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जब मैं घर से भाग गया.............

Posted On: 7 Jan, 2011 Others में

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बात उन दिनों की है जब मैं कोई दस या ग्यारह साल का था……… हमारे आसपास के क्षेत्र मे एक अजीब सा माहौल था………. हर तीसरे दिन किसी न किसी लड़के के भागने की खबर सुनाई देती……….. बड़ा आश्चर्य होता की कैसे भाग गया वो लड़का……..

फिर घर पर और आस पड़ोस मे चर्चा होती की घरवाले उसको डाटते पीटते होंगे………. इसलिए भाग गया होगा…… अरे बच्चा है उसको प्यार से समझ बुझा कर रखना चाहिए…… मार पीट कर तो वो भागेगा ही…… फिर एक दिन मेरे एक रिश्तेदार का लड़का भी भाग गया…….. फिर जब वो लौट आया तो उसके कुछ दिन बाद उसकी माता जी हमारे घर आईं …….. तो हमारी माता जी ने समझाते हुए कहा की….. देखो अब वो आ गया है तो अब उसको कुछ मत कहना…….. उसको प्यार से समझाया बुझाया करो…… आखिर बच्चा ही तो है…….. अब डांटना मत ……….


ओर वो चली गयी……. फिर एक दिन उनके घर जाना हुआ …… तो वो लड़का बिलकुल राजा बेटा बना दिखाई दिया……. लगा है शरारतों मे ओर कोई कुछ नहीं कह रहा……. पिछली बार जब आया था तो इस से भी कम शरारतों मे उसकी कई बार सेवा खातिर हो गयी थी…. उसके बदले हालात देख कर मुझे बड़ा अच्छा लगा मानो कई गुरु मंत्र मिल गया………..


अब मैंने सोचा ये बड़ा सरल है ……….. जब भी घर वाले सताने लगें तो घर से भाग जाओ………. फिर तो सम्मान ही सम्मान है……. अब मैं तैयार था किसी भी झमेले के लिए……… जब किसी समस्या का समाधान आपको मिल जाता है तो आपके भीतर एक अजीब सा आत्मविश्वास आ जाता है…… फिर आप उस समस्या का इंतज़ार बेसब्री से करने लगते हैं…….. ऐसे ही मैं भी इंतज़ार मे था की अब मैं कब पिटूँ ओर कब घर से भाग जाऊँ………… ओर कब मैं घर का राज कुमार बन जाऊँ………..


ऐसा कोई मौका नहीं आया……. अब मैं परेशान होने लगा……. लगा ये बड़ा मुश्किल है…… किसी को तो रोज मौका मिले ओर किसी को एक भी नहीं…….. क्या है ये…..?


फिर अचानक एक दिन छूट्टी का दिन था…… सुबह सुबह मैंने अपने घर के बाहर लगे अमरूद के पेड़ पर पत्थर फेंक के मारा ओर वो पत्थर पडोसी के घर मे घुस गया……. ओर वो मुझे पिताजी के सामने ले जाकर डांटने लगे……..


हमारे पिताजी ने कई बार हमें पत्थर फेंकने पर डांटा था…….. फिर उसदिन फिर जम के डांट पड़ गयी…. मुझे पकड़ कर पिताजी भीतर ले गए ओर पढ़ने के लिए बैठा दिया…… जैसे ही पिताजी बाहर की ओर गए……… मैं घर से भाग लिया…….. करीब आधे घंटे तक मैं दौड़ा…….. फिर मैं मेन रोड पर पहुँच गया………… तो याद आया की पिताजी ने कहा था की मेन रोड की ओर अकेले कभी भी मत जाना…… तो फिर मैं दूसरी ओर दौड़ने लगा……… जब बहुत थक गया ……. तो घर की ओर वापस चल दिया…….


घर पहुंचा तो किसी ने कुछ खास ध्यान नहीं दिया…… मैं बड़ा आश्चर्यचकित हो गया …. की ये क्या है….. फिर मैंने अपनी माता जी से कहा की मैं अभी भाग कर वापस आ रहा हूँ………. मुझे कुछ तो तवज्जो दो….. सब लोग हसने लगे……… मैं झेप गया…… मेरी समझ मे नहीं आया की मैं इतनी दूर तक भागा ओर फिर भी मुझे कोई भाव नही दिया……… क्या मैं गलत भागा…….


अब मैंने सोचा की क्यों न उस लड़के से भागने का सही तरीका पूछूं…… ओर सही तरह से भागूँ………. फिर मैं उस लड़के से मिला……. मैंने बिना ये बताए की मैं एक बार भागने का असफल प्रयास कर चुका हूँ…… उससे पूछा की भाई तू भागा कैसे ……….?


तू उसने बताया की मैं बस अड्डे गया ओर एक बस मे चड़ गया…… फिर तीन चार दिन इधर उधर घूमता रहा फिर एक आदमी ने मुझे पकड़ा ओर घर वालों को बता दिया……… अब मेरी समझ मे आया की वीआईपी ट्रीटमेंट के लिए तीन चार दिन के लिए भागना पड़ेगा…….

अब घर जाते ही मैं बिलकुल सभ्य सा बर्ताव करने लगा…….. अभी तक जो अलादीन का चिराग घर से भागने का सूत्र मेरे हाथ लगा था …….. वो अचानक कहीं खो गया….. क्योंकि मैं अपने घर वालों से 4-5 घंटे दूर नहीं रह सकता था …. तो पूरा दिन दूर रहने का कोई सवाल ही नहीं था……… ओर फिर मैंने ये खयाल छोड़ दिया………….


इस बात का एक मात्र सबक यही है की किसी भी बुराई को किसी की ताकत न बनने दिया जाए……..समाज मे यही हो रहा है……… हम बच्चों को यही सीखा रहे है……. वो खेल कूद कर रहा है तो हम उसको डरते हैं…….. उससे नाराज हो जाते हैं……. पर जैसे ही वो बीमार होता है या कभी चोटिल हो जाता है….. या किसी भी तरह परेशान होता है…. तो हम उसको प्रेम से सराबोर कर देते हैं……… हम सब उसपर प्रेम की वर्षा करने को तत्पर हो जाते हैं….. कहीं उसके बाल मन मे ये धारणा न बस जाए की मुझे तभी प्रेम मिलेगा जब की मैं परेशान / दुखी / बीमार हुंगा…… ओर वो इन सबको अपनाने का आदि हो जाए…… हमें ध्यान देना होगा की बच्चों के सामने किसी बुराई को ताकत का रूप न लेने दें………

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731 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
February 20, 2011

घर पहुंचा तो किसी ने कुछ खास ध्यान नहीं दिया…… मैं बड़ा आश्चर्यचकित हो गया …. की ये क्या है….. फिर मैंने अपनी माता जी से कहा की मैं अभी भाग कर वापस आ रहा हूँ………. मुझे कुछ तो तवज्जो दो….. सब लोग हसने लगे……… मैं झेप गया…… मेरी समझ मे नहीं आया की मैं इतनी दूर तक भागा ओर फिर भी मुझे कोई भाव नही दिया……… क्या मैं गलत भागा……. अब मैंने सोचा की क्यों न उस लड़के से भागने का सही तरीका पूछूं…… ओर सही तरह से भागूँ………. फिर मैं उस लड़के से मिला……. मैंने बिना ये बताए की मैं एक बार भागने का असफल प्रयास कर चुका हूँ…… उससे पूछा की भाई तू भागा कैसे ………. ————————————————————————————- बहुत खूब पियूष जी मजेदार संस्मरण ….. जिसके साथ आपने इसकी नैतिक शिक्षा जोड़कर और अच्छा बना दिया है बधाई :) ———————————————————————————— हाँ एक बात याद रखिये अब भागने की कोशिश मत करियेगा नहीं तो सत्कार तो मिलाने से रहा …. मार डाट फ्री में मिल जायेगी :) ———————————————————————–

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 20, 2011

    भाई शैलेश जी …….. तब नहीं भाग पाए तो अब तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता…. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………

Aakash Tiwaari के द्वारा
January 10, 2011

आदरणीय श्री पियूष जी, अच्छा हुआ घर से भागने का ख्याल आपके दिमाग से निकल गया…वरना आप कहीं खो जाते तो आज ये ज्ञानवर्धक लेख हम कैसे पढ़ पाते…एक बार फिर ज्ञान वर्धक लेख पर आपको ढेर सारी बधाई…. आकाश तिवारी

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 10, 2011

    आकाश भाई …….. आपके स्नेह ओर इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…………..

nishamittal के द्वारा
January 9, 2011

पीयूष जी माता-पिता का सकारात्मक व्यवहार बच्चों के गलत क़दमों को सही राह पर मोड़ देता है.बहुत अच्छी आपबीती.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 9, 2011

    आदरणीय निशा जी…….. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……

Harish Bhatt के द्वारा
January 9, 2011

पियूष जी नमस्ते, बहुत ही बेहतरीन लेख के लिए हार्दिक बधाई. आपने सही कहा कि हमें ध्यान देना होगा की बच्चों के सामने किसी बुराई को ताकत का रूप न लेने दें

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 9, 2011

    हरीश जी………. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…….

kmmishra के द्वारा
January 9, 2011

पंज जी ऐसी ही एक कोशिश मैंने भी की थी, मात्र दो घंटों के लिये ही भाग पाया था । लेकिन इतने में छोटे भाई की घर वालों ने खूब खबर ली थी । मेरी उससे लड़ाई हुयी थी । थोड़ी देर पार्क में बैठा रहा फिर यह सोच कर वापस हो लिया कि भाई अब तक खुब डाट खा चुका होगा । बचपन की यादें ताजा हो गयीं । आभार ।

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 9, 2011

    आदरणीय मिश्रा जी…….. संयोगवश सभी लोग इस कृत्य को करते हैं……… कुछ विराट स्तर पर तो कुछ आपकी ओर मेरी तरह आंशिक रूप मे………. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………

विनोद पाराशर के द्वारा
January 9, 2011

पियूष जी, बच्चों की मानसिकता पर सुंदर आलेख पढने को मिला.धन्यवाद.मानव स्वभाव को समझने व उसे जनसाधारण की भाषा में समझाने में आप सिद्धस्थ हॆं.आशा हॆ, भविष्य में इस तरह के ऒर भी लेख -पढने को मिलते रहेंगे.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 9, 2011

    आदरणीय विनोद जी……. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……….

Amita Srivastava के द्वारा
January 8, 2011

पीयूष जी,  आपका लेख हमेे बच्चो  के मनोिवज्ञान के िवषय  मे बहुत कुछ सोचने पर मजबूूर करती है. अच्छे लेेख केे िलए बधाई.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 9, 2011

    अमिता जी……… आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………

Amita Srivastava के द्वारा
January 8, 2011

पीयूष जी,  आपका लेख हमेे बच्चो  के मनोिवज्ञान के िवषय  मे बहुत कुछ सोचने पर मजबूूर करती है. अच्छे लेेख ककेे िलए बधाई.

HIMANSHU BHATT के द्वारा
January 8, 2011

पियूष जी कहानी में मजा आ गया….. बहुत सुंदर तरीके से बाल मनोविज्ञान को समझाया है आपने…. सुंदर रचना के लिए साधुवाद….

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    January 8, 2011

    पियूष जी १५०० वें कम्मेंट मैंने आपको दिया है….. बधाई स्वीकार करें.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 9, 2011

    आदरणीय भट्ट जी……… कहाँ पड़े हैं गिनती के चक्कर मे……… ओर बाल मनोविज्ञान तो आपसे बेहतर कोई समझता ही नहीं है……….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…………

Alka Gupta के द्वारा
January 8, 2011

पीयूष जी , बाल मन को समझना अपने आप में ही एक बहुत बड़ी बात है…….. उनमें अनुकरण की प्रवृत्ति प्रबल होती है………ध्यान देने योग्य बात ज्यादा प्यार कहीं उसके जीवन के लिए तो हानिकारक नहीं हो रहा है …..| किसी को किसी की ताकत न बनने दिया जाए बहुत ही अच्छा सन्देश देती हुई रचना है !

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 8, 2011

    आदरणीय अल्का ही… साथ ही साथ ध्यान देने योग्य बात ये भी है की कहीं ज्यादा उपेक्षा उसके जीवन के लिए तो हानिकारक नहीं हो रहा है…… कई बार हम बात बात पर बच्चे को टोकते हैं……. इसका भी उसके मन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है…………. क्योकि उसकी ऊर्जा का स्तर उसको स्थिर नहीं रहने देता… ओर ये उसका मौलिक आचरण हैं… तो हमको उसके इस पक्ष को भी देखना होगा……….

    Rose के द्वारा
    July 12, 2016

    Евгений Вольнов / он говорил о свободе и говорил правильно. послушай ÐБÂ½ÃÂ¸ÃÂ¼ÃÂ°ÃÂòµ»ÑŒÐ½ÐµÐµ.Я во многом с ним согласен и не о чем спорить же.

Deepak Sahu के द्वारा
January 8, 2011

पीयूष जी! एक बहुत सुन्दर ब्लॉग आपका! बधाई! दीपक http://deepakkumarsahu.jagranjunction.com/

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 8, 2011

    दीपक भाई…… आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………

atharvavedamanoj के द्वारा
January 8, 2011

भागने का अपुन के पास ग्रेट एक्सपेरिएंस है…..तीन तीन बार भाग चूका हूँ घर से…शहर से भागता और गाँव आ जाता…घर वाले परेशान…जंतर मंतर जादू टोना सब कुछ हो गया पर मैं अपनी आदत से बाज थोड़े ही आने वाला था…जहाँ मौका मिला छु मंतर….कई बार तो अदृश्य शक्तियों तक से साक्षात्कार हो चुका हैं…और डर के मारे सच में छोडिये जाने दीजिये…..आपका संस्मरण लाजबाब है मेरा तो हारर भी है…कभी अवसर मिला तो मंच पर रखूँगा…आपका आभार जय भारत, जय भारती

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 8, 2011

    भ्राता मनोज जी……….. आपके इस संस्मरण का इंतज़ार रहेगा………. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………

Dharmesh Tiwari के द्वारा
January 8, 2011

पियूष जी,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,कहानी के माध्यम से एक अच्छी शीख,,,,,,,,,,,हर चीज अपने आप में एक कला होती है,धन्यवाद!

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 8, 2011

    धर्मेश जी आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…………

    Hester के द्वारा
    July 12, 2016

    Michael — don’t be so modest. You have offered definitive proof that some public health groups were too quick to jump to conclusions about political interference in the DOJ case. I’m sure some will criticize you for citing a former B&W lawyer and an anonynmous blogger but unlrtounatefy that type of accusatory behavior is all to typical of these so-called “defenders of the truth”. As you rightly point out, Bass doesn’t work for the industry any more so he can hardly be accused of being a front for them.

shailandra singh के द्वारा
January 8, 2011

पंतजी आपका आलेख पड़ा अच्छा लगा और यह महशुस भी हुआ की घर से भागना भी एक कला है और एक संकेत,भी क़ि आज हम बच्चे है तो भागना या डांट डपट एक सामाजिक सरोकार है क़ि गलती करोगे तो डांट खाओगे और पिटाई भी हो सकती है पर जब हम बड़े हो जाते है हमें भी बही कुछ करना होता है जो हमारे माँ और बाप करते है क्यों क़ि बच्चो की भलाई का सच उनमे निहित है अच्छा लेख बधाई हो.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 8, 2011

    शैलन्द्र जी……… बच्चे की ज़िद्द को दबाना नहीं खत्म करना जरूरी है……… उसको उसकी जिद्द न पूरी किये जाने के कारण समझाने चाहिए……….. तब ही बदलाव संभव है………. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……

aditya के द्वारा
January 8, 2011

पन्त जी नमस्कार, बाल मन की कोमल बातों के माध्यम से बाल मनोविज्ञान का सुन्दर सन्देश देने का एक बहुत ही अच्छा कार्य आपने किया है. इस प्रकार आपने आज के उन अभिभावकों को सन्देश दिया है जो बाल मनोविज्ञान को बिना समझे बच्चों से साथ दुर्व्यवहार करते हैं…………….खैर आप उम्दा लेखक हो यह तो मैं आपके विषय में पहले भी कह चुका हूँ…………..आपकी तरक्की की ईश्वर से प्रार्थना है………… सुन्दर लेख के लिए हृदय से आभार. आपका आदित्य. http://www.aditya.jagranjunction.com

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 8, 2011

    भ्राता आदित्य जी……. हम बच्चों को सिखाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं……. किन्तु बच्चों के लिए बच्चों का नज़रिया समझने ओर सीखने को तैयार नहीं हैं………. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……

naturecure के द्वारा
January 8, 2011

पियुष जी, आपने एक बहुत ही प्रेरणादायी संस्मरण लिखा है , इसके लिए बधाई | वास्तव में बच्चों का मन तो कोमल होता है , यह कर्त्तव्य तो माँ-पिता का ही है कि वे अपने बच्चों के मन में संस्कार के बीज बोयें | क्योंकि- ——” तराशा गया पत्थर शंकर बन जाता है, और बिना तराशा पत्थर कंकर ही रह जाता है |”

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 8, 2011

    सही कहा आपने की बच्चों के कोमल मन पर पड़ने वाले प्रभावों को ध्यान मे रख कर ही हमको कोई बात कहनी या करनी चाहिए………. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……

abodhbaalak के द्वारा
January 8, 2011

पियूष जी आपने अपनी इस कहानी के द्वारा एक सीख भी दे दी है, की बच्चो के साथ किस तरह का व्यवाहर करना चाहिए…, एक पंथ दो काज, मज़ा भी आ गया और कुछ सीखने को भी मिल गया. :) http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 8, 2011

    अबोध जी……. ये आप जैसे लोगों के लिए नहीं अपितु वास्तविक अबोधों के लिए सबक है की माता पिता की भावनाओं को ब्लैक मेलिंग से आहात नहीं करना चाहिए………… आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……

Ramesh bajpai के द्वारा
January 8, 2011

प्रिय पियूष जी बचपन के संस्कार कोमल मन को बाल सुलभ उत्कंठाओ से भर ते है ,यही संस्कार ढाल का उत्तर दायित्व भी निभाते है आप का अपने परिवार से चन्द घंटो का वियोग न सह पाना उस प्यार की निशानी है जो माता पिता ने आप पर लुटाया है | बचपन की in मीठी यादो को हमसे बाटने का शुक्रिया |

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 8, 2011

    आदरणीय बाजपई जी……… पर सबसे बड़ी त्रासदी ये है की कुछ लोग हमारे इस व्यवहार को होम सिकनेस, ओर कुसंस्कार जैसे शब्दों से अलंकृत करते है…. क्योकि इसी कारण मैं कई बार जॉब छोड़ छोड़ कर वापस घर आया ओर केवल ऐसी सरकारी नौकरी की तलाश मे रहा जो मुझे घर से दूर न होने दे……….. अब जब ये सब हो गया तो वही लोग जो मुझे कुसंस्कारी कहते थे…………. अब कहते हैं की किस्मत है नहीं तो घर पर किसको नौकरी मिलती है……. …… आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……

rajkamal के द्वारा
January 7, 2011

प्रिय पियूष भाई ….. नमस्कार ! यह जान कर बहुत ही दुःख हुआ की आपकी घर से भागने की बचपन की इच्छा अभी तक अधूरी ही है ….. खैर अब तो लड़का बांका जवान हो चूका है ….. एक मस्त पटाखा लड़की भी मेरी नजर में है ….. उसके संग भागने के बारे में आपका क्या ख्याल है …. जब उसके साथ अपने घर में जायोगे तो मुझको पूरा यकीन है की आप दोनों की खूब खातिरदारी होगी ….. बिना सोचे समझे अपना विचार बतलाना …. जल्दी से पहले इसको अमल में लाना … आपका एक परम हितैषी

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 8, 2011

    भाई राजकमल जी…….. हम 1-2 दिन से ज्यादा अपने घर से दूर नहीं रह पाते…………….. इसिलिये रोज 5 घंटे यात्रा करके नौकरी कर रहे हैं….. ओर आप ऐसी राय दे रहे हैं…. की जीवन भर का अज्ञातवास हो जाए………. आपकी इस अनमोल राय पर विचार करने पर भी घर से तड़ीपार किया जा सकता है…….. इस लिए आप अपनी उस पटाखा लड़की के लिए कोई दूसरा ब्लॉगर खोजें……… आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    January 8, 2011

    राज कमल जी का ऑफर बिलकुल ठीक है …. शायद पियूष जी को पसंद भी हो लेकिन लोक लाज के डर से स्वीकार नहीं कर पा रहे होंगे…. राज जी पियूष जी को ऐसे ऑफर फ़ोन पर देते तो वे स्वीकार कर लेते…एक बार ट्राई कीजियेगा… गारंटी १०० %

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 9, 2011

    नहीं हिमांशु भट्ट जी……. हम इनके ऑफर को फोन पर भी नही मानेगे……….. जब ये खुद इतने पंगेबाज हैं तो इनकी पसंद …. ? इन परिस्थितियों मे आदमी घर छोड़े भी तो कैसे….

Syeds के द्वारा
January 7, 2011

पियूष जी, बहुत अच्छा लेख..बच्चों की सहीतरीके से परवरिश बहुत ज़रूरी है…अक्सर बच्चों के ग़लत कदम उठाने की वजह घर वाले ही होते हैं… http://syeds.jagranjunction.com

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 8, 2011

    मैं तो ये तक कहता हूँ की भले आप अपने बच्चे की परवरिश न कर पाएँ कोई समस्या नहीं पर….. उसकी किसी गलत मांग को पूरा कर बाकी के बच्चों के लिए एक मिसाल न बना दें……….. जिससे अन्य लोग परेशान हों…….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……..

Amit Dehati के द्वारा
January 7, 2011

आदरणीय पियूष जी प्रणाम ! बिल्कुल सही फरमाया आपने ……..अगर हम बच्चो पर पहले से ही ध्यान दे और उसकी हर जरुरत को समझने की कोशिस करें तो शायद ऐसा नहीं होगा | लेकिन भ्राता श्री आजकल के बच्चे भी होसियार हो गए है .//……..यहाँ यूज से ज्यादा मिसयूज किया जाता है …………….. धन्यबाद !

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 8, 2011

    अमित जी इस विषय को उठाने का कारण ही यही है की दो दिन पूर्व एक लड़के को जो की 15-16 साल का है …. बाइक मे जाते देखा …….. वो कुछ समय पूर्व घर से भाग चुका था…. तो वापस आने पर उसको बाइक का नज़राना दिया गया………तब मन मे  ये प्रश्न उठा की क्या अब उस को देख कर अन्य बच्चे इस ओर प्रेरित नहीं होंगे………. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……….


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