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आँधी प्रेम की ......

Posted On: 14 Feb, 2011 Others में

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पिछले कई दिनों से इस मंच पर प्रेम की आँधी चल रही है…… प्रेम के अलग अलग रूप ओर प्रेम के बारे मे अलग अलग विचार चल रहे हैं…. प्रेम की अंधी मे सामाजिक लेख तिनकों की भांति उड़ जा रहे हैं………. कभी सार्वजनिक तौर पर प्रेम की बात करने वाले का हुक्का पानी बंद हो जाता था…… तो आज इस मंच पर यदि आपके लेख के बाद वेलेंटाइन कॉन्टेस्ट नहीं लिखा है तो उस लेख का हुक्का पानी बंद हो जाएगा…… इस लिए सामाजिक विषय पर भी लिखते समय शीर्षक के अंत मे वेलेंटाइन कॉन्टेस्ट जोड़ना शायद मजबूरी बन जाए……

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प्रेम के इस मंथन से कुछ अमृत निकलेगा इस की संभावना कम ही नजर आती है…… क्योकि यहाँ तो प्रेम को लेकर ही मतभेद होने लग गए हैं…….. हर किसी ने अपनी अपनी परिभाषा बना ली है……. कोई आत्मा के प्रेम के पक्ष मे है तो कोई खूबसूरती के …… तो कोई रिश्तों के…. तो कई लोग केवल एक स्त्री ओर पुरुष के अतिरिक्त अन्य लोगों के बीच के संबंध मे प्रेम को मानने को ही तैयार नहीं हैं……. उनके लिए उनके पास अलग अलग शब्द है……

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एक लेख पर मैंने पढ़ा था की प्रेम केवल प्रेमी एक माँ को अपने बच्चो से सिर्फ मोह होता है क्योंकि एक बच्चा अपनी माँ का पुत्र नही शरीर का एक अंग होता है…. पर इस ओर कोई इशारा नहीं था…… की पुत्र को अपनी माँ से जो होता है वो क्या है…….. कहते हैं की यदि अपनी जान बचाने के लिए शरीर के किसी अंग का बलिदान भी करना पड़े तो हसते हसते कर देना चाहिये……. तो फिर क्यों अपनी अंग (औलाद) के लिए माँ अपना ही बलिदान कर देती  है…….

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श्रवण कुमार का अपने माँ बाप के लिए भाव क्या था……. लगाव प्रेम अथवा अंधों के प्रति सहानुभूति ……. सबकुछ अपने पक्ष मे होने पर भी पिता के मान के लिए अपने राजवंश को त्याग कर वन जाने मे राम का क्या लोभ था…. अगर केवल ये कहा जाए की वो उनके लिए पूजनीय थे…… तो कृष्ण मीरा के लिए क्या थे…….? सच्चे दिल से किया गया प्रेम पुजा हो जाता है…… तो फिर वो चाहे किसी के भी प्रति हो क्या फर्क पड़ता है…..

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एक प्रश्न था की क्या कृष्ण को अपने माँ से प्रेम था? या राम-कौशल्या के बीच कोई प्रेम गाथा सुनी है आपने?… ये आपके ओर हमारे सोचने का तरीका है ….. वो शायद इस लिए है क्योकि हम प्रेम कथा के लिए एक नायक ओर एक नायिका ही खोजते हैं…… माँ बाप के प्रति प्रेम जो वास्तविक नायक भगवान श्री राम ओर श्रवण कुमार जैसे पुत्र दिखा गए है…. हमारे स्वयं के लिए अपने जीवन मे पालन करना मुश्किल है …. इसलिए हम उस प्रेम को वास्तविक बता देते हैं जो हमें रुचिकर लगता है……. ये बड़ा ही अद्भुद नजरिया है……. और जिसे प्रेम के नाम पर प्रस्तुत किया जा रहा है …….. ये प्रेम कैसा है जो शादी के बाद खत्म हो जा रहा है….

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दो प्रेमी प्रेमिकाओं की कहानी अभी कुछ समय पूर्व तक बड़ी चर्चा मे थी …….. जिसमे प्रेमी प्रेमिका विवाह करते हैं ओर फिर प्रेमी राजेश गुलाटी अपनी प्रेमिका (पत्नी) के 70 टुकड़े करके उनको ठिकाने लगा देता है……. जो प्रेम शादी के बंधन मे बधने से खत्म हो जाता है वो प्रेम नहीं है ……. वो अपनी स्वतन्त्रता को उचित ठहराने के तरीके हैं……

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जिन रिश्तों (माँ बेटा, पिता पुत्र, भाई बहिन ) मे इंसान हमेशा मिटने को तैयार रहता है ……… उसको कर्तव्य, लगाव, मोह जैसे शब्दों मे सीमित कर के यदि प्रेम पर चर्चा की जाए तो उसका कोई अर्थ नहीं है…….

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एक मित्र द्वारा कुछ इस ऐसा भी लिखा गया था की पहले मैं प्रेम के संदर्भ मे माता पिता भाई बहिन के साथ प्रेम पर लिखना चाह रहा था पर भी वेलेंटाइन कॉन्टेस्ट के कारण मैं केवल प्रेमी प्रेमिका के बारे मे भी लिख रहा हूँ………. आखिर ये कैसा प्रेम है जो प्रेमिका के बिना शुरू ही नहीं हो रहा……….

कुछ भ्रम जागरण जंक्शन की ओर से भी रहा …….  कॉन्टेस्ट के लिये लगाया गया चित्र ये है……….

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क्या प्यार यही है जो ऊपर है और नीचे अगले चित्र मे है ………….
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या फिर वो जो सबसे नीचे लगे चित्रों मे है………… अपने पिछले ब्लॉग प्रेम मेरी नजर मे, मे मैंने ये उदहारण दिया था की ………. कभी आप गौर करके देखें जब एक घर मे कोई संतान जन्म लेती है तो कैसे उस घर का माहौल बदलने लगता है……. एक नयी प्रेम की ऊर्जा उस घर मे दौड़ने लगती है…. सारा वातावरण प्रेममय होने लगता है……. और नीचे लगे चित्रों को आप देख लें तो आपको पता चलेगा की मातृत्व का सुख मिलने पर केवल स्त्री ही नहीं अपितु जानवर भी प्रेम से भर जाते है……….

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37 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Johnavon के द्वारा
July 12, 2016

Pourquoi pas, à condition d’avoir une tenue adaptée (je dirais une tenue assez classique/working girl, pour casser l&e8u17;évent2#lle touche femme des champs ou baba cool). Je pense que j’aurais un peu de mal, sauf s’il est roulé pour faire plus bandeau, mais avec l’avantage des deux bouts qui font un joli noeud.Mais pour les jours de cheveux un peu sales qui ne veulent pas se coiffer, en trouver son foulard et sa façon de le poser, ça peut être une bonne idée!

rajkamal के द्वारा
February 14, 2011

प्रिय पियूष भाई …नमस्कार ! आपने ठीक कहा है की यह कैसा प्रेम है जोकि शादी के बाद खत्म हो रहा है …. लेकिन मेरे भाई जरा उन बेचारियो के बारे में भी सोचो जिनसे करने वालो का प्रेम शादी से पहले ही पूर्णता प्राप्त करके खत्म हो रहा है (जी भर रहा है ) धन्यवाद सहित शुभकामनाये

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 15, 2011

    राजकमल भाई ……. ये प्रेम है ही कहाँ……… मीरा पत्थर के कृष्ण के सामने नाचती गाती रही….. लोगों ने उसे न जाने क्या क्या कहा…….. पर वो कभी उस निष्प्राण मूरत से विरत नहीं हुई……… क्योकि वो मूरत से नहीं कृष्ण के सच्चे स्वरुप से प्रेम करती थी……… अगर प्रेम आकर्षण के कारण है तो वो आकर्षण धीरे धीरे क्षीण होने लगता हैं………… आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……

Aakash Tiwaari के द्वारा
February 14, 2011

श्री पियूष जी, प्रेम के व्यापक रूप है आज आपने अपने लेख के माध्यम से उन्हें उकेरने की कोशिश की है…बहुत ही सार्थक बहस भी हुई… आकाश तिवारी

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 15, 2011

    पर आकाश भाई……… प्रेम बहस का विषय है ही नहीं…….. प्रेम तो सारी बहसों का अंत है………. ये हमें समझना होगा…….. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……

आर.एन. शाही के द्वारा
February 13, 2011

प्रेम का बड़ा ही सजीव और यथार्थवादी चित्रण पियूष जी, पता नहीं कैसे मेरी नज़रों से ओझल था । देर से ही सही, हार्दिक बधाई ।

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 15, 2011

    आदरणीय शाही जी…….. आपने इसको पढ़ा ये ही हमारे लिए हर्ष का विषय है……. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……

Deepak Sahu के द्वारा
February 13, 2011

भ्राता पीयूष जी! मुझे लगता है की आपका इशारा मेरे ब्लॉग “प्रेम की सार्थकता” की ओर है! जैसा की कॉन्टेस्ट valentine केलिए चल रहा है नाकी “प्रेम”  के लिए| अतः मैंने वही लिखा जो कॉन्टेस्ट के लिए उचित है| हालांकि मै भाई बहन माता पुत्र आदि के प्रेम को नकार नहीं रहा हूँ! और ये सब मैंने अपने ब्लॉग मे लिख दिया है| और जो इसे नकार रहे है मै उनके लिए कुछ नहीं कहना चाहता हू! http://deepakkumarsahu.jagranjunction.com/2011/02/09/valentine-contest

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 13, 2011

    भ्राता दीपक जी…… मैंने अभी आपका ब्लॉग प्रेम की सार्थकता पुनः पढ़ा….. और अब मैं कह सकता हूँ की मेरा इशारा आपकी हो ओर था…. आप ही ने ये लिखा है की ………. आज प्रेम शब्द का प्रयोग अत्यंत संक्षिप्त हो गया है | इसे हम प्रायः प्रेमी व प्रेमिका के मध्य उत्पन्न प्रेम से ही लगाते है | जबकि इसके भी अनेक रूप है| माता-पुत्र,पिता-पुत्र, व भाई-बहन आदि का प्रेम भी इसकी श्रेणी मे आता है|……. और जहां से आपने बात को छोड़ा है मैंने वही से शुरुवात की है… आपने स्वयं लिखा था की प्रेम शब्द का प्रयोग अत्यंत संक्षिप्त हो गया है | इसे हम प्रायः प्रेमी व प्रेमिका के मध्य उत्पन्न प्रेम से ही लगाते है | जबकि इसके भी अनेक रूप है|  मैं आपकी इस विवशता को ही अपने तरह से इस मंच पर रखने का प्रयास कर रहा हूँ….. की यहाँ सभी ने कुछ इस तरह का प्रेम फैला दिया है की आप जैसे प्रबुद्ध ब्लोगर भी भ्रमित हो जा रहे हैं की आखिर प्रेम पर इस कॉन्टेस्ट का मानक क्या है ….. क्या यहाँ प्रेमी युगल पर ही चर्चा को मापा जाएगा…. या किसी प्रेम कहानी को …… या नायक नायिका के सौन्दर्य से सजी किसी कविता को…… और आपके मेरे ओर अन्य ब्लोगेर्स के भ्रम का कारण जो चित्र है उसको भी मैंने उल्लेखित किया है….. मैंने कहीं पर भी आपके लेख को गलत नहीं कहा…. पर इतना जरूर कहा की आप भी इस प्रतियोगिता के स्वरूप पर भ्रमित हो गए…, आशा है आप इसे अन्यथा न लें…… इसी लिए मैंने प्राथमिकता से आपकी प्रतिक्रिया का उत्तर दिया …….

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 13, 2011

    साहू जी क्षमा चाहूँगा लेकिन एक बात कहे बिना यहाँ से जा नहीं पाऊंगा…. अगर संत वैलेंटाइन आपकी यह कथन पढ़ लें तो वो भी आपना सर फोड़ डालेंगे …. भाई अब आप वैलेंटाइन और प्रेम को ही अलग कर देंगे तो बचा क्या?… भाई कम से कम इतना तो करो की JJ का कांटेस्ट की सुचना ही ढंग से पढ़ लेते उसमे प्रेम विषय पर ही लिखने को बोला है… भाई प्रेम के वृहद् क्षेत्र को संकुचित न करो… प्रेम आपकी सोच से भी अधिक उचाइयां और गहनता लिए हुए है… अब जिनको प्रेम का अर्थ ही समझ में ना आता हो… उनसे क्या कहें…. प्रेम की सार्थकता तो तभी है जब प्रेम है…. माँ से भी प्रेम होता है… कोई भी रिश्ता प्रेम की डोर से ही बंधा होता है… अगर प्रेम नहीं है तो रिश्ता कैसे बचा रहेगा… यह समझना जरुरी है… अगर मुझे कुछ समझाना हो तो आपका स्वागत रहेगा…. दिल पर मत लेना मित्र…

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 13, 2011

    माफ करना हिमांशु भाई! जब valentine कॉन्टेस्ट का चित्र ही दर्शा रहा है मै भ्रमित हो गया था| लेकिन मै अब इस कॉन्टेस्ट के लिए अपनी एक रचना प्रस्तुत करूंगा जो प्रेम का सम्पूर्ण वर्णन करे| धन्यवाद

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    February 13, 2011

    दीपक भाई… क्षमा मांगने वाली कोई बात नहीं है… यह तो विचारों का मंच है जब हम एक सार्थक बहस करेंगे तभी कोई दिशा प्राप्त हो सकेगी… यह भी नहीं है की मेरा नजरिया ही सही हो … लेकिन जब मै कुछ कहूँगा … तभी आप अपना अर्थ मुझे समझायेंगे…और तभी हम किसी निष्कर्ष पर आयेंगे… मेरे विचार से तो इस मंच पर लिखने का यही उद्देश्य है… सिर्फ एक दुसरे के कमेन्ट पाने के लिए हम असहमत होते हुए भी उपरी सहमती जताएं… तो तात्कालिक रूप से आपको अच्छा तो लगेगा लेकिन यह स्वयं आपके लेखन और विचारों के विकास के लिए घातक होगा… ऐसे लोगों से सावधान रहियगा… लेखन और विचारों पर ध्यान देना ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए… मई अगर ज्यादा कह गया हूँ तो माफ़ी चाहूँगा… मै भी अभी सिख रहा हूँ….

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 15, 2011

    भाई हिमांशु जी………. दीपक साहू जी की शंका का निवारण जिस ख़ूबसूरती से आपने किया उसके लिए आभार……….. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……

kmmishra के द्वारा
February 13, 2011

भाई पियूष जी नमस्कार । तो आप सब लोग वैलेंन्टाईन कांटेस्ट की वैतरणी में जी जान से लगे हुये हो । कोई मित्र ऐसा भी है जो इस तूफानी, लहराती, बलखाती, पहाड़ी नदी में अपनी नाव लेकर नहीं भी उतरा । खैर । अब वापस आ गया हूं तो आप सबके दिल का हाल जो लंबे लंबे लेख में बयां किया गया है पढ़ना पड़ेगा । (लेख बिना पढ़े टिप्पणी की गयी) . “आखिर ये कैसा प्रेम है जो प्रेमिका के बिना शुरू ही नहीं हो रहा” कुछ भ्रम जागरण जंक्शन की ओर से भी रहा . कॉन्टेस्ट के लिये लगाया गया चित्र ये है” (लेख पढ़ने के बाद टिप्पणी) वैसे यह लेख बताता है कि भले ही मैं नहीं था लेकिन मेरे मित्रों ने भारतीय संस्कृति का झंडा थामे रखा । लेख पढ़ कर बहुत खुशी हुयी । बहुत बहुत आभार ।

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 15, 2011

    आदरणीय केएममिश्रा जी………. इस तरह की प्रतियोगिता में भाग न लेकर या इस का विरोध करके हम सामाजिक बदलाव की बात नहीं कर सकते…….. ये हमारा दायित्व है की हम विदेशी प्रेम की ओर आकर्षित हो रहे युवा को इस प्रेम की महत्ता से रूबरू करवा कर ……. उसे प्रेम और आकर्षण के बीच का फर्क समझाएं……… आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……

HIMANSHU BHATT के द्वारा
February 13, 2011

पियूष भाई प्रेम को उसके सही अर्थों में साझ पाने और समझा पाने में आप आखिरकार कामयाब हो ही गए हैं…. नहीं तो प्रेम के नाम पर यहाँ अर्थात जागरण के इस मंच पर कुछ भी परोसा जा रहा है… और कुछ लोगों का तो ध्यान विषय की गुणवत्ता से हट कर JJ की बनायी विशेष श्रेणियों में शामिल होने भर का है… चाहे वो कुछ का कुछ लिख आये हों… अर्थ का अनर्थ कर आये हों… इस सर्व व्यापी विषय को लोगों ने इस मंच पर इतना छोटा बना दिया है की अब प्रतिक्रिया भी क्या दें… जिस प्रेम को कबीर…नानक…रैदास…ओशो…चैतन्य… और ना जाने कितने संतों ने व्याख्यित कर हमें समझाने की चेष्टा की… वह प्रेम का स्वरुप हमारी क्षुद्र बुध्धि समझ ही नहीं पाती… अब समझ में आ रहा है की इन लोगों का अपने समय में इतना विरोध क्यों हुआ था…. क्योंकि इंसान कभी बदला ही नहीं है… आप इस मंच के कुछ गिने चुने लोगों में से हैं जो विषय को समझते भी हैं… और प्रस्तुत करने की क्षमता भी रखते हैं…. आपको शुभकामनायें. http://www.himanshudsp.jagranjunction.com

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 15, 2011

    जिस प्रेम को कबीर…नानक…रैदास…ओशो…चैतन्य… और ना जाने कितने संतों ने व्याख्यित कर हमें समझाने की चेष्टा की… वह प्रेम का स्वरुप हमारी क्षुद्र बुध्धि समझ ही नहीं पाती… अब समझ में आ रहा है की इन लोगों का अपने समय में इतना विरोध क्यों हुआ था…. क्योंकि इंसान कभी बदला ही नहीं है… आदरणीय भट्ट जी…….. खूबसूरत विचारों से भरी आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……

rajkamal के द्वारा
February 12, 2011

priy पियूष भाई …नमस्कार ! आपका यह लेख अपने आप में बहुत ही गहरे अर्थ और अपने भीतर समुन्द्र से भी गहरे राज़ समाये हुए है …जिसको को कोई तुक्केबाज़ ही समझ सकता है …. अक अति सुंदर और बेहतरीन लेख की प्रस्तुति के लिए आपका आभार व इस प्रतियोगिता के लिए बधाई

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 15, 2011

    भाई राजकमल जी…….. हमारे लेख उतने गहरे अर्थ और अपने भीतर समुन्द्र से भी गहरे राज़ समाये हुए नहीं होते हैं जितनी की आपकी प्रतिक्रियाएं……आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया………

nishamittal के द्वारा
February 12, 2011

बहुत अच्छा दृष्टिकोण पियूष जी आपने प्रस्तुत किया सच में कई बार तो कुछ समझ नहीं आ पा रहा है मुंडे मुंडे मतिर भिन्ना तो होता है परन्तु सब ने अपनी क्षमता अनुसार अपने ढंग से प्रस्तुत किया.जैसा की आपने कहा है इसको और व्यापक रूपों में प्रस्तुत किया जा सकता था.क्योंकि प्रेम केवल प्रेमी प्रेमिका तक ही सीमित नहीं होता.आपके द्वारा प्रस्तुत चित्र व विचार उन रूपों का दर्शन करा रहे हैं.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 15, 2011

    आदरणीय निशा जी……. यही प्रयास होना चाहिए था की प्रेम के वृहद रूप को उभारा जाता …. पर कुछ JJ और कुछ इस पर्व ने प्रेम को सिमित कर दिया प्रेमी प्रेमिका के स्तर तक………. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…

rameshbajpai के द्वारा
February 12, 2011

प्रिय पियूष जी प्रेम की इस आंधी में तो बाकि कुछ नजर ही नहीं आ रहा है | बधाई

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 15, 2011

    आदरणीय बाजपाई जी…….. नजर आना तो दूर यहाँ तो खुद के पैर जमाये रखना भी मुश्किल हो रहा है……. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…

allrounder के द्वारा
February 12, 2011

सही कह रहे हो पियूष जी इस परम की आंधी, आंधी नहीं बल्कि तूफान मैं सभी उड़े जा रहे हैं !

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 15, 2011

    सचिन जी……. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 12, 2011

पीयूष भाई, अपने विचारों और चित्रों के माध्यम से आपने जो सन्देश संप्रेषित किया है और जो प्रश्न उठाये हैं मैं उससे पूरी तरह सहमत हूँ|बहरहाल, जागरण जंक्शन के चित्र से तो यही लगता है कि उन्होंने प्यार के इसी परिप्रेक्ष्य में (स्त्री-पुरुष) इस प्रतियोगिता का आयोजन किया है| साभार,

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 15, 2011

    वाहिद भाई,,,,,,, इसमें JJ का भी कोई कसूर नहीं…….. वो भी प्रेम की तस्वीर कहाँ से लाये…….. अब माँ बेटे वाली लगता तो लोग माँ पर ही प्रेम को सिमित कर लेते……… लोग चित्रों और शब्दों में भटक गए हैं……… आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…

alkargupta1 के द्वारा
February 12, 2011

पीयूष जी , इस प्रेम के तो न जाने कितने स्वरुप हैं जिसे आपने न जाने अपने कितने ही लेखों में दर्शाया है केवल एक रूप नहीं पशु-पक्षी हर प्राणी जीव में यह भावना होती है….लेख के साथ प्रदर्शित तस्वीरें साक्षी हैं और जो यह कहते हैं कि प्रेमी और प्रेमिका का ही प्रेम है इन चित्रों से उन्हें भी समझ में आ गया होगा वे बहुत बड़ी गलत फहमी के शिकार हैं अच्छा लेख बधाई!

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 15, 2011

    अलका जी…….. प्रेम का वास्तव में कोई स्वरुप है ही नहीं…….. एक भाव जो कभी प्रकृति के प्रति, कभी प्राणी के प्रति तो कभी स्वजनों के प्रति अलग अलग रूप में दीखता है…….. कोई भी इस भाव से अछूता नहीं है फिर चाहे वो कई पशु पक्षी हो या कोई अन्य जीव या वनस्पति………… आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…

baijnathpandey के द्वारा
February 12, 2011

आदरणीय पियूष जी ,,,,,तुलना से परे एक खुबसूरत आलेख ,,,,,,,आपने सपाट शब्दों में वो सब कह डाला जो अलंकारों एवं शब्दभारों की भूलभुलैया में गुम हो जाता रहा ………….बधाई स्वीकारें |

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 15, 2011

    खूबसूरत शब्दों से भरी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…

priyasingh के द्वारा
February 12, 2011

अदभुत लेख ….. १४ फरवरी तक का इंतज़ार करने की जरुरत नहीं है मेरे दृष्टिकोण से आप ही विजेता है ….

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 15, 2011

    प्रिय जी…. नाहक ही JJ से पंगा न लें…… ये उसके अधिकार क्षेत्र में दखल है………… आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…

Preeti Mishra के द्वारा
February 12, 2011

पीयूषजी आपका कहना बिल्कुल सही है प्यार के कई रूप हैं. उनमें से नायक-नायिका का प्रेम भी एक रूप है. लेकिन यदि लोग सिर्फ नायक-नायिका के प्रेम के अलावा यदि किसी और प्रेम को नहीं मानते तो यह गलत है.अच्छी रचना. शुभकामनाएं.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 15, 2011

    आपके वैचारिक समर्थन के लिए और आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…

vinitashukla के द्वारा
February 12, 2011

सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 15, 2011

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…


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