परिवर्तन की ओर.......

बदलें खुद को....... और समाज को.......

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कमी वस्त्रों मे या मानसिकता मे..........

Posted On: 23 Dec, 2010 Others में

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अक्सर हम अपने भाव लोगों के साथ ये सोच कर बाटते हैं की हमारे विचारों मे विस्तार हो………… अर्थात अगर हमारी सोच की दिशा सही है तो हम उसी ओर बढ़ें ……. अन्यथा अपनी सोच मे कुछ बदलाव लाये…. इस मंच का उद्देश्य भी यही है….. की हम नए नये विचारो से परिचित हों …. ओर अपने विचारों को भी रखें……… इस प्रयास मे जो मंथन होता है उससे कई तथ्य सामने आते हैं………  जो कई सवालों का उत्तर दे जाते हैं……. किसी भी ब्लोगर चाहे वो नया हो अथवा कोई पुराना कुछ भी ज्ञानवर्धक जानकारी दे सकता है……. तो इसी लिए सभी के ब्लॉग पढ़ कर उनपर अपनी सोच के अनुसार प्रतिक्रिया देना मैं उचित समझता हूँ…….  इसी क्रम मे इस मंच पर कुछ विचार मैंने पढे……..


जिनके अनुसार लड़कियां अश्लील कपड़े पहनती है… ओर इसी कारण लड़कों का रुझान उनकी तरफ बढ़ जाता है……. ओर इसी कारण उनके साथ दुर्व्यवहार की घटनाएँ बढ़ गयी हैं……….. ओर उस पर एक वाक्य अपनी बात को ज़ोर देने के लिए कहा गया की शेर के शामने माँस रखो और वो खाएं ना, ऐसा कैसे हो सकता है ।


इस पर प्रतिक्रिया स्वरूप मैंने एक प्रश्न रखा था …….. किन्तु मेरे प्रतिक्रिया से वो प्रश्न गायब था…. मेरा ये प्रश्न उस लेख को लिखने वाले के प्रति ही नहीं अपितु उन सभी के लिए था जो इसको वजह मानते हैं………. क्योंकि आवश्यक नहीं की ये उस ब्लोगर की राय हो…… हो सकता है की किसी ओर की राय पर वो हमसे सलाह चाह रहा हो……….. ओर मेरा प्रश्न ये है की क्या उन सभी से है जो ये कहे की केवल लड़कियां इस लिए तंग की जाती है क्योकि वो कपड़े ही उस तरह के पहनती है उसकी यही धारणा तब भी बनी रहती है जब वैसे ही कपड़ों मे वो अपनी बहन या किसी ओर रिश्तेदार को देखता है………. क्या वस्त्रों के साथ साथ उसके भाव अपने घर की महिलाओं के प्रति भी बदल जाते हैं……..


अब सोचना ये है की क्या ये सही है…… क्या वास्तव मे वस्त्रों ने आदमी की प्रवृति को बदला है…….. क्या ये कपड़े जो तन को ढकने के काम आते हैं वो मन को भी ढकते हैं…………. क्या तन से हटते कपड़े मन को भी नग्न कर देते हैं…….. नहीं वास्तव मे तन ओर मन दो बिलकुल अलग अलग हैं……… क्या तन को पूरी तरह से ढाकने वाले मन से नग्न नहीं होते …….? तन के छुपे ओर खुले होने का मन के भाव से कोई मेल नहीं……….. सारा गणित आपकी मनोदशा का है………. आपकी नज़र का है………….. कुछ लोग अजंता की गुफाओं मे नग्नता देखते हैं तो कुछ उसमे छुपी कला भावना………


हमे अपनी इस सोच को विकसित करना होगा की नग्नता हमारे विचारों पर न रहे………. फिर हमें शायद कुछ भी नग्न न लगे……….



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28 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

vinaysingh के द्वारा
December 24, 2010

बहूत अच very good sir

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 25, 2010

    Thanks ……..

    Justice के द्वारा
    July 12, 2016

    No me parece mal que cuenten lo que deseen. Es más, dadas sus ciacrnstancius, me da la impresión de que no tienen muchas opciones.Pero, efectivamente, los mineros chilenos, tienen compañeros que no van a recibir nada de nada. Y, también es verdad, otros muchos meneros, en todo el mundo, sufren cada día accidentes que les dejan enterrados para siempre. Una noticia breve en un rincón de un diario y a veces ni eso.Eso si me parece mal, muy mal.

ashutoshda के द्वारा
December 24, 2010

पियूष जी नमस्कार बहुत अच्छा लिखा आपने पियूष लगता है आप अपनी कलम फिर से पैनी कर ही आये ! आपके समर्थन में एक कहानी जोड़ना चाह रहा हूं एक बार दो साधू गंगा तट पर नहा रहे थे दोनों ही ब्रहमचारी थे तभी एक महिला के डूबने की आवाज आई उनमें से एक साधू तो इसलिए नहीं कूदा क्योकि उसकों बचाने में उसका ब्रहमचर्य व्रत टूट जाता किसी भी लड़की या महिला को छुना उनके लिए पाप था पर दूसरा साधू नदी में कूद कर उस महिला को बचा लाया और किनारे पर लाकर अपनी चादर भी उसकों देदी सभी ने उसकी तारीफ करी और लड़की को बचाने पर उसका धन्यवाद् किया लेकिन पहले वाले साधू को उसकी ये तारीफ बड़ी खली उसने जाकर गुरूजी से उसके इस कृत्य की शिकायत कर दी और ब्रहमचर्य टूटने की बात कही गुरूजी ने उस साधू को बहुत लताड़ा कहा की वास्तव में उसने मन से ब्रहमचर्य का पालन किया है तभी तो उसे डूबती महिला में केवल मानवता दिखाई दी लड़की या महिला नहीं , जबकि तुमने उसमें केवल महिला को देखा मानवता को नहीं यही नहीं वो तो अपने इस कृत्य को भूल गया लेकिन तुमारे दिमाग में वो कृत्य इतना बस गया की तुम उसको आश्रम तक ले आये वास्तव में अपराधी वो नहीं तुम हो ब्रहमचर्य तुम्हारा टुटा हुआ है ! लेकिन मेरे या आपके इस तरह से लिख देने से उन व्यक्तिओं द्वारा उठाई गयी आवाज दब नहीं जाएगी बात केवल असभ्य पोषक पहनने तक की नहीं बल्कि इस तरह की पोशाकों को पहन कर लडको को तरह तरह की भाव भंगिमा से आकर्षित करने की भी है जिसकों नाकारा नहीं जा सकता ताली दोनों हाथ से बजती है ! आशुतोष दा

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 24, 2010

    आपकी इस कहानी ने इस लेख की सार्थकता को ओर भी मजबूती दी है आशुतोष दा ……… आपकी इस प्रतिकृया के लिए हार्दिक शुक्रिया………..

Aakash Tiwaari के द्वारा
December 24, 2010

Piyush ji, Ek saarthak lekh jisko padhne ke baad shayad kuch logon ki manovriti badal hi jaye……aapki ye baat bilkul sahi hai ki aise log jo kam kapde vaali ladkiyon ko dekhkar comment karte hai vo khud ke ghar ki ladkiyon ko dekhkar aisa nahi kar skte… iska matlab kami kapde me nahi vicharon me hai… Aakash tiwaary

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 24, 2010

    भाई आकाश जी……. सैद्धांतिक सहमति के लिए ओर इस प्रतिकृया के लिए हार्दिक शुक्रिया………

allrounder के द्वारा
December 24, 2010

पीयूष जी, नमस्कार छोटे कपडे पहनना न पहनना ये किसी का व्यक्तिगत मामला है, यधपि इस बात को पूर्णता नहीं नकारा जा सकता की आजकल के भड़काऊ कपडे कुछ मानसिक रूप से बिकृत लोगों को छिछोरापन करने का मौका देते हैं ! आपकी इस बात से मैं पूर्णता सहमत हूँ की जो भी लोग यहाँ लेख लिखकर कोई सामाजिक प्रश्न उठाते हैं तो फिर उस लेख पर आये प्रश्नों के माध्यम से उस विषय पर एक स्वस्थ चर्चा के जरिये इस मंच पर मौजूद होने के अर्थ को सार्थक करें, जिससे की विचारों के मंथन से कोई अच्छी सुविधजनक राय किसी विषय पर बन सके !

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 24, 2010

    सचिन जी …….. आपकी सहमति के लिए हार्दिक शुक्रिया……..

Harish Bhatt के द्वारा
December 24, 2010

पियूष जी नमस्ते, मैंने आपका प्रश्न भी पढ़ा था और वो लेख भी. जिसके बाद आपने यह लेख लिखा . आपने इस लेख में सही लिखा है कि हमको अपनी इस सोच को विकसित करना होगा की नग्नता हमारे विचारों पर न रहे………. बहुत ही अच्छे लेख के लिए हार्दिक बधाई.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 24, 2010

    हरीश जी आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया ………

Amit Dehati के द्वारा
December 24, 2010

बहुत बढ़िया . एक अच्छी पोस्ट के लिए बहुत-बहुत बधाई ! http//:amitdehati.jagranjunction.com

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 24, 2010

    अमित जी आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……………

    Malinda के द्वारा
    July 12, 2016

    Ja mam przykład oddolnej inicjatywy pacojrtytznei. To jest mój blog toyah.pl. Problem w tym, że ja nie wiem, czy Zybertowicz mnie akurat miał na myśli. No i kogo on dla mnie przewidział jako coacha. Któregoś z bliźniaków Karnowskich?

HIMANSHU BHATT के द्वारा
December 24, 2010

राजकमल जी ने सही लिखा है की पहले हम स्वयं को बदलें फिर समाज को….. असल में हम खुद को बदल पायें यही पर्याप्त है….. समाज को बदलने की आवश्यकता ही नहीं है….. हम बदलेंगे तो परिवर्तन स्वाभाविक है….. क्योंकि हर घटना या दुर्घटना हमारी सोअच पर निर्भर करती है….. हम जिस ऐनक से देखते हैं वैसा ही हमें दिखलाई पड़ता है….. जैसी हमारी मनोस्थिति होती है वैसे ही हमारे विचार होते है….. और वैसा ही निष्कर्ष हम निकलते हैं…… पियूष जी उत्कृष्ट लेखन के लिए आप बधाई के पात्र हैं……..

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 24, 2010

    माननीय हिमांशु जी……. आप का कथन …………. हम जिस ऐनक से देखते हैं वैसा ही हमें दिखलाई पड़ता है….. जैसी हमारी मनोस्थिति होती है वैसे ही हमारे विचार होते है….. और वैसा ही निष्कर्ष हम निकलते हैं…… यथार्थ के बहुत करीब है………. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…………..

rajkamal के द्वारा
December 24, 2010

यार नन्ही सी जान ! और इतनी भारी भरकम सोच और अति उत्तम विचार ….अब तो हम यही सोचने लग गए है कि कैसे हम पहले खुद कों बदले और फिर अपने इस समाज कों … बढ़िया सोच और बहुत बढ़िया लेख बधाईयाँ

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 24, 2010

    राजकमल भाई दुनिया भले बदल जाए……. पर आप हमेशा यूं ही रहना…….. क्योकि कुछ चीज़ें बदलाव से परे ही सार्थक है…… बदलाव उनकी महत्ता को समाप्त कर देता है……….

rajkamal के द्वारा
December 24, 2010

ऐसा लगता है कि आज दुआ हमारी रंग ले लाई है…..बड़ी ही मुश्किल से उन्होंने ब्लाग लिखने के लिए कालम अपनी चलाई है ….

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 24, 2010

    राजकमल जी ……… इस तरह के लेखों के लिए दुवा न किया करें………. कुछ सार्थक निकले तो बात हो…….. ऐसे लेख लिखकर यूं लगता है की परनिंदा जैसा कोई दुष्कर्म किया हो………… पर आपकी दुवाओं ओर प्रतिक्रियाओं के लिए हार्दिक शुक्रिया………….

s p singh के द्वारा
December 24, 2010

प्रिय पियूष जी सारा गणित आदमी की अपनी मनोदशा का है……….उसकी नज़र का है………….. कुछ लोग अजंता की गुफाओं मे नग्नता देखते हैं तो कुछ उसमे छुपी कला भावना इसी प्रकार से खजुराहो में कुछ लोग नग्नता देखते हैं और कुछ उसमे कला के दर्शन करते हैं. ……पर आज के आधुनिक जीवन में विकाश की दौड़ में सबकुछ जायज है – नग्नता कही नहीं है केवल विचार में ही खोट है – क्योंकि जोकुछ हमने पहले नहीं देखा उसे देख कर अचंभित होना मनुष्य का स्वभाव है ऐसा मैं मानता हूँ !

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 24, 2010

    आदरणीय सिंह साहब………. आपका विचार विचारणीय है…. आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद…..……

nishamittal के द्वारा
December 24, 2010

अच्छा प्रश्न उठाया पीयूष जी, मै ये तो स्वीकार करती हूँ कि वस्त्र-विन्यास शालीन होना चाहिए.परन्तु छेड़-छाड़ की घटनाएँ केवल इसी लिए नहीं होती.,ऐसी घटनाएँ तो विवाहित महिलाओं के साथ,या गाँव की लड़कियों के साथ भी होती हैं जिनकी वेशभूषा बिल्कुल अलग होती है.ये सही है कि दोष मानसिकता का है..मैंने अपने लेख” पूजा नहीं सम्मान चाहिए में भी यही लिखा था.” शेष कारणों पर भी प्रकाश डाला था.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 24, 2010

    ये भी एक कटु सत्य है… की ………….. ऐसी घटनाएँ विवाहित महिलाओं के साथ,या गाँव की लड़कियों के साथ भी होती हैं जिनकी वेशभूषा बिल्कुल अलग होती है. आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद…..…

December 23, 2010

पियूष जी आपने सही कहा, किसी भी चीज को इंसान अपने दिमाग में उत्पन्न हुए भावों के साथ देखता है और ये भाव उसके संस्कारों, रिश्तों की मर्यादाओं और सोचने समझने के नजरिये से प्रेरित होते हैं इसलिए इंसान को अपनी सोच को विकसित करना होगा जिससे की इस प्रकार के विचार न पनपें.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 24, 2010

    भाई राजेंद्र आपकी इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ की इंसान को अपनी सोच को विकसित करना होगा जिससे की इस प्रकार के विचार न पनपें.  आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद…..…….

jagobharat के द्वारा
December 23, 2010

पियूष जी आपने सही प्रश्न उठाया है… लेकिन अगर यह भी मान लिया जाए कि छोटे या अश्लील कपड़े पहनना गलत है तो भी क्या गलत का जबाब और गलत करके देना सही है.. यह दुश्चरित्र और दानव प्रवृति है… सराहनीय रचना…..

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 24, 2010

    क्या गलत का जबाब और गलत करके देना सही है.. सार्थक सवाल …….. आपकी प्रतिकृया के लिए हार्दिक बधाई………..


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