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चिठ्ठी न कोई सन्देश...........

Posted On: 4 Oct, 2010 Others में

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डाकिया डाक लाया डाकिया डाक लाया………….
ख़ुशी का पयाम कहीं कहीं दर्द नाम लाया…………..
डाकिया डाक लाया …………….

डाकिये पर एक पूरा का पूरा गाना लिख दिया गया था एक ज़माने में………….  और उस डाकिये के साथ एक भावनात्मक सम्बन्ध बना लिए गए थे……….. पर आज डाकिये का भावनात्मक महत्व कुछ नहीं रह गया है……….

मुझे याद है …….. एक समय था जब हम छोटे छोटे थे और साईकिल की घंटी की आवाज़ आती तो हम दोनों भाई दौड़ कर गेट की और जाते की शायद कोई डाक आई है……………


जब वो डाकिया कहता की पन्त जी तुम्हारी कोई डाक नहीं है…………… तो उस समय वो दुश्मन सा लगता………… पर जब वो ही डाकिया दुसरे दिन चिट्ठी दे कर जाता तो अपना सबसे अजीज़ दोस्त लगने लगता………………

आज भी याद है पड़ोस का भुवन भी मेरी तरह ही घंटी की आवाज़ सुनते ही दौड़ कर बाहर आ जाता था……… जब मेरे घर कोई चिट्ठी आती तो मैं कहता………… देखा हमारी तो आ गयी …………. तुमको कोई लिखता तो है नहीं…………. फिर भी दौड़ कर आ तू रोज जाता है………….. और जब उसकी आती तो वो ये सब कहता………….

उन दिनों उन चिट्ठियों को पढने में एक बड़ा सुकून सा लगता था…………. किसी की खबर पुरे महीने का हाल उस कागज़ के टुकड़े में मिल जाता ……………… कभी ख़ुशी और कभी ग़मों से रुबरु करते थे वो ख़त………..

कभी राखी तो शादी के कार्ड या कभी किसी और त्यौहार पर खुशियाँ लुटा जाते थे वो ख़त…………… और नए साल पर तो जैसे होड़ लगी होती थी की देखें उनमे से कितने लोग ग्रीटिंग भेजते हैं जिनको हमने भेज दिए………… और कितने ऐसे है जिनको हमने नहीं भेजा पर उन्होंने भेज दिया…….

और चिट्ठी पढने से ज्यादा रोचक चिट्ठी लिखना होता था………….
जैसे स्कूल में प्रार्थना पत्र का प्रारूप याद कर लेते थे वैसे ही पत्र का भी……………..
सबसे ऊपर आदरणीय……..चाचा जी, चाची जी…… मामा जी मामी जी…………. या जो भी रिश्तेदार है……… उनको सादर चरण स्पर्श………….. हम यहाँ कुशल पूर्वक हैं और आपकी कुशलता की कामना करते है……..
और फिर अंत में …………. इन शब्दों के साथ बात को समाप्त करता हूँ……….. गलतियों के लिए क्षमा चाहता हूँ…………… आपकी कुशलता की जानकारी के इंतजार में…………
आपका ………… पियूष……..

एक पेज का पत्र लिखने में दो दिन लगते थे…………. शब्द ख़ोज ख़ोज कर जमाना पड़ता था………. पर हर शब्द में भावनाएं होती थी……. हर पत्र शब्दों की जगह भावनाओं को ले जाता था…………..

पर अब कहीं खो गए है वो कागज़ के टुकड़े जिनमे भावानाये छुपा करती थी…….. अब पत्र आते हैं ………… पर उनमे अधिकतर सरकारी पत्र जैसे प्रतियोगी परीक्षा के प्रवेश पत्र….. सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत मांगी सूचनाएं………..आदि……………

अब डाकिये के साथ बधा भावनात्मक सम्बन्ध समाप्त सा हो गया है…………… अब डाकिये केवल औपचारिकता बन गए हैं……… वो खुद भी दुखी हैं अपनी इस दुर्दशा पर……… जो मोबाईल फोन और इंटरनेट ने उनकी की है……………..



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31 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Pooja के द्वारा
October 28, 2010

यादों के गलियारे में पंहुचा दिया आपने… मेरे पिताजी सरकारी नौकरी में हैं, तो एक जगह से दूसरी जगह तबादले होना स्वाभाविक है, और हम सहेलियों को उन्ही चिठ्ठियों ने जोड़ रखा था… हम जब भी किसी जगह से नई जगह जाते और पुराणी सहेलियों के ख़त आते तो घर में सभी चिढ़ाते, “लो, आ गया मैडम की चिट्ठी” और मै बड़े चाव से उन्हें पढ़ती, फिर अपने यहाँ का हाल लिखती, यूंही हम सभी एक-दुसरे से जुड़े रहते… यहाँ तक की मैंने आज भी वो ख़त संभाल कर रखे हैं, और जब भी उन सहेलियों से मिलने का मन होता है तो उन्हें पढ़ लेती हूँ… न जाने क्यूं, चिट्ठियों में अजीबा-सा अपनापन होता है जो e-mails में तो कतई नहीं होता… आज आपका लेख पढने के बाद फिर वो संदूक खोलने का मन हो रहा है जहाँ मेरी सहेलियां और वो यादें रखीं हैं… धन्यवाद…

    October 29, 2010

    चिट्ठियों में अजीबा-सा अपनापन होता है क्योकि ये अहसास कराती हैं की इन्ही पन्नो पर अपने हाथों से आपके प्रियजनों ने आपकी कुशलता की कामना से भरी चिट्ठी लिखी होगी…….. ….प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद………

Ritambhara tiwari के द्वारा
October 5, 2010

पियूष जी! बचपन में मैं भी अपने नानाजी , मामाजी, को चिठ्ठिया लिखा करती thi पर किशोरावस्था तक आते आते मोबाईल युग ने उस सुखद अहसास को समाप्त ही कर दिया जो कभी छठे छमासे किताबों के बीच में दबी पुराने पत्र को पा के भी मिलता था! पर जैसा की आपका ब्लॉग शीर्षक भी है परिवर्तन की ओर हम नित नए कदम बढ़ा रहे हैं जो की हमारे ज्ञान विज्ञान की उन्नति का ही परिचायक है . एक बढ़िया लेख के लिए बधाई!

    October 29, 2010

    कमोबेश सभी का यही हाल था……. की रिश्तेदारों की चिट्ठियां बार बार पढ़कर उनसे दुरी भूलने का सुखद अहसास यद् करते थे……….प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद………………

Dharmesh Tiwari के द्वारा
October 5, 2010

पियूष जी………..अब डाकिये के साथ बधा भावनात्मक सम्बन्ध समाप्त सा हो गया है………..सच्चाई बयां करता एक लेख,बधाई

nishamittal के द्वारा
October 5, 2010

सच कहा पीयूष जी,पत्रवाहक कहूँ या पत्र की कितनी व्यगता से प्रतीक्षां रहती थी,परन्तु नेट युग ने व् मोबाइल ने उस आनंद से वंचित कर दिया.

    October 28, 2010

    वास्तव में इस आधुनिकता ने हमारी छोटी छोटी खुशियों को कही हमसे बहुत दूर कर दिया है…………

rita singh \'sarjana\' के द्वारा
October 5, 2010

पियूष जी , सुप्रभात l आपकी रचना आभी-अभी पढ़ी l बीते दिनों की याद ताज़ा हो उठी l सच एक पत्र में कितने भावनाये छुपे होते है जो की टेलीफोन द्वारा एहसास करना कठिन है l अच्छी पोस्ट बधाई l

Aakash Tiwaari के द्वारा
October 5, 2010

पन्त जी बिलकुल सच कहा आपने…….पत्र का अपना ही महत्व होता था………….शायद उसमे जो शब्द होते थे उन्हें बार-बार पढने का अपना ही महत्व,अपना ही मजा होता था………..मगर अब वो दिन कहा………… आकाश तिवारी

    October 27, 2010

    आकाश भाई …….. सही कहा आपने मेल में वो स्वाद नहीं जो कागज़ के उस टुकड़े में था ………. वास्तव में वो रस उन अक्षरों में अपने प्रियजनों को खोजने का था……… प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया .………….

ashvini kumar के द्वारा
October 4, 2010

पियूष जी जो रस पत्र पड़ने में मिलता था,वह आज के दौर एक सपना हो गया है ,पत्रों को पड़कर आपकी कल्पना को पंख लग जाया करते थे ,लिखने वाला चाहे जिस भाव से लिखे आप अपने भावों के अनुसार उन पत्रों को पढ़ा करते थे ,(कोइ लौटा दे मुझे वो बीते हुए दिन) ख्वाबों में ले जाने के लिए धन्यवाद

    October 27, 2010

    सही कहा आपने …….. दुसरे के भावों को अपने भावों से पढने का मजा ही कुछ और था………. प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया .………….

rajkamal के द्वारा
October 4, 2010

पियूष भाई … एक बहुत अच्छी प्रस्तुति … है कौन जिसको अब डाकिया याद नहीं है आता ……….

    October 27, 2010

    राजकमल भाई ……….. मुझे तो डाकिया बड़ा ही प्रिय है……… एक वही है पुरे क्षेत्र में जो मेरी क़द्र करता है……… अन्यथा बाकि लोग कहते हैं की उलटे सीधे कामो में ही लगा रहता है………. कभी इस विषय पर जागो कभी इस विषय पर जागो…………….. सोने देते नहीं और जगाने की बाते करते हैं………. प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया .………….

s.p.singh के द्वारा
October 4, 2010

पियूष जी बहुत खूब – बढ़िया पोस्ट के लिए पोस्ट-मैंन जैसा अच्छा विषय चुनने के लिए बधाई —–

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
September 17, 2010

प्रिय पीयूष जी, भाई आप ने मन के दबे तारों को झकझोंर दिया है। वो डाकिया चाचा या डाकिया मामा का संबोधन पाने वाले वाक्‍य और समय लौट कर नहीं आने वाला जिस का इंतजार लोग टकटकी लगाए बैठे रहते थे। चिटठी, मनीयाडर, रिजल्‍ट व राखी व परदेस से अपनों की कुशल श्रेम सभी तो इन डाकियों पर निर्भर थी पर आज यह आधुनिक जरियों (एस;एम;एस, ई;मेल, मोबाईल एवं फोन) ने यह चिटठी का रिश्‍ता ही खत्‍म कर दिया है। अब तो यह मात्र इतिहास की बात भर रह गया है। बहुत अच्‍छी रचना है इस के लिए तहे दिल से धन्‍यवाद। दीपक जोशी

    Piyush Pant के द्वारा
    September 17, 2010

    सर आपकी प्रतिक्रिया ने उत्साह का संचार किया है……. इस के लिए शुक्रिया…………..

manishgumedil के द्वारा
September 16, 2010

पियूष जी ……. आपने तो पुराने दिन के लौटा दिए…. मुझे जगजीत सिंह की दो पंक्तिया याद आ गयी “वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी”……… हालाँकि यहाँ पर यह पंक्तियाँ सटीक नहीं है पर बात तो बचपन की है ना…… मुझे भी याद है ज़ब में एक चिठ्ठी लिखने के लिए दो से तीन दिन लगाया करता था …… शब्दों को खोजा करता था……. और माँ की प्यारी सी डांट खाने को मिलती थी ……. नानी जी को चिठ्ठी कब डालेगा……. दो दिन हो गए हैं……… पर आज ……….

    Piyush Pant के द्वारा
    September 16, 2010

    मनीष जी……… ये पत्र लेखन की ये कथा कहानी घर घर की ही थी…………. प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…………

Neha के द्वारा
September 15, 2010

पियूष जी मुझे भी याद है की कभी हम लोग भी पोस्टमेन का वेट करते the. आप की तरह.

    Piyush Pant के द्वारा
    September 15, 2010

    ये आपकी और मेरी ही नहीं मुझे लगता है ये हालत सब की हुआ करती थी…………..

Piyush Pant के द्वारा
September 15, 2010

आदरणीय शाही जी आपने इसको पढ़ा और सराहा ये बड़ी खुशी का विषय है मेरे लिए………… आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……

    Clarinda के द्वारा
    July 12, 2016

    EVERYTHING is on repeat for me right now! Mostly a mint blouse from Zara and coral skinnies from Express. Th1r8#&2e7;ye even awesome together, which is a super bonus. Love those mint jeans. Bit

आर.एन. शाही के द्वारा
September 15, 2010

डाकिये से सम्बंधित आपका संस्मरण बहुत भावुक है पियूष जी, बधाई । आपकी यह रचना किसी वजह से मुझसे छूट गई थी ।

R K KHURANA के द्वारा
September 14, 2010

प्रिय पियूष जी, आपने पुराने दिनों की याद दिला दी ! आज वो भावना ही ख़त्म हो गयी है ! आज तो मोबाईल औ इ-मेल ने वो प्यार समाप्त कर दिया है ! याद है जब अपने मित्रों या हम उम्र चचेरे ममेरे भाई बहन को पात्र लिखते थे तो चुन चुन कर शे’र लिखते थे और उनके पढ़ कर भाग विभोर हो जाते थे ! अब वो बात कहाँ ! खुराना

    Piyush Pant के द्वारा
    September 15, 2010

    सही कहा आपने आदरणीय खुराना जी………… एक एक शब्द का चयन करने में घंटो लग जाते थे………… हर शब्द को लिखने से पहले ये सोचना पड़ता था की कही दुसरे को बुरा न लगे……….. पर मोबाइल पर जो मुह में आया बोल गए……………………

chaatak के द्वारा
September 14, 2010

पीयूष जी, ख़त तो अनमोल होते थे कितनी भावनाएं जुडी होती थीं उनमे| मैंने अभी तक कुछ यादगार पत्र संभाल कर रखे हैं फुर्सत में जब उन्हें पढता हूँ तो एक बार फिर से वो यादें ताज़ा हो जाती हैं कुछ कुशियों की तो कुछ ग़मों की| अच्छे लेखन पर बधाई!

    Piyush Pant के द्वारा
    September 15, 2010

    चातक जी…………. कभी कभी ये सोचता हूँ……… की भविष्य में कोई कैसे तेरी खुशबू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे …………….. या चिठी आई है आई है ……………. जैसे गीत कैसे लिख पायेगा…………. जो लोग आज कल एक का SMS दुसरे को भेज रहे हैं वो इन भावनाओं को कैसे समझ सकेंगे………….. आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……


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