किसी एक धर्म की और से नहीं हो सकती इसके लिए दोनों को आगे आना होगा……….. हिन्दू व मुस्लिम दोनों समुदायों ने इसे नाक का विषय बना लिया है………. पर क्या अपने अपने धर्म के गरीबों के लिए ही सही शांति व्यवस्था बनायीं नहीं जा सकती…………. मैं प्रार्थना करता हूँ की हमें अपनी प्रतिरक्षा हेतु लड़ना न पड़े…… और सबकुछ शांति से सुलझ जाये……… आज तक कोर्ट के निर्णय को मानने को तैयार दोनों पक्ष कोर्ट की बात पर ही राज़ी हो जाएँ…………

कोर्ट का फैसला कुछ भी हो बस हो जाये………… ताकि इसके समाधान की और कुछ प्रयास हों………… ये तय है की दूसरा पक्ष सुप्रीम कोर्ट में जायेगा ही …………… तो कम से कम इस फैसले को शांति से स्वीकार कर कोई ऐसा काम न किया जाये जिस से हमारे उन भाईओं को कोई परेशानी हो जो एक दुसरे पर भरोसा कर रह रहे थे………… अर्थात हिन्दू बाहुल क्षेत्रों में रह रहे मुस्लिमो को और मुस्लिम बाहुल क्षेत्रों में रह रहे हिन्दुओं को……. ऐसा मैं उस छोटे से लड़के की और से कह रहा हूँ जो अपने घर से दूर छोटी सी उम्र मैं हमारे यहाँ गाँव में नाइ का काम कर रहा है……… और एक अजीब से खौफ में है की जाने क्या हो ……………. कई बार पूछ चूका है की क्या होगा भैया …….. और क्या मैं अपने घर चला जाऊं…… और मैं उसको कह चूका हूँ……. की फैसला कुछ भी हो ………. मंदिर बने या न बने तेरा काम बंद नहीं होगा………. हम सब तेरे साथ हैं…….
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21 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rajkamal के द्वारा
September 27, 2010

पियूष जी ….. शांति और सिथरता ही विकास का आधार है …. विद्वान न्यायधीश भी देश के हालात को देख और समझ कर ही कुछ फेसला लेंगे … क्या फेसला लेंगे ? कब लेंगे ?…. यह तो वक्त ही बताएगा …. और एक आम आदमी आज के इस ग्लोबलाइजेशन के समय में सर जी हो गया है …. अहमियत तो उसकी भी है ही …चाहे किसी के लिए भी क्यों न हो ….

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 27, 2010

    सही कहा आपके राजकमल भाई…….. की शांति और सिथरता ही विकास का आधार है…….. जब तक आम आदमी नाम से सर जी है तबतक ही ठीक है राजकमल भाई……. जिस दिन वो दिल से सर जी वाली मानसिकता का हो गया फिर तकलीफ होगी…….. क्योकि आम तभी स्वादिष्ट है जब तक वो आम है……….. हार्दिक शुक्रिया…………….

Aakash Tiwaari के द्वारा
September 27, 2010

पन्त जी सबसे पहले तो आपको एक जोरदार लेख पर ढेर सारी बधाई…… पन्त जी आपके लेखानुसार अगर एक रिक्शे वाले की स्थिति का अंदाजा इन मन्दिर और मस्जिद वालों को हो जाए तो क्या बात है…. दुनिया में जितनी धार्मिक पुस्तकें हैं सभी में हिंसा का विरोध है….कमजोरों को मदद मिलनी चाहिए ….मगर हमारे देश में लोग भुखमरी को न देखते हुए,,,,मंदिर और मस्जिद की ही लड़ाई में व्यस्त है….मुझे तो ऐसे लोगो पे धिक्कार है जो भूखों को रोटी के लिए कभी नहीं लड़े मगर मंदिर मस्जिद के लिए सड़क पर निकल आये है…. आकाश तिवारी

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 27, 2010

    आकाश जी ………. आपकी सोच को सलाम …………………. और प्रतिक्रिया के लिए.. हार्दिक शुक्रिया ….

abodhbaalak के द्वारा
September 27, 2010

पियुश्जी अति सुन्दर रचना, हमें सोचने पर विवश करती है की क्या हम सच में मंदिर या मस्जिद ही चाहते हैं और क्या यही सबसे आवश्यक वास्तु है हमारे जीवन में? फिर से बधाई हो http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 27, 2010

    यही सोचना होगा………… आदमी आदमी के बीच की दिवार गिरानी होगी……… हरिदिक शुक्रिया…….

nishamittal के द्वारा
September 27, 2010

सही पीयूष जी,जब राम रहीम के बन्दों के घर चूल्हा नहीं जलेगा,बीमार के लिए दवाई नहीं आ सकेगी तो क्या राम या अल्लाह हमारे साथ होंगें.सच कोई आपदा हो पिसता बेचारा मजदूर ही है.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 27, 2010

    जी सही कहा आपने निशा जी……….. मुझे याद है जब उत्तर भारतियों को महाराष्ट्र में मारा जा रहा था तो सभी उत्तर भारतीय जो की संपन्न थे (सिवाय बच्चन साहब को छोड़ कर) को कुछ नहीं फर्क पड़ा पर गरीब टैक्सी चालकों को बुरी तरह से पीटा गया…

Raj के द्वारा
September 27, 2010

ये धर्म के ठेकेदार अपनी रोटियां सेंकने के लिए इस आग को बुझाने की बजाए उसमे घी दाल कर ऊपर से हवा भी दे रहे हैं.ऐसे में यह लेख शायद उन लोगों की गन्दी सोच पर कुछ अच्छा प्रभाव डाले मैं तो यही दुआ करूँगा. इतनी अच्छी लेख के लिए धन्यवाद. राज jawedraj86.jagranjunction.com

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 27, 2010

    प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया राज भाई ………

आर.एन. शाही के द्वारा
September 27, 2010

पियूष जी, काश धर्म के ठेकेदार भी इस रिक्शेवाले की तरह समझदार हो जाते, तो एक रिक्शेवाले या दिहाड़ी मज़दूर की व्यथा भी समझ पाते, और सारी समस्याओं का अंत भी हो जाता । लेकिन समझदार नहीं हैं, यह भी कैसे मान लिया जाय? सब कुछ सोचसमझ कर ही तो होता है । बधाई ।

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 27, 2010

    आदरणीय शाही जी…………..सही कहा आपने …………यहाँ सब कुछ सोचसमझ कर ही होता है……..

    Genevieve के द्वारा
    July 12, 2016

    ‘Someone correct me if I’m wrong, but even though the $360 trillion is built up from many of the same assets being insured and/or flipped over and over again, nonetheless each of those transactions may be constructed out of borrowed money, am I correct? And each of those borrowings is done at some interest rate, rieC8?&#t217;honsidgr yourself corrected. Insurance doesn’t have to be bought with borrowed money, and usually is not.

priyasingh के द्वारा
September 26, 2010

मै भी इसीलिए ही कह रही थी की इस फैसले को टालने में ही भलाई है क्योंकि फैसला जो भी होगा एक पक्ष तो आहत होगा ही और उसके बाद गरीब और माध्यम वर्ग ही सबसे ज्यादा प्रभावित होगा …….. इससे अच्छा कोई बीच का रास्ता निकाल ले या फिर यूँ ही फैसला टालते रहे …….. जानती हूँ फैसला टालने के बारे में कहना यूँ लगता है जैसे परिस्तिथियों का सामना करने के बजाय भाग लिया जाये ……. पर दंगे की भयावहता एक बार महसूस कर चुकी हूँ इसलिए नही चाहती की किसी ईंट पत्थरों की ईमारत के लिए चाहे वो मंदिर हो या मस्जिद इंसानियत को दांव पर लगाया जाये……………….. एक अच्छा लेख प्रस्तुत करने के लिए बधाई……………………..

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 27, 2010

    आपने दंगे की भयावहता महसूस की है तो आप अच्छी तरह से समझ सकती है….. की क्या क्या सहना पड़ता है……… आम जनता को………… और मेरी प्रार्थना है की दुबारा ऐसा न हो कभी भी……..किसी के भी साथ…………….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
September 26, 2010

प्रिय श्री पीयुष पंत जी, रिक्‍शा वाले के माध्‍यम से गरीब की स्थिति का बहूत सूंदर चित्रण किया है आपनें । गरीब तो दोनों तरफ से मरता हैं । हॉं से भी और ना से भी । आपनें यह भी एकदम ठीक लिखा है कि — कम से कम इस फैसले को शांति से स्वीकार कर कोई ऐसा काम न किया जाये जिस से हमारे उन भाईओं को कोई परेशानी हो जो एक दुसरे पर भरोसा कर रह रहे थे………… अर्थात हिन्दू बाहुल क्षेत्रों में रह रहे मुस्लिमो को और मुस्लिम बाहुल क्षेत्रों में रह रहे हिन्दुओं को –   काश कि सभी इसे समझ जाएं । अरविन्‍द पारीक

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 27, 2010

    सभी इसे समझ जाएं इसकी प्रार्थना कर सकते है…….. और करते है…… शुक्रिया……

pankaj mishra के द्वारा
September 26, 2010

Wonderful sir ji, bahut achha likha hai…

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 27, 2010

    शुक्रिया पंकज भाई………..

ravinder batra के द्वारा
September 26, 2010

dost! bahut shaandaar lekh likha hai! asal baat to yeh hai ki garib ki to har haal main mout hi mout hai! kaisa mandir kaisi masjit! Kya insaan ki jaan se jyada kimti hai ye patthar! lage raho! main tumhare saath hun! aur bahut se mare dost bhi. ravinderbatra2003@yahoo.com

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 27, 2010

    अपना समर्थन प्रदर्शित करने के लिए शुक्रिया…….दोस्त………


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