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दोषी कौन ? फैसला करें.........

Posted On: 3 Jan, 2011 Others में

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इस मंच पर कई बार ये विषय उठाया गया की आजकल की सन्तानें आपने माता पिता को अकेला या वृद्धा आश्रम मे छोड़ कर अपना जीवन अलग बसाने लगे हैं…….. और अक्सर इस बात की पूरी ज़िम्मेदारी या यूं कहें की बदनामी उस औलाद को दे दी जाती है……….. पर औलाद के दृष्टिकोण को कोई नहीं देखता………………


एक औलाद के दृष्टिकोण से मैंने इस समस्या को देखा तो मुझे कई मौके पर औलाद की तुलना मे माता पिता अधिक दोषी लगे………….. यहाँ पर स्पष्ट करना चाहता हूँ….. की हर बार नहीं पर कई बार इस बात के दोषी माता पिता भी होते है………. अपनी महत्वाकांक्षाएं अपनी संतान पर थोपने वाले ये माता पिता बुढ़ापे मे अपने अकेलेपन का दोष भी उनपर ही मढ़ देते हैं…………


आपको इन सबको समझने के लिए अपने भीतर झांकने का साहस करना होगा…….. आप अगर अपने माता पिता से दूर हैं तो सोचिए की क्या आप उनसे वास्तव मे दूर रहना चाहते हैं………… ओर यदि उनके ही साथ है तो क्या इसके पीछे उनके संस्कार या आपके प्रति उनका विश्वाश भरा रवैया नहीं था……………


जब भी इस विषय पर कोई बात होती है……… मुझे अपने एक मित्र की याद आ जाती है…….. मैं ओर मेरा मित्र ……. हमने साथ साथ पढ़ाई खत्म की ओर फिर दोनों साथ साथ दिल्ली नौकरी के लिए गए…….. मेरा वो मित्र शुरू से सरकारी नौकरी अपने घर के आसपास करना चाहता था…… ताकि वो अपने माता पिता के साथ रह सके……. पर उसके घर वालों ने उसे बी.एस.सी. न करवा कर व्यावसायिक कोर्स करवाया……….. मैं कभी भी घर से दूर नहीं रहा था…. तो मुझे इस से कोई फर्क नहीं पड़ता था की मैं कहाँ नौकरी करूँ………


फिर कोर्स के दौरान ही उसके पिता ने सभी जगह ये प्रचार करना शुरू कर दिया था…. की अब मेरा लड़का बड़ा इंजीनियर बनेगा……. ओर इत्तफाक से कॉलेज ने प्रचार के लिए बच्चों को सस्ते मे बिना किसी अधिक औपचारिकता के पासपोर्ट बनवा दिया……. इस विचार से की शायद कभी इस की जरूरत पड़ ही जाए मेरे मित्र ने इसके लिए अप्लाई किया ….. पर मैं घर छोडने को ही बमुश्किल तैयार हुआ था……. तो देश छोडना तो दूर की बात थी……. तो मैंने अप्लाई नहीं किया…..


जब उसके पिता को पता चला की उनके पुत्र का पासपोर्ट बन गया है ओर मेरा नहीं……… तो उसके पिता ने ये प्रचार करना शुरू किया की मेरे लड़के पर कॉलेज को भरोसा है की वो विदेश जाएगा…… तो उसका पासपोर्ट उन्होने ही बनवा दिया…… अपने लड़के के प्रति उन्होने एक अजीब सा माहौल बना दिया……..


फिर कोर्स पूरा होने के बाद मैं भी दिल्ली गया ओर वो भी ओर दोनों ने ही अलग अलग जगह अच्छी कंपनी मे नौकरी शुरू की ………. पर मात्र एक माह बाद मुझे घुटन सी होने लगी…… मैं जब तक ऑफिस मे होता सब ठीक ……… जैसे ही कमरे पर जाता जहां मेरे एक दो मित्र ओर थे…….. तो लगता की ये क्या कर रहा हूँ मैं ……..? कब तक ….?



मैं अपने उस मित्र से अक्सर ये कहता था की मैं चाहे कितना भी बड़ा आदमी क्यों न हो जाऊ……. मेरे माता पिता मेरे साथ यहाँ नहीं आने वाले……. ओर अगर मुझे उनके बिना ही रहना है तो ये नौकरी किस काम की……. वो भी मेरी ही तरह भावुक होकर कहता की …… कुछ तो करना ही होगा………. मैं भी यहाँ नहीं रहना चाहता ………


फिर एक दिन मैंने अपने घर फोन किया ……. ओर सबके हाल समाचार पूछे …… सबने कहा ठीक हैं……. फिर उसी दिन मैंने अपने घर के पास रहने वाले अपने मित्र को फोन किया…. उसने कहा की तेरे पिताजी की तबीयत बीच मे खराब थी अब ठीक है….. तो बड़ी चोट लगी ….. फिर मैंने तय कर लिए की कुछ समय नौकरी करके मैं वापस घर चला जाऊंगा…… ओर कुछ वहीं करूंगा……. पर यहाँ नहीं रहूँगा………


जहां चाह वहाँ राह …….. एक दिन कुछ ऐसी घटना हुई की… मेरा सारा इरादा बदल गया………… मैंने तुरंत घर जाने की तैयारी कर ली………. ओर मैं घर लौट आया…….. घर वालों ने मुझसे कहा की कितने दिन के लिए आया है………. मैंने कहा हमेशा के लिए……. तो घर वालों ने पूछा….. तो आगे क्या करेगा…… मैंने कहा की वो मेरे ऊपर छोड़ दो…………


फिर जब मैं आपने उस मित्र के घर वालों से मिला तो मेरे उस मित्र के घर वालों ने मुझे कहा की तू अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार रहा है……… कल को रोएगा…….. माँ बाप का क्या है आज है कल नहीं है……. मगर कल को तू पछताएगा………….पर मैंने कहा की कल किस ने देखा है…….. कौन जानता है की कल कौन है ओर कौन नहीं….. माँ बाप की बात तो दूर है मेरा खुद का कोई पता नहीं की कल मैं हूँ की नहीं……… और मेरा मानना है की कल के लिए अपना आज गवाना मूर्खता है……….


मेरे उस मित्र को उसके घर वालों ने सख्त हिदायत दे दी की कुछ भी हो वहीं रहना……. ओर मेरा उदहारण दे कर समझाया गया की देखना एक दो महीने मे ही वापस आ जाएगा…….. ओर वो बेचारा वही रह गया……… वहाँ दिन भर कंपनी मे दिमाग खपाने के बाद कमरे पर आकर कमरा जब काटने को दौड़ता तो वो मुझे फोन करता…… ओर अपना दुख कहता……….


फिर वहीं कुछ ऐसे ही दो चार लोग उसे ओर मिल गए जो इधर उधर से घर वालों से दूर रहा करते थे……. फिर दिन भर ऑफिस मे काम करके वो लोग एक जगह जमा होते ओर सिगरेट ओर शराब चलती …….. धीरे धीरे वो उस दुनिया का आदि हो गया……… अब उसके मेरे लिए फोन कम आने लगे…… घर भी उसकी बात कम ही होती ….. ओर घर वाले भी कम बात करते ताकि कहीं वो भावनात्मक होकर घर न आ जाए…….. घर वाले उससे ओर वो घर वालों से काटने लगा……..


यहाँ मेरे घर वाले मेरे लिए चिंतित थे…….. सभी लोग कहते की आपका लड़का गलती कर रहा है……. यहाँ हल्द्वानी मे प्राइवेट जॉब हैं नहीं……… सरकारी मे निकालना मुश्किल है…….. करेगा क्या ? हालांकि वो ये कह तो देते की हमें पूरा भरोसा है की वो कुछ न कुछ तो अच्छा कर ही लेगा…….. पर अंदर ही अंदर घर वाले ओर घबरा जाते………. फिर मैंने पढाना शुरू किया….. ओर धीरे धीरे मैं इस क्षेत्र मे घुस गया ……… मैं दिन भर पढाता ओर फिर अपनी तैयारी करता………. ओर फिर मेरा चयन एलआईसी मे कैशियर पद के लिए हुआ……. तब उन्होने कहा था की 15 हजार रूपये ओर 1.5 लाख रुपये मासिक इतना अंतर ……… मेरे बेटे को 15 लाख रुपये सालाना का प्रस्ताव है । पर वहाँ 5 साल का अनुबंध था …. इस लिए मैंने उसे वहाँ जाने से मना कर दिया…….. पर उसका हाल मैं जानता था……….


मेरा वो मित्र मंदी के समय हुई छटनी मे बाहर हो गया……….. बड़ा संकट था…… आईटी इंडस्ट्री बाहर के लिए बनाये जाने वाले सॉफ्टवेरों के बूते ही खड़ी थी…….. जब विदेशी कंपनियाँ डूबी तो काम मंदा हो गया…… ओर उसको घर बैठा दिया गया…….. वो अब वापस आना चाहता था…… वो मेरी तुलना मे बहुत मेहनती था….. ओर जब मैं सरकारी जॉब पा गया तो उसको यकीन था की वो भी पा जाएगा……. पर उसके पिता ने कहा की नहीं वहीं रहो…….. तुम्हारे यहाँ वापस आने से मेरी नाक कट जाएगी…….
फिर उसके पिता ने यहाँ प्रचारित किया की मंदी मे काम कम होने के कारण बेटा दो चार दिन के लिए घर आने वाला है…… वो आया ओर उसने घर पर बात की पर पिता का अहं को चोट लगती थी………. जिस बेटे को विदेश जाने वाला बता दिया था वो वापस आकार सरकारी जॉब करे…….. बेटा फिर वापस चला गया……


नए सिरे से उसने संघर्ष किया ….. 8 महीने की बेरोजगारी के बाद वो फिर एक बार एक अच्छी कंपनी मे चुना गया……. पर अब उसका परिवार के प्रति मोह भंग हो गया था…. दूसरी ओर यहा जब कोई उसके पिता से पूछता की आप क्यों नहीं उसके साथ रहते तो उसके पिता यहाँ कहते की वो विदेश जाने वाला है…….. इस लिए कोई पक्का ठिकाना नहीं है……. एक बार वहाँ सेटल हो जाए तो फिर जाएंगे………


अब वो मित्र जो पहले किसी न किसी बहाने से हर महीने एक दिन आता था….. अब होली ओर दिवाली मे भी नहीं आता …….. पिछले 2 साल से मैं उसको केवल फोन पर ही या नेट पर ऑनलाइन ही मिला हूँ…….. एक बहुत ही भावुक ओर भले लड़के को उसके पिता के अहं ने अपने परिवार से दूर होने को मजबूर कर दिया ……….
कल को शायद जब उसके घर वाले अकेले हों………


यही वो घटना है जो मुझे तब खिन्न कर देती है……. जब कोई एक तरफा फैसला करके औलाद को दोषी करार देता है……… मैं नहीं मानता की मैं गलत हूँ….. ओर इसी कारण से मैंने अपना पिछला ब्लॉग लिखा था……….



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27 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Tilly के द्वारा
July 11, 2016

So much info in so few words. Tostoly could learn a lot.

NK Thakur के द्वारा
January 21, 2011

मुझे लगता है की , एक गंभीर विषय में , आपने बड़े हलके फुल्के तरीके से , लेख लिख मारा / आपके लेख में भी एक बात खटकती है की यदि माँ बाप गलत थे तो भी वो पढ़े लिखे औलाद भी क्या बेवकूफ ही थे ? उन्होंने समझदारी क्यों नहीं दिखाई ? जो भी हो आपने गंभीर विषय को छेडा तो सही .. इस पर अधिक अच्छे चिंतन के साथ आपका विचार अपेक्षित है …..

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 21, 2011

    मैं आपकी बात पूरी तरह से समझ नहीं पाया…….. वो किस तरह समझदारी दिखा सकता था….. जब आपके घर पर आर्मी का शासन चलता हो तो आप किस तरह से समझदारी दिखा सकते है………. जब आपको केवल ऑर्डर ही दिया जाता हो ……… आपकी राय न ली जाती हो……. तो किस तरह से समझदारी दिखाई जाए………….. वास्तव मे कुछ हालत ऐसे भी होते है जहां हमको लगता है की ये इतना मुश्किल नहीं था…… पर जब खुद उन हालातों मे घिर जाते हैं…. तो पता चलता है की ये कितना मुश्किल था…………………… मैंने बहुत नजदीक से उसके घर का माहौल देखा है……… एकलौते पुत्र पर जो वजन है…… वो केवल वो ही समझ सकता है……… फिर भी हम लोग पुत्र के स्थान पर तो खुद को ही रखते हैं पर  माँ बाप के स्थान पर भी अपने ही माँ बाप को रख लेते हैं………. पर जिस तरह हर स्थान की अलग अलग आबो हवा के साथ वहाँ के लोगों के रंग रूप कद काठी बदल जाती है उसी तरह परिवार के माहौल के साथ संस्कार ओर विचार भी बदल जाते हैं……………….. आपकी ये प्रतिकृया आपका अपने परिवार के साथ स्नेह प्रदर्शित करती है………… इस विचार के लिए शुक्रिया…………

Alka Gupta के द्वारा
January 20, 2011

पीयूष जी, जब माता-पिता बच्चों पर अपनी इच्छाएं लाद कर उनसे कुछ जरूरत से ज्यादा पाने की आकांक्षा रखते हैं जिन्हें पूर्ण करने में बच्चे अपनी असमर्थता ज़ाहिर करते हैं तो उन्हें फ़ोर्स नहीं करना चाहिए…..अन्यथा तो फिर दोनों के संबंधों में दरार आना ही है इसलिय बहुत आवश्यक है माता-पिता के लिए भी कि अपनी प्रतिष्ठा के चक्कर मे न पड़कर उनकी भी भावनाओं का सम्मान करें और कुछ निर्णय उन्हें भी स्वयम लेने दें इसी में दोनों पक्षों की अच्छाई होगी…. !

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 20, 2011

    आपकी इस बात से मैं सहमत हूँ…. ओर वास्तव मे मेरा भी यही मानना है………. आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
January 19, 2011

प्रिय पियूष जी, अभिवादन .. आपका लेख पढ़ा अच्छा लगा, पुत्र का पक्ष रखने के लिए बधाई ….. जहाँ तक मैं समझता हूँ, आपके मित्र के पिताजी ने बार – बार आपके मित्र को विदेश भेजने के लिए प्रयाश करने को अगर छोड़ दें तू मुझे लगता है, उन्होंने अपने पिता होने के धर्म का निर्वहन करते हुए उसे अच्छी शिक्षा दी, उसे अपने पैरों पर खड़े होने के लायक बनाया, और अपने पुत्र प्रेम को कर्म के लिए न्योछावर किया ; यद्यपि महानगरों में कार्यालय से आने के बाद अकेलापन महसूश होता है ; किन्तु आप (मैं कोई पुत्र) इसके लिए पिता या परिवार के लोगों को दोषी नहीं ठहरा सकता ; क्योंकि अगर आपका मित्र बाहर नौकरी करने नहीं जाता तो उसे भी सरकारी नौकरी मिल जाती जरूरी नहीं है ; तो ऐसे में यदि परिवार के पास संचित धन नहीं होता तो आर्थिक समस्याओं से जूझते हुए भी वो माता – पिता को दोषी ठहराता | इसलिए पिता का कदम उचित था; और पुत्र को उनके त्याग और दूरदर्शिता का आभारी होना चाहिए | अगर ऐसे में पुत्र माता- पिता से खिन्नता रखता है तो वो गलत है | माता-पिता ऋण कोई चुकता नहीं कर पता है | उलटे ही उन्हें ही दोष लगता है जो की गलत है |

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 19, 2011

    पर शैलेश भाई…….. क्या व्यर्थ के सामाजिक बढप्पन के लोभ वश पुत्र को दूर रखना गलत नहीं है……. जिस तरह पिता के निर्धन होने पर पुत्र को उसकी विवशता को समझते हुए उसके साथ व्यवहार करना चाहिए….. ओर अपनी क्षमता के अनुरूप ही अपनी आदतों को रखना चाहिए……… तो क्या पिता का ये कर्तव्य नहीं की वो पुत्र की सच्चाई को ही प्रकट करे…… आखिर क्या आवश्यकता है……. उसको बड़ा करने की ॥ क्या उसके गुण उसको बड़ा नहीं बनाते………. ओर इस परिस्थिति मे जब की आप स्वयं अच्छे सरकारी लाभ के पद पर हों…… जबकि आपके पास पैतृक संपत्ति हो …….. तो बच्चे के लिए इस तरह का व्यवहार………….. कई लोग यहाँ ऐसे भी है जो रोजगार के अवसर न होने के कारण दिल्ली मे बेहद विषम परिस्थिति मे जीवन यापन कर रहे हैं……… जिनके घर वालों ने कम उम्र से ही उन्हे पढ़ने के लिए बाहर भेज दिया……. ओर जो आज भी अपने माता पिता से दूर है…… यहाँ बात विवशता की है। किन्तु मेरे मित्र के केस मे विवशता है ही नहीं……… यहाँ अपने अभिमान के लिए पुत्र का बलिदान है……. पुत्र अपना स्कूल खोलने को तैयार था ………. तो कहा नहीं ….. लोग क्या कहेंगे…… बाप के पैसे से स्कूल चला रहा है…… इतना पढ़ कर स्कूल चलना ……. नहीं………. वो लड़का आज हल्द्वानी नहीं आता क्योकि वो एक 10 लाख के सालाना वेतन वाले की तरह व्यवहार नहीं कर सकता…… जैसा की उसके संबंध मे प्रचारित है….. इसकी आधी सेलरी वो पाता है……. पर पिता का अहं उसको 5 लाख सालाना मे स्वीकार नहीं कर पा रहा है……… क्या जिस स्थान पर आपने जन्म लिया जहाँ आप पाले बढ़े……. वहाँ आने का आपका मन नही होगा….. तो कैसे उसको उस स्थान से दूर करने वाले पिता के प्रति वो लगाव रखे…….. लोभ ओर अहंकार सम्बन्धों को समाप्त कर देता है…….. झूठी शान के लिए पुत्र का बलिदान किस तरह से न्यायोचित ठहराया जा सकता है…………… आपकी निष्पक्ष प्रतिक्रिया के लिए शूक्रिया……….

    Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
    January 19, 2011

    पियूष जी मैं इस बारे में भी लिखा था की पिता का ये कार्य गलत था, क्योंकि ये ढांचा कर्तव्य की नीव पर न खड़ा होकर झूठी प्रतिष्ठा दिखाने के दलदल में खड़ा है | और रही बात १०-लाख और ५ लाख वार्षिक वेतन पाने वालों के जीवन स्तर में अंतर की बात तो इतना अधिक अंतर नहीं है | हाँ ये गलत है की पिता की झूठी प्रतिष्ठा को ध्यान में रखकर उसे स्वांग करना पड़ेगा | या सच कहने पर प्रतिष्ठा को थेश लगत है, लेकिन ऐसा कुछ नहीं प्रतिष्ठा को कोई थेश नहीं लगाती झूठ बोलने से प्रतिष्ठा नहीं बनती है , ऐसे में आपके मित्र को नि संकोच अपने घर जाना चाहिए, आपका मित्र अगर ५ लाख पात है और सच कहता हा तो अपराधी नहीं की उसे लोग अस्वीकार करेंगे …….

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 20, 2011

    भाई शैलेश जी…… आपको अपने मित्र के पक्ष मे बताते बताते मैं इतना बता चुका हूँ………. की कहीं उसके पिता जी को पता चल गया…… तो………. ?  पर आपकी हर बात से मैं सहमत हूँ…… वो आज भी जब कोई उसको पूछता है तो अपनी सही सैलरी बोलता है….. ओर उसकी ये बात उसके पिता को गवारा नहीं है…….. क्योकि झूठी प्रतिष्ठा पर चोट लगती है….. भले ही लोग बेटे को सत्यवादी कहें पर इसका प्रतिकुल असर पिता पर पड़ेगा…….. तो वो आता ही नहीं है…….. न आएगा…… न किसी को अपनी नौकरी के बारे मे बताना पड़ेगा ओर न ही उसके पिता के सम्मान को ठेस लगेगी………………. आपने एक सपूत की तरह उसके पिता के हर भाव का सम्मान किया…….. इसके लिए आप प्रसंशा के पात्र है…

ashutoshda के द्वारा
January 19, 2011

लेकिन आपके मित्र की माता पिता के प्रति संवेदनशीलता के बारें मैं आप क्या कहेगें उन्होंने तो आपके मित्र की भलाई ही करी क्या आपके मित्र को महसूस नहीं होता जो कुछ उसके माता पिता ने किया वो कुलमिला के उसके लिए अच्छा ही किया भले ही इसमें उनका अहम् हो और उसको अब उन्हें अपने साथ रखना चाहिए मुद्दा पियूष भाई यह है की सब कुछ होते हुए भी लड़का अपने माता पिता को साथ मैं नहीं रख रहा तब जब उसके माता पिता को उसकी बहुत जरूरत है मुद्दा यह है की आप माता पिता से कुछ अनबन होने पर उन्हें साथ रखने से मना कर दे मुद्दा यह नहीं की आपने हल्द्वानी मैं ही अपना करियर बना लिया जहाँ आपके माता पिता रहते है और वो उस शहर को छोड़ना नहीं चाहते है शायद आप कुछ गलत समझ बैठे है वैसे आपके संघर्ष की दाद देने से मैं नहीं चुकूँगा यक़ीनन आपने अपने आप को सिद्ध किया और माता पिता का आशीर्वाद पाया ! यह उनके आशीर्वाद का ही फल है जो आप सरकारी नौकरी पाने मैं सफल रहे ! आशुतोष दा

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 19, 2011

    भाई आशुदोष जी…….. मेरा मित्र संवेदनाहीन हुआ है तो उसकी वजह वो जीवन है जहां उसको हर पल संघर्ष करना पड़ रहा है……. महानगरों मे वो लोग जो माँ बाप (परिवार) से दूर रह रहे हैं…… उनका जीवन कितना कष्ट प्रद है वो ही जानते हैं………. बीमारी हो या कोई दुख खुद से ही बाटना पड़ता है…… कोई सहारा नहीं जिसके कंधे पर सर रख कर अपना दुख दूर किया जाए……. सुबह से रात तक नौकरी कर के जब खाली कमरे मे आओ………… तो लगता है की क्या इस जीवन का कोई मूल्य है……. ओर क्या ये जीवन है भी………. जब कंपनियाँ कर्मचारियो को हर बदलते दिन मे जाने कब बाहर कर दें……. तो नौकरी बचाने के प्रयासों मे सारा जीवन हाथ से छुट जाता है……… ओर आईटी फील्ड तो ओर भी काटों से भरा है……. रोज नए नए सॉफ्टवेर आ रहे है…. आपको हर नए बदलाव के लिए खुद को तैयार करना पड़ता है………. तो जीवन कैसे जिया जाए…………. ओर जहां तक मेरा प्रश्न है ……… मैं शुरू से ही ये मानता हूँ………… की मेरी सफलता मे मेरे घरवालों का हाथ है……… उन्होने जो भरोसा मुझपर दिखाया वो ही मुझे सरकारी नौकरियों तक ले गया……….

Aakash Tiwaari के द्वारा
January 19, 2011

श्री पियूष जी, मेरे पिता जी के दोस्त भी आपके दोस्त के पिता की तरह ही है……आज उनका लड़का अपने पिता द्वारा थोपे गए फैसले से बहुत पिछड़ गया है… मै इंटर पास करते ही इलाहबाद छोडकर दिल्ली नौकरी करने गया और फिर मेरी भी स्थिति बिलकुल आपके जैसे ही हो गयी थी…सबने फोन पर मुझको बहुत साहस बंधवाया मगर मम्मी की बुझी आवाज और बड़े भाई का अकेलापन मुझे दिल्ली में 10 दिन भी नहीं रोक सका और मै एक हफ्ते में ही वापस अपने घर आ गया….फिर यही अपना शेयर बाजार का बिजनेस शुरू कर दिया….सबके साथ भी हूँ सबके पास भी हूँ… मै अपने परिवार के बिना नहीं रह सकता….. आपका लेख एक सौ दस प्रतिशत सत्य है आकाश तिवारी

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 19, 2011

    आकाश भाई….. ये बड़ा खेद का विशय है की कई बार औलाद अपने माता पिता के साथ रहकर पितृ ऋण से मुक्त होना चाहती है…… हालांकि ये किसी भी तरह से संभव नहीं है की इस ऋण को चुकाया जाए……….. पर इसका प्रयास करने वालों को माता पिता के द्वारा ही रोक दिया जाता है……. आपने जो अपने परिवार के लिए किया है वो संस्कारों के तौर पर आने वाली पीढ़ी तक जाएगा……….

abodhbaalak के द्वारा
January 19, 2011

आपने एक न्य पक्ष रखा है पियूष जी, सच तो है की ऐसा भी होता है, माँ बाप को एक आयु के बाद बच्चो को अपने निर्णय के लिए खुला छोड़ना चाहिए, पर ऐसा दुसरे वाले केसेस के अनुपात में कम ही होता है. आप सदा ही जो लिखते है, वो सबसे अलग होता है…, इस लिए आपके लेख अपना एक अलग ही महत्व रखते हैं http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 19, 2011

    भाई अबोध जी…… आपकी निष्पक्ष प्रतिक्रिया हमारे लिए विशेष महत्व रखती है……… आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…………

ashutoshda के द्वारा
January 19, 2011

पियूष जी नमस्कार आपका चयन एल आई सी में हुआ इसके लिए बंधाई लेकिन सभी आपके जैसे नहीं होते कभी कभी आपके जैसो द्वारा लिया निर्णय वास्तव मैं गलत हो जाते है ! ! इसलिए मैं आपकी कहानी को अपवाद ही मानूगा ! आशुतोष दा

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 19, 2011

    आदरणीय आशुतोष दा ,, जहां तक मेरा प्रश्न है तो मैं बताता हूँ…… की कितना संघर्ष मुझे करना पड़ा……. मैं हाईस्कूल परीक्षा मे अच्छे अंक प्राप्त नहीं कर पाया था…. क्योकि मेरे सामाजिक विषय मे केवल पाससिंग मार्क्स थे…….. ये विषय मुझे शुरू से ही उबाऊ लगता था॥ पर जब मैंने सबकुछ छोडकर सरकारी की ओर जाने का फैसला लिया तो  मेरे सामने ये चुनौती थी……. मैं स्नातक मे कम्प्युटर विज्ञान का स्टूडेंट था….. मैंने सबकुछ छोड़ कर इतिहास, भूगोल जैसे बोरिंग विषय पढ़ना शुरू किए…….. मैं अक्सर बोर हो जाता था… पर तब मे ये सोच कर ओर मेहनत करता था की अगर बाबर अकबर से दोस्ती नहीं की तो घर से दूर होना होगा….. फिर जब मैं प्रतियोगी परीक्षाओं मे सफल होने लगा तो फिर मुझे इंटरव्यू मे होने वाले खेल से जूझना पड़ा…….. फिर किसी ने कहा की एलआईसी ओर बैंक के पेपर मे ऐसा कुछ नहीं होता….. तो मैंने इस ओर रुख किया….. 3 माह लगातार पढ़ने के बाद मैं एलआईसी की विकास अधिकारी ओर एसबीआई क्लर्क के लिए परीक्षा मे सफल हुआ………. पर दोनों इंटरव्यू मे नहीं…….. फिर भी मे लगा रहा ओर तब मैं एलआईसी कैशियर के पद पर चयनित हुआ…… ओर फिर मुझे हल्द्वानी से 100 किमी दूर की ब्रांच मिली……. मैं वहीं रहता ओर शनिवार को वहाँ से आकार सोमवार को मैं वापस जाता …. फिर एक ओर परीक्षा मे मेरा चयन हुआ ओर मैं अपने वर्तमान पद पर पहुंचा……….. जहां मैं रोज डेढ़ - डेढ़ घंटे के सफर के बाद घर से आ जा सकता हूँ….. तो मेरा ये मानना है की सारी कोशिश इस सोच के साथ की जाए की ये निर्णय ही जीवन मरण का है…. तो सब कुछ हो जाता है…. इस तरह की कोशिश मे माँ बाप का आशीर्वाद काम आता है……………… आपकी प्रतिकृया के लिए शुक्रिया………….

Preeti Mishra के द्वारा
January 19, 2011

सही कहा पीयूषजी आपने कई बार बेटे के अलग रहने का कारण वह खुद नहीं होता लेकिन यह हमारे समाज की मानसिकता है कि वह बिना कारण जाने बेटे को ही दोष देता है.कोई बेटे का पक्ष ही नहीं जानना चाहता.अच्छी रचना.बधाई.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 19, 2011

    आपने इस भावना को समझा और मेरी बात का समर्थन किए उसके लिए ओर ……….. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……

nishamittal के द्वारा
January 19, 2011

पियूष जी इस सन्दर्भ में पूर्व में एक लेख मेरे द्वारा लिखा गया था कि माता-पिता अपने अरमान बच्चों के माध्यम से पूर्ण करना चाहते हैं ,परिचितों के बच्चों को विदेश गमन के लिए जाता देख ऐसी इच्छाएं उनकी रहती हैं,परन्तु बारम्बार बच्चों की अनिच्छा होने पर भी इस बात के लिए एक सपना पाल लेते हैं परन्तु दुःख इस बात का है कि जब वो बच्चे अपने उत्तरदायित्व के चलते समयाभाव के कारण समय नहीं दे पाते तो दुखी होते हैं.सपने पालना बुरा नहीं परन्तु उसके बाद बच्चों पर दोषारोपण करना अनुचित है.यह व्य्ताथा बहुत परिवारों की है.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 19, 2011

    बिलकुल सही कहा है आपने की………. सपने पालना बुरा नहीं परन्तु उसके बाद बच्चों पर दोषारोपण करना अनुचित है. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………………….

rachna varma के द्वारा
January 19, 2011

जीवन के एक यथार्थ परक अनुभव को साझा करने के लिए साधुवाद ! तथा माता -पिता के झूठे अहम को समानांतर रख कर जिस तरह से आपने इस घटना को व्यक्त किया उससे पता चलता है कि हमेशा औलाद ही गलत नहीं होते कभी -कभी पुरानी पीढ़ी भी अपने ही बनाये झूठी आन -बान -शान के धागे में उलझ कर अपने बच्चो से दूर हो जाती है ! एक अच्छे लेख के लिए धन्यवाद !

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 19, 2011

    रचना जी…… यही सत्य है की हर सिक्के के दो पहलू होते हैं…… इस लिए इसको एक ही तरीके से देखना गलत ही होगा………… आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………

वाहिद काशीवासी के द्वारा
January 19, 2011

पीयूष जी! बहुत ही भाव विह्वल करने वाला यथार्थ आपने सामने रखा है| कभी समय मिला तो अवश्य आपके साथ मैं भी अपने अनुभव बाटूंगा| शुभकामनाएँ आपको,

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 19, 2011

    आपके अनुभव का इंतज़ार रहेगा…… आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………

rajkamal के द्वारा
January 18, 2011

प्रिय पियूष भाई …. नमस्कार ! आपकी इस रचना से मुझको भी एक कहानी याद अ गई है ….. शायद अगली बार कहूँ …… “हाथों की लकीरों में विधवा का योग” आपने अपनी बात सुंदर शब्दों में और हमेशा की तरह सलीके से प्रस्तुत की है ….. अच्छे लेखन पर बधाई

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 19, 2011

    राजकमल भाई हर बार की तरह उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……….


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