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क्योंकि अब हम बड़े हो चुके हैं........

Posted On: 4 Oct, 2010 Others में

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बचपन ………. कितना मधुर था जीवन तब……….
हमारी एक चीख पर सभी घरवालों की साँसे रुक जाती थी………. न जाने क्या हुआ………. क्यों चीखा वो……….. पर अब हम बड़े हो गए………. अब हम खुद को सँभालने में सक्षम हो गए…………… आज जरा देखें क्या क्या बदला अब और तब में………………

तब एक चीख पर सब घर वाले सामने खड़े हो जाते थे………. और तब माँ आकर कहती थी, की बेटा गिर गया लगी तो नहीं………. थोडा आराम से चला कर…….. तो खुद को एक भरोसा सा होता था……… की अब सब ठीक है…………. और प्रेम से गले लग जाते थे अपनी माँ के…………

और आज जब वो ही माँ कहती है की बेटा बाइक आराम से चलाना कही लग न जाये ……… तो हम कहते है.. की बस तुम टोक दो अब तो नहीं भी लगने वाली होगी तो लग ही जाएगी…….. और जब अपनी गलती से चोट लगा कर आते हो तो घर आ कर कहते हो की सब तुम्हारे टोकने के कारण हुआ है…….

तब वो माँ ही थी जो हमारे टूटे फूटे अल्फाज़ समझ जाती थी जिनको कोई और समझ नहीं सकता था…….. और हमको लगता था की हम सब कुछ समझने की स्थिति में हैं……..
और आज हम उस से ही ये कहते है की नहीं माँ तुम नहीं समझ पाओगी…….. तुम कुछ नहीं जानती……

तब वो माँ ही थी जिसका स्पर्श ही अहसास करा देता था की वो हमसे क्या चाहती है…………. उसका स्पर्श ही हम समझ जाते थे……
और आज हम कहते हैं…… की आपकी बातें मुझे समझ नहीं आती हैं…………

वो माँ जो हमारी ख़ुशी के लिए न जाने अपनी कितनी खुशियाँ दबा गई……
उसकी कोई बात आज अगर जबरन माननी पड़ जाये जो की हैं हमारे भले की ही तो हम कहते है………. बस हो गया ……अब हो गयी खुश………

याद रखें जब भी कुछ कड़वा कहें अपनी माँ से एक बार उसकी आँखों में जरूर देखें …….. एक दर्द उमड़ पड़ेगा उन आँखों में…………….. ये जीवन एक निश्चित यात्रा है….. जो कभी भी पूरी हो सकती है……….. हो सकता है आप आज जो व्यवहार आज अपनी माँ के साथ कर रहे हैं कल चाह कर भी उसकी माफ़ी भी न मांग सकें…………….

सख्त रास्तों में भी आसान सफ़र लगता है………..
ये मुझे माँ की दुवाओं का असर लगता है…………
एक मुद्दत से मेरी माँ रात भर नहीं सोई……….
मैंने एक रात कहा था माँ मुझे डर लगता है………

ये पंक्तियाँ किस इंसान ने लिखी मुझे नहीं पता…………………
पर इस लेख के लिए इस से सुन्दर पंक्तियाँ मुझे कहीं नहीं मिली…………….

*******************************************************************

शुभ कामनाओं के साथ………….
पियूष कुमार पन्त………………..

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34 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Kaden के द्वारा
July 12, 2016

I’ve just watched, and whilst I thought it was pretty good, I don’t like some of the casting and how some of the minorities were? portrayed. Soldiers, for example, were played by the ugliest and most cartoonish Thai extras they could find. It’s like Besson made this distinction so the audience knew who the bad guys were. Also, there are some ethnic soldiers with face tattoos who looked and behaved like animals; I think th;ta#8217&s almost racist.

Pooja के द्वारा
October 28, 2010

क्या कहे??? शायद शब्द गम गए… बहुत प्यारी सी सीख दे दी आपने… धन्यवाद…

    October 28, 2010

    माँ की महिमा के आगे शब्दों का कोई मोल है भी नहीं………….. प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……………..

roshni के द्वारा
October 5, 2010

पियूष जी, kuch lines मेरी taref se…….. पियूष जी मेरी तरफ से माँ के लिए दो शब्द इस ज़ुल्म की दुनिया मैं फ़क़त प्यार मेरी माँ , है मेरे लिए साया -इ -दीवार मेरी माँ , नफरत की जंजीरों से मोहब्बत की हदों तक , बस प्यार है प्यार है बस प्यार मेरी मान !

ashvini kumar के द्वारा
October 5, 2010

पियूष जी ऐसी भावनाएं उसी हृदय में उत्पन्न हो सकती हैं,जिसने (माँ ) को महसूस किया है ,उसकी भावनावें जिस हृदय को आज भी स्पन्दित करती हैं,आपका लेख उनके लिए एक प्रेरणा है जिनके हृदय भावनाशून्य हो गये हैं ,क्योंकि जीवन का प्रथम पृष्ठ (माँ)ही होती है ,और माँ के लिए हम उसके आखिरी पन्ने तक विस्तृत रहते हैं |

    October 28, 2010

    आपके भाव इस विषय की गहराई को बखूबी प्रकट करते हैं……………….. बहुत शुक्रिया ……… इस प्रतिक्रिया के लिए…………

rajkamal के द्वारा
October 4, 2010

एक और शिक्षाप्रद लेख … बधाई

    October 28, 2010

    राजकमल भाई ………. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……….

    Twiggy के द्वारा
    July 12, 2016

    Vaaaaai, si tuuuu?? Bai, a innebunit lumea cu jocurile astea de pe facebook :) ) Inclusiv eu. :D Din pacate harbul meu de calculator nu-mi permite sa ma joc Cafe World. Se incarca extrem de greu jocul si se blocheaza taman cand trebuie sa iau “de pe foc” o friptana. :( Si dupa cateva mancaruri arse si nervi in miez de noapte pentru ca mi se bloca brleswr-uo, am renuntat. Acum ma joc doar Farmville si Restaurant City. :D Spor la gatit acolo! :)  

NIKHIL PANDEY के द्वारा
October 4, 2010

प्रिय पियूष जी .. माँ के महत्व और समय के साथ होने वाले हमारे व्यवहार के परिवर्तन पर आपका ये लेख तो बेहतरीन है.. और बहुत से लोगो को शिक्षा देने वाला है… और अनुकर्णीय है… आपने जो लेने दी है वह मुनव्वर हसन की लिखी है

    October 28, 2010

    इस जानकारी के लिए और आपकी प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक शुक्रिया………..

R K KHURANA के द्वारा
September 10, 2010

प्रिय पियूष जी, इसीलिए लोग कहते हैं की – रब सब जगह नहीं रह सकता इसलिए उसने माँ बनाई ! खुराना

    Piyush Pant के द्वारा
    September 11, 2010

    परम आदरणीय खुराना जी……………… बिलकुल ठीक कहा आपने धरती पर भगवान् का साकार रूप है माँ………… अच्छी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……………

manishgumedil के द्वारा
September 10, 2010

सत्य वचन…….. मेरा दिल कहता है- माँ से बढकर इस दुनिया में कोई नहीं होता, माँ का स्थान तो पिता से भी ऊँचा होता है, इस आलेख के लिए धन्यवाद् ईद आपको भी मुबारक

    Piyush Pant के द्वारा
    September 10, 2010

    प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……….. मनीष जी…………….

sumityadav के द्वारा
September 10, 2010

बहुत ही बढ़िया लेख पीयूषजी। आज के बदलते दौर में भावनाएं भी बदल गई हैं। पहले मां की बातें दिल को सुकून और सुरक्षा का अहसास दिलाती थी पर आज वहीं बातें और सलाह बोझ और खिझाने वाली लगती हैं। यही है संस्कारों का पतन। जब भी कोई बड़े होने पर अपनी मां से ऐसा व्यवहार करता है तो उसे अपना बचपन याद करना चाहिए जब उसकी एक छींक या आवाज पर मां दौड़ी चली  आती थी। शायद यह सब यादकर उसे अपनी गलती का अहसास हो।

    Piyush Pant के द्वारा
    September 10, 2010

    सुमित जी आपने बिलकुल ठीक कहा…………. बचपन के दिन यादकर सबको अपनी गलती का अहसास हो सकता है…. जो वो अब कर रहे हैं………. प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……………….

आर.एन. शाही के द्वारा
September 10, 2010

माँ की ममता का कोई मोल हो ही नहीं सकता पियूष जी । इसीलिये तो एकमात्र ममता ही वो प्यार है, जिसे नैसर्गिकता का दर्ज़ा प्राप्त है । बहुत अच्छी रचना, बधाई ।

    Piyush Pant के द्वारा
    September 10, 2010

    आदरणीय शाही जी, मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ…………….. ममता चाहे माँ की हो अथवा पिता की अथवा भाई, बहिन या मित्र की, ममता का कोई मोल है ही नहीं………….. प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…………………….

nishamittal के द्वारा
September 10, 2010

क्या विडंबना है , जब तक कोई रिश्ता,अपने साकार रूप में हमारे साथ होता है,हमे उसकी कही बातें कोरे उपदेश दिखाई देते हैं.दूर जाने के बाद वो सब याद आता है.उसका महत्व समझ में आता है.काश समय रहते हम चेत जाते..

    Piyush Pant के द्वारा
    September 10, 2010

    निशा जी……… इसलिए ही तो इंसान की दुनिया में इतने दर्द है………… जो ख़ुशी उसके पास है…….. उसका कोई मोल नहीं ………. भाग रहा है अनजाने सुख के लिए………………. पता नहीं वो सुख है भी या……….. कोई मरीचिका है…………….. प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…………………….

Ramesh bajpai के द्वारा
September 10, 2010

पियूष जी माँ की ममता का तो कोई मुकाबला ही नहीं .माँ के मम्मत्व की और त्याग के सामने कोई दूसरा रिश्ता ही नहीं है . बधाई

    Piyush Pant के द्वारा
    September 10, 2010

    पर बाजपाई जी………. ये बातें आजकल लोगों के मन और किताबों तक ही रह गयी हैं…………. और वो माएं जिन पर कई बातें लोग कह देते है …….. वो घरों में उपेक्षित हो रही है………. आपके जैसे विचारों की जरूरत रोजमर्रा के जीवन में है……. शुक्रिया…………

SHIV के द्वारा
September 10, 2010

पियूष जी! सच मानिए आप ने रुला दिया मुझे | मैं अपने बचपन में खो गया| मुझे मेरी ही पंक्तियाँ स्मरण हो आई — “मन में हुयी थी दस्तक, कुछ बोध हो रहा था | आँखों में थी उदासी, मन उसका रो रहा था || पापा कहाँ हैं मेरे? मम्मी मेरी कहाँ है? ड्राइवर निकालो गाड़ी, जाना मुझे वहां है || * डूबा अतीत में वह, बचपन था याद आया | पोते- बहू को लेकर, बेटा था गाँव आया || मन में थी बेकरारी, बेचैनी भी बड़ी थी | पापा की अरथी पर ही, मम्मी मरी पड़ी थी ||” —– इंजिनियर : एक काव्य कथा (संपूर्ण भाग ) आपके लेख में हर किसी को अपनी माँ नज़र आएगी| ऐसे भाव प्रधान लेखन के लिए बधाई |

    Piyush Pant के द्वारा
    September 10, 2010

    शिव जी, आपकी काव्यात्मक प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…………………….

नवनीत श्रीवास्तव के द्वारा
September 9, 2010

सही कहा..। कोई मां अपने बच्चे को डरता हुआ देख कर नहीं सो सकती। परम आदरणीय मुरारी बापू द्वारा रामकथा में कहा गया एक कथानक अचानक याद आ गया। एक औरत रोज एक दुकान पर आती और अचानक रोज एक शीशी दूध उठा कर ल जाती..। एकदिन उस दुकानदार ने उस औरत का पीछा किया, तो वह कब्रिस्तान पहुंच गया, जहां एक कब्र के ऊपर उसका छोटा बेटा भूख से चिल्ला रह था…। दुकानदार समझ गया…। मां भले ही कहीं भी हो वह अपने बच्चों को रोता हुआ या डरता हुआ नहीं देख सकती….। भले ही वह या न हो…।     

    Piyush Pant के द्वारा
    September 10, 2010

    सही कहा आने नवनीत जी……………. ये माँ की फितरत ही कुछ ऐसे है……………..

chaatak के द्वारा
September 9, 2010

पीयूष जी, आपकी इस पोस्ट के लिए मेरी कविता की पंक्तियाँ – आज चाहत फिर मेरी माँ की जिद से टकराई, और मेरा प्यार बना मेरी माँ की रुसवाई, माँ ने फिर मांग ली मुझसे अहसासों की बलि, आँख में ‘कृष्ण’ के फिर से घटायें घिर आई | माँ जो खुश हुई तो पूछा- मांगता क्या है ? ‘माँ, मैं फिर से जनम लूँ , तेरा बेटा बनकर |’

    Piyush Pant के द्वारा
    September 10, 2010

    बहुत सुन्दर प्रतिक्रिया चातक जी……….. मेरे पुरे लेख पर आपकी और शिव जी की पंक्तियाँ भारी पड़ रही हैं……….. शुक्रिया………….

rita singh 'sarjana' के द्वारा
September 9, 2010

पियूष जी , माँ एक ऐसा शब्द हैं जहाँ दुनियां की हर ख़ुशी उनमे समाये होती हैं जो अपने बच्चों ख़ुशी के लिए हर परिस्थिति से लड़ने की ताकत रखती हैं l अच्छे लेख लिखने के लिए बधाई l

    Piyush Pant के द्वारा
    September 10, 2010

    जी सही कहा आपने……………. जब तक बच्चा माँ पर निर्भर होता है उसको दुनिया बड़ी सुन्दर लगती है…………. क्योकि तब तक दुनिया का सारा संघर्ष माँ अपने ऊपर ले लेती है……….. और जैसे ही वो माँ से दूर होता है……………. उसको जीवन नीरस और बोझिल लगने लगता है…….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………………….

razia mirza के द्वारा
September 9, 2010

आपकी इस पोस्ट के लिये आपको अपनी एक कविता सादर … कानों में गुनगुनातीं हैं वो माँ की लोरियाँ। बचपन में ले के जाती हैं वो माँ की लोरियाँ। लग जाये जो कभी किसी अनजान सी नज़र, नजरें उतार जाती हैं वो माँ की लोरियाँ। भटकें जो राह हमारा कभी अपनों के साथ से, आके हमें मिलाती हैं वो माँ की लोरियाँ। हो ग़मज़दा जो दिल कभी करता है याद जब, हमको बड़ा हँसाती हैं वो माँ की लोरियाँ। अफ़्सुर्दगी कभी हो या तनहाई हो कभी, अहसास कुछ दिलाती है वो माँ की लोरियाँ। पलकों पे हाथ फ़ेरके ख़्वाबों में ले गइ, मीठा-मधुर गाती हैं वो माँ की लोरियाँ। दुनिया के ग़म को पी के जो हम आज थक गये, अमृत हमें पिलाती हैं वो माँ की लोरियाँ। माँ ही हमारी राहगीर ज़िंदगी की है, जीना वही सिखाती है वो माँ की लोरियाँ। अय “राज़” माँ ही एक है दुनिया में ऐसा नाम, धड़कन में जो समाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

    Piyush Pant के द्वारा
    September 10, 2010

    बहुत सुन्दर कवितामय प्रतिक्रिया…………. आप सभी कवियों ने काव्यात्मक प्रतिक्रियाओं से इस लेख पे चार चाँद लगा दिए……. आपकी कविताएँ पढ़ कर ही ये लेख पूरा लगने लगा है………… हार्दिक शुक्रिया………….


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