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वेलेंटाइन कॉन्टेस्ट और JJ की मुश्किल.........

Posted On: 16 Feb, 2011 Others में

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एक लंबे (14 दिनों के) इंतज़ार के बाद आखिरकार वेलेंटाइन कॉन्टेस्ट भी निपट ही गया….. कुल मिलकर इस दौरान मंच पर एक मिश्रित माहौल देखा गया……. सभी खुद को प्रेम से परिपूर्ण प्रदर्शित करने के प्रयास कर रहे थे……… प्रेम पर लगभग सभी ने कुछ न कुछ सकारात्मक / नकारात्मक लिखा …… पर कुछ लोग इस प्रतियोगिता से दूर भी रहे…. जिनमे से कई ऐसे भी थे जिनसे कई उम्मीदें थी…… कई बार ऐसा भी हुआ की लेखों मे प्रेम की बारिश करने वाले कुछ लोग प्रतिक्रिया या प्रतिक्रिया का उत्तर देते हुए कुछ कठोर हो रहे थे………. तो एक भ्रम होने लगता था की क्या उनका ये प्रेम केवल उनके लेखों मे लिखे शब्दों मे ही है……. हृदय मे नहीं…. अन्यथा अपने लेख मे शब्द कुछ और, और दूसरे की प्रतिक्रियाओं मे कुछ और शब्द कैसे…… शायद कई लोग इस लेख को पढ़ने के बाद मेरे लेखों मे आई प्रतिक्रियाओं मे खोजने लगें की आखिर इशारा किसकी ओर है……..
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इस प्रतियोगिता के आयोजन से कोई सबसे अधिक मुसीबत मे है तो वो है जागरण जंक्शन ….. क्योकि इस प्रतियोगिता का परिणाम उसके लिए एक परीक्षा है…… एक ही सवाल सभी ब्लोगेर्स के मन मे ही की आखिर एक अग्रणी समाचार पत्र समूह का ये अंग (जागरण जंक्शन) किस आधार पर विजेता का चयन करता है……. यूं ही वो प्रतियोगिता के नियमों को लेकर प्रतिभागियों को भ्रमित कर चुका है ….. कभी अंत मे वेलेंटाइन कॉन्टेस्ट / Valentine Contest जोड़ने की बात कही तो फिर आधे मे ही नियम बदल कर केवल अँग्रेजी मे Valentine Contest को मान्य किया गया……….
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कुछ लोग इस बदलाव से नाराज भी थे… पर मैं JJ के समर्थन मे था…. भाई जब पर्व अंग्रेजों का इसको आपके द्वारा मनाने का पसंदीदा तरीका भी अंग्रेज़ो का तो कॉन्टेस्ट हिन्दी मे क्यों……. कम से कम इस एक दिन सभी तथाकथित प्रेमी भले ही वो किसी भी विचारधारा के हों…….. किन्तु वेलेंटाइन डे के विदेशी स्वरूप के समर्थक हों……. तो वो कॉंग्रेस के हिन्दू संगठनों को आतंकवादी संगठन घोषित करने के अभियान मे उसका समर्थन करने को तैयार रहते हैं….. ये तो कॉंग्रेस का लचर नेतृत्व है अन्यथा उसने 6 फरवरी से ही इन संगठनो को आतंकवादी संगठन घोषित करने की वकालत करनी थी…….. तो न जाने कितने युवा प्रेमी उसके समर्थन मे आ जाते………इन पर प्रतिबंध से ही तो उन प्रेमियों का वेलेंटाइन डे सफल बनेगा……… वेलेंटाइन कॉन्टेस्ट पर जंक्शन ने कहा था……..
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प्रेम का त्यौहार वैलेंटाइन डे पास आ रहा है. जिंदगी में प्यार के रंग की अहमियत से कौन इंकार कर सकता है. प्रेम एक प्रार्थना है, प्रेम एक पूजा है, प्रेम एक ईश्वरीय उपहार है जिसे हर कोई अपने दिल में जगह देना चाहता है. इस अवसर की महत्ता को देखते हुए जागरण जंक्शन एक विशेष कॉंटेस्ट “वैलेंटाइन किंग एंड क्वीन” का आयोजन कर रहा है जो पूरी तरह से प्रेम के प्रति समर्पित है.
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इसके लिए बस आपको प्रेम के प्रति अपनी भावनाओं, अपने प्यार के संस्मरणों और प्यार के विषय में अपने विचारों को ब्लॉग के रूप में पोस्ट कर देना है. प्यार आपके लिए कितना महत्वपूर्ण है, प्यार आपके जीवन में क्या स्थान रखता है या प्यार इंसान के लिए कितना जरूरी है?……. ये सब आप अपने ब्लॉग में लिख सकते हैं.
……………….

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यहाँ स्पष्ट हो रहा है की प्रेम के क्या मायने है आपकी नज़र मे वो आपको लिखना है….. पर चित्र भटका देता है……. वहाँ यूं प्रतीत होता है की दो प्रेमी युगल इस दुनिया से दूर कहीं जाना चाहते हैं…. जहां बस प्रेम ही प्रेम हो……… कल्पनाओं की कोई दुनिया सी जगह………… अब यहाँ से JJ कुछ शंका पैदा कर देता है……. और कुछ बुद्धिमान ब्लॉगर भी इस भय से की कहीं यहाँ माता पिता के प्रति अपने प्रेम की अभिव्यक्ति अस्वीकार न कर दी जाए……. वो प्रेमी प्रेमिका की चर्चा पर उतर आते हैं…..
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अब यहाँ हम जैसे कुछ लोग जो इस छूत की बीमारी (प्रेम) से अछूते रह गए…… और इसी लिए सामाजिक तौर पर पुरानी पीढ़ी के वर्ग मे गिने जाने लगे…… उनके लिए मुसीबत खड़ी हो जाती है…….. अब एक तो ये तरीका है की अपने मित्रों के प्रेम प्रसंगों को अपने नाम से सुनाकर खुद को अंतराष्ट्रीय स्तर का प्रेमी बता दिया जाए…… कौन सा कोई सार्टिफिकेट जमा करना था……. की मैंने 6 माह या 1 वर्ष सफलतापूर्वक प्रेम किया है……. या दूसरे तरीके मे केवल ये सफाई दी जा सकती है की हमने ये इस लिए नहीं किया की क्योंकि जिस स्तर के हम प्रेमी है वो तो प्रेम तो द्वापर मे भगवान श्री कृष्ण के साथ ही खत्म हो गया……

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और जिस स्तर के हमारे मित्रों के प्रेम प्रसंग थे उसको नजर मे रखते हुए मुझे ……. दूसरा मार्ग ही ठीक लगा…… और हम उसी पर चल पड़े…….. यहाँ कई लेख शिवसेना, बजरंग दल, और अन्य संगठनो द्वारा किये जाने वाले वार्षिक विरोध के लिए भी थे……. उनका विरोध जायज भी है…… आखिर एक संवैधानिक राष्ट्र मे इन्हे कौन अधिकार देता है इस विरोध का ……… ये श्री कृष्ण के भक्त जब कृष्ण लीला का अनुभव उनही पार्कों मे करते हैं जो उनके माँ बाप के द्वारा भरे टैक्स से बने हैं…….. या जिन होटलों के कमरों मे वो प्रेम का पर्व मानते हैं उनका पैसा वो खुद भरते हैं…….. अब प्रेम के प्रतीक आगरे के ताजमहल के किसी कोने मे प्रेमी प्रेमिका किसी प्रेम मुद्रा मे हों तो इसमे आपत्ति क्या ओर क्यों…….. जिस का प्रतीक ये ताजमहल है वही तो वो भी कर रहे हैं…….

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अब JJ के सामने मुसीबत ये है की यदि वो किसी ऐसे लेख को विजेता चुनता है जिसने हिन्दू संगठनो का विरोध किया है तो फिर उसपर विदेशी परंपरा के वाहक होने का आरोप लगाया जा सकता है…… एक तो पहले ही टाइटिल को हिन्दी से इंग्लिश करवाया जा चुका है…….. यदि किसी ऐसी प्रेम कथा को जो पहली नज़र के प्रेम पर आधारित हो चुना जाए तो भी JJ का संकट ये भी है की क्या वो ऐसे आकर्षण को भी प्रेम मानता है………. अब JJ की मुसीबत ये है की वो आखिर प्रेम किसे माने …….

क्योकि कई ब्लॉगर बंधुओं के  इस प्रतियोगिता से दूर रहने का कारण यही था की ये प्रतियोगिता प्रेम पर न होकर प्रेम के विदेशी स्वरूप वेलेंटाइन डे पर थी…….. पर उनके लिए भी एक प्रश्न बनता है की क्या देश के प्रति उनके भाव, अपने संस्कारों के प्रति उनके भाव, अपने माता पिता के प्रति उनके भाव प्रेम से भरे नहीं है……. देश के प्रति प्रेम, अपने संस्कारों के प्रति प्रेम माता पिता संतान के प्रति प्रेम अगर उनकी दृष्टि मे श्रेष्ठ था तो उनको उस प्रेम के रूप को मंच पर प्रस्तुत करना था…….. बाकी JJ पर छोड़ देना था…..

फिर ये JJ का दायित्व था की वो उन राष्ट्रप्रेमियों के प्रेम को अधिमान देता है….. या फिर उनको जो प्रेम के लिए केवल एक लड़की या लड़के के होने की अनिवार्यता रखते हैं…… जो प्रेम के लिए माता पिता से अधिक एक प्रेमिका की आवश्यकता बताते हैं…….. जो वो प्रेम का पाठ पढ़ते हैं जो आजकल 5वीं से शुरू होकर हर साल क्लास और उस क्लास के सेलेबस बदलने के साथ बदलता जा रहा है……. तब JJ पर निश्चित रूप से ये प्रश्न उठाए जा सकते थे ……. की आखिर ये मंच प्रेम का कौनसा रूप लोगों को दिखा रहा है……. अब गेंद JJ के पाले मे है……… इस दौरान फीचर्ड ब्लोगस को लेकर भी JJ की प्रतिष्ठा धूमिल हो चुकी है… कई ब्लॉग यूँ ही फीचर्ड हो गए और कई बेहतरीन ब्लॉग JJ की नजर से चूक गए (इनमे से कुछ का उल्लेख मैं अगले अंक में करूँगा)………… कई लोग इस बात से परेशान थे की उनके पास उनका ब्लॉग फीचर्ड होने की मेल तो आ रही है पर पोस्ट दिखाई नहीं देता…….. पर मेरे साथ तो ये अक्सर हुआ है तो मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ा……. वैसे भी JJ अपनी निष्पक्ष छवि के मामले में संदेह के घरे में ही रहा है……….. यहाँ कई लोग JJ की लगातार उपेक्षा का शिकार हैं……… और वो यहाँ टिके भी हैं तो यहाँ के बाकि ब्लोगरों के प्रेम के कारण……. तो अब JJ की हालत अपनी जमानत बचाने की है…… की अब उसने इस प्रतियोगिता के द्वारा ओखली मे सर दे दिया है ………… अब देखें कितने मूसल पड़ते हैं……. और क्या JJ इस बार अपनी साख बचा पाता भी है की नहीं …….
अभी का सबसे बड़ा प्रश्न यही है……

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58 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
February 17, 2011

प्रिय भाई पियूष जी … मैं भी आप से शत प्रतिशत सहमत हूँ … JJ के लिए निर्णय लेना चुनौती पूर्ण कार्य है …

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 20, 2011

    आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………

Harish Bhatt के द्वारा
February 17, 2011

पियूष जी नमस्ते, आपने विचारों से अवगत कराया. आपकी साफगोई के लिए आपको बहुत बहुत हार्दिक बधाई.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 20, 2011

    आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……… हरीश जी…….

kmmishra के द्वारा
February 17, 2011

मैं समझता हूं कि जेजे जैसे प्रतिष्ठित मंच पर इस प्रकार की किसी प्रतियोगिता की कोयी जरूरत नहीं थी । देश आजादी के बाद अपने सबसे भ्रष्टतम कालखण्ड से गुजर रहा है । घोटालों पर घोटाले, देश और देशवासियों का खरबों खरबों रूपया रोज बरबाद हो रहा है । प्रधानमंत्री की स्वच्छ छवि दागदार हो गयी । केन्द्र सरकार स्विस बैंक में जमा कांग्रेसियों के खरबों डालर को बचाने के लिये बहाने पर बहाने किये जा रही है । जेपीसी और पीजे थामस पर बेशर्मी की सारी हदें पार कर दी गयीं और न्यायपालिका को थके और गठबंधन का अधर्म निभाते प्रधानमंत्री हद में रहने की नसीहत दे रहे हों ऐसे वक्त में जेजे ने एक विदेशी, बाजार द्वारा प्रायोजित डे पर एक प्रतियोगिता आयोजित करने का कोयी तुक नहीं बनता । जैसे यह प्रतियोगिता बुद्धिजीवी ब्लागर्स का ध्यान तमाम मुद्दों से भटकाने के लिये की गयी थी । क्या जेजे पर बाजारवाद हावी हो चला है ? क्या जेजे अपनी टी आर पी बढ़ाने के लिये आगे भी ऐसे टोटकों का सहारा लेगी ? कुछ समझ में नहीं आता है । . एक तरफ फेसबुक ने मिस्र में हुस्नी मुबारक की तानाशाही खत्म कर दी तो भारत में जेजे ध्यान भटकाओ प्रतियोगिता आयोजित कर रही है ।

    kmmishra के द्वारा
    February 17, 2011

    जेजे ने एक विदेशी, बाजार द्वारा प्रायोजित डे पर एक प्रतियोगिता आयोजित करने का कोयी तुक नहीं बनता । X जेजे द्वारा एक विदेशी, बाजार द्वारा प्रायोजित डे पर एक प्रतियोगिता आयोजित करने का कोयी तुक नहीं बनता ।

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 17, 2011

    आदरणीय मिश्रा जी ……. आपने सही बात कही है…….. यही मेरा मन्तव्य है की क्यों एक ऐसा माहौल था की जब लोग अपने लेखों को बिना वेलेंटाइन कॉन्टेस्ट लिखे रखने मे डर रहे थे……… क्यों नहीं लोगों ने देश प्रेम से भरे लेख भी इस प्रतियोगिता मे उतारे…… आखिर देश प्रेम क्यों प्रेम की श्रेणी से बाहर हो गया……… एक खूबसूरत लेख पढ़ा था जिसके एक वाक्य ने बड़ा प्रभावित किया………की……… हमारे विचार लोगों को प्रभावित करते हैं या हम सिर्फ लोगों को प्रभावित करने के लिए विचार करते हैं……. यदि मेरी नजर से देखा जाए तो वो इस कॉन्टेस्ट के दरमियान आये सर्वश्रेष्ठ लेखों मे एक था………. अगर आप पढ्ना चाहे तो…….. लिंक……… http://rahulpriyadarshi.jagranjunction.com/?p=188

rajeevdubey के द्वारा
February 17, 2011

पियूष जी, खूब कुरेदा है आपने विचारों की धरती को…निश्चय ही अब जब कि यह कांटेस्ट बीत गया है, आगे बढ़ने का वक्त आ गया है…

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 17, 2011

    राजीव जी……. .आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……… ……

Dharmesh Tiwari के द्वारा
February 17, 2011

पियूष जी नमस्कार,बीते कांटेस्ट से जुड़े कई पहलुओं पर आपने प्रकाश डाला है,आपके द्वारा उठाये प्रश्नों को देख काफी अच्छा लग,धन्यवाद!

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 17, 2011

    धर्मेश जी……..आपकी प्रोत्साहन भरी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……… ……

nikhil के द्वारा
February 17, 2011

पियूष जी मै प्रारंभ में इसपर कुछ भी लिखना नहीं चाहता था.. लेकिन ..मुझे अब लगता है की इस कांटेस्ट को यहाँ एक नया रूप मिल गया … इसका विदेशी स्वरुप यहाँ पर कही नहीं दिखा और कही था भी तो छुपा था .. सामने थी प्रेम की वही भारतीय व्याख्या जहा भौतिकता को सबसे निकृष्ट समझा जाता है… तो मुझे लगता है की बढ़िया हुआ इसी बहाने.. ये तो स्पष्ट हो गया की बुद्धिजीवी वर्ग अभी तक प्रेम के किस रूप को मान्यता देता है… कांटेस्ट के पीछे जो भी विचार हो… मुझे सबसे अच्छा ये लगा की हमने वैलेंटाइन डे को एक नया रूप दिया वैचारिक स्तर पर ठीक वैसे ही जैसे व्यवहारिक स्तर स्कुलो में बच्चो ने अपने दोस्तों को माता पिता .. को भाई बहन को वैलेंटाइन विश किया ये देख कर तो यही लगा ,,, की इसे स्वीकार करके हमने इसे नई परिभाषा दे दी.. है अर्थ बदल रहे है.. ये और ज्यादा सकारात्मक हो रहे है.. कांटेस्ट का परिणाम चाहे जो हो.. पर मुझे बढ़िया लगा .. लिखकर ..और साथियो की रचनाये पढ़कर..

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 17, 2011

    निखिल जी …… आपने बिलकुल सही कहा की प्रेम का जो स्वरूप बाजार मे है वो इस मंच पर नहीं दिखा….. इसके विपरीत यहाँ प्रेम के अलग अलग स्वरूप दिखे………. कहीं आध्यात्मिक तो कहीं सांसारिक…… पर आखिर ऐसा क्या रहा की कई उत्कृष्ट ब्लॉगरों से खुद को इस से दूर ही रखा…… क्यों राष्ट्रवादी विचार धारा वाले जो राष्ट्र प्रेम को ही सबसे बड़ा मानते हैं …….. या वो लोग जो प्रेम को अपने परिवार से जोड़ कर देखते हैं……. इस प्रतियोगिता मे भाग नहीं लिए…….. कहीं न कहीं जागरण जंक्शन इस स्तर पर विफल रहा की वो ये यकीन दिला सके की वो केवल प्रेम की बात करना चाहता है……… और प्रेम संस्कृति से या देश से या माता पिता से किसी से भी हो सकता है….. इसका नतीजा ये निकला की कई लोग यहाँ JJ को खुश करने के लिए ये लिखते पाये गए की …… माँ ओर पुत्र का प्रेम प्रेम नहीं है…….. पति पत्नी का प्रेम भी प्रेम नहीं ………. और प्रेम केवल प्रेमी ओर प्रेमिका के बीच ही होता है……….. आखिर क्यों ……… ? क्योकि प्रतियोगिता का स्वरूप न तो ठीक ठीक व्यक्त किया गया……… और न ही नियम ………… .आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……… ……

R K KHURANA के द्वारा
February 16, 2011

प्रिय पियूष जी, विजेता तो चाहे कोइ भी हो लेकिन एक बात है की प्रतियोगिता के बहाने कई लोप हो चुके लेखक भी दोबारा मंच पर दिखाई दिया और बहुत ही अच्छे अच्छे लेख पढने को मिले ! बाकी तो राम ही राखे ! आर के खुराना

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 17, 2011

    आदरणीय खुराना जी……. सही कहा आपने…… इस प्रतियोगिता ने कई लोगों को इस मंच पर उतरने का मौका दिया…… ओर कई पूर्व ब्लोगर्स को एक नया मौका अपने हुनर दिखाने का……….आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……… …….

chaatak के द्वारा
February 16, 2011

प्रिय पीयूष जी, आपकी पोस्ट पढ़ कर कई बातों का पता चला| जागरण पर चल रही प्रतियोगिता ने काफी कुछ पढने का मौका दिया परन्तु समयाभाव के कारण सभी की पोस्ट पर कमेन्ट ना कर पाना थोडा खर भी रहा था| कई बार फीचर्ड ब्लॉग और अभी-अभी में आई हुई पोस्ट के चुनाव पर असहमति होती है लेकिन मुझे नहीं लगता कि जे.जे. किसी भी तरह की मुश्किल महसूस करता होगा| हाँ ये अंतर्द्वंद हममें से ज्यादातर ब्लागरों के मन में जरूर होगा क्योंकि कोई भी प्रतियोगिता किसी इम्तिहान की तरह होती है जिसके नतीजे आने तक लगातार प्रतिभागियों के मन में कौतूहल, आशाएं और डर बने रहते है लेकिन परीक्षक और जज के मन में ऐसी कोई बात नहीं होती| ये शायद ब्लागरों के दिल का अंतर्द्वंद है जो ‘प्रभाव स्थांतरण’ की भांति हमें जे.जे. पर दिखाई दे रहा है जबकि वह तो शायद बिलकुल निर्द्वंद होकर नतीजे निकालने में लगा होगा| एक बेहतर लेख द्वारा ब्लागरों के मन की बात पटल पर रखने के लिए आप बधाई के पात्र हैं!

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 17, 2011

    चातक जी……. शायद आप सही कह रहे हों ….. पर एक प्रश्न ये उठता है की जो रचना आज फीचर्ड होने के योग्य नहीं है……. कल ऐसे क्या हालत होते है की वही रचना फीचर्ड हो जाती है…….. एक बहुत सुंदर लेख का बुरा हाल देख कर आहात हुआ हूँ……….. प्रतियोगिता के परिणाम आने के बाद उसको पुनः पटल पर रखने की उक्त ब्लॉगर से मैं मेल पर अनुमति ले चुका हूँ……. वो रचना न हो फीचर्ड हुई और न ही प्रेम से भरे पाठकों द्वारा सराही गयी….. आशा है की JJ आपकी बात का मान रखेगा………. और सभी ब्लॉगर चाहे वो हर रोज के ब्लॉगर हों अथवा केवल दो ब्लॉग वाले हों अथवा कभी कभी मंच पर अपने विचार रखने वाले को एक समान रूप से आकेगा……… आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…….

Amit Dehati के द्वारा
February 16, 2011

आदरणीय पियूष जी प्रणाम ! बहुत ही ज्ञानवर्धक सन्देश दिया आपने ……. मैं पूर्ण रूप से सहमत हूँ आपके इन विचारों से ……..आपने मेरे मन की बात कह दी इसके लिए आभार !!!!! धन्यवाद ! अमित देहाती

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 17, 2011

    अमित जी JJ के खिलाफ समर्थन करने से पूर्व ये जरूर याद रखें की अभी प्रतियोगिता का कोई परिणाम नहीं आया है ……. ओर ऐसे किसी लेख पर सकारात्मक प्रतिक्रिया जीतने की संभावनाओं पर कुप्रभाव डाल सकती है….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…….

    Amit Dehati के द्वारा
    February 18, 2011

    भ्राता श्री वो डरें जिन्हें हारने का कौफ हो, और जो जितना चाहते हों …… मैं हारने के खौफ से सच्चाई को नहीं दबा सकता ….| एक बात और …..जितने वाला कभी लालच नहीं करता बल्कि प्रयाश करता है ….अमित देहाती

sanjay kumar tiwarl के द्वारा
February 16, 2011

Mahoday lagta hai j.j. ne bina tayari ke pratyogita aarambh ki thi …. ek sarthak va samayik lekh ………shubkamnay ……….

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 17, 2011

    तिवारी जी…….. पर्दे के पीछे से आती प्रतिक्रियाएँ ये स्पष्ट करती है की यहाँ मंच पर सरकार ओर समाज के हित मे हो हल्ला करने वाले कैसे जब मंच की किसी बुराई पर आवाज़ उठती है तो कहीं ओट मे हो जाते हैं……….. फिर भी आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…….

amita के द्वारा
February 16, 2011

विचारणीय विषय है, आगे-2 देखिए होता है क्या ———

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    अमिता जी………. यही इंतज़ार सभी को है……. प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……..

rajkamal के द्वारा
February 16, 2011

प्रिय पियूष भाई ….नमस्कार ! आप तो मेरे से भी बड़े जिगरे वाले निकले …. वाह ! क्या बात है …. इतनी बेबाकी से तो मैंने भी अपना आक्रोश व्यक्त नहीं किया , और वोह भी इतने सुरुचिपूर्ण ढंग से , अकाट्य तर्कों और दलीलों समेत …. भाई मेरे बहुत -२ मुबारकबाद ….. अब तो लगता है की जागरण जंक्शन वाली मेरी बीवी को अपना वोही साढ़े नो गज वाला घूंघट उठा कर आपको अपना दीदार करवाना ही पड़ेगा …… देखना कहीं आप मेरी तरह उसकी खूबसूरती पर रीझ कर कोई रियायत मत दे देना उसको …. आपकी कोशिशे सफल हो , इस अभियान में कलम से मैं बाकी ब्लागरो की तरह आपके साथ हूँ … और रही बात धन की तो , आप मेरी हालत जानते ही है , की यहाँ से कितना मिलता है और क्या मिलता है ? धन्यवाद सहित शुभकामनाये

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 16, 2011

    भ्राता श्री, हम भी सर्वसम्मति से आपके समर्थन में खुलकर आ गए है. और जो आपने कहा है लगता है ऐसा कुछ होने ही वाला है. पीयूष भाई आपको बहुत आभार,

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    भाई राजकमल जी……. आपने हमेशा इस मंच पर बिना किसी चिंता की अपनी बात को बखूबी रखा है…….. और इसके फलस्वरूप आपको हमेशा जागरण की ओर से उपेक्षा ही मिली है……. कई बार आपके ब्लोगस पर मैंने कहा की ये ब्लॉग निश्चित ही फीचर्ड होने के योग्य है …… पर जब उसी दिन किसी अन्य साधारण ब्लॉग को फीचर्ड होते देखा तो लगा की शायद यहाँ स्पष्टवादिता का रिवाज नहीं है……. आपकी उस पहल जिसमे लगातार कई ब्लॉग एक साथ आने पर आपने ईसाई आतंकवाद नाम से व्यंग लिखा था…….. उसको इनहोने व्यंग मे ही उड़ा दिया……. पर जब आकाश भाई ने आपके समर्थन मे फिर लिखा तो JJ उत्तर देने उतरा…… इसी तरह डॉ आशुतोष जी…. भी बिना किसी प्रतिक्रिया या अन्य पुरस्कार के लोभ मे लगातार ब्लॉग लिखते हैं…….. पर कभी ब्लोगस की कमी होने पर ही उनके ब्लोगस फीचर्ड होते हैं……… उनके सामाजिक लेखों को यूं ही जाया कर दिया जाता है……. इस मुहिम मे आपका साथ इसलिए भी आवश्यक था क्योकि इस तरह के लेखन की ये सारी प्रेरणा आप ही से मिली है…… प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……………

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    वाहिद भाई…….. आपके दोनों के समर्थन के लिए हार्दिक शुक्रिया……

baijnathpandey के द्वारा
February 16, 2011

आदरणीय पियूष जी ,,,,,,,,,,साहित्यकार सदैव समाज की धरोहर है ,,,,,अतः उसे अपना काम करता रहना चाहिए , परिणाम चाहे जो भी हो, विजयी वही होता है जिसे जनता स्वीकारती है | सबसे बड़ा सच यही है की हम सभी साहित्य के सेवक है और इसकी आराधना में जो सुख है उसकी तुलना पुरष्कारों से नहीं हो सकती | जागरण ने जो जहमत उठाई है वह उसकी अपनी परेशानी है ………..हमें सृजन के लिए किसी का मुंह नहीं ताकना | ………..साभार

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    भाई बैजनाथ पांडे जी…… आपका कथन बिलकुल सही है…… पर साहित्यकार के समाज के प्रति कुछ दायित्व भी हैं………. जो उसको निभाने पड़ते हैं…….. हम लोग यहाँ एक दूसरे से प्रतिक्रियाओं के द्वारा जुड़े हैं तो एक दूसरे के लेख को पढ़ते हैं……. पर कई लोग लेखों का आकलन उनके फीचर्ड होने से करते हैं…….. ओर केवल वही ब्लॉग पढ़ते हैं जो की फीचर्ड हो चुके हैं ……….. तो ऐसे मैं कई ऐसे लेखक जो की नए है उनके रचनात्मक लेख बिना पढे ही समाप्त हो जाते हैं…….. तो उनके हित के बारे मे बात करना भी हमारा दायित्व है……….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………

allrounder के द्वारा
February 16, 2011

पियूष जी, बहुत ही सोचनीय प्रश्न उठाये है,आपने लेख मैं किन्तु लाख टेक का सवाल यही है विजेता कौन ? और कैसे ? ये तो वर्ल्ड कप से भी ज्यादा पेचीदा हो गया लगता है ! ऐसा न हो वर्ल्ड कप के कुछ मैचों की भांति यहाँ भी डकवर्थ एंड लुईस का फ़ॉर्मूला लगाया जाए जो अच्छे – अच्छे क्रिकेटर्स की समझ मैं नहीं आता !

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    सही कहा आपने वास्तव मे यहाँ कई रचनाएँ बेहद प्रभावशाली थी जो कुछ नये ब्लोगर्स भाइयों द्वारा लिखी गयी थीं…….. पर उनको फीचर्ड ही नहीं किया गया…….. और उस दौरान कई ब्लॉग 40 घंटे से ऊपर टंगे रहे……. ऐसा नहीं है की वो इस योग्य नही थे की इतनी देर तक टंगे…… पर किसी को इतना सम्मान ओर किसी को बिलकुल नहीं……. ये नीति गलत है…….. अब देखें विजेता के चुनाव मे क्या नीति अपनाई जाती है……… आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………

Anuj Kumar Karonsia के द्वारा
February 16, 2011

पियूष जी आपने एकदम सही मुद्दा उठाया है कही ये प्रतियोगिता ब्लोगर्स की गुटबंदी का शिकार न हो जाये. मेरे ख्याल से JJ को लेख के कंटेंट्स, उनकी सार्थकता और समाज मैं पड़ने वाले उसके प्रभाव को भी ध्यान रखना ही चाहिए. वाकी कम से कम हमसे ज्यादा बुद्धिवान लोग तो है ही जागरण के पास, शायद उनसे भूल की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. आपके लेख मैं धाराप्रभाव अच्छा है.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    अनुज जी……. यहाँ ब्लोगर्स मे गुटबंदी जैसा कोई मुद्दा नहीं है….. ये जरूर है की लगातार लेखों और प्रतिक्रियाओं के द्वारा हम एक दूसरे से एक रिश्ता सा बना लेते हैं…….. किन्तु लगभग सभी यहाँ किसी न किसी तरह से सामाजिक चेतना के लिए प्रयास कर रहे हैं फिर चाहे वो कोई भी हो……. किसी की सार्थक पहल पर साथ देना गुटबाजी नहीं कही जा सकती ….. और आपकी ही तरह यहाँ सभी की यही राय है की JJ को लेख के कंटेंट्स, उनकी सार्थकता और समाज मैं पड़ने वाले उसके प्रभाव को भी ध्यान रखना ही चाहिए…….. और इसके लिए मुझसे पूर्व भी कई जागरूक ब्लोगर्स इस विषय को उठा चुके हैं……….

आर.एन. शाही के द्वारा
February 16, 2011

तमाशा हम भी देखेंगे । बधाई ।

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    आदरणीय शाही जी……. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………

Munish के द्वारा
February 16, 2011

पियूष जी, आपने अपने लेख में बहुत सही प्रश्न उठाये हैं और लेख प्रासंगिक भी है, परन्तु इस लेख को हास्य व्यंग या मस्ती मालगाड़ी में क्यों आपने रखा ये मुझे सोचने पर विवश करता है, http://munish.jagranjunction.com/2011/02/15/%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a4%b0-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82/

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    इस संदर्भ मे ज्यादा न सोचें…….. मैं सारा कारण स्पष्ट कर देता हूँ……. पहले मैं एक स्वच्छ व्यंग लिख रहा था….. पर कुछ अजीब सा लगा की क्या इतना गंभीर विषय छोड़ कर व्यंग लिखा जाए…… फिर मैंने इस को पुराना लेख एडिट कर उसके स्थान पर इसे लिखा पर भूल वश इसे जनरल डिब्बे मे रखने के ……. पूर्व के चयनित मस्ती मालगाड़ी ओर व्यंग मे ही रहने दिया…….. भूल सुधार करवाने के लिए शुक्रिया……..

dr.manoj rastogi के द्वारा
February 16, 2011

सही सवाल उठाए हैं आपने rastogi.jagranjunction.com

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    डॉ. मनोज रस्तोगी जी…….. आपके प्रोत्साहन ने इस विचार को बल दिया…….. इसके लिए आपका आभार…….. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया………

Alka Gupta के द्वारा
February 16, 2011

पियूष जी , इस लेख का हर पैराग्राफ अपने में महत्त्व समेटे हुए व गहन चिंतन के उपरांत लिखा गया सार्थक लेख है वैसे ही आपके सभी लेखों मे अद्भुत जीवन्तता होती है इस लेख की अंतिम पंक्ति पढ़ कर तो में अपनी हंसी भी नहीं रोक सकी….ओखली में सिर दे दिया है…..देखें कितने मूसल पड़ते हैं …..! जब ओखली में सिर दिया है तब तो मूसल पड़े बिना कोई भला कैसे बच सकता है! इसके साथ ही मेरी फॉन्ट सबंधी समस्या का समाधान अगर आप कर सकते है तो मैं आपकी बहुत आभारी होऊँगी पोस्ट लिखते समय HTML पर कोई भी ऑप्शन फॉन्ट के बड़े करने का नहीं है मैने बहुत कोशिश की पर नहीं हो सका अगर दूसरा कोई तरीका हो और आपके लिए संभव हो तो कृपया बताने का कष्ट करे बहुत धन्यवाद !

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    अल्का जी……. बाकी तो मैं नहीं जानता की आप किस तरह लेख लिखती है………. पर रंगों के चयन व पैराग्राफ को जस्टिफ़ाई करने के बाद आप Visual के स्थान पर HTML का चयन करें जहां…… इस तरह के कोष्ठकों के बीच कुछ कोड लिखे होंगे……. अब आप पहली लाइन के पहले < के आगे पहुंचे ओर वहाँ पर लिख दें………. अब ठीक उसी तरह लेख के आखरी > के बाद लिख कर पोस्ट सेव कर लें……… ओर उसका प्रीव्यू देख लें…….. पर एक बार ये टैग जोड़ने के बाद जैसे ही आप दुबारा Visual पर क्लिक करेंगे ……. फॉन्ट फिर से छोटे हो जाएंगे……. इस लिए जब तक visual का काम पूरा न हो जाए……. ये टैग न जोड़े……….. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया………

    alkargupta1 के द्वारा
    February 16, 2011

    पियूष जी , त्वरित उत्तर के लिए मेरा हार्दिक आभार ! यह प्रयत्न करके देखती हूँ बहुत बहुत धन्यवाद पियूष जी

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    अल्का जी…….. आप ये प्रयोग करके देखें…… शायद फर्क पड़े…….

Aakash Tiwaari के द्वारा
February 16, 2011

श्री पियूष जी, ये बात सही है की अब पता चलेगा की जागरण किस आधार पर विजेता का चुनाव करता है…. बहुत ही तथ्य्पर्ख लेख… आकाश तिवारी

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……… आकाश भाई……

Your Friend के द्वारा
February 16, 2011

आपका ye लेख nisandeh sarahniya है! or ye bade hi khed ka vishay है की इसको जज ने फेचार्ड नही किया iska ek kaaran ye bhi ho sakta है की क्योंकि aapne is me JJ par hi sawal uthaye hain. is se purv bhi aap ek blog me JJ ke khilaf likh chuke है to JJ ke aapke blog को फीचर्ड न karne se itna to tay है की aapne JJ se panga le liye है. or kam se kam आपका विजेता बनाना तो namumkin है! ये शायद आप भी समझ चुके हैं! जज भले ही कुछ कहे पर यहाँ बिना चापुलासी या dadagiri ke कुछ nahi hota! कांटेस्ट में बने रहने के लोभ से मैं apni pahachan chhupane को मजबूर हु.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    मेरे मित्र ……… आपने अपनी पहचान छुपाई है ये आपकी मजबूरी नहीं कमजोरी कही जानी चाहिए……. और जहां तक मेरे JJ से पंगा लेने का प्रश्न है तो इसमे कुछ गलत नहीं है….. इस मंच पर हमे समाज को बदलने के नारे लगाते हैं ओर मंच पर हो रही अराजकता को केवल पुरस्कार के लोभ से सहे जाएँ तो ऐसी प्रतियोगिताओं से बाहर होने मे कोई बुराई नहीं है……….. और वैसे भी हमारे स्तर का प्रेम JJ को पसंद भी नहीं है……. क्योकि यहाँ न प्रेमी है न प्रेमिका……… संस्कारों का तो अब हर तरफ अंतिम संस्कार किया जा चुका है …….. फिर JJ से कोई उम्मीद क्यों…….. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……………. पर एक बात कहना चाहता हूँ…….. की नाम बदलकर किसी क्रांति की बातें नहीं की जा सकती………….

February 16, 2011

पियूष जी, जागरण जंगशन की द्विधा का सही आंकलन किया हॆ आपने.खॆर पुरानी कहावत हॆ-नाई रे नाई बाल कितने….साख बचेगी या ……..जल्दी ही पता लग जायेगा.इस तरह की प्रतियोगिताओं को खेल की भावना से ही लिया जाना चाहिए.परिणाम कुछ भी हो, इस मंच के कारण जो ब्लागर मित्र हमें मिले हॆं-उनमें किसी तरह का मन-मुटाव-इस तरह की प्रतियोगिताओं से नहीं आना चाहिए.चिचार अलग हो सकते हॆ-लेकिन प्रेम बना रहना चाहिए.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    आदरणीय विनोद जी……… प्रतियोगिताओं का मकसद आपस मे स्पर्धा के माध्यम से विकास होता है……… इस दौरान मतभेद होना स्वभाविक है …… पर इनको मन भेद मे नहीं बदला जाना चाहिए…….. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया………

priyasingh के द्वारा
February 16, 2011

बाजपेई जी ने बिलकुल ठीक कहा ……..और उनकी इस बात से यहाँ सभी सहमत होंगे ………… हाँ आपने ये सही लिखा की ब्लॉग फीचर दिखाई नही दे रहे थे पर मेल आ रहे थे की ब्लॉग फीचर हुआ है मेरे मेल में भी ब्लॉग फीचर हुआ है ऐसी मेल आ रही थी पर फीचर ब्लॉग में दिखाई नही दी मुझे लगा शायद कोई तकनिकी खामी की वजह से ऐसी मेल आ गयी है …….. अब तो विजेता को लेकर सभी के मन में उत्सुकता है ………… पर हाँ आपके लेख विजेता की श्रेणी में जरुर होंगे …….

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया………

deepak pandey के द्वारा
February 16, 2011

पियूष जी, बहुत ही सुन्दर लिखा है आपने . वैसे jj तो बुरा फंस गया है विजेता बनाने के मामले में. फीचर्ड ब्लॉग के मामले में मै आपसे सहमत हूँ. वैसे राजकमल भेजी ने तो बहुत बेहतरीन व्यंग्य किया है इस बारे में . खैर फर्क नहीं पड़ता क्युकी लोग अच्छे लेखक का लेख ढूंढ़ कर पढ़ते हैं.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    भाई दीपक जी……. फीचर्ड ब्लॉग पर सभी एक मत ही हैं……. और जहां तक राजकमल जी के व्यंग का प्रश्न है तो वो इस मंच के राजा है व्यंग के क्षेत्र मे फिर चाहे लेख हो या प्रतिक्रियाएं …… उनका मुक़ाबला कर पाना किसी के बस का काम नहीं है……. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया………

ashvinikumar के द्वारा
February 16, 2011

पियूष भाई,, चिंतन, के उपरांत लेख के लिए हार्दिक धन्यवाद …….जय भारत

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    भ्राता अश्विनी जी….. आपकी इस प्रतिकिया के लिए शुक्रिया…… और जहाँ तक चिंतन का प्रश्न है तो चिंता चिता सामान होती है ये तो सुना था पर जागरण वालों की नज़र में चिंतन भी चिता के ही सामान है………..

Ramesh bajpai के द्वारा
February 16, 2011

प्रिय पियूष जी आप इस मंच के समर्पित,सर्व प्रिय व सर्व क्षेष्ठ ब्लोगर है | आपसे न मिल पाने पर कमी महसूस होती है और मिलते ही नितांत अपने पन का सदा आभास होता आया है | आपकी इस स्वाभाविक जिज्ञाषा का हल जरुर होगा बस थोडा वक्त लगेगा |

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    February 16, 2011

    आदरणीय बाजपई जी…ये सब आपका स्नेह है अन्यथा सर्व प्रिय ओर सर्व श्रेष्ठ जैसे शब्द यूं ही प्रयोग नहीं किए जाते हैं……… आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया………


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