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जादू प्रेम का...........

Posted On: 2 Feb, 2011 Others में

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बचपन मे पढ़ा ओर सुना था की विद्या एक ऐसा धन है जो की बाटने मे बढ़ता हैं………. पर समझ ही नहीं पाता था………….. की ऐसा कैसे है……. कैसे इसको बाटें ओर कैसे ये बढ़े…….. फिर दिन बड़े भाई ने पढ़ाते समय एक सवाल बिना पूरा पढे ही उसका पूरा उत्तर सही सही बता दिया………… मैं थोड़ा चौंका की ऐसे कैसे……….?
फिर भाई ने कहा की तुझे पढ़ाते पढ़ाते मुझको सब याद हो गया है…………. तब समझ की कैसे ये धन बढ़ता है……………..

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तब से केवल यही विचार था की विद्या एक ऐसा धन है जोकि बाटने से बढ़ता है………. फिर धीरे धीरे एक ओर धन से परिचय हुआ ………… जो विद्या की तरह ही बाटने से बढ़ता है…………. ओर वो धन था प्रेम………..

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प्रेम सुगंध के समान है……… जो फैलता है……. आप फूल के नजदीक से भी गुजर जाओ तो न चाहते हुए भी उसी सुगंध आपको आकर्षित करती है……….. उसी तरह प्रेम भी है……… आप यदि इस प्रेम से भरे हों तो न चाहते हुए भी लोग आपकी ओर आकर्षित होंगे…….. ओर आपके प्रति प्रेम उनके हृदय मे उत्पन्न हो जाएगा……… आपका प्रेम किसी पत्थर के हृदय मे भी आपके प्रति प्रेम जागा सकता है……….

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ये एक सामान्य सा प्रश्न है……. की क्या कभी पत्थर मे भी भगवान होते हैं……..? ये तो प्रतीक मात्र हैं…………. तो क्या प्रतीक से भी कभी उस तक पहुंचा जा सकता है………? जो किसी रूप का नहीं है फिर भी हर रूप उसी का है……… जिसका कोई वजूद नहीं है…… फिर भी हर वजूद मे बस वो ही है………… वास्तव मे ये हमारा उस अनंत परमात्मा के प्रति प्रेम ही है उसको पत्थर मे भी आने को मजबूर कर सकता है……….. प्रहलाद को खंभे से भगवान यूं ही नही मिलते……. वो उसका प्रभु के प्रति असीम प्रेम ही है जो उस परमात्मा को मजबूर कर देता है……..

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प्रेम के संदर्भ मे एक बहुत रोचक कथा सुनी……………

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एक बार एक संत किसी मंदिर के निकट अपनी कुटिया बना कर रहते थे…….. एक बार एक लोभी साहूकार संत से मिलने आया……… उसने संत से प्रार्थना की कि वो उसकी एक इच्छा पूरी करने का कोई उपाय बताए….. इसके बदले वो संत को 10 स्वर्ण मुद्राए देगा………… संत ने कहा कि वो उसकी हर भरसक सहायता करेगा…….. ओर फिर संत ने पूछा कि बता क्या इच्छा है तेरी……………..
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साहूकार बोला ……. महाराज कोई ऐसी तरकीब बताओ कि जिससे मेरी बीबी मर जाए…….. संत बोले हम यहाँ उस अनंत जीवन कि ओर लोगों को ले जाते हैं……. ओर तो हमसे किसी कि मौत का तरीका पूछ रहा है…….. पर हम इस काम मे तेरी कोई सहायता नहीं कर सकते……….
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साहूकार बोला कि महाराज सोच लें……… मैं इस काम के बदले आपको 20 स्वर्ण मुद्रा दूंगा……………. संत ने कहा कि ये मिट्टी का लोभ हमे न दे……… ये तो हम कब के छोड़ चुके………. अब साहूकार बोला 50 स्वर्ण मुद्रा दूंगा………. अब संत ने कहा ठीक है पर बता कि क्यों मारना चाहता है अपनी पत्नी को………. वो बोला कि वो हर बार अपने को सवारने मे मेरा धन व्यर्थ उड़ाती है………
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संत ने कहा………ठीक है सामने जो मंदिर है उसमे जाकर भगवान से कह कि यदि मेरी पत्नी स्वस्थ रहे दीर्घायु होजाए तो मैं 100 स्वर्ण मुद्राये चड़ाऊंगा……….. साहूकार बोला मैं अपनी पत्नी कि मौत इस लिए चाहता हूँ कि मेरा धन बचे…….. ओर तुम उसकि दीर्घायु के लिए मंदिर मे धन चड़ाने कि बात करते हो………
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संत ने कहा…….. मूर्ख मैंने चड़ाने के लिए नहीं केवल वादा करने को कहा है…….. जब तो धन नहीं चढ़ाएगा तो तेरी प्रार्थना उल्टी हो जाएगी ओर 3 माह के भीतर तेरी पत्नी मर जाएगी………… साहूकार को ये बात कुछ पसंद आ गयी….. ओर उसने मंदिर जा कर कहा कि अगर मेरी बीबी मर जाए तो मैं 1000 स्वर्ण मुद्राए चढ़ाऊगा…… संत ने कहा 1000 क्यों …… साहूकार बोला जब चढ़ानी नहीं है तो 1000 कहने मे क्या जाता है……..
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ओर साहूकार घर चला गया………. कुछ दिन बीते पर उसकी पत्नी पर कोई असर नहीं हुआ…….. वो ओर भी सेहतमंद नजर आने लगी…… तो साहूकार फिर संत के पास आया ओर बोला कि महाराज मेरी बीबी तो मरने के स्थान पर ओर भी स्वस्थ होने लगी है…….. तो संत ने कहा कि तूने धन नहीं चढ़ाया इसका पाप तुझे मिलना तय था…….. पर क्या तूने भगवान को इंसान समझा है ….. जो ये भी न समझ पाएँ कि तेरी पत्नी का मारना तेरे लिए शाप नहीं वरदान होगा……….
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अब साहूकार ने कहा कि अच्छा आप कोई उपाय बताएं………. तो संत ने कहा कि तू आज अपनी पत्नी के लिए सुंदर वस्त्र ले जा……. उसकी तारीफ कर उसको जी भर कर देख…….. उसको प्रेम कर………. जब तू उसको प्रेम करने लगेगा…… तो तब उसकी मृत्यु तेरे लिए शाप के सामान होगी……..और तब भगवान शाप के रूप मे उसको उठा लेंगे……………
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ये बात साहूकार कि समझ मे आ गयी……. ओर उसने ऐसा ही किया……….. वो सुंदर वस्त्र ओर आभूषण लेकर पत्नी के पास गया…….. यूं उसको पत्नी से कोई प्रेम नहीं था…… पर आज वो प्रेम का झूठा प्रदर्शन कर रहा था……. पत्नी भी उसको कोई प्रेम नहीं करती थी……… क्योकि वो जानती थी कि वो उसको नहीं केवल पैसे को प्रेम करता है…..
पर जब आज साहूकार सुंदर वस्त्र ओर आभूषण लाया ओर अपने प्रेम का प्रदर्शन करने लगा तो स्त्री ने भी अपने वर्षों के संचित प्रेम को पति पर लूटा दिया………… नए वस्त्रों मे अपनी खूबसूरत पत्नी को देख कर साहूकार बड़ा खुश हुआ……… ओर फिर जब उसकी पत्नी के भीतर दबा प्रेम बाहर आया तो वो भी प्रेम कि उस सुगंध से अछूता न रह सका …………….
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पत्नी के असीम प्रेम के कारण धीरे धीरे उसका भी अपनी पत्नी के प्रति प्रेम जागने लगा………… जैसे ही उसको ये एहसास हुआ वो दौड़ा………… ओर संत के पास गया ओर बोला कि महाराज अब मैं नहीं चाहता कि मेरी पत्नी को कुछ भी हो……….. मैं उसको वास्तव मे प्रेम करने लगा हूँ………… आप कोई राह दिखाईये……… संत ने कहा कि जितना धन चढ़ाने का वादा किया था वो चढ़ा दे…….वो बोला ठीक है……मैं तैयार हूँ………. ओर तब संत बोले बस हो गया अब उस धन कि आवश्यकता नहीं है……… तुझे जो राह दिखानी थी वो तुझको दिखा दी… अब तू इस पर चलता जा……..
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साहूकार बोला पर कहीं मेरी पत्नी को कुछ हो गया तो………… संत बोले वो भगवान सिर्फ देता ही है लेता कुछ भी नहीं है………… केवल अपनी पात्रता सिद्ध करनी होती है…….. अब तूने अपनी पत्नी के प्रति अपनी पात्रता सिद्ध कर दी है ………. अब तू जा……. कुछ नहीं होगा………………….

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ये साहूकार कि पत्नी का प्रेम ही था……… जिसे साहूकार के लोभ को समाप्त कर दिया…….



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60 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

NIKHIL PANDEY के द्वारा
February 11, 2011

वाह पियूष जी बहुत खुबसूरत कहानी और सन्देश.. हमें केवल अपनी पात्रता सिद्ध करनी होती है..

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    भाई निखिल जी…….. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………..

nishamittal के द्वारा
February 7, 2011

बहुत अच्छी कहानी पीयूष जी सबसे शेयर करने का शुक्रिया.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……

    Open के द्वारा
    November 28, 2013

    You make thgnis so clear. Thanks for taking the time!

a mishra के द्वारा
February 5, 2011

पीयूष जी , आपकी कहानी वाकई बहुत अच्छी है. यूँ ही लिखते रहे और लोगों में प्रेम बांटते रहे .धन्यवाद

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………..

baijnathpandey के द्वारा
February 5, 2011

ह्रदय को छू लेने वाली इस रचना के लिए धन्यवाद् ……….एक और बेहतरीन आलेख

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    पाण्डेय जी …. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………..

rajeevdubey के द्वारा
February 4, 2011

पीयूष जी, आपकी यह रचना पहले भी पढी थी और अच्छी लगी थी… अब भी, आपको मेरी ढेरों शुभकामनाएं

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    राजीव जी ……. रचना को पुनह पढने और सराहने के लिए और आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………..

rajkamal के द्वारा
February 3, 2011

प्रिय पियूष भाई …नमस्कार ! पति पत्नी में प्रेम पूर्ण समर्पण की भावना लिए हुए होना चाहिए , इसी बात को उजागर करता आपका यह सीख देता हुआ लेख …. प्रतियोगिता के लिए आपकी विजय की कामनायो के साथ

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    भाई राजकमल जी…… आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………..

Alka Gupta के द्वारा
February 3, 2011

पीयूष जी , प्रेम के स्वरूप पर प्रकाश डालती बहुत ही अच्छी कहानी है ! वेलेंटाइन कॉन्टेस्ट के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं !

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    अलका जी…… आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………..

February 3, 2011

पियूष जी कहानी के माध्यम से प्रेम का सन्देश फैलाने के लिए साधुवाद.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    भाई रतूड़ी जी…. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………..

Nikhil के द्वारा
February 3, 2011

अच्छी कहानी. बधाई!

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    निखिल भाई……… आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………..

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    भाई आकाश जी….. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………..

deepak pandey के द्वारा
February 3, 2011

अच्छी कहानी पियूष जी , भगवन करे प्रेम इस जगत में इतना फैले की नफ़रत के लिए कोई जगह न रहे.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    भगवन करे प्रेम इस जगत में इतना फैले की नफ़रत के लिए कोई जगह न रहे…….. सुंदरा भावों से भरी आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………..

abnish के द्वारा
February 3, 2011

“धीरे धीरे एक ओर धन से परिचय हुआ ………… जो विद्या की तरह ही बाटने से बढ़ता है…………. ओर वो धन था प्रेम……….. ” बहुत सुन्दर अंदाज में आपने अपनी बात कह दी. बढ़ाई स्वीकारें. आपका- अवनीश सिंह चौहान

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    अवनीश सिंह जी…… आपकी इस सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………..

HIMANSHU BHATT के द्वारा
February 3, 2011

भाई पियूष जी…. आपकी इस प्रतियोगिता में भाग लेने की उत्कट इच्छा झलक रही है….. निराश न हों….. शनिवार और रविवार की छुट्टी का पूर्ण उपयोग करें….. आपकी लेखनी बहुत सशक्त है…..

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 6, 2011

    सही कहा हिमांशु जी आपने अब शनिवार और इतवार का ही भरोसा है…….. आप इन छुट्टियों का पूरा लाभ उठायें……..और प्रतियोगिता के विजेता बने……. ऐसी कामना है…… आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………………….

    Gianina के द्वारा
    November 28, 2013

    Furrealz? That’s maslrvouely good to know.

Ramesh bajpai के द्वारा
December 25, 2010

प्रिय पियूष जी प्रेम के इस जादू भरे पिटारे को बहुत ही खूबसूरती से शब्द दिए है आपने |बहुत बहुत बधाई

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 25, 2010

    आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…….

rajeev dubey के द्वारा
November 27, 2010

प्रेम वह मुस्कान है जो अकारण ही ओंठों पर खिल उठती है … और स्वयं के साथ-साथ चारों ओर भी, खुशियाँ बिखेर देती है, बस यूँ ही … । अच्छा लेख ।

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 25, 2010

    अच्छी प्रतिकृया से उत्साहवर्धन के लिए शुक्रिया………

अरुण कान्त शुक्ला \\\'आदित्य\\\' \\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\' के द्वारा
November 26, 2010

जिस मनुष्य पर लोभ की प्रवृति हावी हो जाती है , उसके सभी नैसर्गिक भावनाएं दब जाती हैं | साधू ने उसी को समाप्त करने की कोशिश की और सफल हुआ | इस जगत को जो देंगे , जगत भी वही ब्याज के साथ वापस करता है | सुन्दर कहानी और विचारों के लिये बधाई |

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 25, 2010

    सही कहा आपने की…………. जिस मनुष्य पर लोभ की प्रवृति हावी हो जाती है , उसके सभी नैसर्गिक भावनाएं दब जाती हैं | आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…….

R K KHURANA के द्वारा
November 26, 2010

प्रिय पियूष जी, सुंदर लेख ! सच में प्यार से आप संसार जीत सकते है ! खुराना

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 25, 2010

    आदरणीय खुराना जी……. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…….

rita singh 'sarjana' के द्वारा
November 26, 2010

पियूष जी , बेशक प्रेम ही एक ऐसा अस्त्र हैं जो शत्रु का भी दिल जितने की क्षमता रखता हैं l प्रेम से प्रेम ही बढ़ता हैं जो साहूकार के साथ हुवा l बहुत सुन्दर और ज्ञानवर्धक कथा प्रेषित करने के लिए शुक्रिया l

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 25, 2010

    रीता जी…… आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…….

allrounder के द्वारा
November 26, 2010

भाई पियूष जी बिलकुल सही विचार व्यक्त किये आपने प्यार एक ऐसी चीज है जो बहुत तेजी से फैलती है, काश संसार मैं वो लोग जो नफरत फैलाते हैं प्रेम ke mehattav ko samajh saken !

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 25, 2010

    हम सभी की यही कामना होनी चाहिए………. की …………..काश संसार मैं वो लोग जो नफरत फैलाते हैं प्रेम के महत्व को समझ सकें………..आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………..

Tufail A. Siddequi के द्वारा
November 26, 2010

पियूष भाई अभिवादन, “आप यदि इस प्रेम से भरे हों तो न चाहते हुए भी लोग आपकी ओर आकर्षित होंगे…….. ओर आपके प्रति प्रेम उनके हृदय मे उत्पन्न हो जाएगा………” बधाई.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 25, 2010

    वास्तव मे यही सत्य भी है की ………. आप यदि इस प्रेम से भरे हों तो न चाहते हुए भी लोग आपकी ओर आकर्षित होंगे…….. ओर आपके प्रति प्रेम उनके हृदय मे उत्पन्न हो जाएगा…… आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया …………..

kmmishra के द्वारा
November 26, 2010

प्रेम एक ऐसी पवित्र गंगा है जिसमें डुबकी लगा कर मन के साभी पाप धुल जाते हैं । कहानी के लिये आभार ।

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 25, 2010

    ओर सत्य ये है की प्रेम रूपी इस गंगा मे डूब कर आदमी मरता नहीं अपितु अमर हो जाता है……… आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……….

HIMANSHU BHATT के द्वारा
November 26, 2010

पियूष जी एक और बेहतरीन रचना के लिए साधुवाद……..

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 25, 2010

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…………………………..

Amit kr Gupta ,Hajipur के द्वारा
November 26, 2010

नमस्कार पियूष जी. कैसे हैं ? आपकी यह रचना काबिले तारीफ हैं.वैसे तो आपकी हर रचना अच्छी होती हैं लेकिन यह कुछ अलग हैं. बधाई

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 25, 2010

    शुक्रिया अमित जी…………

RajniThakur के द्वारा
November 26, 2010

रचना अच्छी लगी पियूष जी प्रेम की महिमा तो खैर निराली है …लेकिन क्या कहते हैं वो ‘…और भी ग़म हैं ज़माने में…’

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 25, 2010

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…

Dharmesh Tiwari के द्वारा
November 26, 2010

नमस्ते पियूष जी, इसमें कोई शक नहीं की प्रेम में वो ताकत है जो जिन्दगी की हर ख़ुशी और हर उचांयियों को दिला सकती है,शायद प्रेम में ही जिन्दगी निहित है,धन्यवाद!

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 25, 2010

    प्रतिकृया के लिए शुक्रिया आदरणीय तिवारी जी…….

Aakash Tiwaari के द्वारा
November 26, 2010

वाह पियूष जी, क्या बात सुनाई आपने सुबह-शुबह आपका ये लेख पढ़ा और कुछ सीखने को भी मिला… एक शिक्षाप्रद लेख पर आपको ढेर सारी बधाई…. आकाश तिवारी

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 25, 2010

    आकाश भाई आपकी उत्साहवर्धक प्रतिकृया के लिए हार्दिक शुक्रिया……….

suryaprakash tiwadi के द्वारा
November 26, 2010

मित्र पियूष वाकई प्रेम में ताकत होती है,जो बुराई को भी अच्छाई में बदल देता है.लेकिन मै ये जानना चाह रहा हु की आपको किसे से अब तक प्रेम हुआ की नहीं

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 25, 2010

    सूर्य प्रकाश भाई……. इस लेख को पढ़कर आपको समझ लेना था की प्रेम मेरे भीतर ओवरफ़्लो हो रहा है…….. ओर इसको रोकने या बाधित करने का कोई भी प्रयास मैं नहीं करता…… अपितु जब भी ये उमंगे पैदा करता है मैं इसको छलका देता हूँ……….. कभी प्रकृति पर तो कभी प्राणियों पर कभी मित्रों के बीच ओर उसके बाद सारा अपने परिवार पर……….. ओर कोई प्रेम की परिभाषा मे नहीं जानता………….. आपकी प्रतिकृया के लिए हार्दिक शुक्रिया………..

chaatak के द्वारा
November 26, 2010

प्रिय पीयूष जी, आपकी इस पोस्ट के लिए मैं बेहद मशहूर पंक्तियाँ दोहराना चाहूंगा- ‘पोथी पढि-पढि जग मुआ, पंडित भया ना कोय, ढाई आखर प्रेम का पढय से पंडित होय|| अच्छी और विचारणीय पोस्ट पर बधाई!

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 23, 2010

    चातक बंधु…….. ये प्रेम के ढाई अक्षर का ही खेल है जो इस संसार को जीने लायक बनाता है………… इस प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक शुक्रिया……….

nishamittal के द्वारा
November 26, 2010

प्रेरणास्पद रचना पीयूष जी. प्रेम की शक्ति की महिमा अपरम्पार है.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 23, 2010

    इस प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक शुक्रिया……….


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