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सड़क पर न्यायमूर्ति........

Posted On: 16 Feb, 2011 Others में

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सुबह आठ बजे का समय था….. और मैं दफ्तर के लिए निकल पड़ा था……. जहाँ से मैं ऑफिस के लिए गाड़ी में बैठता था वहां तक घर से ऑटो में जाना होता है…….. जैसे ही मैं ऑटो से उतरा तो देखा वहां बनी पुलिस बीट (बीट : कुछ स्थानों पर छोटे छोटे डब्बे रखे है जिसके अन्दर केवल दो पुलिस वाले बैठ सकते हैं…… चित्र संलग्न है…) पर भीड़ लगी है…….
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पुलिस बीट पर मेरे ऑफिस जाते समय पुलिस तो कभी दिखती नहीं……हो सकता है की शायद इस के पीछे ये कारन हो की सुबह पुलिस और अपराधी दोनों के सोने का समय होता है……… ये दोनों ही निशाचर है……. अर्थात रात्रि में भ्रमण करने वाले……….. यहाँ इस चौराहे पर खड़े होकर मैं हर रोज अपनी गाड़ी के आने का इंतजार करता हूँ और उस दिन भी कर रहा था……..

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beet.
एक बार फिर रोने चिल्लाने की आवाजें आने लगी……. अब गाड़ी तो दिख नहीं रही थी….. मैंने सोचा एक बार देख तो लूँ की माजरा क्या है….. दूर से ही मैंने देखा की. वहां बीट के भीतर एक लड़का बैठा था …… और गला फाड़ कर रो रहा था….. उसको ही चारों और से लोगों ने घेर रखा था…… और उसकी शकल बता रही थी की बुरी तरह से उसकी पिटाई हो चुकी है…… वो चिल्ला चिल्ला कर कह रहा था की बाबु जी मैंने कुछ नहीं किया बाबु जी…… और लोग चर्चा में लगे थे……..
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तभी एक लड़का भी दौड़ता हुआ आया और उसने भी बहती गंगा में हाथ धो ही डाला …. और दो चार झापड़ जड़ दिए………… फिर बोला क्या किया इस साले ने………. फिर भीड़ भी उसकी हरकत से थोडा सा दवाब में आ गयी…….. और उस भीड़ में से एक आदमी बोला …………
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अरे भाई साहब चोरी कर रहा था……..साला…….. वो भी मंदिर से………….

मंदिर से चोरी ………….साले तेरी तो……… .का उद्घोष करके वो फिर चढ़ गया ………. और फिर दे दाना दान……… चार पांच हाथ धर दिए……….और बोला बुलाओ पुलिस को साला चोरी करता है…….. छोड़ना नहीं इस साले को………..

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और वो पीछे की और मुड़ा और कुटिल मुस्कान चेहरे पे ले कर अपनी मित्र मंडली जो अपने हाथो में किताबें लेकर मेरे नजदीक ही खड़ी थी …….. में घुस गया और बोला साला सुबह ट्यूशन में मास्टर जी ने मुझे पेल दिया था……….. तब से मुड ख़राब था…. अभी हाथ साफ़ किया तो थोडा सुकून मिल गया……… नहीं तो साला पूरा दिन काला हो जाता….. उस मास्टर का चेहरा याद कर कर के मारे उसको झापड़…………
.

फिर मैंने थोडा नजदीक जा कर उस बीत के अन्दर देखा ……..तो उसके पास कोई सामान नहीं था…. फिर मेरा माथा ठनक गया……… मैंने भीड़ के नेता से पूछ लिया…… की इसने चोरा क्या ये तो खाली हाथ है…….. और पता कैसे चला की ये चोर है………

अब नेता जी बोले……… अरे भाई साहब …. मैं वहां मंदिर के गेट पर ठेला लगता हूँ…… फल का…… अब ये सुबह सुबह ये मंदिर में घुसा ….. साला खाली हाथ मंदिर में गया और वापसी में थैला भरा जैसा लगा……… तभी मुझे शक हो गया ………

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मैंने कहा की ये तो एक दम सही बात है यार………… अब अगर मंदिर कोई भरा थैला ले कर जाये और खाली हाथ आये तो तो समझ आता है …………… पर कोई खाली हाथ जाये और झोली भर के ले आये तो शक हो क्या यकीन हो जाना चाहिए की वो चोर है………

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वो बोला तो और क्या……… ऐसे कैसे भर सकता है किसी का झोला……….. बस फिर क्या था…….. मैंने वहीँ से जो इसको पीटना शुरू किया तो मारते मारते हीयां बीट तक ले आया………. फिर वो छोटू चाय की दुकान वाला फिर उसने भी दे दना दन जो मारा इस साले को………. तब से रो रिया है………..

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तो मैंने कहा की यार तो सीधे पुलिस को बुला लेते ……… तो वो बोला अरे अभी तो मंदिर वालों ने कोई मारा है……..अभी तो वो भी आंगे….. जभी वो मार लेंगे…….. तब जाकी पुलिस को बुलांगे……… इसका न्याय तो हमहीं कर देंगे…..

……………………………………………………………………………………………………..

इस घटना को सुनते ही मुझे एक और घटना की याद आ गयी……….. जब एक चोर कुछ चुराते हुए पकड़ा गया……….. और भीड़ में से एक लड़का बार बार आगे निकल कर उसको पीटता…… फिर भीड़ उसको जैसे ही पीछे हटाती वो फिर आगे आ जाता……… अब भीड़ से रहा नहीं गया ……. उन लोगों ने पूछ ही लिया यार इतना गुस्सा क्यों हो रहे हो………. तो वो बोला साला चोरी कैसे करने आया………….

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फिर वो चोर ने कहा की मैं बताता हूँ…… तो वो लड़का बोला चुपकर साले तू क्या बताएगा………. दो चार जड़े और चल दिया……..तब वो चोर बोला की ये चोरी का प्लान उसका था…….. मुझे लगा अकेले ही चुरा लूँगा…… इस लिए साला भड़क रहा था………
-
फिर उस चोर को लोगों ने पुलिस को दिया और पुलिस ने उससे पैसे मांगे वो गरीब था इसलिए ही चोरी की तो वो कुछ दे नहीं पाया………. तो उसको जेल भेज दिया गया …………..
———————————————–

तब मैंने भी ख्याल किया की यहाँ भी उस लड़के को मारने वाले लोग जो न्याय की प्रतिमूर्ति बने थे……. जो उस लड़के की चोरी को देख कर मार पीट पर उतर आये थे……… उन की आँखों के ठीक सामने न जाने कितने बार पुलिस वालों ने उस बीट पर चालान का डर दिखा कर लोगों से पैसे लिए हैं…… वो फल वाला न जाने कितने मंदिर जाते भक्तों को कम तोल कर और अधिक दामों पर फल बेचता है………

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आखिर कौन इन्हें न्याय करने का अधिकार दे देता है……….. और क्यों ये न्यायमूर्ति उस समय आँखों पर पट्टी बांध लेते है जब ये सारे काम कोई पुलिस वाला और कोई बड़ा आदमी कर रहा होता है……… क्यों वो मौन हो जाते हैं जब उनसे ठेला लगाने का हफ्ता लिया जाता है………

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गरीब क्यों हर बार कभी पेट और भूख के हाथों और कभी इन तथाकथित न्यायमूर्तियों के हाथों मारा जाये……… हर बार भीड़ गरीब अपराधी को मारती है क्योकि उसको पता है की पुलिस उसको पैसा लेकर छोड़ देगी……. तो वो भीड़ ही क्यों नहीं पुलिस के खिलाफ कुछ करती है जब वो उसको छोड़ देती है…………

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इन सवालों के पीछे और उस गरीब चोर लड़के के प्रति सहानुभूति रखने के पीछे एक छोटी सी घटना है जो बताना चाहता हूँ…….. एक बार एक लड़का जिसकी उम्र कोई 15-16 साल रही होगी…. एक गली से जा रहा था….. लड़का ही था और गरीब भी…… तभी उस गली के मोड़ पर वो भी मुड़ा और वही से एक लड़का कुछ चुरा कर भगा….. भीड़ अक्सर अंधी होती है………
दुर्भाग्यवश जैसा की उस लड़के ने बताया की उसके पीछे के मैदान से एक गेंद तेज़ी से उसके आगे को गयी …… और वो उसको लेने के लिए दौड़ा …….. उसका दौड़ना और उस चोर का उस गली में मुड़ना एक साथ हुआ….. चोर न जाने कहाँ को मुड़ गया……. भीड़ को वो लड़का दौड़ता दिखा और उस भीड़ ने जैसे ही वो लड़का गेंद उठाने के लिए झुका उसको गिरा कर पीटना शुरू कर दिया……….
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ये उस लड़के का सौभाग्य था की वो आदमी जिसके यहाँ से वो चोर लड़का सामान चोर कर भाग रहा था… वो भी पीछे पीछे आ रहा था………और उसने उस लड़के को ध्यान से देख रखा था…….. फिर जब उसने कहा की ये वो लड़का नहीं है ……..तो भीड़ वापस अपने अपने काम पर चली गयी…. और उस गरीब का इन्साफ नहीं हो पाया……….. क्योकि अंधे न्यायमूर्तियों ने उस गरीब के जो कपडे फाड़े जो उसको जख्म दिए ……… उनका उसको कोई मुवावजा नहीं मिल सका………..

.
कई बार भीड़ यूँ ही किसी को भी अपने अपने भीतर भरे गुस्से को निकलने के लिए मामूली सी बात पर बुरी तरह से मार जाती है….. और बाद में पता चलता है की उसका कोई कसूर ही नहीं……… कानून कहता ही की भले ही दस कसूरवार छुट जाएँ पर एक बेक़सूर को सजा नहीं होनी चाहिए………. पर भीड़ कहती है की भले 10 बेकसूर पिट जाएँ पर एक कसूरवार छूटना नहीं चाहिए……….
.
तो क्या भीड़ का इन्साफ सही है…… बड़े बड़े कसाब और अफजल गुरु जैसे आतंकवादियों (जिनके अपराध के सारे सबूत उपलब्ध हैं और जिनको हमारे देश की अदालतों के न्यायमूर्ति इन सबूतों के आधार पर सजा दे चुके हैं… ) को पालने वाली सरकारों के खिलाफ हम खामोश है और जो हमारे हाथ में आया…….. उसको हम बिना अपराध जाने ही मारने को तैयार हैं………
क्या हमे सोचने की जरूरत नहीं है…………..



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50 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

aam admi के द्वारा
November 19, 2010

आज भीड जो कुछ भी कर रही है, वह समर्थ व सक्षम को दण्डित न कर पाने के क्षोभ का ही प्रगटीकरण तो नहीं —— कुल मिला कर लेख भीडतन्त्र का आईना है.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 19, 2010

    तो ये सब लोग अपना क्षोब सरकार के खिलाफ जिसको बनाने वाले ये खुद है क्यों नहीं करते……… नेता अपने काले धन को छुपा कर स्विस बैंक में रख रहा है और भूखा एक रोटी चुराने के अपराध में भरे बाज़ार इस भीड़ के हाथों मारा जा रहा है………

November 17, 2010

ऐसे दृश्य आम-तौर पर दिखाई पद जाते हैं. एक बार ऐसे ही किसी तथाकथित चोर की निर्मम पिटाई से मुझे आभास हुआ की कहीं वो मर न जाये अतः मैंने कहा कि इसे और न मरकर पुलिस को दे दो. पूरी भीड़ मेरे ही खिलाफ हो गयी. उन मारने वालों में कुछ तो ऐसे थे जो किसी ना किसी कारणवश आरोपी रह चुके थे. एक अच्छा लेख, बधाई पीयूष जी.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 17, 2010

    दीपक जी………ये जान काr अच्चा लगा की आप भी इस तरह के विचार रखते है………….जो निरपराध को या अपराधी को भी अपराधियों की भीड़ के द्वारा सजा देने के खिलाफ हैं………..

div81 के द्वारा
November 12, 2010

पियूष जी ऐसे समाज के ठेकेदार सभी जगह मिल जायेंगे जिनको पता ही नहीं की सही और गलत क्या है | अच्छी प्रस्तुति पर बधाई!

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 12, 2010

    सही कहा आपने पर हमको भी इस बात का पूरा ध्यान रखना होगा की कही से भी हम इनके इस कृत्य को उचित न ठहराएँ…………. ताकि ऐसा करने वालों को बल न मिले………. आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया………

Ajay Kumar के द्वारा
November 9, 2010

समाज को आइना दिखने वाली प्रस्तुति के लिए बधाईi

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 9, 2010

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…………..

atharvavedamanoj के द्वारा
November 8, 2010

ओ डार्लिंग ये है इंडिया…यहाँ करते हैं ऐसे ही सब डांडिया….बेहतरीन और यथार्थपरक …जय भारत.जय भारती

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 8, 2010

    प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया मनोज जी…………

chaatak के द्वारा
November 8, 2010

प्रिय पीयूष जी, इस तरह के दृश्य हमारे गली मोहल्लों और सड़कों पर आम हैं| इन घटनाओं को देख कर मुझे हमेशा Robert S. Porter की एक बात याद आ जाती है- “For littl’ crims dey put you in de gaols, for da bigger dey put you in de Hall O’fame!” मानना होगा कि सभ्य समाज का असली चेहरा यही है| बेहतर प्रस्तुति पर बधाई!

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 8, 2010

    चातक जी………. आपकी प्रोत्साहन भरी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……….

daniel के द्वारा
November 7, 2010

मैंने सोचा कि एक कमेन्ट और लिख दूँ जिससे हजारवें के साथ एक हज़ार एक वा कमेन्ट भी मेरे नाम हो जाए !

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 8, 2010

    डेनियल जी……आप कहाँ पड़ गए इस नंबर की रेस में ……. चलिए आपने हमारे प्रति सद्भावना रक्खी इसका शुक्रिया,,,,,,,,

daniel के द्वारा
November 7, 2010

प्रिय पियूष जी ! भीड़ ऐसे व्यक्तियों का समूह है जिसका नियंत्रण अराजक तत्वों के हाथ में होता है इस भीड़ में कुछ ऐसे व्यक्ति भी हो सकते है जो स्वयं अराजक न हों लेकिन इस भीड़ में उनका रोल भीड़ का संख्या बल बढ़ाने के अलावा कुछ और नहीं होता इस भीड़ का कोई चरित्र नहीं होता यह भीड़ जब भी मौका मिले अपनी हिंसक प्रवृत्ति की प्यास बुझा लेती है यह कभी बसों में आग लगाती है , कभी दुकानों को लूट लेती है मौका मिले तो किसी पर अत्याचार करने और जान लेने का आनंद भी उठा लेती है हमारे समाज को आइना दिखने वाली एक वास्तविक प्रस्तुति के लिए बधाई

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 8, 2010

    डेनियल जी…….. भीड़ को आपने भी ख़ूबसूरती से परिभाषित किया है अपनी इस प्रतिक्रिया में……. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया………

Tufail A. Siddequi के द्वारा
November 7, 2010

बधाई.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 7, 2010

    हार्दिक शुक्रिया…………. तुफैल भाई……..

abodhbaalak के द्वारा
November 7, 2010

पियूष जी अक्सर ऐसा देखने में आता है की हम खुद ही न्यायाधीश बन जाते हैं और न्याय करने लगते हैं, आज कानून हाथ में लेना एक आम बात हो गयी है, और इसमें अक्सर ऐसे ही लोग होते है जो किसी का गुस्सा किसी पर उतारते हैं, काश हम उस बात पर विश्वास करते की पहला पत्थर वो मरे जिसने पाप ना किया हो, यहाँ कहीं पढ़ा था की लोग तब ही तक ईमानदार है जब तक उनको मौका नहीं मिलता …. सदा की भांति सुन्दर लेख पन्त जी,, मेरे जैसा अबोध आप जैसे लेखक को बधाई दे तो अच्छा भी नहीं लगता, http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 7, 2010

    सही कहा आपने की पहला पत्थर वो मरे जिसने पाप ना किया हो, और ये भी सत्य है की लोग तब ही तक ईमानदार है जब तक उनको मौका नहीं मिलता …. पर खुद को अबोध कहना …………? कही इस और इशारा तो नहीं…………..की अगर कोई ये कहे की वो जानता है की वो सब कुछ जानता है तो इसका अर्थ है की वो कुछ नहीं जानता है….. और कोई ये कहे की वो जानता है की वो कुछ जानता है तो इसका अर्थ है की शायद वो कुछ जानता है….. पर अगर कोई ये कहे की वो जानता है की वो कुछ नहीं जानता है तो इसका अर्थ है की वो ही सब कुछ जानता है….. तो कहीं अबोध का अर्थ ये तो नहीं की सारा बोध यही हो…………….

jagojagobharat के द्वारा
November 7, 2010

प्रिय , पन्त जी कानून कहता ही की भले ही दस कसूरवार छुट जाएँ पर एक बेक़सूर को सजा नहीं होनी चाहिए………. पर भीड़ कहती है की भले 10 बेकसूर पिट जाएँ पर एक कसूरवार छूटना नहीं चाहिए……….यह आज की सच्चाई है जिससे आप ने उजागर कर हमें अवगत करवाया है……….अच्छा लेख ……….

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 7, 2010

    प्रिय , पन्त जी लिखने के लिए एक और प्रतिक्रिया की आवश्यकता नहीं थी …………..यहाँ हम सब यूँ भी एक दुसरे की भावनाओं को समजते है……………..

jagojagobharat के द्वारा
November 7, 2010

कानून कहता ही की भले ही दस कसूरवार छुट जाएँ पर एक बेक़सूर को सजा नहीं होनी चाहिए………. पर भीड़ कहती है की भले 10 बेकसूर पिट जाएँ पर एक कसूरवार छूटना नहीं चाहिए……….यह आज की सच्चाई है जिससे आप ने उजागर कर हमें अवगत करवाया है……….अच्छा लेख ……….

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 7, 2010

    आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया………

R K KHURANA के द्वारा
November 7, 2010

प्रिय पियूष जी, गरीबी ही सब बुराईयों की जड़ है ! गरीब की सच बात पर भी कोइ विश्वाश नहीं करता ! और इसी तरह से मार खाता है ! खुराना

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 7, 2010

    आदरणीय खुराना जी .. गरीबी ही सब बुराईयों की जड़ है ! ये कहना सही नहीं………… वास्तव में सभी बुराईयों की जड़ असंतोष और लालच है………… आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया………

Alka Gupta के द्वारा
November 7, 2010

पियूष जी,आज निर्बल और बेकसूरवार ही पीटा जाता है कोई न्याय नहीं है इनके लिए समाज में मानवता तो है ही नही।अंधे न्यायमूर्तियों ने……….ज़ख्म दिए……… .मुआवज़ा नहीं मिल सका।यही है  समाज की सच्ची तस्वीर।बहुत अच्छ। लेख है।

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 7, 2010

    देखिये न्यायपालिकाएं अपने काम को बखूबी अंजाम दे रही है…………. पर उसपर कुछ बंदिशें है ……..जो उसको कमजोर करती है……….. adalat सजा देती है और राजनैतिक दल माफ़ी के लिए राष्ट्रपति के पास गुहार लगते हैं…………….. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया………

s p singh के द्वारा
November 6, 2010

प्रिय पियूष जी, बहुत खूब शीषर्क से तो ऐसा लगा की वास्तव में कोई …….मूर्ति टुन्न होकर सड़क पर पड़ी हुई है – पर मजा आ गया , यही तो भीड़ तंत्र है ,हो सकता है वाही फल वाला ही मंदिर में चड़े हुए फल उठा लता हो \ धन्यवाद.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 7, 2010

    अरे नहीं साहब ………पहले तो इस तरह का कोई प्रकरण होता नहीं है………….और यदि इस तरह का कोई प्रकरण यदि होता भी तो मैं आपके साथ इस तरह बाटता नहीं……….. आपका ख्याल भी सही लगता है की हो सकता है वाही फल वाला ही मंदिर में चड़े हुए फल उठा लता हो ……………… आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया………

kmmishra के द्वारा
November 6, 2010

भीड़ की मानसिकता और भीड़ में अकेले हम. आभार.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 7, 2010

    मिश्रा जी………आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…………….

harish के द्वारा
November 6, 2010

पीयूष जी आपको दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 7, 2010

    हरीश जी……. आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…………….

deepak joshi के द्वारा
November 6, 2010

प्रिय पियूष जी, आप ने सड़क पर न्‍यायमुर्ति के माध्‍यम से जो भीड़ का चेहरा दिखाया है वह एक सच्‍चाई ही है। कमजोर व गरीब को तो सभी दबा लेते है, और कहते भी है कि भीड़ से तो भूत भी डरते है। गरीब व निसहाय पर अपने हाथ साफ करना एक कुंठित मनोदशा को दर्शाता है। बहुत ही अच्‍छे लेख के लिए बधाई।

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 7, 2010

    सही कहा आपने की भीड़ से तो भूत भी डरते है। मगर ये भीड़ भूतों को डराने की जगह लोगों को ही भूत बनाने पर लगी है……………आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…………….

Aakash Tiwaari के द्वारा
November 6, 2010

आदरणीय पियूष जी, आपको तथा आपके पूरे परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं.. आपके लिखे लेख को पढने के बाद मै कुछ कहूँगा..’भीड़ के द्वारा दिखाया गया एक कमजोर पर गुस्सा लोगों की कमजोरी को दर्शाता है,लोग अब सरकार,या फिर प्रशाशन के विरुद्ध कुछ कर नहीं पा रहे है तो केवल गरीब को ही पीट कर अपने दिल को ठंडक पहुंचा लेते है…. रही बात कसाब और अफजल की तो भाजपा के एक नेता ने कहा था की “भारत में कसाब से ज्यादा सुरक्षित कोई भी नहीं”.. “भइया इ हिन्दुस्तान है यहाँ सब कुछ हो सकता है वो भी केवल देश के अहित में…” आकाश तिवारी

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 7, 2010

    वास्तव में सत्य ही है ये कथन की “भारत में कसाब से ज्यादा सुरक्षित कोई भी नहीं”.. एक बार फिर प्रोत्साहन के लिए हार्दिक शुक्रिया…………….

ashvinikumar के द्वारा
November 6, 2010

पियूष भाई यह नजारा आम होता जा रहा है ,लोगों की प्रकृति हिंषक होती जा रही है (आदमी जानवर बनने की तरफ अग्रसर है ) ऐसी घटनाओं पर अफशोश होता है,छोटे चोर का न्याय/अन्याय भीड़ कर देती है,, लेकिन वह बड़े चोर …….उनकी तरफ केवल देखा या कहा जाता है……….शायद भीड़ का भी उसमे लाभ निहित होता है ?………प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामना

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 7, 2010

    अश्विनी भाई अगर ये कहें की आदमी जानवर बनने की तरफ अग्रसर है………… तो शायद ये जानवरों का अपमान हो…………. एक बार एनिमल प्लैनेट पर एक शो देखा था जिसमे एक भैंस अपने छोटे से बच्चे के साथ शेरों के झुण्ड में फंस गयी…………. और उसकी एक आवाज़ पर जंगली भैंसों का पूरा झुण्ड शेरों पर टूट पड़ा………… और वो मासूम सा बच्चा बच गया……….. पर क्या इंसान ऐसा करता है………………. स्नेह भरी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………………

nishamittal के द्वारा
November 6, 2010

यही तो न्याय है पीयूष जी, अंधेर नगरी चौपट राजा का.दुर्बल को सताना तो समाज का नियम बन गया है.अच्छा lekh

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 7, 2010

    आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………….

Ritambhara tiwari के द्वारा
November 6, 2010

क्या करियेगा?.ऐसा ही होता आया है …………..बड़े अपराधी चूँकि बड़ी पहुँच और ताकत वाले भी होते है सो उनसे सभी डरते हैं कमजोर पर सब हाथ साफ़ करना चाहते हैं .बस यही कहा जा सकता है कि………………….. “परिवर्तन की ओर………..एक अच्छे समाज के सृजन के लिए आपका जो उद्घोष है वो सभी को अपनाना चाहिए!”………..”बदलें खुद को……. और समाज को……! “

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 7, 2010

    यही सोचने सोचने का अंतर है कोई इसे उद्घोष समझता है और कोई यूँ ही टैग लाइन समझ कर पढता है……………….. वैचारिक समर्थन के लिए हार्दिक शुक्रिया……………….

rajkamal के द्वारा
November 6, 2010

प्रिय पन्त जी आपका सन्देश अलग से भी मिला है उसके लिए धन्यवाद, दीपावली का पवन पर्व आपको परिवार सहित बहुत बहुत मंगल मय हो. एस.पी सिंह, मेरठ ****************************************************************************************************************** प्रिय पियूष भाई ..नमस्कार ! यह आपके परम मित्र श्री सिंह साहिब जी ….या तो दीपावली की खुशी में … या फिर कुछ ज्यादा पीने के कारण गलती से मेरे पास आ गए थे … अब इनका घर तो मैं जानता नहीं हूँ … इसलिए आपके सपुर्द करता हूँ …. आगे का काम आप जाने … जय श्री राम और सत श्री अकाल

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 7, 2010

    नहीं राजकमल भाई ………… आये वो आपको ही मिलने थे………. पर शायद दिवाली में बस यूँ ही छोटी सी दिल्लगी कर गए……………

    Ajay Kumar के द्वारा
    November 9, 2010

    राजकमल जी, आजकल ये बीमारी आम है की कोई भी कहीं भी किसी का भी नाम चिपका दे रहा हैi

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 9, 2010

    अजय कुमार जी ….. यदि आप भी ब्लॉग लिखते हैं तो अपना लिंक भेजें………

rajkamal के द्वारा
November 6, 2010

कानून कहता ही की भले ही दस कसूरवार छुट जाएँ पर एक बेक़सूर को सजा नहीं होनी चाहिए………. पर भीड़ कहती है की भले 10 बेकसूर पिट जाएँ पर एक कसूरवार छूटना नहीं चाहिए………. बहुत अच्छी बात कही है आपने …. आज आपके लेख को पड़कर मुझको मुंशी प्रेम चंद की कहानी “अठ्ठनी का चोर याद आ गई … आपका यह लेख ठन्डे दिमाग से सोचने पर ही कुछ एहसास करवाता है एक अकेले आदमी को … लेकिन जब वोही बहुत सारे अकेले आदमी मिल कर भीड़ तंत्र का रूप धर लेते है तो उनका स्वभाव और चरित्र बिलकुल सिरे से ही बदल जाया करता है …. अच्छा लेख …मुबारकबाद

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 7, 2010

    भाई राजकमल आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…………..


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