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श्राद्ध की बिल्ली....

Posted On: 17 Nov, 2010 Others में

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ये एक छोटी सी कहानी है………… जो बताती है की कई बार हमारी परम्पराएँ ऐसी होती हैं की जिनको हम यूँ ही ढोते हैं…… जबकि उनकी उत्पत्ति अज्ञानता वश होती है……….और ये कैसे होती है शायद इस कहानी से स्पष्ट हो जाये……………….

किसी एक गाँव में एक सास और उसकी बहु रहते थे……… दोनों में सास बहु जैसा न होकर माँ बेटी जैसा स्नेह था……. सास ने एक बिल्ली पाली हुई थी……. जब भी सास चूल्हे में कुछ पकाने बैठती तो बिल्ली भी चूल्हे के पास आकर बैठ जाती……..

यहाँ पहाड़ों में ठण्ड के मौसम में पानी के जम जाने से पानी के पाइप तक फट जाते है………. तो फिर बिल्ली ऐसे सर्द मौसम में और क्या करती ……….. तो इस ठण्ड से बचने के लिए वो वहीँ बूढी सास के साथ आग के नजदीक बैठ कर अपने शरीर को गर्म कर लेती………… अब बिल्ली की तो आदत ही होती है की अभी नज़र हटी तो कभी किसी बर्तन में मुह डाल दे तो कभी किसी और में…….

जब से बहु घर में आई तो उसने देखा की हर साल रोज बिल्ली सास के साथ बैठी रहती है…… पर जब भी उसके ससुर का श्राद्ध होता है तो सास सुबह से बिल्ली को एक टोकरी के नीचे छिपा कर रख देती………. जब तक श्राद्ध पूरा न हो जाये……… और ब्राह्मन महाराज खाना खा कर चले न जाएँ…….. बिल्ली उस टोकरी के नीचे ही रहती ……….. उसको वहीँ खाना पीना मिल जाता……..

इस के पीछे मूल कारण ये था की……. श्राद्ध के दिन ब्राहमण को भोजन करना और भगवन का प्रसाद बनाना होता था….. और बिल्ली घर में हो तो ये खतरा रहता था की कहीं वो प्रसाद को जूठा न कर दे….. इस लिए सास बिल्ली को पहले ही एतिहत के तौर पर ढक देती थी………

अब धीरे धीरे सास बूढी होने लगी…..और बहु बड़ी होने लगी………. अब वो सास के साथ श्राद्ध में खाना बनाने में सहायता करने लगी………. अब वो बहु सुबह सुबह टोकरी लाती और बिल्ली को उसके नीचे छुपा देती……….. कुछ सालों बाद सास परलोक सिधार गयी……. और संयोग से उसी साल कुछ ही समय बाद वो बिल्ली भी मर गयी………

अब एक साल बाद जब सास का श्राद्ध आया तो बहु सुबह सुबह पड़ोस के घर गयी और बोली आज दिन भर के लिए अपनी बिल्ली मुझे दे दो………….. पड़ोसन ने पूछा… आज सुबह सुबह बिल्ली जो क्यों चाहिए……..

बहु बोली क्या करूँ काकी (चाची) कल शाम याद ही नहीं रही ले जाने की……. आज ईजा (माँ) का श्राद्ध है…….हर साल बौज्यू (पिताजी) के श्राद्ध में ईजा बिल्ली को टोकरी के नीचे ढक कर रखती थी….तब सामग्री बनती थीं……… अब बिल्ली तो बौज्यू के श्राद्ध के बाद मर गयी……. अब तो केवल टोकरी ही है……… तो मैं नहीं चाहती की ईजा के मरने के बाद ये परंपरा यूँ ही ख़त्म हो जाये………….
———————————————————————————————

ऐसा ही कई सम्प्रदायों में होता है……… वो जानते नहीं की वो जो कर रहे है वैसा क्यों कर रहे हैं……… उनके धर्म प्रवर्तकों ने वैसा किया तो उन्होंने उसको नियम ही मान लिया …….. बिना ये सोचे की आखिर इसका कारण क्या था ………… जिन परम्पराओं को समय के साथ ही समाप्त हो जाना था……….. वो ही इन सम्प्रदायों का अनिवार्य अंग हो गयी…………

बुद्ध ने जीवन पर्यंत मूर्ति पूजा का विरोध किया….. और बोद्धों ने बुद्ध को बुत बना दिया………… बुद्ध की अनगिनत प्रतिमाओं के कारण ही बुद्ध का अपभ्रंस बुत आया………….. इसी तरह अन्य कई संप्रदाय बस खोखली बातों को पकडे हैं और सारहीन बातों से कोसों दूर हैं…………….

एक सज्जन ने एक बार बताया था की जैन संप्रदाय में ये प्रथा है की सूरज ढलने के बाद भोजन नहीं लेते हैं…………. पर क्यों नहीं लेते इसका कारण कोई नहीं बता पाया……….. वास्तव में इसका कारण शायद ये है की ………क्योकि महावीर सूरज ढलने के बाद भोजन नहीं करते थे इसलिए वो भी नहीं करते……….. पर महावीर के सुर्यस्तोपरांत भोजन न लेने का कारन न्यायोचित था………. वो सूर्यास्त के उपरांत भोजन नहीं लेते थे क्योकि अँधेरा होने पर छोटे छोटे कीट भोजन के साथ मुह में जा सकते थे…….. उस काल में प्रकाश की कोई व्यवस्था नहीं थी……… यदि आग से प्रकाश किया जाये तो कीट और भी अधिक आग की और आकर्षित होते है….

पर ये प्रथा बदस्तूर जारी है………….. आज कई जैन लोग ऐसे कमरों में रह रहे हैं जहाँ दिन से भी अधिक प्रकाश रात को हो रहा हैं………. कीट पतंगों का प्रवेश जहाँ नहीं हो सकता है वहां भी जैन रात्रि भोजन को निषेद मानते हैं………….

इस लिए हर परंपरा को निभाने से पूर्व हमको सोचना चाहिए की क्या इस परम्परा के पीछे कोई वाजिब वजह है………….. या  यूँ ही …………………….?



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23 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

vinitashukla के द्वारा
February 20, 2011

सार्थक लेख. लकीर का फकीर बने रहने में समझदारी नहीं , परम्पराओं का सामयिक औचित्य भी होना जरूरी है.

ashutosh के द्वारा
November 18, 2010

पियूष जी काफी अच्छा लिखा है आपने वैसे आज के प्रगतिशील समाज के पारंपरिक कार्यो को करने से पूर्व किसी के पास यह समझने का समय नहीं की अमुक कार्य क्यों होता है खास कर युवाओं में जैसे बहु ने सास से यह कभी नहीं पूछा की वह बिल्ली को क्यों ढकती है अगर उस समय यह सवाल का उत्तर बहु को मिल जाता तो आज समाज समाज में फैली कई पारंपरिक भ्रांतियों को निस्तारण हो गया होता अतेह सभी लोग मिलजुल कर समाज में फैली भ्रन्तिओं के निस्तारण का बीड़ा उठाए तो संभव है एक भ्रान्ति मुक्त समाज हम आने वाली पीडी को दे सके जैसे आपने जैन समाज में फैली एक भ्रान्ति को दूर करके किया ! वैसे मेरे कई जैन मित्र इसका पालन नहीं करते उम्मीद करते है की आने वाले लेखो में कुछ और भ्रान्ति का निस्तारण करेंगे आशुतोष

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 18, 2010

    आशुतोष जी …… वास्तव में यहाँ ये भी ध्यान देना होगा की कहीं भ्रांतियों को अनदेखा करने के नाम पर हम लोग परम्पराओं को भी न छोड़ दें…………. और जहाँ तक अआपके जैन मित्रों का प्रश्न है……… तो कई लोग (हर संप्रदाय में) जगे हुए भी हैं……………….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…………

ashvinikumar के द्वारा
November 17, 2010

भाई पीयूष जी आपके (पात्र बहू) जी की अदा मन को भा गयी,,समाज को एक अच्छा संदेश देती कथा…………….जय भारत

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 18, 2010

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……… 

roshni के द्वारा
November 17, 2010

पन्त जी कहानी के जरिया रीती रिवाजों की सचाई बताई है अपने .. ऐसे कितने ही अनगिनत रिवाज है जो तब किसी साधन की कमी या किसी और व्यक्तिगत कारन के कर्ण किये जाते होगे मगर देखते देखते और हम तक आते आते वोह परम्परा बन गए ….. बहुत बढ़िया लेख धन्यवाद

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 17, 2010

    सही कहा आपने रौशनी जी…………..आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया …..

Harish Bhatt के द्वारा
November 17, 2010

परंपरा को निभाने से पूर्व हमको सोचना चाहिए की क्या इस परम्परा के पीछे कोई वाजिब वजह है………….. यूँ ही रीती रिवाजो को निभाते चले जा रहे है. क्योकि उनको तोड़ कर आगे निकलने के लिए जिस हिम्मत की जरुरत होती है वो तो हमारे पास है ही नहीं. बहुत अच्छा लेख. बधाई.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 17, 2010

    हरीश जी …………. इसके पीछे एक अनहोनी का डर है……….. कही इस परंपरा का उल्लंघन करने से कुछ हो जाये तो……….? आदमी एक क्षण के लिए अपने पर सब कुछ बर्दाश्त कर सकता है पर परिवार के लिए वो इनको ढोने को भी तैयार है……..आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया …..

priyasingh के द्वारा
November 17, 2010

बिलकुल सही लिखा है आपने छोटे छोटे ऐसे कई रीती रिवाज आज सबके मन में घर कर गए है और खासकर हम औरतो के मन में …सबसे ज्यादा हम औरते ही ये अंधविश्वास बढाती है गुरुवार को साबुन नही लगना, शनिवार को बाल नहीं काटना, लोहा या तेल नहीं खरीदना , मंगलवार को बाल नहीं धोना, तमाम व्रत उपवास रखना लिस्ट बहुत लम्बी है पर आज भी जब किसी से इन सबको न करने का कारण पूछो तो एक ही जवाब मिलता है की नहीं पता क्योंकि माँ ने या दादी माँ ने कहा … लेकिन क्या करे हम बिचारी औरते पति और बच्चो की खातिर कुछ भी करने को तैयार रहती है ……. प्रशंशनीय लेख …

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 17, 2010

    मैं हालाँकि इसका धुर विरोधी हूँ पर मैं कभी मंगलवार को भूले से भी बाल नहीं कटाता………. क्योकि हमारे पिताजी ने कहा था की मंगल को बाल कटाना छोटे भाई के लिए शुभ नहीं होता……… तो तब से न मैं बाल कटवाता हूँ………और न मेरे बड़े भाई साहब………….. कई बार जब कोई भावनात्मक तर्क दिए जाते है तो हम न चाहते हुए भी इन बातों को मानने लगते हैं………………… आपकी प्रतिक्रिया का शुक्रिया ……………….

    priyasingh के द्वारा
    November 18, 2010

    चलिए अच्छा है मेरा भ्रम टुटा औरते को मै बेकार ही बदनाम कर रही थी ………. पुरुष भी पीछे नही है ……….

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 18, 2010

    प्रिया जी इस पर केवल इतना ही कहा चाहता हूँ की भावनाएं पुरुषों में भी होती हैं……….. यदि किसी रिश्ते को किसी परंपरा से जोड़ कर दिखाया जाये तो पुरुष उसको हर हाल में निभाता है……….

div81 के द्वारा
November 17, 2010

सही कहा आप ने पियूष जी, हम आज भी कई ऐसी मान्यताओं को मानते आ रहे है जिनका कोई भी तुक नहीं मगर पूर्वजो ने किया था अब हम कर रहे है | मैं धर्म विरोधी नहीं हूँ मगर कई बार अपने सवालों से मेरे ऊपर ये ठप्पा लग गया है की मैं धार्मिक नहीं हूँ | दिखावा करना आता नहीं और अंध विश्वास में कर नहीं सकती | और वाजिब वजह मुझे मिलते नहीं है | आच्छा लेख बधाई

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 17, 2010

    जहाँ तक अन्धविश्वास की बात है…………. मेरा मत आपसे कुछ भिन्न है……… मेरा मानना है की विश्वास प्रारंभ में हमेशा अँधा ही होता है…….. फिर वो धीरे धीरे विश्वास में परिवर्तित होता है……….. विश्वास का जन्म अन्धविश्वास से ही होता है………. एक बात पढ़ी थी की दोस्ती में दोस्तों के बीच विश्वास ठीक उस तरह होना चाहिए जैसे उस बच्चे में होता है…………जिसको की उसका पिता हवा में उछालता है और वो बच्चा हँसता है…………. क्योकि वो जानता है की नीचे उसका पिता उसको पकड़ने के लिए मौजूद है………… पर क्या उसके पिता से चुक नहीं हो सकती….. अर्थात वो अपने पिता पर आँख मूंद कर विश्वास कर लेता है……… आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया …..

आर.एन. शाही के द्वारा
November 17, 2010

पियूष जी हमारी तथा औरों की भी बहुत सारी परम्परागत रीतियां कुछ ऐसी ही हैं, जो वर्तमान संदर्भों में कोई आधार नहीं रखतीं और महत्वहीन हैं । परन्तु उनके साथ तर्क़ की बजाय आस्था जुड़े होने के कारण कोई हाथ नहीं लगाना चाहता । देखा गया है, कि बिल्ली के गले में परिस्थितियों वश या हिम्मत के साथ जब कोई घंटी बांधने की हिम्मत कर जाता है, यानि इनको तोड़ने की पहल करता है, तो थोड़े द्वंद्व और नुक्ताचीनी के बाद समाज भी साथ हो लेता है, क्योंकि सबको इनको तोड़ने का फ़ायदा समझ में आ जाता है । आज बहुत सारी पुरानी रीतियों-कुरीतियों का अस्तित्व नहीं रहा, तो कुछ हमने नई भी गढ़ डाली हैं । गिफ़्ट और मामूली नेग के तौर पर शुरू की गई दहेज़ प्रथा किस विद्रूप स्वरूप के साथ आज विषबेल बन चुकी है, इसका उदाहरण आज हमारे सामने है । इन्हें उखाड़ फ़ेंकने के लिये समाज की सामूहिक ताक़त की दरकार है । आप ही के शब्दों में, अकेला चना भाड़ कैसे फ़ोड़े? साधुवाद ।

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 17, 2010

    आदरणीय शाही जी………….सही कहा आपने हमने कई बहुमूल्य परम्पराओं को अपने हित के लिए एक विकृत रूप प्रदान कर दिया है……………….. आपकी स्नेहपूर्ण प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया …..

rajkamal के द्वारा
November 17, 2010

आपके उपर और निचे ईसाई आंतकवादी है ..जरा बच के मेरे भाई

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 17, 2010

    राजकमल भाई………. सुरक्षा इंतजाम की पूरी व्यवस्था है………… निश्चिंत रहें……… आपको भी उपलब्ध करा दी जाएगी…………

rajkamal के द्वारा
November 17, 2010

प्रिय पियूष भाई …नमस्कार ! मैन धर्म के मामले में अपनी टांग फसाना उचित नहीं समझता …क्योंकि वैसे भी मेरी टांगो को फुर्सत ही कहाँ मिल पाती है …कमबख्त न जाने कहाँ -२ जा के ज़बरन ही फस जाया करती है …. और आपकी शंका के बारे में इतना ही कहना चाहूँगा की हो सके तो आप आचार्य रजनीश की जैन धर्म के उपर लिखी कोई किताब अगर पढ़ ले तो शायद आपकी इस शंका का समाधान भी हो जाए …

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 17, 2010

    राजकमल भाई ………… आचार्य रजनीश की कोई पुस्तक पढने का समय तो नहीं मिला पर उनके प्रवचन सुने हैं………… उस स्तर की बुद्धि नहीं पाई इस लिए अधिकतर प्रवचन ऊपर से ही गए हैं……

s.p.singh के द्वारा
November 17, 2010

प्रिय पियूष जी प्रणाम, आपकी सरल भाषा में व्यक्त की गई कहानी बहुत खुबसूरत बन गई है, यही तो भारत की जनता की भोले पन और सहजता को दर्शाता है की अपने बुजुर्गो की किसी भी अच्छी बुरी परंपरा को बहुत ही सरलता से अपना लेते है. धन्यवाद.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 17, 2010

    सिंह साहब ………….. आपने बिलकुल सही कहा……… की ये हमारा भोलापन ही है की हम अपने बुजुर्गों की हर बात को परंपरा मान कर निभाते हैं………….. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया………………


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