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बूढ़े माता-पिता अकेले क्यों........?

Posted On: 16 Jan, 2011 Others में

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कल एक ब्लॉग पढ़ा ……..कुछ तो शर्म करो …….……..  जिसमे वृद्ध आश्रमों मे कष्ट झेल रहे बूढ़े माता पिताओं के बारे मे उल्लेख था…….. खूबसूरत इस लेख को पढ़ कर मैंने भी प्रतिक्रिया मे शायद औलाद को कोस कर अपने दायित्व की पूर्ति कर लेनी थी…… किन्तु इस लेख को पढ़ते समय मुझे अपने एक मित्र की याद आई……. जो आज बाहर किसी कंपनी मे है…. ओर उसके अकेले माता पिता यहाँ है…….. तो इस लेख को एक बार मैंने उस की नज़र से पढ़ा ओर जो समझ आया वो लिख रहा हूँ………. लेख को स्पष्ट करने के लिए एक दो कहानिया भी इधर उधर से ली गयी हैं……………..


एक बार एक छोटा सा बालक अपनी माँ के साथ बैठा था……. उसकी माँ उसके मुख को देख कर रोने लगी…… उसने पूछा… माँ ! तू इस तरह मेरे मुख को देख कर रो क्यों रही है……. माँ ने कहा तू बड़ा होकर बहुत बड़ा राजा बन जाएगा और तब तू मुझे भूल जाएगा……… क्योकि एक राजा के लिए उसकी सारी प्रजा समान होती है……….
लड़के ने पूछा… माँ तुझे कैसे पता की मैं राजा बनूँगा……. ?


माँ बोली तेरे आगे के दो दाँतों मे राजा बनने के लक्षण हैं……. उन्हे देख कर आज एक विद्वान ने ये बताया…… और उसी ने कहा की एक दिन तू राजसी सुख प्राप्त करेगा……..



लड़के घर से बाहर निकाल गया…….और थोड़ी देर मे वापस अंदर आया….. माँ दरवाजे की ओर पीठ करके बैठी थी…. लड़के ने कहा माँ तेरी परेशानी का समाधान मैंने निकाल लिया है……… और माँ ने पलट कर लड़के की ओर देखा तो उसके मुह से खून निकाल रहा था……. माँ ने पुछा की ये तूने क्या किया……. लड़का बोला की माँ अब तू निश्चिंत हो जा, मैंने अपने वो दाँत ही तोड़ दिये जिनमे राजसी लक्षण थे…… अब न तो मैं राजा बनूँगा ओर न ही कभी तुझसे दूर होना पड़ेगा…………….. ये लड़का आचार्य चाणक्य था………



निश्चित ही ये बालक चाहे कोई भी होता और वो भले अपने दाँत न भी तोड़ता…. पर वो कभी भी अपनी माँ से दूर नहीं होता…….. क्योकि उसकी माँ ने उसको सबक दिया था की उस माँ के लिए एक सम्राट पुत्र की तुलना मे एक साधारण पुत्र ही श्रेष्ठ था………..



इसी तरह का एक प्रसंग आशुतोष मुखर्जी के संबंध मे भी है……… आशुतोष मुखर्जी कलकत्ता हाई कोर्ट के जज थे…….. बाद मे वो विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर भी बने…. वो विलायत जाने के इच्छुक थे …… पर उनकी माँ उनके विलायत जाने के पक्ष मे नहीं थी…… इसी लिए वो भी कभी इस ओर प्रयास नहीं करते थे……..



एक बार जब लार्ड कर्ज़न हिंदुस्तान के गवर्नर जनरल बन कर आए …….. तो उन्होने एक दिन आशुतोष मुखर्जी जी को विलायत जाने की सलाह दी……. मुखर्जी ने कहा, मेरी माँ की इच्छा नहीं हैं…….. और वो नहीं चाहती तो मैं भी नहीं जाऊंगा…………



लार्ड कर्ज़न सत्ता के मद मे चूर थे तो उन्होने कहा , जाकर अपनी माता जी से कहना की भारत के गवर्नर जनरल आपको विलायत जाने का हुक्म देते हैं………



तो इस पर आशुतोष मुखर्जी जी ने कहा की, अगर ये बात है, तो मैं माननीय गवर्नर जनरल से कहूँगा की आशुतोष अपनी माँ की आज्ञा के अतिरिक्त अन्य किसी का आदेश नहीं मानता …….. फिर चाहे वो गवर्नर जनरल हो या कोई सम्राट………..



ये दोनों कहानियाँ ये स्पष्ट करती है की संतान जीवन भर माता-पिता की सेवा के लिए तत्पर है…….. हमारा आपने माता पिता के प्रति प्रेम बदलता नहीं है…….. पर अक्सर कई माँ बाप अपने बच्चों पर अपनी महत्वाकांशा थोप देते हैं………… और माँ बाप द्वारा ही ये सिखाया जाने लगता है की, यार दोस्त, घर परिवार ये सब से अधिक महत्वपूर्ण तुम्हारा भविष्य है……. कल को कोई नहीं पूछेगा अगर ऐसे ही रहे…… जिसके पास पैसा है उसी की ये दुनिया है………..



उसको गलती से भी ये बताया ही नहीं जाता की बेटा हम तुझसे इतना स्नेह करते हैं की कल को यदि तू कुछ नहीं बन पाये तो हमारा सारा बुढ़ापा इसी दुख मे बीत जाएगा की हमारे कारण तू आगे नहीं बढ़ सका…….. क्या इस तरह से उसको नहीं समझाया जा सकता की ये संसार मे प्रेम ही सबसे बड़ा है…. और उन माता पिता का बुढ़ापा बहुत कष्ट मे बीतता है जिनको ये लगता है की उनके प्रेम के कारण उनके पुत्र का भविष्य अंधकारमय हुआ…….. तो हमारा ये प्रेम तेरी कमजोरी न होकर तेरी ताकत हो…..



पहले अपने बच्चों को माता पिता अच्छी पढ़ाई के लिए हॉस्टलस मे दाखिल कर देते हैं…….. और जब उसकी सारी संवेदनाएं मर जाती है…….. जब वो बचपन मे ही माँ के स्नेह और पिता के प्रेम का अर्थ ही नहीं समझ पाता है तो युवा अवस्था मे उसके भीतर उनके प्रति प्रेम का अंकुर कैसे फूट सकता है……… जब उसको बचपन मे ही ये पढ़ा दिया गया है की घर – परिवार, यार – दोस्त – रिश्तेदार सब से पहले भविष्य है…… तो फिर कैसे युवा होते ही वो माँ बाप कैसे ये सोचते हैं की बचपन से सिखाई ये बात वो भूल जाए…… जब एक बार कोई इस अंधी दौड़ मे दौड़ पड़ता है तो फिर अंत तक ये दौड़ खत्म नहीं होती…..



जब उसका कैरियर शुरू हो जाता है उसके बाद वो जैसा की उसको सिखाया गया है की बस आगे बढ़ते ही जाना है…….. कोई सीमा नहीं है ….. ओर फिर जब वो दौड़ना सीख जाता है तो फिर उसपर ज़िम्मेदारी (शादी) डाल दी जाती है…… अब दोहरी ज़िंदगी उसको दौड़ मे कुछ कमजोर कर देती है……. फिर उस पर माँ बाप को ला कर उसकी ज़िंदगी त्रिकोण बन जाती है ……. एक तरफ करियर की दौड़ …….. एक तरफ माँ बाप,…….. एक तरफ उसके बच्चे और वो लड़की (उसकी बीबी) जो उसके लिए सबकुछ छोड़ कर आ गयी……….. और अगर रेस मे जीतना हो तो वजन लेकर कभी नहीं दौड़ा जा सकता …….. जितना अतिरिक्त वजन होगा उतनी ही गति कम होगी…….. ओर थकान अधिक…. तो वो उन माँ बाप के वजन को कम कर देता है, जिनहोने खुद को पहले ही करियर से कमतर बताया था……… जिनहोने कहा था….. की घर – परिवार, यार – दोस्त – रिश्तेदार सब से पहले भविष्य है……



ये सब मैं अपने एक दोस्त के नज़र से देख कर कह रहा हूँ………… कभी वो भी मेरी तरह अपने घर वालों के साथ रहना चाहता था……….. पर उसको घर – परिवार, यार – दोस्त – रिश्तेदार सब से पहले भविष्य है……इस नारे के साथ घर से भेज दिया ओर अब वो खुद आना ही नहीं चाहता…. (इस पूरी कहानी को सुनकर शायद कुछ ओर समझ मे आए………… लंबी कहानी है अगली बार कहूँगा………..)


दूसरी ओर हमें शुरू से ये समझाया की जब सारे रास्ते बंद हो जाते है तो भगवान काम आते हैं ……. और एक औलाद के भगवान उसके माँ बाप होते हैं……….. तो इस संसार की हर चीज़ नश्वर है ……… कुछ शाश्वत है तो वो है औलाद का माँ बाप के प्रति प्रेम ………. जो एक औलाद से उसकी औलाद को संस्कारों के रूप मे मिलता रहेगा………. ओर हमेशा जिंदा रहेगा……………



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64 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Dr. SHASHIBHUSHAN के द्वारा
June 15, 2011

बहुत सारगर्भित लेख है। कुछ ऐसे ही विचार मैंने —कुछ हो शर्म करो—- नामक लेख में व्यक्त की है।              bhushanshashi43@yahoo.com

chadndra kailash के द्वारा
May 25, 2011

किसी भी उद्देश्य मैं सफलता तभी मिलती है जब हम पूरी तरह उसमे घुस jate है हमें यही मानना होगा की माँ बाप ही सब कूच हैं अ यह हमारे ऊपर लानत है की हम खुद आनंद ले रहे हैं और बूड़े माँ बाप लाचारी की दशा मैं परेशां हैं यही सोच उनके मन मैं ग्लानी पैदा करती है औलाद को जन्म देने की इसमें उनका दूश नहीं हैं हम और हमारी पत्नी जो दुसरे घर से इस ख्वाब के साथ आती हैं की मुझे ससुराल मैं मालकिन बनाना हैंतो हम दो परिवारों को ख़राब कर रहे हैं लानत है ऐसे हर इन्सान पर जिसके दिल मैं उसके लिए कोई जगह नहीं जिसने हमें जन्म दिया

January 19, 2011

पियूष भाई! बहुत ही यथार्थपूर्ण लेख हॆ.मां-बाप द्वारा बच्चों को दिए गए संस्कार, इस मामले में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हॆं.दु:ख की बात तो यह हॆ कि आज हम अपने बच्चों को डाक्टर,इंजीनियर तो बना रहे हॆं लेकिन सही इंसान नहीं बना रहे.मानवीय रिश्तों को प्यार व स्नेह से सिंचना पडता हॆ,तब जाकर वे पनपते हॆं.अच्छा हॆ जो आज मां-बाप हॆं वे आपके इस लेख से कुछ सीख लें लें.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 19, 2011

    विनोद जी……… आपकी इस प्रतिक्रिया ने मेरे मन से इस बोझ को हटा दिया……… की कहीं कुछ गलत तो नहीं लिख दिया है………. आपकी इस उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…….

dr manoj rastogi के द्वारा
January 19, 2011

kash ham yah samajha pate.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 19, 2011

    आदरणीय मनोज जी……. अगर हम ये नहीं समझेंगे तो फिर पछताना पड़ सकता है…….. तो जरूरत है की कमसे कम अपने आने वाली पीढ़ी को रिश्तों की महत्ता समझा सकें………..

ज्‍योति के द्वारा
January 18, 2011

पंत जी बहुत अच्‍छी सीख है आपकी रचना मेरा भी एक बेटा है मैं उसे एक सीख देती रहती हूं की बेटा एक कामयाब इंसान बनने के लिए अच्‍छी शिक्षा आवश्‍यक है । आपकी सीख याद रखुंगी वाकई हर मां बाप को यह बात याद रखनी चाहिए । अच्‍छी रचना की हार्दिक बधाई

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 18, 2011

    मेरा आपसे ये अनुरोध है की आप उसको केवल ये न कहें की एक कामयाब इंसान बनने के लिए अच्‍छी शिक्षा आवश्‍यक है……. अपितु उसको ये भी संदेश दें की कामयाबी तभी सार्थक है…….. जब उसका लाभ उनको मिले जिनके प्रयासों से वो कामयाबी मिली अर्थात माँ बाप…………… उसको ये भी बताएं की कामयाबी का ये अर्थ नहीं की आप ऊंचे पद, ओर ढेर सारी सैलरी लें……….. अपितु कामयाबी का ये अर्थ है की हर माँ कहे की बड़े होकर मेरा बेटा भी ऐसा ही बने…… यानि पहले उसके गुण आदर्श भाई, पुत्र, पिता, पति और तब कहीं उसके धन ओर वैभव का नाम लिया जाए……….. तब कहीं वो एक सफल इंसान बनेगा ………

Dharmesh Tiwari के द्वारा
January 18, 2011

पियूष जी नमस्ते,ये काफी पुरानी मान्यता है की जो बीज बोया जायेगा वही काटने को मिलेगा,यहाँ आपने कुछ काफी अच्छे तर्क प्रस्तुत किये…………….जरुरी है शरू में ही अच्छे बीज बोने की ताकि बेहतर कल मिले,धन्यवाद!

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 18, 2011

    एक अच्छे कल के बारे मे तभी सोचा जा सकता है जब…… आज ही उसके लिए अच्छी तैयारी की जाए……. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……….

deepak pandey के द्वारा
January 18, 2011

पियूष जी आपने उदाहरण तो अच्छे दिए पर ऐसे सपूत बस उंगलियों पर ही गिने जा सकते है .

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 18, 2011

    नहीं दीपक जी…… ऐसे सपूतों की कोई कमी नहीं है। पर हम लोग ही उनको अनदेखा कर देते हैं…………..ताकि उनकी माता पिता के प्रति श्रद्धा कहीं हमपर उंगली उठने के कारण न बन जाए……….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………

Arunesh Mishra के द्वारा
January 17, 2011

पियूष जी, लेख तो आप का निश्चित ही विचारणीय है. यहाँ दोनों बाते समझे लायक है की एक तरफ अपने माता पिता के सेवा कर्त्तव्य से कैसे न विमुख हुआ जाये और जीवन में प्रगति के पथ पर कैसे बढ़ा जाये. हमें नहीं लगता की यह कोई इतना कठिन कम है जो साथ साथ न किया जा सके, बस इक्षाशक्ति की जरूरत है. बहुत लोगो को देखा है उनके ड्राइंगरूम में सोफे/टी वी/फ्रिज को तो जगह मिल जाती है लेकिन माता पिता के बिस्तर के लिए जगह नहीं मिलती, और कारण ये दिया जाता है की घर छोटा है जगह नहीं है इतने लोगो के लिए. लेकिन साथ रहने के लिए घर में जगह से पहले ह्रदय में जगह की जरूरत होती है, जिसकी कई बार कमी दिखती है आज कल भागते समाज में.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 18, 2011

    अरुणेश जी……….. यही सच्चाई है……… की अगर आपका बेटा घर का मतलब पति पत्नी बच्चों ओर इन सामानो से  निकलेगा तो वो अपने घर पर भी इनहि को रखेगा ………. जब तक आप अपने बूढ़े माँ बाप को अपने घर मे जगह नहीं देंगे………. तब तक आपकी संतान भी आपको कोई स्थान नहीं देगी…………. मैं आपको अपना उदहारण दूँ तो….. मेरे दादा दादी हमारे बचपन मे ही गुजर गए थे……… तब हम हल्द्वानी मे ही रहते थे…………. क्योकि पिताजी की नौकरी यही थी…….. तो आज भी जब कोइ हम से पूछता है की तुम्हारा घर कहाँ है तो हम उसको अपने दादा दादी का घर का पता ही बताते हैं …………. क्योकि हमारे पिताजी ने ये ही बताया है की मक़ान ओर घर मे यही अंतर है की घर माँ बाप से बनता है ओर मकान उसमे रहने वाले से……..  पहले तर्क स्वरूप मे ये कह देता था की पर हमारे माता पिता (आप दोनों) तो यही हैं तो ये हमारा घर तो हुआ……. तो उन्होने कहा….. की तो जब ये हमारा घर है ही नहीं तू तुम्हारा कैसे………

Amit Dehati के द्वारा
January 17, 2011

भ्राता श्री एक अच्छे विचार के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद ! भ्राता श्री ये सही है की हमें (बच्चो को )बचपन से ही हास्टल में दाल दिया जाता है करियर को मजबूत बनाने के लिए . लेकिन सारी किताबी ज्ञान के अलावा हमें मैनर्स भी सिखया जाता है . ये बच्चो के ऊपर निर्भर करता है की उन किताबी ज्ञान के किन-किन बातो को किस प्रकार अपनी जिदगी में प्रयोग करें . कहते है ” न करने के सौ बहाने “. बस यही बात है ………….. धन्यवाद !

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 18, 2011

    भाई अमित जी……… आपकी बात कुछ स्पष्ट नहीं हुई…….. अपने अगले लेख पर मैं आपसे इस का विस्तार चाहूँगा…………. तब तक के लिए प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……….

rajkamal के द्वारा
January 17, 2011

प्रिय पियूष भाई … नमस्कार ! आप का कहना सही है ….. में खुद भी मिडल क्लास से होने के कारण ज्यादातर नोकरियो के लिए फार्म ही नही भरा करता था ताकि घर से दूर न नोकरी लग जाए कहीं …. अच्छे लेखन पर बधाई स्वीकार करे

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 18, 2011

    राजकमल भाई……… मैं आपकी भावना समझ सकता हूँ……. क्योकि ऐसा ही कुछ हाल मेरा भी रहा……… मैंने कभी कोई ऐसा पेपर नहीं दिया…….. जिसमे नौकरी के लिए हल्द्वानी से कहीं दूर जाना पड़ जाए……………. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………….

    January 18, 2011

    पियूष जी और राजकमल जी, मेरा तो हमेशा से एक ही नारा रहा है….. “मेरा गाँव, मेरा देश- ऋषिकेश.” अपने माता-पिता और अपनी ये मिट्टी छोड़कर जाने की बात मेरे लिए हमेशा से ही अकल्पनीय रही है. पियूष जी, दोनों पक्षों का अच्छा विश्लेषण.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 18, 2011

    रतुड़ी जी…….. वास्तव मे अगर आप ओर हम लोग अपने घरों से बाहर नहीं जा पाये तो कहीं न कहीं हमारे घर वालों का हमारे प्रति स्नेह ही आधार है…….. उन्होने हम पर इतना भरोसा किया की हमें बिना दवाब के अपनी इच्छा से नौकरी हेतु बाहर जाने या न जाने का विकल्प दिया………… आपके विचारों को पढ़ कर खुशी हुई………..

    rajkamal के द्वारा
    January 18, 2011

    प्रिय पियूष भाई ….. नमस्कार ! प्रिय जुबली कुमार जी … नमस्कार ! मैंने तो अपना फर्ज अदा कर दिया था …. लेकिन शायद नियति को कुछ और ही मंजूर था …. जिसकी थोड़ी सी सच्चाई आप मेरे लेख दिवार भीतरी अस्मिता के लुटेरे में पढ़ सकते है ….. फिर भी में उस खुदा का शुक्रगुज़ार हूँ ….

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 19, 2011

    भाई राजकमल जी……… हमारा प्रयास ही महत्वपूर्ण है…….. बाकी तो सब उसकी मर्जी है………

Aakash Tiwaari के द्वारा
January 17, 2011

आदरणीय पियूष जी, सत-प्रतिशत सत्य…..अधिकतर माँ-बाप के कुछ गलत नियम ,विचारों के कारण ही बच्चे माँ बाप से दूर हो जाते है….मैंने खुद इसको देखा,समझा और महसूस किया है……… आकाश तिवारी

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 18, 2011

    आकाश जी……… ये उस औलाद के लिए बड़ा दुखद है ……. जो अपने माता पिता के कारण ही उनसे दूर है ओर जमाना उस औलाद को ही दोषी करार दे रहा है………. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……….

SUMIT PRATAP SINGH के द्वारा
January 17, 2011

पियूष भैया आपके इस लेख को पढ़ कर मस्तिष्क चिंतन मुद्रा में आ चुका है….

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 18, 2011

    सुमित भाई ……. चिंतन इतना ही करना की आपके हाथों दोनों मे से कोई भी पाप न हो ……… न ही आप अपने बूढ़े माँ बाप को दुख दें……….. ओर न ही बच्चों को ये सिखाएँ की स्नेह ममता ओर रिश्ते से बड़ा करियर होता है……… आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…………..

Harish Bhatt के द्वारा
January 17, 2011

पियूष जी नमस्कार, एक और सर्वोत्तम लेख के लिए हार्दिक बधाई. जैसा बोया जाता है वैसा ही काटने को मिलेगा. इसलिए बोने वाला ही असली दोषी है.

    Human के द्वारा
    January 17, 2011

    Piyush ji aap ne accha topic udhaya hai,parantu mein eik baat se sahmat nahin hoon ki parents hi bacchon ko apney se alag karney ke zimmedar hain.parents yadi acchi education de kar apna dayitv nibhatey hain ,to bacchon ko bhi apni buddhi ka prayog karkey success milney per apney parents ko bhi usmey involve karna chahiye.bahut se aise udharad hain jismey ye dekhney ko milta hain jitni zyada success mili utney hi zyada unhoney parents ke prati kratagyata aur nishtha dikhayi for eg.none other than Amitabh Bacchan.We should appreciate him for being a caring and loving son.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 18, 2011

    हरीश जी……. सही कहा आपने जैसे संस्कार दिये जाएंगे वो ही आपको मिलेंगे……….. जब अभी बच्चे अपने माँ बाप को अपने दादा दादी से अलग देखेंगे तो कैसे वो इससे अछूते रहेंगे…….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……….

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 18, 2011

    मित्र (Human) मैंने कहीं भी ऐसा नहीं कहा की इनसबके लिए माता पिता जिम्मेदार हैं………. मैं केवल ये कह रहा हूँ……. की अगर माता पिता अपने संतान के हित के लिए कोई फैसला लें तो उसको इतना भरोसा दें की ये उसके हित के लिए है………… अपनी आजादी के लिए नहीं……….. अन्यथा कई बार अपनी आजादी के लिए भी बच्चों को हॉस्टल मे डाला जाना आम बात है। तो ऐसे मे बच्चे के भीतर संवेदनाएं कहाँ से आएंगी……………. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………….

ashutoshda के द्वारा
January 17, 2011

पियूष जी नमस्कार पियूष जी आपने कई बातें यहाँ पर बहुत ही सही लिखी है जैसे की माता पिता अपने बच्चों के भविष्ये को सुधारने के लिए उन्हें होस्टलों में डाल देते है और पढने के लिए विदेश भेज देते है जिससे माता पिता के प्रति उनकी संवेदन शीलता लगभग समाप्त हो जाती है यही नहीं माता पिता भी उनसे दूर रहने के कारन उसके व्यवहार में आये बदलाव को समझ नहीं पाते और उनकों उसी उम्र का समझते है जिस उम्र में उन्होंने उनकों होस्टल में डाला था ऐसे मैं दोनों का साथ में रहना बहुत मुश्किल हो जाता है क्योकि उनकी आदत वैसी ही पड़ जाती है ज्यादातर माता पिता का परित्याग करने वाले ऐसे ही बच्चे होते है इसलिए हम हमेशा बच्चों को दोष नहीं दे सकते अपवाद सब जगह है ! आपने बहतरीन कहानियों के साथ अपने ब्लॉग को संवारा इसके लिए बंधाई के पात्र है आपकी उम्र से पहले इतनी जानकारी आपमें उपस्तित विलक्षण प्रतिभा को प्रदर्शित करती है ऐसे ही अपने ब्लागों से हमें रूबरू करतें रहे ! धन्यवाद आशुतोष दा

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 18, 2011

    वास्तविकता यही है ……… की पहले माता पिता स्वयं बच्चों को ये सीखाते है की विदेश मे नौकरी …… मोटी तनख्वाह… ये सब ही जिंदगी है ….. ओर तू अगर खुश है तो हम खुश है…… ओर जब एक बार ये भावना उसके अंदर भर जाती है तो फिर ……….. ? वही होता है जो कुछ तो शर्म करो …….…मे वर्णित है………………..

Alka Gupta के द्वारा
January 17, 2011

पीयूष जी , मुझे लगता है कि दोष एक तरफ का ही नहीं है….. बात माता-पिता द्वारा दिए गए संस्कारों की भी आती है…..साथ ही आज समय व परिस्थितियां भी इसके लिए सबसे अधिक उत्तरदायी हैं इसके लिए दोनों ही में सामंजस्य की आवश्यकता है………कुछ लोग ऐसे भी हैं जो माता-पिता पर प्रश्न चिह्न ही लगा देते हैं या माता-पिता संतान पर जो कदापि नहीं होना चाहिए…..तभी स्थिति कुछ सुधर सकती है !

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 17, 2011

    सही कहा अल्का जी…………महाराज दशरथ भी भगवान  श्री राम भी के वियोग मे स्वर्गवासी हुए थे……….. तो इसका ये अर्थ नहीं की राम दोषी थे………. ये सर्व विदित है की पिता की आज्ञा पालन के कारण ही श्री राम वन गए थे……… अन्यथा कई लोग उसी परिस्थिति से विवश है पर वहाँ वो ही दोषी कहे जा रहे हैं क्योंकि उनकी मजबूरी किसी को पता नहीं है….. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……..

allrounder के द्वारा
January 17, 2011

पियूष जी, एक अच्छे शशक्त लेख के लिए बधाई !

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 17, 2011

    सचिन भाई………… आपकी इस संक्षिप्त प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……..

वाहिद काशीवासी के द्वारा
January 17, 2011

पीयूष जी| आज के दौर के पारिवारिक संबंधो की जटिलताओं को दर्शाता एक सुन्दर लेख लिखा है आपने| सम्बन्ध परस्पर होते हैं.. और हर किसी को अपने निर्णयों के लिए कुछ स्वतंत्रता होनी ही चाहिए| अच्छे संस्कार ही इसमें मददगार बन सकते हैं| जैसे बीज बोए जायेंगे वैसा ही फल प्राप्त होगा| साभार,

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 17, 2011

    वाहिद भाई ……….आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……..

roshni के द्वारा
January 17, 2011

पियूष जी , जिस हवाले से आपने ये कहा की माता पिता भी कही न कही दोषी है तो कुछ एक examples को छोड़ दिया जाये तो सिथि वही है ……. बिलकुल छोटे बच्चों को हॉस्टल में भेजना गलत है मगर एक उम्र के बाद कुछ माँ – बाप शायद इस लिए उन्हें हॉस्टल भ्जेते है क्युकी या तो बच्चे वहां के माहोल से बिगड़ रहे होते है या फिर उनके अच्छे भविष्य को छोड़ कर ……. वैसे भी चलिए जो भी है हमे हमारा फर्ज याद रखना चहिये न की ये की हमे प्यार नहीं मिला या हमसे कभी कुछ कह दिया गया तो हम उनका ख्याल न रखेगे ………. लेकिन हाँ दोनों पक्षों को एक दुसरे से सहयोग करना चहिये …………

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 17, 2011

    मैंने खुद एक प्रतिक्रिया मे कहा है की औलाद के भले के लिए हॉस्टल मे भेजा जाए तो उसमे कोई बुराई नहीं………. जैसा की कई माँ बाप जोकि ऐसी जगहों मे रहते हैं जहां अच्छी शिक्षा नहीं है करते हैं…….. पर केवल पैसा कमाने ओर एक दूसरे से आगे निकले की होड मे लगे पति पत्नी जब बच्चे से छुटकारा पाने के लिए उसको हॉस्टल मे भेज देते हैं………. तो ये वास्तव मे दुखद है………… आपकी प्रतिक्रिया ले लिए हार्दिक शुक्रिया…………

abodhbaalak के द्वारा
January 17, 2011

पियूष जी एक पेड़ लगाने की बाद, हर कोई उसकी छाव की आशा रखता है, माँ और बाप उस बच्चे को जो की कुछ करने के लायक नहीं था, इस लायक बना दें की … और फिर जब वो ऐसा करे तो कैसा लगता होगा उन्हें, par ab adhunikta के daur me ….. Hostel, kid zone etc… kya ye hame वो sab de paayenge .. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 17, 2011

    भाई अबोध जी ……… प्रश्न यही है की जब हम फसल बोने मे ही लापरवाही करें तो उस फसल के अच्छा होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है………… आपकी प्रतिक्रिया ले लिए हार्दिक शुक्रिया……………

RajniThakur के द्वारा
January 17, 2011

piyush ji ek kahavat hai,jaisa boyenge.vaisa katenge…..bahut fark aa chuka ka parents ke perception men..vo pahle se hi mentally prepared ho rahe hain..’tu bhi ji or mujhe bhi jine de..

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 17, 2011

    रजनी जी ………. प्रश्न यही है की जब वो इस तरह की सोच रखें तो फिर औलाद को दोषी कैसे ठहरा सकते हैं…… न तो हर माँ बाप की ऐसी सोच है ओर न ही हर औलाद अपने माँ बाप को खुद ही छोडती है………….. पर देखने वाले अक्सर दोष औलाद का ही बताते हैं…………..

vinitashukla के द्वारा
January 17, 2011

पीयूष जी , अंधी महत्वाकांक्षा की दौड़ में आजकल के युवा सब कुछ पीछे छोड़ देना चाहते हैं; अपना परिवार और बुजुर्गों के आशीर्वाद का साया भी. ऐसे में अगर करियर में वे ऊपर उठ भी गये तो जीवन एक शून्यता से भर जाता है, रिश्तों की मिठास जो नहीं होती उसमें! बुजुर्गों का पक्ष, पुख्ता तौर पर सामने रखने के लिए बधाई.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 17, 2011

    विनीता जी…….. हर माँ बाप की अभिलाषा होती है की जिस औलाद के लिए वो अपना आज भूल रहे हैं वो उनका कल बनें ओर उनका सहारा बने……. पर क्या बिताती होगी उनपर जब वो औलाद जिसके लिए उन्होने अपने सारे सुख छोड़े वो ही उनको छोड़ दे……….. ये वाकई सोचनीय है……….

Preeti Mishra के द्वारा
January 17, 2011

पीयूषजी अच्छा लेख.बधाई.मेरे विचार से माता-पिता को बच्चे का भविष्य निर्माण एक कर्म की तरह करना चाहिए जो कर्म प्रकृती ने उनको सौंपा है.प्रेम के वशीभूत होकर उनके रास्ते की अड़चन नहीं बनना चाहिए.रही बुढ़ापे की बात तो यदि अच्छे संस्कार दिए जाएँ तो बच्चे हमेशा आपका ध्यान रखेंगे.बच्चों को होस्टल भेजने के पक्ष में मै भी नहीं हूँ.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 17, 2011

    प्रीति जी………. जहाँ तक हॉस्टल भेजने के संबंध मे मेरे विचार का प्रश्न है वो मैं नीचे एक प्रतिकृया मे दे चुका हु………. उनको प्रेम के वशीभूत अडचन नहि बनना चाहिए, के स्थान पर मेरा ये कहना है की उनको अपने बच्चे को इस बात का एहसास दिलाना चाहिए की उनकी सारी कठोरता के पीछे उनकी अपर ममता छिपी है……….. उनको ये एहसास करना चाहिए की करियर ओर पैसे से बड़े स्नेह ओर प्रेम के रिश्ते है………….. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……

Deepak Sahu के द्वारा
January 17, 2011

पीयूष जी! जो माता पिता अनेक कष्ट सहन कर आपने बच्चों को बड़ा करते है, इसी आशा के साथ की उनका बेटा उनके बुढापे की लाठी बनेगा, पर ऐसा बहुत कम ही हो पता है, आज के युग में सुपुत्र बहुत कम ही बचे हैं! बूढ़े माता पिता बच्चों को बोझ नज़र आने लगे हैं! कहानियों के माध्यम से बहुत ही अच्छी शिक्षाएं प्रदान की है आपने! बधाई! दीपक http://deepakkumarsahu.jagranjunction.com/

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 17, 2011

    दीपक जी ………. इस सिक्के का एक ओर पहलू भी है ……. उसको ही मेरा अगला पोस्ट स्पष्ट करेगा………… आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……

nishamittal के द्वारा
January 17, 2011

पियूष जी जीवन की वास्तविकता है ये,संतान बुलंदियों पर पहुंचे ,हर माता-पिता का ये स्वप्न रहता है परन्तु स्वप्न पूरा होते -होते एक स्तिथि ये आ जाती है कि बच्चे को परिवार से दूर जाना पड़ता है .माता-पिता जिस स्थान पर प्रारम्भ से रहें हैं वो छोड़ने को तैयार नहीं मै ऐसे कई परिवारों से परिचित हूँ जहाँ ये समस्या है.नौकरी छोड़ना तो संभव नहीं माता-पिता जाने को तैयार नहीं,महानगरों या नगरों का जीवन उनको रास नहीं आता चक्की में पिसता है लड़का थोडा एडजेस्ट तो करना ही होगा .हाँ जहाँ संतान है ही नालायक तो वहां सारी व्यवस्था व्यर्थ हो जाती है,ऐसी संतान भी हैं,जो अपनी आजादी के कारण या बोझ समझ कर माता-पिता से सम्बन्ध समाप्त कर लेते हैं..

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 17, 2011

    आदरणीय निशा जी……… इसी ओर मेरा भी संकेत है……….. की हम अक्सर अकेले बूढ़े माँ बाप को देख कर उसके बच्चों के प्रति धारणा बना लेते हैं…….. पर अक्सर यही होता है की माँ बाप अपने पुश्तैनी मकान को ओर अपनी संस्कृति ओर अपने लोगों को छोड़ कर बाहर निकालना ही नहीं चाहते……….. स्वयं मेरे जानने वालों मे मेरा एक मित्र बंगलोर मे है ओर उसके माता पिता सुदूर पहाड़ी क्षेत्र मे रहते है……… अब वो उनको ले जाने का हर प्रयास कर चुका है ओर वो जाने को राजी नहीं है क्योकि वो उस गाँव को जहा उन्होने अपने बचपन - जवानी के दिन बिताए……… छोड़ कर जाना नहीं चाहते……………. तो कैसे उस लड़के को दोषी बताया जाए…………….. । आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……

Bibhaw के द्वारा
January 17, 2011

हॉस्टल में बच्चो को भेजकर बहुत ही निमर्मता-पूर्ण कार्य करते है ! मै भी इसके खिलाफ हूँ !

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 17, 2011

    बिभाव जी………… अगर औलाद के भले के लिए हॉस्टल मे भेजा जाए तो उसमे कोई बुराई नहीं………. जैसा की कई माँ बाप जोकि ऐसी जगहों मे रहते हैं जहां अच्छी शिक्षा नहीं है करते हैं…….. पर केवल पैसा कमाने ओर एक दूसरे से आगे निकले की होड मे लगे पति पत्नी जब बच्चे से छुटकारा पाने के लिए उसको हॉस्टल मे भेज देते हैं………. तो ये वास्तव मे दुखद है…………………

Ramesh bajpai के द्वारा
January 17, 2011

प्रिय पियूष जी जीवन की इस आपा धापी में बूढ़े माता पिता कभी कभी परिस्थिति जन्य विवश्ताओ के कारण पुत्र से दूर रहने को विवश होते है , लेकिन उन्हें किसी आश्रम में छोड़ देना तो घोर निंदनीय अक्षम्य अपराध है

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 17, 2011

    आदरणीय बाजपई जी…….. मेरा खुद यही मत है की किसी भी परिस्थिति मे ऐसा करने वालों बच्चों के साथ सहानुभूति रखना भी पाप है…….. पर मेरा ये उपरोक्त लेख मे प्रकट मत मेरे एक मित्र के जीवन से प्रभावित है……… उसकी कथा पढ़कर शायद आपको ये लगे की हर बार दोषी औलाद ही नहीं…….. कई बार माँ बाप भी इसके बराबर के दोषी हैं…………… अन्यथा पुत्र वियोग मे मरने के बाद भी दशरथ की मृत्यु के लिए श्री राम पर कोई दोष नहीं लगा……….. क्योकि परिस्थितियाँ भगवान श्री राम ने नहीं राजा दशरथ ने ही पैदा की थी……….. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…………

naturecure के द्वारा
January 16, 2011

पियुष जी, नमस्कार! आपने सही कहा है , जैसा की रौशनी जी के लेख की प्रतिक्रिया में भी मैंने कहा था की बच्चों के अन्दर प्रारंभ से जो संस्कार के बीज बोये जाते हैं कालांतर में वे प्रस्फुटित होकर इस तरह के कृत्य को अंजाम देते हैं परन्तु पियुष जी यहाँ पर इन माँ बाप को क्या यह नहीं सोंचना चाहिए की ऐसा करके वे अपने स्वयं के बच्चों में क्या संस्कार डाल रहे हैं ? क्या भविष्य में वे अपने बच्चों से स्नेह की अपेक्षा रख पाएंगे? विचारणीय प्रश्न है उनके लिए, जो अपने बृद्ध माँ-बाप को ब्रद्धाश्रम में छोड़ आये हैं ………|

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 17, 2011

    आदरणीय कैलाश जी…….आपकी बातों से मैं सहमत हूँ…………. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………

    Nilesh Kumar के द्वारा
    January 17, 2011

    Dear Pyush ji Namaskar Es tarah ka Blog likhne ke liye sabse pahle aapko bahut 2 dhanyad. Pyush ji main bhi aapne maa. papa ke liye kuch karna chhahta hu? sayad esele maine sadi nahi ki hai . pl aap kuch aise sansata se jod de jis se ke main un lachar maa papa ki kuch madad kar saku, pyush ji main ek middil class se hu Nilesh Kumar

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 17, 2011

    भाई नीलेश जी…… मैं खुद एक मिडिल क्लास से हूँ……. ओर जहां पर मे आज हूँ …. उससे कहीं आगे हो सकता था….. अगर मैं अपने माँ बाप को छोड़ कर दिल्ली मे ही जॉब कर रहा होता…… पर वास्तव मे मिडिल क्लास वो लोग हैं जिनके पास सब कुछ है पर माँ बाप नहीं है…….. ओर जहां तक किसी संस्था का सवाल है तो बस अपने माता पिता को ही खुश रखें………… ओर मेरा मानना ये है की वृदधाआश्रम ओर अनाथ आश्रमों को संयुक्त कर देना चाहिए……… ताकि अनाथ बच्चे दादा दादी का स्नेह ओर बूढ़े नाती पोते का स्नेह पा सकें……… ताकि अनाथ बच्चों को अच्छे संस्कार मिल सकें…………….. ओर शादी करने न करने से कोई फर्क नहीं पड़ता ………… फर्क आदमी के बदलने से पड़ता है………. आप शादी करें ओर बहू का सुख भी माता पिता को दें……….. पर कभी भी अपनी पत्नी को ये एहसास न होने दें की आपके लिए उसकी अहमियत उसके माता पिता से अधिक है…………. बल्कि उसको ये एहसास कराएं की उसके प्रति आपके मन मे प्रेम उतना ही बढ़ता जाता है जितनी इज्जत वो आपके माता पिता की करती जाती है……….. आपकी भावनाएं सम्माननीय हैं……………..

HIMANSHU BHATT के द्वारा
January 16, 2011

पियूष जी आपका लेख पढ़ा …. एक अच्छी रचना है….. वास्तव में यदि संस्कारों की कमी की बात की जाये तो यह केवल संतान में ही नहीं बल्कि माता पिता की और भी इंगित करती है….. क्यूंकि जो आज संतान है वो ही कल के माता पिता हैं…. यह मूल रूप से विचारों का मुद्दा है…. अच्छी सोच के साथ प्रस्तुत रचना…. बधाई….

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 17, 2011

    हिमांशु जी…………… वास्तव मे इसका कारण वही संस्कार है , जिनमे हम बच्चे को सीखाते हैं की दुनिया मे रिश्ते नाते से जरूरी अच्छा पद अच्छा पैसा है………. जब वो ये सीख लेगा तो फिर रिश्ते का मूल्य कहाँ समझेगा…….. आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………..

rajkamal के द्वारा
January 16, 2011

प्रिय पियूष भाई …नमस्कार ! आप एडिट में जाकर इस लेख को कापी >कट करके फिर से दुबारा पेस्ट करे …. क्योंकि यह पूरा प्रिंट नही हुआ है

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 16, 2011

    भाई राजकमल ………. पता नहीं ये क्या हो रहा है…….. कभी कमेंट लॉक हो जाते हैं………. जबकि पोस्ट करने से पहले चेक किए ………. ओर ये आधा पोस्ट जबकि एक बार प्रीव्यू पढ़कर भी देखा……….. आपकी इस जानकारी के चलते पूरा पोस्ट दुबारा लिख रहा हूँ………… शुक्रिया………….


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