परिवर्तन की ओर.......

बदलें खुद को....... और समाज को.......

117 Posts

24194 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 1372 postid : 635

नाम जो पहचान बन गए........

Posted On: 9 Nov, 2010 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

अक्सर कुछ लोग ऐसे अदभुद होते हैं……… जो अपनी प्रतिभा के बूते अपने को किसी विषय का पर्याय बना लेते हैं……. जैसे सचिन तेंदुलकर क्रिकेट के पर्याय से लगने लगे हैं……….. अमिताभ अभिनय जगत के पर्याय……. लता मंगेशकर संगीत जगत की……… बाबा रामदेव योग के…….. और न जाने कौन कौन किस-किस के पर्याय बन गए……………
.
पर फिलहाल मैं व्यक्ति नहीं अपितु उत्पादों के सम्बन्ध में कहना चाहता हूँ………… आज बाले लम्बे समय के बाद एक शब्द सामने आया तो मानो बीते दिनों की याद ताजा हो गयी…….. और वो नाम था डालडा……. ये शब्द सुनते ही सबसे पहले जो चीज़ याद आई वो थी एक पहेली………….जो आस्कर बचपन में हम लोग एक दुसरे से पूछते थे…….. और वो थी……….. की ………..तीन अक्षर का मेरा नाम उल्टा सीधा एक समान…………….
.
तब हमारे पड़ोस में एक लड़का था जिस से आप कितनी बार भी ये पहेली पूछो वो उत्तर डालडा ही कहता………. हर बार उसको समझाया जाता की नहीं ……… इस का उत्तर है…. जहाज ……..वो कहता की ठीक है ……… पर दुबारा पूछने पर वो फिर कहता की डालडा………..और हम उसको कहते की तेरे बुद्धि पर डालडा ही जम गया है……….
.
ये डालडा शब्द उन दिनों वनस्पति घी का पर्याय सा बन गया था…….. लोग खुला वनस्पति घी लेने जाते तो भी कहते की एक किलो डालडा दे देना…….जैसे वनस्पति घी ने नया नाम पा लिया हो…….. फिर लम्बे समय बाद कई नए ब्रांड बाजार में आये और तब भी लोगों का रुख नहीं बदला वो तब भी कहते की एक किलो डालडा वो रथ वाला…….
.
ये तो थी डालडा की कहानी………. कुछ ऐसा ही हाल कई और उत्पादों का है…….. दन्त मंजन कई सालों तक कोलगेट ही था……. लोग कहते की एक कोलगेट दे दो…… और दूकानदार कोई अन्य टूथपेस्ट पकड़ा देता और वो चले आते…….. आप कहें की ये तो बबूल है कोलगेट नहीं………. तो वो कहते की क्या कहते हो ……… ये दांत साफ़ करने का कोलगेट ही है……. इस बार नाम अलग है………….
.
एक अन्य उत्पाद जिसमे ये सारा घटनाक्रम मैंने नजदीकी से देखा है……….. वो है L.I.C. पिछले साल जब मैं LIC में कैशियर / सहायक के पद पर था……… तो कई लोग मेरे पास आते और पूछते की पन्त जी…….. एक L.I.C.करवाई है.. जरा बता दें की ठीक है की नहीं……… और वो मुझे Bond दिखाते किसी अन्य कम्पनी का……फिर में जब उनको कहता की ये L.I.C. नहीं है…… ये तो किसी और कंपनी का Bond है… इसके बारे में मैं कुछ नहीं बता सकता……… तो वो कहते की हाँ इस बार L.I.C. किसी दूसरी कंपनी से करा ली है……….. उनके लिए इंश्योरेंस का पर्याय L.I.C. बन चुका था………….
.
ऐसे ही न जाने कितने ब्रांड है जो उत्पाद के नाम के रूप में लिए जाने लगे हैं……….कुछ ये हैं और बाकि कुछ आप सोचें…….



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (8 votes, average: 4.50 out of 5)
Loading ... Loading ...

678 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

verntroup994864 के द्वारा
August 20, 2016

I know this site provides quality dependent content and other stuff, is there any other web site which presents such stuff in quality?

Rashid के द्वारा
November 22, 2010

सुन्दर लेख…. राशिद http://rashid.jagranjunction.com

div81 के द्वारा
November 12, 2010

बढ़िया लेख पियूष जी बचपन में कई बार मैंने भी किसी विशेष डिटर्जन का नाम न ले कर सर्फ़ ही माँगा था ये बात बहुत बात में पता चली थी की सर्फ़ खुद डिटर्जन का एक प्रोडक्ट है सुन्‍दर रचना के लिए बधाई।

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 12, 2010

    वास्तव में हम सभी ने किसी न किसी तौर पर ये सब देखा या किया है……………. आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया………

Amita Srivastava के द्वारा
November 11, 2010

पीयूष जी बहुत-2 बधाई

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 11, 2010

    हार्दिक शुक्रिया……………….

    Lorene के द्वारा
    July 12, 2016

    说道:I simply want to mention I’m very new to blogging and actually savored this web page. Probably I’m going to bookmark your blog . You surely come with exoeitpcnal well written articles. Cheers for sharing your web-site.

ashvinikumar के द्वारा
November 11, 2010

पियूष भाई बहुत से ऐसे नाम होते हैं जो दिल में बस जाते हैं ,,अब आप अपने को ही देख लो आपको देख कर पहाड़ों की याद आ जाती है,,बुरा मत माना यार ,,( वैसे आपके मंच टिप्पणी की जगह प्रचारों की बौछार क्यों हो रही है ) [ पढने के लिए क्लिक करे ,,यीशु भयभीत,, संसार भयभीत,,, प्रभु यीशु भयभीत ] **ये क्या है भाई आप अपने मंच को प्रचार मंच क्यों बना रहे हैं …..आपको प्यार, आभार, नमस्कार, स्वीकार करें *

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 11, 2010

    अश्विनी भाई………. ये आपका वहम है की हमने अपने मंच को प्रचार मंच बना रखा है…….. जहाn तक आपका इस प्रचार की और इशारा है [ पढने के लिए क्लिक करे ,,यीशु भयभीत,, संसार भयभीत,,, प्रभु यीशु भयभीत]…………….. तो मैं स्पष्ट कर दूँ की कुछ सेल्स मेन डोर तो डोर मार्केटिंग करते हैं………….. तो उनको मन तभी किया जाये जब आप घर पर हों …………. अब बिना पूछे कोई कुछ डाल जाये तो क्या करें……… पर ये सेल्स मेन क्या आपके दरवाजे नहीं आये…………………… आपकी स्नेह भरी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……………….

    Polly के द्वारा
    July 12, 2016

    Par &liaÃo; ru©qlasme » il faut entendre une approche plus proche du réel que le romanesque hollywoodien. Après, Verhoeven ne s’est jamais caché des approximations purement historiques, il voulait illustrer un moyen-âge réaliste pour trancher avec l’imagerie populaire mais pas documentaire.

S.P.SINGH के द्वारा
November 10, 2010

प्रिय पियूष जी बहुत सुन्दर रचना, बधाई

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 11, 2010

    सिंह साहब…………प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद…………..

    Barbi के द्वारा
    July 12, 2016

    Hű, ez nagyon gusztán néz ki. Igazi férfias étel, mert én nem igazán barátkoztam még meg a csülökkel. Pedig, ahogy te is írtad, a hátsó fajtája egészen húsos.Idén Szerényebb szilveszter lesz nálunk ételek teen©tktÃiben, de talomba elteszem.:)

deepak joshi के द्वारा
November 10, 2010

प्रिय पीयूष जी, भई कहते है कवि/लेखक की कल्‍पना काल एवं युग से बहुत दुर तक देख सकती है। आप की उमर के हिसाब से डालडा के बाद रथ का प्रचलन अधिक हो गया था किन्‍तु नाम केवल डालडा का ही लिया जाता था जिस पर उस एक पेड़ का चित्र छपा होता था। भई पुरानी यादे ताजा करने के लिए धन्‍यवाद। और आप को बताऊ की लिप्‍टन की चाय (लोगो ने मजाक में एक जुमला बनाया हुआ था जो उस जमाने में बहुत फेमस था – चाह चमारी चुरड़ी कहे लिप्‍टन की चाह) भी उस जमाने मे बहुत प्रसिद्द थी। बहुत ही संक्षिप्‍त एवं सुन्‍दर रचना के लिए बधाई। -दीपकजोशी63

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 11, 2010

    आदरणीय दीपक जी………..ऐसा नहीं है जैसा आप सोच रहे हैं…………. हम आज के नहीं है…….. हमारे ज़माने में भी सिर्फ डालडा ही चलता था………… फिर कोई तीन चार साल बाद रथ का डिब्बा दिखने लगा………….. ये बुद्धि मोटी नहीं है…… बस डालडा की परत है जो मोटा बना देती है……….. फिर भी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद…………..

abodhbaalak के द्वारा
November 10, 2010

पियूष जी आपने सत्य ही लिखा है की कुछ नाम अपने आप में ब्रांड बन जाते हैं, डालडा और LIC इसका ज्वलंत उदहारण है, आपकी लेखनी के जादू का असर है जी सीधा साधा लेख भी …… और आप अब खुद भी अच्छी लेखनी का एक प्रयाय्वाची बन चुके हैं या ये कह ले की आप स्वयं भी एक ब्रांड बन चुके हैं http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 11, 2010

    बहुत बढ़िया प्रतिक्रिया ……….. मेरा बस चले तो इसे प्रतिक्रिया ऑफ़ द इयर का पुरस्कार दे दूँ… ——————- और आप अब खुद भी अच्छी लेखनी का एक प्रयाय्वाची बन चुके हैं या ये कह ले की आप स्वयं भी एक ब्रांड बन चुके हैं …. ———————– सुबह पोस्ट किया जब शाम को पढ़ते है तो खुद नहीं समझ पाते की ये क्या लिख डाला और आप इतने बड़े शब्दों से प्रहार कर रहे है………… कही आप किसी गलत पते पर तो नहीं आ गए….. या कहीं सही में राजकमल भाई ने आपको शिक्षा देनी शुरू तो नहीं कर दी की कैसे दुसरे को भीगा भीगा के मारते हैं………………. की सामने वाले अपनी बुरे भी हस हस के पढ़ें…………………. फिर भी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद…………..

    abodhbaalak के द्वारा
    November 13, 2010

    पियूष जी, ऐसा नहीं है, ह्रदय से कह रहा हूँ, की आप बहुत ही अच्छे लेखक हैं, मेरा ऐसा कहना अगर आपको कुछ और लगता हो तो क्षमा चाहता हूँ, आप मेरे लेखों का स्तर तो देख ही चुके हैं, बस लिख डालता हों लेकिन अपनी क्षमता और सीमा जनता हूँ, रही बात राज जी की तो उन्होंने टयूशन देना अभी शुरू ही नहीं किया, आग्रह तो उनसे कर रहा हूँ, अगर आप थोडा समय निकल …….. आपका अबोध http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 13, 2010

    मैं तो खुद आपसे टयूशन लेने का इच्छुक हूँ……… पर समय नहीं मिल पाता…………….. आप जैसे मित्रों का ही प्रेम है की सुबह 8 से शाम 8 तक बाहर रह कर भी इस मंच से जुड़ा हूँ……. और इसको समय देता हूँ……….. पर आप खुद की प्रतिभा को हमसे तुलना करके केवल हमारा सम्मान बाधा रहे हैं………….. अन्यथा आप स्वयं जानते हैं की आप क्या हैं………………….

daniel के द्वारा
November 10, 2010

प्रतिबंधों के साथ जागरण मंच पर प्रकाशित पोस्ट प्रभु यीशु के नाम से संसार भयभीत क्यों हो जाता है पढने के लिए क्लिक करे~ http://daniel.jagranjunction.com/2010/11/08/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AD%E0%A5%81-%E0%A4%AF%E0%A5%80%E0%A4%B6%E0%A5%81-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AE-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0/

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 11, 2010

    पहले ये लेख लिखने की गलती और फिर दो दो बार ये लिंक देने की गलती …………… क्यूँ…….?

soni के द्वारा
November 10, 2010

बहुत सुंदर ……………………

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 11, 2010

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………

daniel के द्वारा
November 10, 2010

प्रतिबंधों के साथ जागरण मंच पर प्रकाशित पोस्ट प्रभु यीशु के नाम से संसार भयभीत क्यों हो जाता है ? पढने के लिए क्लिक करे http://daniel.jagranjunction.com/2010/11/08/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AD%E0%A5%81-%E0%A4%AF%E0%A5%80%E0%A4%B6%E0%A5%81-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AE-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0/ अथवा http://jesusbanned.blogspot.com/

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 11, 2010

    माननीय डेनियल जी…….. आपका लेख पढ़ा और बहुत दुःख हुआ……… आपसे ऐसे आशा नहीं थी……. बाकि विस्तृत प्रतिक्रिया आपके ब्लॉग में ही दूंगा…….

    Marel के द्वारा
    July 12, 2016

    NUNZIO…….m ti &#s820;8frocoleoࢭ un altro po…… quindi questa punta di cui parli è forte? fa al caso del napoli?? ho letto il post in cui hai risp ma vorrei qualche rassicurazione in piu

Arvind Pareek के द्वारा
November 10, 2010

प्रिय श्री पियूष जी, नाम ही पहचान है गर याद रहे और ब्रांड नेम के लिए तो ना जाने अदालतों में कितनें मुकदमें चल रहे हैं। फिर भी बात तो आपकी सही हैं पुराना जमाना याद दिलानें का शुक्रिया । जले पर लगानें की क्रीम आज भी बरनोल ही है और ग्‍लुकोज बिस्‍ि‍कट पारले जी । अरविन्‍द पारीक

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 11, 2010

    आदरणीय पारीक जी ……. बरनोल को तो मैं भूल ही गया था…….सही याद दिलाया आपने………. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………

Raj के द्वारा
November 10, 2010

पियूष जी, नया लेख, नया विषय और नया अंदाज़……………………………………….. ……………… ……………… बढ़िया है……………… राज

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 11, 2010

    राज जी….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………….

ajaykumarjha1973 के द्वारा
November 10, 2010

हाहाहा ..रोचक पोस्ट लगी पीयूष जी । L I C वाली बात ने तो मुस्कुराहट ला दी ..बहुत खूब ..

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 11, 2010

    झा जी……. आपकी प्रथम प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………….

kmmishra के द्वारा
November 9, 2010

पुराने दिनों की याद दिला दी अपने. आभार.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 11, 2010

    प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…………. मिश्रा जी ………

    Agatha के द्वारा
    July 12, 2016

    Disegnare interfacce per Apple è uno dei miei Tre Sogni Proibiti.Gli altri due non hanno niente a che vedere con l&rca;info#mati39.

R K KHURANA के द्वारा
November 9, 2010

प्रिय पियूष जी, ठीक कहा है आपने ! डालडा सभी बनस्पति घी का सर्फ़ सभी डिटर्जेंट पाउडर का पर्याय बन चूका है ! सुंदर लेख खुराना

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 11, 2010

    आदरणीय खुराना जी……… आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………….

priyasingh के द्वारा
November 9, 2010

लक्स, निरमा, रेमंड, लिज्ज़त पापड़ आदि ऐसे कई नाम है जो इतने सालो के बाद भी अपने विज्ञापन के कारण आज भी हमारे जेहन में है…….. नहाने का सबुन माने लक्स, कपड़ा धोने का पाउडर निरमा ही होगा और दामाद जी को सूट का कपड़ा देना है तो वो रेमंड ही हो , और खाए जाओ खाए जाओ यूनाइटेड के गुण गए जाओ ……. सच में आपका लेख पढ़ कर तो न जाने कितने पुराने नाम याद आ गए………….

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 11, 2010

    कुछ और उत्पादों की याद दिलाने और इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………….

Alka Gupta के द्वारा
November 9, 2010

पियूष जी ,बीते दिनों की यादों को ताज़ा करना विभिन्न उत्पादों के  विज्ञापन की दुनिया का ही कमाल है

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 11, 2010

    प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………….

rajkamal के द्वारा
November 9, 2010

प्रिय पियूष भाई नमस्कार ! इस बार तो आप दूर को कौड़ी ले कर आये है , टोपाज़ ब्लेड से पुराने दिनों को कांट छांट के … अच्छी प्रस्तुति …. अब विज्ञापन से ज्यादा प्यारी तो विज्ञापन वालिया होती है ….

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 11, 2010

    सही कहा अब विज्ञापन बनाने वाले भी इसी बातको ध्यान रखते है की …… उत्पाद पर किसी की नज़र न पड़े विज्ञापन वाली के प्रभाव से ही चीज़ बिक जाये……….. प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………….

Aakash Tiwaari के द्वारा
November 9, 2010

श्री पियूष जी, वाकई में आपने तो पुराने दिनों की याद दिला दी..पहले के तो विज्ञापन भी कितने प्यारे हुआ करते थे..काश …….. आकाश तिवारी

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 11, 2010

    सही कहा आकाश जी………. मान गए आपको और आपकी परखी नज़र दोनों को………… यूँ ही प्रसिद्द नहीं हुआ था……….. प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………….


topic of the week



latest from jagran