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शर्तों पर प्रेम ......

Posted On: 3 Feb, 2011 Others में

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जागरण जंक्शन ने वेलेंटाइन डे प्रेमियों के महापर्व के लिए प्रतियोगिता का आयोजन कर एक मौका दिया है की लोग अपने विचार प्रेम के प्रति दें………. इस मंच पर मेरे भीतर जितना भी प्रेम था वो मैं पूर्व मे ही कुछ लेखों पर उड़ेल चुका हूँ……… अब कुछ विचार है ओर न ही खाली समय है…… तो मजबूर हूँ की उनही अपने तरह के प्रेम से सराबोर लेखों को दुबारा प्रस्तुत करूँ…….. चुकि वेलेंटाइन डे जैसे महापर्व मुझ जैसे मूढ़ों के लिए नहीं है…….. इसलिए इस महापर्व के अनुसार हमारा लिखना बहुत मुश्किल है….. तो कुछ पुराने लेख दुबारा इस महापर्व पर इस मंच को समर्पित कर रहा हूँ…………


एक बार एक जंगल मे एक भँवरा ओर एक तितली रहा करते थे । दोनों एक दूसरे से बहुत प्रेम करते थे । भँवरे के मन मे एक दिन विचार आया की क्या तितली भी मुझे उतना ही प्रेम करती है जितना की मैं । भँवरा जानता था की तितली उसको बहुत प्रेम करती है । पर वो ये जानने को उत्सुक था की आखिर कितना प्रेम वो उसको करती है ।


उस जंगल मे एक फूल का पेड़ था । इस पेड़ पर एक बड़ा ही सुंदर पुष्प लगता था जो सूर्योदय से सूर्यास्त तक खिला रहता था ओर ज्यों ही अंधेरा होने लगता वो मुरझा जाता । ओर फिर अगले दिन वो सूर्य की किरणों के साथ फिर खिल उठता । दोनों अक्सर उस फूल के पेड़ के पास मिलते । भँवरा रोज सुबह जल्दी पहुँच जाता ओर तितली का इंतज़ार करता ।


अब जब भँवरे ने तितली की परीक्षा लेने का फैसला कर लिया था तो उसने सुबह सुबह देर से आई तितली से कहा की क्या तुम भी मुझे उतना ही प्रेम करती हो जितना की मैं तुम्हें । तितली ने कहा मुझे नहीं पता की तुम मुझे कितना प्रेम करते हो पर मेरे प्रेम की कोई सीमा नहीं है । ये मापने के योग्य नहीं है । ये परिमाप की सीमा से परे है ।

भँवरा इतने से संतुष्ट नहीं था । वो ठान चुका था की वो जान कर रहेगा की आखिर तितली उसको कितना प्रेम करती है ।


उसने तितली से कहा की हम दोनों मे से कौन किसको अधिक प्रेम करता है इसका पता लगाने का एक तरीका मेरे पास है । तितली ये सुनकर हैरान थी । उसने कहा की वो क्या । भँवरा बोला की कल जो भी इस पुष्प पर पहले बैठा होगा वो ही दूसरे को अधिक प्रेम करता होगा । तितली ने भँवरे को समझाया की प्रेम परीक्षा से नहीं विश्वाश से बढ़ता है ओर इसकी माप किसी भी तरह नहीं की जा सकती है । किन्तु अब भँवरे को लागने लगा की तितली बहाने बनाने का प्रयास कर रही है। उसने कहा की परीक्षा देने मे संकोच क्यों । तितली को मजबूर होकर मानना पड़ा ।


दूसरे दिन भँवरा सूर्योदय से पूर्व पुष्प के पास आकर बैठ गया । किन्तु तितली का कोई पता नहीं था । धीरे धीरे सूर्य के उगने का समय नजदीक आ गया । किन्तु तितली का कोई पता नही था । भँवरे को लगा की शायद तितली को उससे प्रेम नहीं इसी लिए वो नहीं आ रही है ।


किन्तु शर्त के अनुसार तय था की जो पहले पुष्प पर बैठेगा वो ही दूसरे से अधिक प्रेम करता है तो भँवरा बुझे मन से पुष्प पर बैठने को जाने लगा । जैसे ही वो पुष्प के पास पहुंचा, सूर्य के प्रकाश के साथ पुष्प पूरा खुला ओर उसके अंदर मरी हुई तितली पड़ी थी । भँवरा अवाक रह गया । उसकी कूछ समझ मे नही आया की ये क्या हुआ ओर कैसे हुआ । वो वहीं पर रोने लगा । ओर रोते रोते उसने उस पुष्प से पूछा की प्यारे पुष्प इस तितली की ये दशा कैसे हुई ।


पुष्प बोला कल सूर्यास्त के समय ये तितली मेरे पास आई ओर मेरे ऊपर बैठ गयी । मैंने इसको कहा की सूर्यास्त होने को है ओर मेरी ये पंखुड़ियाँ सूर्यास्त के साथ ही बंद हो जाएगी ओर तू इनके बीच दब कर मर जाएगी । पर ये नहीं मानी इसने कहा की मैं जानती हूँ की भँवरा मुझे बहुत प्रेम करता है ओर वो भोर होने से पूर्व ही यहाँ आ जाएगा । ओर तब शायद वो मुझसे पहले तुम पर बैठ जाए । ओर मैं प्रेम की इस शर्त को नहीं हारना चाहती हूँ । ओर तब मैंने उसको कहा की लेकिन तू इस तरह तो मर जाएगी । तब तितली बोली की मैं भले मर जाऊँ लेकिन शर्तों ओर मापों से परे मेरा ये प्रेम सदा जिंदा रहेगा ।


ये सारी बात सुनकर भँवरा बहुत दुखी हुआ । आज उसको ये एहसास हुआ की प्रेम मे कोई बंधन कोई शर्त कोई माप नही हो सकती । प्रेम इस सब से परे की अनुभूति है । पर अब बहुत देर हो चुकी थी उसने उससे अनंत प्रेम करने वाली उस तितली को अपनी शर्त के लिए मरने को विवश कर दिया था … उसी शाम उसी पुष्प के ऊपर बैठ कर उस भँवरे ने भी आपनी जान दे दी …. अगली सुबह भँवरा ओर तितली दोनों की मृत देह उस पुष्प के अंदर पडी थी……. दोनों एक सुदर जीवन जी सकते थे किन्तु मात्र परखने के फेर मे दोनों को जान देनी पड़ी….

ओर ठीक उसी भँवरे की तरह हम भी शर्तों पर प्रेम, मित्रता ओर न जाने कैसे कैसे सम्बन्धों को परख रहे हैं….. अगर आप मेरी शर्तों पर खरे उतरे तो आप मेरे परम मित्र अन्यथा नहीं । अगर पिता ने पुत्र की मांग पूरी की तो संबंध नहीं तो नहीं ?



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79 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

kanchan chhatrashali के द्वारा
May 17, 2011

बहुत ही सुन्दर रचना है ……… शर्तों पर किसी भी रिस्तो को नही मापा जा सकता

baijnathpandey के द्वारा
February 5, 2011

एक खुबसूरत नज्म याद आ गयी ………परखना मत परखने से कोई अपना नहीं होता ……..अभिनन्दन एवं शुभकामना

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    पाण्डेय जी …. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………

    rajkamal के द्वारा
    February 1, 2011

    प्रिय पियूष भाई …नमस्कार ! अरे भईया आप प्रेम करने का इकरार तो करो , हमको आपकी सारी की सारी शर्ते मंज़ूर है …. और एक पते की और गहरे राज़ की बात :- ” उनको भी मंजूर है” … ******************************************************************************************************************* पियूष भाई चिंता मत करे …यहाँ पर मेरे समेत ज्यादातर लोगों के पास पुराना प्रेम ही है…. अब तो ले दे के उसी से काम चलाना पड़ेगा ….

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    मुनीश जी…….. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…….. आपके इस लिंक पर विजिट कर चूका हूँ….. .

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    bhai राजकमल जी….. हम तो प्रेम करते ही हैं और करते रहेंगे भी……… वो भी बिना शर्त ……. और जहाँ तक पुराने प्रेम का प्रश्न है तो ओल्ड इज गोल्ड……….आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……… .

rita singh \'sarjana\' के द्वारा
February 1, 2011

पियूष जी, एक ज्ञानवर्धक रचना……………… सराहनीय पोस्ट के लिए बहुत-बहुत बधाई l

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……… रीता जी……

Manish Singh "गमेदिल" के द्वारा
February 1, 2011

पियूष जी मैंने न जाने कितनी निच्छल प्रेम की कहानियां एवं कवितायेँ पढ़ी परन्तु इस कहानी को पढ़कर मेरा दिल किस दुनिया में खो गया ………. बताने के लिए उपयुक्त शब्द नहीं मिल रहे हैं……. आप तो रचनाकार हैं,,,,,,,,,, मेरी भावनायों को समझ लीजियेगा………… सुंदर प्रस्तुति

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    आपकी सुंदर भावनाओं के लिए और आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………

abodhbaalak के द्वारा
February 1, 2011

पियूष जी संभवता आपने इस रचना को पहले भी पोस्ट किया था, और मैंने पहले इस पर लिखा था की दिल के गहरायिओं ….. इस बार भी यही कहूँगा की दिल को छू ….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    मैं भी पहले की तरह ही कहता हूँ……… की मित्र आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………

HIMANSHU BHATT के द्वारा
February 1, 2011

बहुत सुंदर प्रेम की व्याख्या करती मार्मिक कथा…… सुंदर….. साधुवाद……

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……… हिमांशु जी……

Alka Gupta के द्वारा
February 1, 2011

पीयूष जी , वेलेंटाइन डे के उपलक्ष्य में इतने अच्छे आलेख की पुनः प्रस्तुति पर मेरी एक बार फिर हार्दिक शुभकामनाएं !

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………

vinita shukla के द्वारा
February 1, 2011

पीयूष जी, आपकी रचना विख्यात कवि श्री गोपाल दास नीरज के एक फिल्मी गीत की याद दिलाती है – ‘कोई शर्त होती नहीं प्यार में मगर प्यार शर्तों पे तुमने किया नज़र में सितारे जो चमके जरा बुझाने लगीं आरती का दिया …..’ मार्मिक और प्रभावशाली लेख के लिए बधाई.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 1, 2011

    आपकी इस गीतमय प्रतिकृया के लिए शुक्रिया………..

ashvinikumar के द्वारा
February 1, 2011

जिन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं ,मे तो मर कर भी मेरी जान तुम्हे चाहूंगी,,,पियूष भाई प्रेममय सम्पूर्ण सृष्टी ही है,किसी एक बिंदु को क्या देखें ………..जय भारत (मन अशांत होने के कारण पिछ्ला आर्टिकल के प्रवाह एवं विषयवस्तु में भटकाव आ गया था अतएव उसे डिलीट कर दिया )………………..जय भारत

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 1, 2011

    अश्विनी भाई…….. प्रेममय सम्पूर्ण सृष्टी ही है,किसी एक बिंदु को क्या देखें … खूबसूरत वाक्य………

Rupesh के द्वारा
January 13, 2011

प्रेम मे कोई बंधन कोई शर्त कोई माप नही हो सकती । प्रेम इस सब से परे की अनुभूति है ।

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 14, 2011

    रूपेश जी उत्साह वर्धन के लिए शुक्रिया…………..

Vibhuti के द्वारा
January 12, 2011

aapne kahani ulti likh di h, jaha tak mujhe pata h , bhawara hi phul ke andar soya tha, titliyan nahi

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 12, 2011

    विभूति जी ………..प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…….

    Rupesh के द्वारा
    January 13, 2011

    vibhuti ji pratikriya ke bajay utsahvardhan jyada shrestha hai so plz………..

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 14, 2011

    क्या फर्क पड़ता है की सोया कौन………. संदेश अधिक महत्वपूर्ण है…….

ज्‍योति के द्वारा
January 12, 2011

वाह पंत जी वाह बहुत सुन्‍दर जब पढना शुरू किया तो अंत करके ही छोङा पाठक को बांधने की अदभुत क्षमता बहुत अच्‍छा ।

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 12, 2011

    आपकी इस उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…

rosy के द्वारा
January 12, 2011

Bahut hi sunder lekh. Prem ki seema nahi. Dil ko chhu gai kahani.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 12, 2011

    आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…….

sushma के द्वारा
January 11, 2011

अत्यंत भावुक कहानी है.वास्तव में प्यार को मापा नहीं जा सकता.जो प्यार को मापने के फेर में रहते है वास्तव में वो प्यार नहीं करते है.क्योकि प्यार तो आत्माओ को जोड़ता है.और आत्माओ को नापने का क्या यन्त्र है?कोई यन्त्र नहीं है.प्यार सभी सीमओं से परे है.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 12, 2011

    सही कहा आपने जब भावनाएं सीमाओं को पार कर जाती है तो वो प्रेम है…… प्रेम किसी योग्यता का मोहताज नहीं………. ….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…

Alka Gupta के द्वारा
January 11, 2011

यह इतनी अच्छी कहानी मेरी आँखों से कैसे ओझल हो गयी नहीं पता ….आज अगर न पढ़ती तो निश्चित ही आपकी इस रचना से रूबरू न हो पाती पीयूषजी, बहुत सही कहा है कि कोई भी सम्बन्ध शर्तों से नहीं परखे जा सकते है……..| केवल एक दूसरे के प्रति प्रेम की भावनाएं ही हैं जिन्हें समझने व आदर करने से ही सभी संबंधों में एक उदात्त प्रेम की अनुभूति होती है और उनकी नींव भी सुदृढ़ रहती है……..! अच्छी रचना के लिए धन्यवाद !

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 12, 2011

    केवल एक दूसरे के प्रति प्रेम की भावनाएं ही हैं जिन्हें समझने व आदर करने से ही सभी संबंधों में एक उदात्त प्रेम की अनुभूति होती है और उनकी नींव भी सुदृढ़ रहती है…… खूबसूरत भावनाएं प्रतिक्रिया द्वारा व्यक्त कर दी आपने……… आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……….

J.L. Singh के द्वारा
January 11, 2011

आज उसको ये एहसास हुआ की प्रेम मे कोई बंधन कोई शर्त कोई माप नही हो सकती । प्रेम इस सब से परे की अनुभूति है. पीयूष जी सचमुच अनमोल है ये पंक्ति! अति सुन्दर रचना एवं सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई. यह आज के शर्तों वाली प्रेम के लिए उदहारण स्वरुप भी है. कोटि कोटि धन्यवाद!

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 11, 2011

    सिंह साहब आपकी प्रोत्साहन भरी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………..

aditya के द्वारा
January 3, 2011

पन्त जी, दिल को छू लेने वाली रचना. मैंने आज ही पडी है. पढ़ कर अवाक रह गया. …………..मैं निशब्द हो गया हूँ . ………………. लगता है कि मैं भँवरे और तितली के बीच के संवाद सुन रहा हूँ…………. आप की इस रचना का मैं कहीं उपयोग करना चाहूँगा, यदि आप को बुरा ना लगे………………… आपका आदित्य. http://www.aditya.jagranjunction.com

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 4, 2011

    भाई आदित्य जी…… मैं स्वयं इस बात को कह चूका हूँ की ये लेखो वास्तव में प्रयास है कुछ चीज़ों को बदलने के……. और अगर कहीं इनका सकारात्मक प्रयोग आप कर सकें तो ये ख़ुशी की बात हैं…………….

amita के द्वारा
January 2, 2011

बहुत सुन्दर लेख आज के समय पर खरा है.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 3, 2011

    आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया

div81 के द्वारा
December 31, 2010

पियूष जी, …………………….नववर्ष की शुभकामनाये नया साल आप के जीवन में खूब सारी खुशियाँ और खूब सारी सफलता लाये आप की और आप के परिवार की मंगल कामना के साथ ……..दिव्या

    Rawal Kishore के द्वारा
    January 1, 2011

    बहुत अच्छी पोस्ट है दिल को पिघला कर रख देने के लिए सुन्दर पोस्ट के लिए हार्दिक बधाई

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 3, 2011

    आपको भी नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये…………….

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 3, 2011

    रावल किशोर जी .आपको ये कथा पसंद आई इसके लिए शुक्रिया…..

atharvavedamanoj के द्वारा
December 31, 2010

लाली छाये दशों दिशा में, जगमग जगमग हो जग सारा | नवल वर्ष के नव प्रभात को विनत हमारी, नमन हमारा || शीतल, मलय सुवासित नंदन वन सा मह मह महके भारत | कोकिल सा कूके इस जग में खग सा चह चह चहके भारत | फटे शत्रुओं पर बन घातक ज्वाला भक् भक् भभके भारत | शौर्य, तेज का तीक्ष्ण हुताशन बनकर दह दह दहके भारत | तड तड टूटे सारे बंधन जीर्ण शीर्ण हो सारी कारा | नवल वर्ष के नव प्रभात को विनत हमारी नमन हमारा || शेष फिर कभी वंदे भारत मातरम मनोज कुमार सिंह मयंक एक हिंदू आतंकवादी

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 3, 2011

    इस सुन्दर कविता से सजी नव वर्ष की शुभकामना के लिए शुक्रीया….

Amit Dehati के द्वारा
December 31, 2010

आपने बहुत ही खुबसूरत विषय पर चर्चा किया है अच्छा लगा , अच्छी पोस्ट के लिए हार्दिक बधाई ! http://amitdehati.jagranjunction.com

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 31, 2010

    अमित जी आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…..

Anuj Kumar Karonsia के द्वारा
December 28, 2010

पियूष जी आपकी ये रचना मार्मिक है, मुझे प्रतिक्रिया देने पर विवस किया है इसने, और इससे अधिक क्या बोलूं. लेकिन इसमे भी कोए दो राय नहीं की मानव मन बिलकुल उस भवरे की तरह ही होता है जहा वो हमेशा ये जानने मै लगा रहता है की कोए उसे कितना प्यार करता है, फिर चाहे रिश्ता कोए भी क्यों न हो और व्यक्ति कोए भी क्यों न हो. कहानी के माध्यम से उस भवरे रूपी मन को शिख देने के लिए बहुत बहुत धन्यबाद.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 31, 2010

    कहानी के संदेश को समझ कर सराहने के लिए हार्दिक शुक्रिया…………

abodhbaalak के द्वारा
December 28, 2010

पियूष जी आपकी इस रचना को पढ़ कर कुछ पल तक तो स्तब्ध रह गया, प्रेम का ऐसा उदारहण ….. सच यही है की प्रेम का कोई पैमाना नहीं होना चाहिए, बहुत बहुत बहुत बहुत बहुत बहुत सुन्दर रचना, शब्द नहीं है … http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 31, 2010

    मित्र आपकी इस प्रतिकृया के लिए हार्दिक शुक्रिया…….. ………

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
December 28, 2010

प्रिय श्री पियुष पंत जी, निस्‍:संदेह रिश्‍ते आज शर्तो पर जिए जा रहे हैं तभी तो लिव इन का जन्‍म हुआ है। यह प्रेम-कथा रिश्‍ते को सही तरीके से जीने का गुर देती है। बधाई। अरविन्‍द पारीक

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 28, 2010

    अरविंद जी बिलकुल सही कहा आपने ……. ये लीव इन रेलेशन भी शर्तों पर प्रेम ही है…. परख कर किया जाने वाला प्रेम…… आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……

rajkamal के द्वारा
December 27, 2010

piyush bhai …..namaskar आजकल प्रेम शर्तो से कहीं उपर उठकर सौदेबाजी + धोखा + विश्वश्घात +तिजारत बन गया है …. अब प्यार में दीर्घकालिक और अल्पकालिक फायदे देखे जाते है ….अपना -२ हित साधा जाता है …. अब और कितनी तारीफ करूं आजकल के जमाने के इलू -२ की …..

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 28, 2010

    राजकमल जी…. आप्कने सही कहा आखिर कैसे सौदेबाजी + धोखा + विश्वश्घात +तिजारत = प्रेम हो सकता है…… आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………….

allrounder के द्वारा
December 27, 2010

पियूष जी, शर्त रहित प्यार को एक प्यारी सी कहानी के माध्यम से बताने के लिए बधाई !

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 28, 2010

    आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……. सचिन जी..

Aakash Tiwaari के द्वारा
December 27, 2010

आदरणीय पियूष जी, बहुत ही स्वाभाविक,दिल को झकझोर देने वाली कहानी जिसको सभी लोगों को पढना चाहिए……वाकई में मैंने तो कयास लगाया था की वो तितली वही बैठी रह जायेगी मगर जब आगे पढ़ा की वो मर गयी तो बहुत दुःख हुआ….विश्वास मानिए बहुत तकलीफ हुई कहानी का अगला भाग पढ़कर…… एक सिक्षाप्रद कहानी के लिए आपको बहुत बधाई… आकाश तिवारी

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 28, 2010

    आकाश जी….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…….वास्तव में सच्चे प्रेम का अंत हमेशा दुखद ही देखा गया है……

Preeti Mishra के द्वारा
December 27, 2010

बहुत ही सुंदर रचना पियूषजी, यदि प्रेम शर्तों पर किया जाये तो वो प्रेम नहीं सौदा है. विडंबना यह है कि आजकल इस सौदे को लोग प्रेम का नाम दे देते हैं.इस सुंदर रचना के लिए बधाई.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 27, 2010

    आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ…प्रेम ओर सौदे के फर्क को समझना ही होगा…। आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……..

nishamittal के द्वारा
December 27, 2010

पीयूष जी,आपकी कथा आज के तथाकथित प्रेमिओं के लिए एक शिक्षा भी है साथ ही शाही जी ने पुराने गीत की पंक्तियाँ याद दिला दीं.कथा का प्रसंग बहुत अच्छा लगा.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 27, 2010

    आदरणीय निशा जी …….ये केवल प्रेमियों के लिए ही नहीं है ये हर एक रिश्ते के लिए है…….. इसको इस मंच पर रखने के लिए मैं जिस घटना से प्रेरित हुआ वो किसी प्रेमी प्रेमिका की नहीं अपितु हम मित्रों की है …. अगले पोस्ट मे इसको भी उल्लेखित करूंगा…. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……..

Syeds के द्वारा
December 27, 2010

प्यार जैसी पवित्र चीज़ में शर्त परखना वगैरह शोभा नहीं देता..प्यार विश्वास का दूसरा नाम है…मोहब्बत में दुनिया ही इतने इम्तेहान लेती है …अगर खुद एक दूसरे की आज़माइश में लग जायें तो… बेहद खूबसूरत कहानी..पेश करने का अंदाज़ निराला है. Http://syeds.jagranjunction.com

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 27, 2010

    बहुत सही बात कही आपने की प्रेम की परीक्षा तो दुनिया ले ही लेती है फिर क्यों एक दुसरे की परीक्षा ली जाये ………..

vinaysingh के द्वारा
December 26, 2010

welldone sir, its a complete definition of love.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 27, 2010

    शुक्रिया विनय जी…….

आर.एन. शाही के द्वारा
December 26, 2010

पियूष जी, इस मार्मिक प्रेमकथा को आपने अपने अंतर्मन से लिखा है, इसलिये भावनात्मकता में जान सी पड़ गई है । आपकी सभी प्रस्तुतियां संदेशपरक ही होती हैं, परन्तु शर्त की बिना पर किये जाने वाले प्रेम की इस कहानी पर मुझे उस गीत की पंक्तियां स्वत: याद आ रही हैं — कोई शर्त होती नहीं प्यार में, मगर प्यार शर्तों पे तूने किया, नज़र में सितारे जो चमके ज़रा, बुझाने लगीं आरती का दिया, जब अपनी नज़र में ही गिरने लगो, अंधेरों में अपने ही घिरने लगो, तब तुम मेरे पास आना प्रिये, ये दीपक जला है जला ही रहेगा तुम्हारे लिये, कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे … तड़पता हुआ जब कोई छोड़ दे ॥

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 27, 2010

    आदरणीय शाही जी …….. आपकी इस प्रतिक्रिया ने इस लेख को बेहतर बना दिया……….. आपकी इस मूल्यवान प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……..

rajkamal के द्वारा
December 26, 2010

जो हमने भी अपना जलवा दिखाया तो जल जायोगे …. अगली बार मैं भी एक ऐसी कहानी लेकर आने वाला हूँ की जिसमे एक दुष्ट जादूगरनी सुन्दर नारी का रूप धरकर तीन भाईऑ में से दो के जिस्म से मांस नोच लेती है …लेकिन तीसरे भाई के काबू में आकर अपने असली अन्त कों प्राप्त होती है …. उम्मीद करता हूँ की मैं जो आपसे इशारों में कहना चाहता हूँ …वोह आप समझ जायेंगे .. आपका शुभचिंतक

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 27, 2010

    राजकमल भाई ……. आपकी इस कहानी का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा …….. आपकी स्नेहपूर्ण प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……..

ashutoshda के द्वारा
December 26, 2010

पियूष जी नमस्कार कहानी पुरानी लेकिन एक नए जोश और उमंग के साथ बहुत सुंदर वाकई ये शर्ते ही तो है जो हमें गर्त में धकेलती है ! इनसे तो हमें पार पाना ही है आशुतोष दा

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 27, 2010

    उत्साह वर्धक प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया….. आशुतोष दा.

rajeev dubey के द्वारा
December 26, 2010

रोचक प्रस्तुति…

roshni के द्वारा
December 26, 2010

पियूष पन्त जी नमस्कार परखना मत परखने से कोई अपना नहीं रहता किसी भी आईने मे देर तक चेहरा नहीं रहता …….. सच प्यार या दोस्ती को परखने की जरूरत ही नहीं यु भी अगर कोई इसे परखना चाहे तो नुकसान परखने वाले का ही होता है ………….. बिना शर्त के किया गया कार्य ही सर्वोतम है सुंदर कहानी के लिए बधाई

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 27, 2010

    आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……..


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