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क्या मैं बच पाउँगा....... ?

Posted On: 9 Feb, 2011 Others में

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कल के लेख में आपने मेरे बारे में पढ़ा ……. आपने अपने अपने आकलन किये …… मेरे लिए………. अब कुछ और तथ्य बताना चाहता हूँ……… नीचे दिए लिंक्स पर राईट क्लिक करके उन्हें न्यू विंडो पर एक बार पढ़ लें…………
मैं कौन हूँ……… ?
क्या है मेरा कसूर ….?
क्या मैं इतना बुरा हूँ…… ?
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जी हाँ तो अब आप मुझे पहचान गए…….. मैं हूँ आपका राष्ट्रीय पशु बाघ……… आकड़ों में जिनकी संख्या 1411 बताई जाती है……… पर पिछले 15 दिन में ही हमारे 3 साथियों के शव भारत के प्रसिद्द टाइगर रिजर्व कार्बेट नेशनल पार्क के क्षेत्र से पाये गए……… वास्तव मे अगर हमारी सर्वाधिक संख्या कहीं देखनी हो तो सरकारी आकड़ों मे देखें……… वहाँ हम मरने के बाद भी जिंदा है…….. ओर यकीन मानिए…… की जब हम पूरी तरह से भी लुप्त हो जाएंगे……. तब भी सरकारी आकड़ों मे कई वर्षों तक पाये जाएंगे………. क्योकि हमारे संरक्षण के नाम पर ही कई विभाग के अधिकारी करोड़ों मे खेल रहे हैं……… हम अब जंगलों मे कहीं भी नहीं हैं…. …..जहां बचे है वहाँ सरकारें हमारे लिए शिकारी नियुक्त कर रही हैं……….
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कार्बेट पार्क की सीमा से लगे क्षेत्र मे एक बाघ को मार कर जिस तरह हाथी पर बैठा कर घुमाया गया ……….. वो हमारे प्रति सरकार के संरक्षण का सुबूत है…….. सरकारों से हमें कोई शिकायत भी नहीं है ……. जो पाकिस्तानी/ बंगलादेशी आतंकवादियो को अपने घर मे घुसने से नहीं रोकती वो भला हमारे घर मे घुसने वाले अपने वोटरों को कैसे रोके…….. जिस तरह इन आतंकवादियों द्वारा किये गए बम धमाकों के बाद उस की जांच के नाम पर ही जनता के कई करोड़ उड़ाए जाते हैं…… उसी तरह हमारे संरक्षण ओर हमें मारने दोनों ही कामो के लिए भी लाखों का खेल होता है………
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हमने कभी किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया……… एक पूरा का पूरा जंगल हमने अपने लिए चाहा…….. और हमने कई पर्यटकों को भी अपने दर्शनों के लिए आकर्षित किया ………. जिससे सरकारी खजाने मे बढ़ोतरी हुई……..आम जन से हमारी कोई शत्रुता नहीं रही…….. हमने कभी किसी को कोई हानी नहीं पहुंचाई………. पर आदमी ने हमारे जंगल मे घुस कर जंगली जानवरों को या तो अपने खाने के लिए या फिर शिकार के शौक के कारन मारना शुरू कर दिया…….कहते है की जब पेट की आग जलाती है तो आदमी भी जानवर बन जाता है ….. तो हम तो जानवर है ही…… जब ऐसे आदमी के लिए जो पेट की खातिर जानवर बना मौत की सजा नहीं है तो हमारे लिए क्यों………….
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इन लोगों ने हमे मारने के लिए जंगल मे लोहे के शिकंजे लगाए……….. जिनमे फंस कर या तो हमने अपने पंजों से या फिर अपनी जान से हाथ धोया……… पर जब हम अपने पंजे को गंवा बैठे तो हमारे लिए भोजन का संकट हो गया…….. एक अपाहिज आदमी तो मांग कर भी खा ले ….. पर एक अपाहिज शेर कैसे …………. जिन पंजों से हम शिकार करते हैं…….. अगर वो ही न रहें तो हम क्या करें………. एक ही रास्ता है किसी सरल शिकार की खोज ……… ओर वो ही इंसान जो की हमारे क्षेत्र मे अक्सर ही घुसता है………. कभी हमारे शिकार के लिए तो कभी लकड़ी ओर चारे के लिए………… (हमारे स्वभाव और नरभक्षी बनाने के कारणों के बारे में ऊपर के लिंकों में काफी कुछ है….)
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फिर हम जब इन लोगों पर जो हमारे घर में अन्दर तक घुस कर हमारे जीवन में दखल दे रहे हैं पर हमला कर बैठे तो हमारे लिए सरकारें शिकारी भेज देती हैं……….हमने ये सुना था की इंसान जिसका नमक खाता है उसका हो जाता है….. शायद इसी लिए हम जानवर नमक नहीं खाते ……….. पर ये सरकारें जिन बाघों को बचाने के लिये प्रोजेक्ट टाइगर के नाम पर दुनिया भर से मिलने वाले फंड खा रही हैं उनही पर गोलियां चला रही है………… और सबसे दुखद बात ये है की इस पूरी कहानी मे हमारे साथ कोई खड़ा नहीं है………
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बहुत आदमी देखें इस जंगल मे हमने……….
पर भरे शहरों मे भी कोई इंसान नहीं देखा……..
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क्या हम इसी तरह मौत के जिम्मेदार हैं……… क्या हमारे लिए यही एक उपाय है…… हमें कोई दर्द नही है ऐसी मौत का ……….
हमें दर्द है तो उस खेल से जो हमारे नाम पर खेला जा रहा है…….. हम चाहते है की सरकारें पूरे देश मे हर जंगल मे शिकारी तैनात कर दें…….. ओर आदेश दें की एक माह मे सारे बाघ मार दिये जाए……….. कम से कम हमारे संरक्षण के नाम पर आम जनता का जो पैसा यूं ही उड़ाया जा रहा है वो उसके काम तो आ जाए………. भले हमारी खाल विदेशों मे बेच दी जाए पर कम से कम उस पैसे को देश के लिए प्रयोग तो किया जाए……….
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अब कुछ शब्द पियूष जी भी कह लें…… उनके दो दिन बर्बाद हुए हैं मेरे कारण……….
अपने अंतिम कगार पर पहुंचा एक दिलेर ……………. भारतीय बाघ………..
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आज एक चित्र देखा जोकि लेख के अंत में लगा है……..
इस चित्र मे एक बाघ जिसको मार कर उसके हाथों को बांध कर रखा था…… जिसको देख कर यूं लग रहा था मानो वो दोनो हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रहा हो की प्लीज़ मुझे बचा लो……. इस चित्र को देख कर आँखें कुछ नम सी हो गयी …… ये वो जानवर है जिसके हाथों मौत भी मैं सौभाग्य मानता हूँ……… इस शानदार जीव को हक है इसका……….. पर इसकी ये दशा ……….. क्या किसी के गुण आपके नाश का कारण होने चाहिए…….
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आखिर जंगलों मे घर बनाने वालों के लिए बाघ को मारा जाना कहाँ तक उचित है……….. जो लोग भारत पाक सीमा पर घर बना लेते हैं……… क्या उनपर गोली बारी होने पर पाकिस्तानी सैनिकों को उनकी सीमा मे जा कर मारा जाता है …….. या उन सरहद पर रहने वालों को वहाँ से हटा दिया जाता है…….. पर क्योकि वहाँ जवाब देने के लिए एक शक्तिशाली दुश्मन है……….. इस लिए जनता को हटाया जाता है ……….. और यहाँ एक प्राणी जोकि आधुनिक शक्ति से सुसज्जित मानव के समक्ष कमज़ोर है को ही मिटा दिया जाता है……..
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अगर इनको मिटाना ही समस्या का हल है तो क्यों नहीं सारे के सारे बाघों को एक साथ मार दिया जाता…….. क्यों प्रोजेक्ट टाइगर जैसे प्रोजेक्टों पर पैसे खर्चे जा रहे हैं……….. जब इनको गोली से मारने के लिए वन विभाग ही आदेश दे रहा है………
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कुछ ब्लोगर मित्रों ने राय दी थी की क्योकि ये वन्य जीवों से प्रेम पर लेख है तो इसे भी कांटेस्ट में शामिल करूँ……. पर मैं ये नहीं कर सकता क्यूंकि यहाँ प्रेम पर केवल बाते होती है …….. और इस गंभीर विषय को कांटेस्ट से जोड़कर इसके मूल स्वरूप को मैं छेड़ना नहीं चाहता था……….

Help

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ये जीव हमसे सहायता की गुहार कर रहा है………. आइये कुछ समाधान का प्रयास करें………

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13 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

priyasingh के द्वारा
February 12, 2011

आपके इस लेख और उसमे लगे चित्र ने तो चौंका दिया सही कहा आपने …..”बहुत आदमी देखे इस जंगल में हमने पर भरे शहरो में भी कोई इंसान नहीं देखा”………इंसान आजकल इंसानों के साथ इंसानियत नहीं दिखा रहा तो वन्य जीवो के साथ क्या दिखाएगा आज ही अखबार में पढ़ा की नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर एक बैग में एक लड़की का शव मिला अब तो इस तरह की खबरे अखबार में पढ़ना आम होता जा रहा है हम कहाँ और किस ओर जा रहे है ये एक बहुत बड़ा प्रश्न है …

आर.एन. शाही के द्वारा
February 9, 2011

पियूष जी, वैलेंटाइन कान्टेस्ट के बुखार की तपिश के बीच भी आपका प्यार निरीह जानवरों के पक्ष में सुरक्षित है, यह देखकर सुखद अनुभूति हो रही है । लीक से हटकर भी लीक के बीच में सुशोभित होते रहने वाले भी आप जैसे कुछ विरले ही होते हैं । हार्दिक बधाइयां स्वीकार करें ।

Amita Srivastava के द्वारा
February 9, 2011

पीयूष जी अच्छे विषय पर अच्छा लेख, बधाई।

allrounder के द्वारा
February 9, 2011

पियूष जी, जानवरों पर दया करो के खोखले नारे को aap जैसे लेखक इस मंच से लगातार उठा रहे इसके लिए आप बधाई के पात्र है ! contest के niyamaon की or dhyanakarshan kaarane के लिए aapka abhaar !

deepak pandey के द्वारा
February 9, 2011

पियूष जी, मैंने देखा है की जागरण में लोग प्रेम , भ्रष्टाचार अदि सब विषयों परर लोगो का ध्यान जा रहा है पर पर्यावरण असंतुलन , जो की एक ज्वलंत विषय है उस पर लोगो का ध्यान नहीं जा रहा. आप बधाई के पात्र हैं जिन्होंने शुरुआत की है . वैसे मेरा लेख इस विषय पर जल्द ही आपसे रूबरू होगा. एक चिंतनीय विषय का ध्यान करने के लिए बधाई.

chaatak के द्वारा
February 9, 2011

प्रिय पीयूष जी, बाघ के लिए आपकी चिंता जायज और स्नेह सराहनीय है| वैसे तो मुझे सभी पशु पक्षियों से प्रेम है लेकिन बिल्ली कुल के सभी सदस्यों से मुझे भी सबसे ज्यादा लगाव है शायद ये मेरे कई जन्मो के सम्बन्धी रहे हों| मेरी हताशा में ये सदैव मेरे प्रेरणा श्रोत रहे हैं लेकिन आज इस तस्वीर को देख कर बहुत बुरा लग रहा है और शायद इंसानों से कुछ दूरी महसूस कर रहा हूँ | जाग्रत करने वाली पोस्ट का आभार!

    chaatak के द्वारा
    February 9, 2011

    बाघ की मजबूरी पर दो पंक्तियाँ याद आ गई किसकी मजाल है जो छेड़े दिलेर को, धोखे से मार देते हैं कुत्ते भी शेर को |

rahulkumarbijupara के द्वारा
February 8, 2011

दिल को छू लेने वाली बातें कही हैं आपने………………लेकिन मुझे मालूम है दो – चार दिनों में हम सब ये सारी बातें भूल जायेंगे……………माफी चाहता हूँ इतनी कड़वी बातें करने के लिये………….लेकिन क्या कोई ये बता सकता है कि हम और आप अपनी रोज-मर्रा कि जिंदगी में ऐसा क्या करें, जिससे हम इन समस्याओं को कम करने के लिये कुछ योगदान दे सकें……………..

vinitashukla के द्वारा
February 8, 2011

राष्ट्रीय पशु की बदहाली का आपने बहुत मार्मिक वर्णन किया है. सरकार की उदासीनता को आपने इस लेख में सशक्त ढंग से उजागर किया है. जनसाधारण को इस मामले में जागरूक होना पड़ेगा. जीवों पर दया, मानवता की अनिवार्य शर्त है. फिर बाघ तो हमारी राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ा हुआ है.

Aakash Tiwaari के द्वारा
February 8, 2011

आदरणीय श्री पियूष जी, आपने एक बहुत ही अच्छा विषय एक सशक्त तरीके से पेश किया है…बिलकुल सही बात है अगर इनकी जमीन हडपना है तो मार डालो इन्हें क्या जरूरत है पैसा बर्बाद करने की….. आकाश तिवारी

rajkamal के द्वारा
February 8, 2011

priy पियूष भाई ….. नमस्कार ! कल जब आपका लेख पढ़ा तो दो ही बाते दिमाग में आई की आप भी शायद वयंग्य लिखने लग गए है …. या फिर आपने अपने स्वभाव के अनुसार किसी की मदद करनी चाही है , उसका नाम लेकर ….. कल वाली कहानी से आज पर्दा उठा है ……. जिस तरह कश्मीर समस्या हल नही होती , उसके रहने में ही बहुत से फायदे हाउ कुछ इसी तरह यह बेचारे बाघ मरते भी रहेंगे लेकिन खाभी भी खत्म नहीं होंगे ….. इन दोनों रहस्यों से भरपूर उत्तम लेखो पर बधाई स्वीकार करे , और मेरा जवाब आज भी कल वाला ही है की समाचारपत्र ही सही माध्यम है

    Evaline के द्वारा
    July 12, 2016

    Ca y est, il va voter pour F deux pines au fion, tout cela parce qu’elle a trouvé un créneau de pur clientèlisme qui lui sied.Quelle taer&fftrieu#8230;Ml, remonte ta toge, tu vas encore marcher dessus et nous jurer que c’est encore un coup des antisémites.AO


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