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एक ओर छुट्टी ..........

Posted On: 24 Jan, 2011 Others में

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26 जनवरी गणतंत्र दिवस …….. यही वो दिन था जब 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज को अंतिम लक्ष्य माना गया और तब से 26 जनवरी को हर साल स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाये जाने का निर्णय किया गया…………किन्तु बाद में जब देश १५ अगस्त को आजाद हो गया… तो इस दिन को (२६ जनवरी को) यादगार बनाये रखने के लिए इस दिन संविधान को लागु किया गया……… और इस दिन को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाने लगा….

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आजादी के बाद भी इस दिन का महत्व आजादी के दिन से कम नहीं रहा………. भारतीय संविधान जो की नवंबर माह मे ही निर्मित हो चुका था……… उसके कई अंशों को 26 जनवरी के लिए रोक कर रखा गया…… ताकि वो दिन जिसे स्वतन्त्रता से पूर्व ही स्वतन्त्रता दिवस के रूप मे मनाया जाता था वो हमेशा के लिए राष्ट्रिय पर्व बन जाए…….. आज भी हालत वही है……… आज के लोगों के लिए भी 26 जनवरी का महत्व ठीक 15 अगस्त की ही तरह है………. दोनों ही दिन राष्ट्रीय अवकाश के दिन…….

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हमारे नीति निर्धारकों ओर आंदोलनकारियों ने सोचा होगा की शायद ये राष्ट्रीय पर्व भारतीय संस्कृति के अलग अलग पर्वों की भांति अपने लिए एक विशेष स्थान बना लेंगे……. लोग इस दिन देश के संबंध मे कुछ सोचेंगे………. उन्हे कहीं भी ये आशा नहीं रही होगी की हम उनको याद करेंगे……. क्योकि इस तरह के बलिदान करने वाले इस तरह के खोखले सम्मान की आशा नहीं रखते…… पर उन्हे निश्चित ही ये भरोसा  रहा होगा की उनके संघर्ष से मिली आजादी का तो हम कम से कम सम्मान करेंगे ही…….

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जिस तरह रोटी का महत्व भूखा ही समझ सकता है…… पानी का महत्व कोई प्यासा ही समझ सकता है…….. उसकी तरह आजादी का महत्व उन शहीदों की शहादत के साथ ही समाप्त हो गया……… अब आजादी का अर्थ बदल गया है… बच्चे के लिए स्कूल की छुट्टी आजादी है………. ओर कर्मचारी के लिए ऑफिस की छुट्टी………. कोई इस ओर सोचता ही नहीं की आखिर देश के लिए हमारा कोई कर्तव्य है भी की नहीं………..

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शहीद शब्द कई साल तक राजनीति का हिस्सा बना रहा ओर अब किताबों तक ही सीमित रह गया है…….. सीमा पर मरने वालों को भी लोग कोई तवज्जो नहीं देना चाहते ……… एक शहीद के परिजन सरकारी दफ्तरों मे कभी राहत राशि तो कभी पेंशन के लिए चक्कर काट काट कर थक जाते है….. पर कोई आगे बढ़ कर उनकी सहायता नहीं करता………. आज भी कई बार शहीद शब्द राजनीति मे भावनात्मक रूप से मतदाता को उलझाने के लिए प्रयोग किया जाता है……. परिवार विशेष की शहादत की दुहाई दी जाती है……….. पर वही पूरी की पूरी पार्टी मे से कोई भी शहीदों के परिवारों को मदद करने मे कभी आगे नहीं आता ……….

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शहीद शब्द राजनीति मे कहीं अपना वास्तविक अर्थ खो चुका है……… देशभक्ति पहले दिलों मे ……… फिर बातों मे ……… फिल्मों मे ……… गानो मे …….. नारों मे ……. किताबों मे ……. होते हुए……… अब लगभग लुप्त होती नजर आ रही है……. अब वैश्विक ग्राम का नारा प्रचलित हो रहा है…….. लोग सीमाओं को बंधन मानने लगे है……… सारा संसार उनको घर लगने लगा है……… जब कोई सीमा ही नहीं तो देश कैसा ओर जब देश नहीं तो देश भक्ति कैसी……………..

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आओ नव भारत का निर्माण करे……

हसते हस्ते जान लुटा गए जो उन शहीदों का सम्मान करे…
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अब समय आ गया है जब हमे नव भारत का निर्माण करने के लिए आगे आना पड़ेगा.. केवल लिखने और कहने से कुछ नहीं होगा. हर होते हुए अत्याचार को देख कर, फैलते हुए भय, भूख और भ्रष्ट्राचार को देख कर, चुपचाप घर आ कर उसपर नया लेख लिखने से नव भारत का निर्माण संभव नहीं है….. जरूरत है उस पर आगे बढ़ कर आवाज़ उठाने की.. कोई फर्क नहीं पड़ता की आपके साथ कितने लोग और है……

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नव निर्माण का बोझ अपने खुद के कन्धों पे उठाना होगा.
दुसरो के कंधो को जनाज़े उठाने के लिए छोड़ दो…

कियोकी भगत सिंह ने कहा है………
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ज़िन्दगी तो सिर्फ अपने दम पर ही जी जाती है….
दूसरों के कन्धों पे तो सिर्फ जनाज़े उठा करते हैं……..
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21 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

aditya के द्वारा
January 25, 2011

पीयूष भाई नमस्कार……………. आज की कडवी सच्चाई यही है कि इन राष्ट्रीय पर्वों का महत्व एक अदद छुट्टी से अधिक नहीं हैं…..किन्तु क्या ये किसी भी दशा में उचित है……… ना जाने कितने ज्ञात और अज्ञात शहीदों की कुर्बानियों से हमे ये आजादी मिली है………. हमें इसकी ऐसी अवहेलना करनी तो नहीं चाहिए…….. किन्तु अकेला क्या करेगा……………. चलो एक कारवां बनाये………………….. गणतंत्र दिवस की बधाई सहित आपका, आदित्य http://www.aditya.jagranjunction.com

Dharmesh Tiwari के द्वारा
January 25, 2011

पियूष जी नमस्ते बिलकुल आपने फिर से एक कडवी सच्चाई को सबके बिच रख्खा है,धन्यवाद!

Alka Gupta के द्वारा
January 25, 2011

पीयूष जी , आज के माहौल में बहुत ही महत्त्वपूर्ण लेख है…….ये आज़ादी कितने ही शहीदों की शहादत का ही परिणाम है…..इसी भावना के साथ इनके प्रति हम सबको नतमस्तक होना चाहिए न की इस दिन को आज़ादी की छुट्टी का दिन माने….. ..नवोदित पीढी में भी यही भावना भरनी होगी……….! भगत सिंह का उदाहरण देकर लेख की महत्ता और भी अधिक बढ़ गयी है !

abodhbaalak के द्वारा
January 25, 2011

पियूष जी आपने आजके युग में इस दिन के महत्व क्या रह गया है बहुत ही ….. क्या महत्व रह गया है इस दिन का, केवल एक छुट्टी मात्र.? कडवी परन्तु सत्य… सदा की भांति आपने वैसे ही लिखा जैसा की आप लिखते आये हैं… और आप कैसे लिखते हैं वो तो जगविदित हैं… :) http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Faisal के द्वारा
    November 28, 2013

    The forum is a brhitger place thanks to your posts. Thanks!

allrounder के द्वारा
January 25, 2011

पियूष जी, ऐसा लगता है हम लोगों को मुफ्त मैं मिली आजादी का मूल्य ही नहीं मालूम जबकि इसी आजादी के लिए हमारे क्रांतिकारियों ने कितनी कुर्बानियां दीं! आज की पीढ़ी इस बात को समझते हुए भी आजादी का मूल्य नहीं समझ रही है, और इस २६ जनवरी को भी छुट्टी मनाने के ही मूड मैं है ! एक सशक्त लेख पर बधाई !

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 12, 2011

    सही कहा आपने सचिन जी…. कुरबानिया इस मुफ्त की आजादी के सामने फीकी पद गयी हैं… आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……..

Deepak Sahu के द्वारा
January 25, 2011

पीयूष जी! देश तभी सफल होगा जब हम सफल होंगे क्योकि हम देश से हैं तो देश हमसे है!! सुंदर लेख आपका! बधाई! दीपक

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 12, 2011

    दीपक जी….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……..

Amit Dehati के द्वारा
January 25, 2011

भ्राता श्री प्रणाम ! आपका लेख बहुत ही तार्किक है ………………देश के प्रति बोलने को बहुत कुछ है | आवाज उठाने का जज्बा कूट कूट के भरा है , लेकिन कहते- “अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता ” | अब जान कर काफी ख़ुशी हो रही है की मैं अकेला नहीं हूँ | भ्राता श्री मैं आपके साथ हूँ ……………… आइये एक कदम बढ़ाएं देश के लिए …….एक नव युग का निर्मद करें ! धन्यवाद ! http://amitdehati.jagranjunction.com

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 12, 2011

    भाई अमित जी…. आप अकेले नहीं हैं…….. पर पहला कदम तो आपको ओर हमें अकेले ही उठाना पड़ेगा…… आंशिक सफलताओं के बाद ही लोग हमसे जुड़ पाएंगे…. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……..

deepak pandey के द्वारा
January 25, 2011

पियूष जी एक वो दौर था जब कड़ाके की ठण्ड में हम प्रभात फेरी के लिए निकलते थे . फिर बांस की लकड़ी में कागज पर पत्तो से हरा रंग और पिला रंग बना तिरंगा लेकर हम नहा धोकर स्कूल जाते थे . उसके बाद शुरू होता था ग्राम भ्रमण . अब तो देश की हालत को जब समझने लगे है तो बस ये दिन सिर्फ एक छुट्टी लगने लगे है. कहे की आज़ादी यार . जब अपने देश में तिरंगा फहरा नहीं सकते .

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 12, 2011

    बिलकुल सही कहा आपने दीपक जी…… आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……..

naturecure के द्वारा
January 24, 2011

पियुष जी, नमस्कार! समसामयिक विषय पर एक अच्छी रचना के लिए बधाई…….|

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 12, 2011

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया….

rajeev dubey के द्वारा
January 24, 2011

कुछ करना होगा….कुछ करना होगा … है न यही ख्याल, आपके लेख में दिखता है एक अहसास कुछ कर गुजरने का, पर क्या? आखिर क्या ? साथियों आप दो ही काम कर सकते है..अकेले कुछ पैसे दान दे सकते है, किसी को पढ़ा सकते हैं, या ऐसा ही कुछ और व्यक्तिगत रूप से कर सकते हैं … या कि आप किसी संस्था से जुड़ सकते हैं और थोड़े बड़े स्तर पर उस संस्था के नियमों के अनुसार कुछ कर सकते हैं. पर यदि आप जन शक्ति को जगा दें और राजनैतिक व्यवस्था में हिस्सा लें तो मजबूर रहने की बजाय लड़ाई करने का सुकून पायेंगे …हमारी और आस पास की पीढी को राजनैतिक हिस्सेदारी की तरफ बढ़ना होगा, जिस किसी भी स्तर पर संभव हो …

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 12, 2011

    राजीव जी…. जहां तक राजनैतिक व्यवस्था में हिस्सा लेने की बात है तो मेरा मानना है की ये जरूरी नहीं की हम खुद ही इसका हिस्सा बनें…. पर हम कम से कम अच्छे लोगों को तो जीता ही सकते हैं…..

January 24, 2011

पीयूष जी नमस्कार, आपने कुछ कडवी सच्चाइयाँ अपने चिर-परिचित अंदाज में बहुत बेहतर तरीके से सामने राखी हैं. बहुत खूब लिखा है आपने…..

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 24, 2011

    भाई रतुड़ी जी……… कहीं न कहीं से तो शुरुवात होनी ही चाहिए…….. थोड़ा आपका प्रयास थोड़ा हमारा जब इसी तरह सभी प्रयास करेंगे तो बदलाव होने लगेगे……………

rajkamal के द्वारा
January 24, 2011

प्रिय पियूष भाई … नमस्कार ! एक बार फिर से आप हाज़िर है अपने चिर परिचित अंदाज़ मे….. पियूष भाई …..हम तथाकथित बडो के लिए चाहे यह राष्ट्रिय पर्व एक अदद छूटटी से ज्यादा महत्व ना रखता हो …. लेकिन बच्चो के कोमल मन पर तों इसकी कुछ ना कुछ छाप पड़ती ही है ….. और फिर २६ जनवरी को हम पूरी दुनिया को अपनी बढ़ती हुई सैनिक ताकत का एहसास भी तों करवाते है इसी बहाने ….. मैं नही समझता कि इसके सारे नुक्सान ही है …… अगर कोई सबसे बड़ा नुक्सान हुआ है तों वोह हमारी मानसिकता में आई हुई गिरावट + नेतायों कि कथनी और करनी में अंतर + चाल और चरित्र में गिरावट + नैतिकता कि कमी ….. कमी हम लोगो मैं है ….यह राष्ट्रिय पर्व तों आज भी उतना ही पावन है जितना कि पहले थे …. एक सुंदर लेख पर आपको बधाई

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 24, 2011

    भाई राजकमल जी……… पर कहीं न कहीं हमारी ये छोटी मानसिकता जो इन महापर्वों को छुट्टी के रूप मे स्वीकार करती है………. वो इन बच्चों की मानसिकता भी बदल देगी…….. बच्चे के लिए ये दिन स्कूल मे कार्यक्रम करने तक ही सीमित न रह जाये ……. इस का ध्यान हमें रखना होगा………… वास्तव मे ये सैनिक परेड आम जन को एक भरोसा दिलाती है की हम अब भी सेफ है………. पर बात ये नहीं है……..  बात ये है की अगर यूं ही लोग इस पर्व को छुट्टी की तरह मानते रहे….. तो क्या कल इन परेडों मे कोई दिखेगा…………. क्या ये लगातार महत्वहीन नहीं हो जाएंगे……. जहां हमने अपनी कई पुरानी मान्यताओं को छोड़ दिया कहीं इनसे भी हम किनारा तो नहीं कर लेंगे………..


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