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भिखारी (आदतन भी और मज़बूरी से भी)........

Posted On: 18 Feb, 2011 Others में

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कुछ समय पूर्व एक ब्लॉग पढ़ा जिसमे भिखारियों के सन्दर्भ में बहुत बढ़िया ढंग से लिखा गया था…. हर बात बिलकुल सही थी…….. वास्तव में हम भीख देने के स्थान पर अगर उनको समर्थ बनाने का प्रयास करें तो कुछ सुधार जरूर होगा………. इस कथन से में शत प्रतिशत सहमत था….

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पर फिर एक घटना याद आ गई……. जो आपलोगों के साथ बाटना चाहता हूँ………

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शाम का समय था ……….. मैं पढ़ा कर घर की और लौट रहा था……और दो मिनट के लिए अपने मित्र की दूकान पर रुक गया जो की बाज़ार में ही थी……….. तभी सामने एक छोटा सा लड़का जिसकी उम्र बमुश्किल बारह साल रही होगी………. दिखा जो एक महिला से कह रहा था कुछ पैसे दे दो बहिन जी……………. माँ घायल है… इलाज करने को पैसा नहीं है…………. लड़के के कपडे साफ़ सुथरे थे……….. और उसके हाव भाव भी कुछ अलग से थे……. महिला ने कहा की स्कूल जाते हो……….छोटे से लड़के न कहा……. उससे क्या होगा…. ? उसने कहा पहले बताओ जाते हो………. लड़का बोला हां जाता हूँ……………..

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beggar

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पढना लिखना जानते हो……. वो बोला हाँ……. फिर उसने एक अखबार का टुकड़ा उसको दिया और बोली पढो क्या लिखा है……….. और उसने पढ़ कर सुना दिया……….. और बोला तो अब तो पैसे दे दो…………. महिला फिर बोली की पढना लिखना जानते हो और इतना नहीं पता की भीख माँगना पाप है………….. अब लड़का बोला मैडम भीख नहीं सहायता चाहिए……… महिला बोली बहुत खूब भीख को सहायता का नाम दे दिया…….. चल भाग यहाँ से…………………

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मैंने अपने मित्र से पूछा कौन है ये लड़का……….. मित्र बोला पहली बार देखा है……….. फिर उसने उसको आवाज़ लगायी………. लड़का दौड़ कर आ गया………….. मैंने पूछा क्या हुआ….. वो बोला माँ काम से घर लौट रही थी तभी एक गाड़ी वाला टक्कर मार कर चला गया………… और माँ अस्पताल में भरती है…. उसकी आँखों में आंसू थे…….. मैंने पूछा कब से मांगता है भीख ………… वो बोला मैं भिखारी नहीं हूँ…………. माँ को बचाने के लिए मांग रहा हु………..

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अब दोस्त बोला भीख मांगने के बदले कोई काम करके क्यों नहीं कमाता……….. वो बोला की मेरी माँ के इलाज का पैसा अगर कोई दे तो मैं मुफ्त काम करूँगा उसके घर ……….

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मैंने कहा चल जाने दे यार ……….. और मैंने अपना पर्स बाहर निकाला और कशमकश में था की क्या दूँ……… कभी लगा की एक पांच रुपए का नोट थमा कर कहूँ की जा ऐश कर……… और कभी लगा की कहीं ये सच तो नहीं कह रहा………. तो कम से कम पचास रुपए तो दे ही दूँ……….

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मित्र बोला भाई दो रुपए दे दे……….. पता क्या यहाँ तेरे से मांगकर अगले मोड़ पर साला चाट खा रहा हो………… फिर मन बदल गया और ….एक भय भी था की कही वास्तव में ये मुझे मुर्ख तो नहीं बना रहा है………. मैंने एक दस का नोट उसके हाथ पर दिया और यूँ गर्व से फूला जैसे उसकी माँ को जीवन दे रहा हूँ……………. एक सहारा था की अगर ये मुर्ख बना रहा होगा तो कम से कम कल ये तो कह सकता हूँ की इतना तो लोग पान बीडी में रोज खर्च करते हैं ………… हम सोचेंगे की हम ने भी एक दिन इनका स्वाद ले लिया………..

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अब दुसरे दिन फिर जब मैं वापस आ रहा था………. तो एक जगह पर भीड़ सी दिखाई दी……. स्वभावश मैंने भी झांक कर देखा तो वही लड़का एक मृत महिला के शव के साथ बैठा था………….. और उसके अंतिम संस्कार के लिए पैसे मांग रहा था……… महिला के मुह पर मक्खियाँ मंडरा रही थी……….. और सभी लोग आज उस बच्चे को पैसे दे कर उसको सहयोग दे रहे थे…………

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मैं अपने मित्र की दुकान पर गया और वहीँ खड़ा होकर भीड़ के छटने का इंतजार कर रहा था……. एक ग्लानी सी महसूस कर रहा था………. भीड़ जब छट गयी तो मैं और मेरा मित्र दोनों वहां गए………… और उस लड़के से पूछा की कैसे हुआ ये सब………. तो वो बोला भैया जी डेढ़ सौ रुपए में फिल्म का टिकट आता है……… गरीब की जान नहीं बच सकती…… आप पूछते थे न की कौन सी क्लास में पढता हूँ…………. तो अब मैं किसी क्लास में नहीं पढना चाहता ……………

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सब गलत पढ़ता है…………….. टीचर बोलता है की जीवन सबसे कीमती है………… झूठ है सब जब कल अपनी माँ के जीवन ने लिए पैसे मांगे तो केवल डेढ़ सौ रुपए मिले……… और आज जब कफ़न के लिए मांगे तो देखो पंद्रह सौ से भी ज्यादा जमा हो गए……….. वो भी बिना किसी के सवाल का जवाब दिए……… तो क्या मतलब मौत कीमती या जीवन………..

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आज उसके सवालों का जवाब देने की सामर्थ्य नहीं थी……… पर कुछ सवाल अपने लिए ही उठ रहे थे……….. की क्या जब वो लड़के ने कहा था की उसकी माँ घायल हालत में सरकारी अस्पताल में पड़ी है………..और सरकारी अस्पताल जोकि बाज़ार में उस जगह के बिलकुल पास था जहाँ पर वो लड़का भीख मांग रहा था…………माफ़ कीजियेगा भीख नहीं सहायता मांग रहा था…….. भीख तो हमे बना दिया…… तो……………

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क्या मैं और मेरा मित्र एक बार अस्पताल लाकर देख नहीं सकते थे की वो सच्चा है या नहीं…………. जब आसपडोस में होने वाले रंगारंग कार्यक्रमों ने लिए हम चंदा जुटाते हैं……………… तो क्या उसकी माँ के इलाज के लिए नही जुटा सकते थे……….. पर अब ये सारे प्रश्न अपने मन को समझाने का बहाना ही थे की मैं तो नेक ही था पर कुछ लोगों के द्वारा भीख को आदत बनाने के कारन मैंने पैसे नहीं दिए…………

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पूर्व में हमारे धर्म में जब बालक शिक्षा दीक्षा हेतु आश्रम जाते थे………. तो उनका यज्ञोपवित कराया जाता था और वो भी भिक्षा मांगने जाते थे……… आज भी हमारे यहाँ को इस प्रथा को सांकेतिक रूप से चलाया जाता है….. की यज्ञोपवित के बाद बालक अपने घर के लोगों से भिक्षा मांगता है………..

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बोद्ध और जैन धर्म में व कई हिन्दू संतों व महात्माओं द्वारा भी भिक्षा मांग कर ही जीवन यापन किया जाता है……. इसका एक अपना महत्व है……. वास्तव में ज्ञान के मार्ग पर चलने वाले कभी अहंकार से ग्रसित न हो सकें इसलिए भिक्षा मांगकर जीवन यापन उनके लिए नियम बनाया गया……

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पर आज कई बार आज जिस को कमजोर समझ कर भिक्षा दे देतें हैं कई बार वो शाम को शराब पीकर इधर उधर झूमता दिखाई देता है………. कोशिश यूँ की जानी चाहिए की यदि कोई भूखा हो तो उसको रोटी दी जाये बीमार हो तो इलाज में सहायता की जाये (या अपने विवेक से कुछ सार्थक किया जाये.) ताकि ये आदत से हट कर केवल मजबूरी वालों के लिए ही रहे………..

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माफ़ी चाहूँगा ये किसी लेख के उत्तर में नहीं है…….. अपितु ये माना जा सकता है की उसी के आगे की कड़ी है……………
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24 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

November 18, 2011

उफ़..! दर्द का पर्याय हो जाता है जीवन कभी-कभी…! जिस निष्कर्ष पर आप पहुंचे थे, उसी निष्कर्ष को ही एकमात्र स्वीकार्य माना जा सकता है..! परन्तु, अपनी-अपनी सीमाओं से बाहर निकलकर, एक शुरुआत करना कठिन हो जाता है. जब हम इतना सोच पा रहे हैं, तो एक दिन ज़रूर वो आएगा, जब हम इसे अमली जामा पहना पायेंगे. हाँ..! खुद पर अविश्वास न करें, इतनी सशक्त वैचारिक पृष्ठभूमि हर एक के पास नहीं होती. और उसे ज़बान तो विरले ही दे पाते हैं. आप सिर्फ एक कदम दूर हैं अब सफलता से. दृढ रहिये, वो दिन ज़रूर आएगा, जब देश के गरीबों के लिए मांगने की नौबत नहीं आएगी. अत्यधिक मर्मस्पर्शी रचना हेतु अनंत शुभ कामनाएं. )))

aditya के द्वारा
April 13, 2011

पियूष भाई, नमस्कार ! आप कहाँ खो गए हो…… इधर काफी दिनों के बाद ब्लॉग पर आना हुआ……… किन्तु जब से आया हूँ….. आपको देखने का प्रयास कर रहा हूँ… लेकिन आप दिखाई नहीं दे रहे हैं….. क्या बात हैं.. इतनी दूरी अच्छी नहीं हैं….. आदित्य http://www.aditya.jagranjunction.com

srinivass dwivedi के द्वारा
November 2, 2010

आप का ये लेख पढ़ा . पियूष जी आप के संवेदनशील मन पर पड़े प्रभाव की गंभीरता समझ सकता हूँ. इस स्थिति से सामना होता ही इसलिए है की हमें याद रहे की हम इश्वर नहीं हैं . साधुवाद..

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 4, 2010

    इस और ही आपका ध्यानाकर्षण चाहता था……… आपको और आपके पुरे परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभ कामनाएं ।

s.p.singh के द्वारा
September 30, 2010

प्रिय पियूष जी आपने अपना वायदा बहुत जल्दी ही निभा दिया, इस लेख के विषय में मेरा केवल यह कहना है कि हम आम भारतीय धर्मभीरु होने के कारण जब हमारे सामने ऐसी कोई विपत्ति आती है जैसे — कोई मांगने वाला, कोई बीमार या बेरोजगार तो हम उसे अपनी सामर्थ्य के अनुसार दो-चार दस-पञ्च रुपये देकर अपने कर्तव्य कि इतिश्री कर लेते है | जबकि होना यह चाहिए कि हम अपनी क्षमता के अनुसार अगर उसकी सहायता कर सकते है तो तुरंत करनी चाहिए वर्ना हाथ जोड़ कर माफ़ी मांग लेनी चाहिए ——— सहायता ऐसे कि बीमार को अस्पताल तक पहुँचाना चाहिए, भूखे व्यक्ति को खाना खिलाना, आदि आदि

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    October 1, 2010

    सिंह साहब ……. बिलकुल सही कहा आपने यही मेरा भी मानना है की अगर आपको लगता है की हम उनको कामचोर बना रहे है तो ये बिलकुल सही है………. पर साथ ही ये भी सुनिश्चित करना चाहिए की कही ये बहाना बनाकर हम जरुरत मंद को भी तो नहीं मन कर दे रहे………. आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……………

आर.एन. शाही के द्वारा
September 29, 2010

पियूष जी ये सामाजिक विडम्बनाएं हैं, और कुछ नहीं । हम कीर्ति और फ़ायदे के लिये कुछ भी करते हैं, परन्तु जहां से कुछ हमें नहीं मिलने वाला, वहां उचटती दृष्टि डालना भी महंगा समझते हैं ।

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    October 1, 2010

    आदरणीय शाही जी…… बिलकुल सही कहा आपने……… हमारे लिए अपने लाभ से बढ़ कर कुछ नहीं हैं………….. आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……………

rita singh 'sarjana' के द्वारा
September 29, 2010

पियूष जी , विडम्बना तो यही हैं कि चंद लोगो के धोखे के कारन कभी-कभी जरूरतमंद सहायता से वंचित रह जाते हैं l उस बच्चे के लिए दुःख हुआ l यहाँ भी उसी चुक के कारन एक जरूरतमंद सहायता से वंचित रह गया l उस बच्चे ने यहाँ तक कहा था कि वह सहायता के बदले काम भी करूँगा मगर जो धोखेबाज़ होते हैं वह कभी काम करने को तैयार नहीं होते ,भाग जाते है l अच्छी पोस्ट ,बधाई l

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    October 1, 2010

    रीता जी……..मगर सवाल अभी भी अपनी जगह हैं की क्या एक दिन मजदूरी कर के वो अपनी माँ के इलाज के लिए कुछ कम सकता था………. उसको वास्तव में केवल सहारा देकर ही मदद की जा सकती थी……… आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……………

nishamittal के द्वारा
September 29, 2010

पीयूष जी,पोस्ट से लिंक करना बहुत अच्छा लगा.मेरे द्वारा पहले भी यही कहा गया था कि मानव धर्म हमको यही सिखाता हैकि हम किसी भी आपद्ग्रस्त की सहायता करें.परन्तु आज जब की बीमारी,घायल,प्राकृतक आपदा ग्रस्त होने के नाम पर भीख मांगना एक व्यापार बनता जा रहा है,जरूरत है उस पर यथासंभव नज़र रखने की न कि अपना मानव धर्म भूलने की.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    October 1, 2010

    बहुत शर्मिंदा हूँ अगर आपको बुरा लगा हो……….. मैंने केवल आपके पोस्ट को आगे बढाया है….. आपकी भावनाएं आहात हुए हों तो क्षमा प्रार्थी हूँ…….. आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……………

rameshbajpai के द्वारा
September 29, 2010

आज उसके सवालों का जवाब देने की सामर्थ्य नहीं थी……… पर कुछ सवाल अपने लिए ही उठ रहे थे……….. की क्या जब वो लड़के ने कहा था की उसकी माँ घायल हालत में सरकारी अस्पताल में पड़ी है………..और सरकारी अस्पताल जोकि बाज़ार में उस जगह के बिलकुल पास था जहाँ पर वो लड़का भीख मांग रहा था…………माफ़ कीजियेगा भीख नहीं सहायता मांग रहा था…….. भीख तो हमे बना दिया…… तो…………… पियूष जी बहुत कुछ सोचने को व्यक्त करने को मजबूर करती आपकी पोस्ट धन्यवाद

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    October 1, 2010

    आदरणीय बाजपाई जी …. आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………………

Aakash Tiwaari के द्वारा
September 28, 2010

वाह–वाह पन्त जी आपके लेख ने तो आखो को भिगो दिया…. काश हम सब इस और कुछ कर पाते…या फिर हमारे अन्दर आत्मविश्वाश की कमी है..मगर इतना कहना चाहूँगा…हम लोग बहुत छोटे दिल वाले है… आकाश तिवारी

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    October 1, 2010

    तिवारी जी कमोबेश सभी का यही हाल है………. प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……………..

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
September 28, 2010

प्रिय पियूष जी ! आपकी कहानी पढ़कर एक आघात सा लगा, साथ ही साथ आज के अति भौतिकता वादी, एवं स्वार्थी समाज पर क्षोभ ही हुआ …………….. सब गलत पढ़ता है…………….. टीचर बोलता है की जीवन सबसे कीमती है………… झूठ है सब जब कल अपनी माँ के जीवन ने लिए पैसे मांगे तो केवल डेढ़ सौ रुपए मिले……… और आज जब कफ़न के लिए मांगे तो देखो पंद्रह सौ से भी ज्यादा जमा हो गए……….. वो भी बिना किसी के सवाल का जवाब दिए……… तो क्या मतलब मौत कीमती या जीवन……….. इन लाइनों ने जैसे झकझोर ही दिया ………. और मन ही मन ऐसा लगा की अगर बाध्यता को छद्म रूप देकर इसका वृत्तिकरण न किया जाता तो बाध्यता और वृत्ति में भेद न कर पाने की असमर्थता का आवरण न होता ……….. कभी कभी ऐसा होता है जब हम ये भांप ही नहीं पाते की, बाध्यता किसकी है, वृत्ति किसकी है | मेरा मानना है, बाध्यता की स्थिति में असहाय की हर तरह से सहायता की जानी चाहिए ……….. इतने अच्छे लेख के लिए बहुत बहुत आभार

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 28, 2010

    शैलेश भाई बिलकुल सही कहा है आपने की बाध्यता की स्थिति में असहाय की हर तरह से सहायता की जानी चाहिए……………… ताकि उस बच्चे के सवालों की तरह किसी और को ऐसे सवाल न खड़े करने पड़ें ….. आपकी प्रतिक्रिया का शुक्रिया …………

atharvavedamanoj के द्वारा
September 28, 2010

सब गलत पढ़ता है…………….. टीचर बोलता है की जीवन सबसे कीमती है………… झूठ है सब जब कल अपनी माँ के जीवन ने लिए पैसे मांगे तो केवल डेढ़ सौ रुपए मिले……… और आज जब कफ़न के लिए मांगे तो देखो पंद्रह सौ से भी ज्यादा जमा हो गए……….. वो भी बिना किसी के सवाल का जवाब दिए……… तो क्या मतलब मौत कीमती या जीवन……….. बहुत ही अच्छा लिखा है आपने,आज का मानव इस तरह से संवेदनहीन हो गया है की कुछ कल्पना ही नहीं की जा सकती|अब तो बस सब कुछ यांत्रिक है…एक कंप्यूटर की तरह, बहुत बहुत धन्यवाद वन्देमातरम

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 28, 2010

    सही कहा आपने मनोज भाई ………….. हम न जाने कब इंसान से मशीन हो गए…………………………… आपकी प्रतिक्रिया का शुक्रिया …………

div81 के द्वारा
September 28, 2010

गेहूं के साथ घुन भी पीस जाता है मैं हमेशा मजबूर या जरुरत मंद की मदद करती हूँ मगर गुस्सा तब आता है जब एक स्वस्थ हत्ता कट्टा इन्सान भीख मांगता है मेहनत करने को कहो तो गली दे कर या हसीं उड़ा कर चला जाता है इन जैसो के कारन मजबूर इन्सान मारा जाता है

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 28, 2010

    पर ये आकलन कैसे हो की कौन जरूरत मंद है और कौन नहीं……… प्रश्न ये है………. जिसे हम हट्टा कट्टा इंसान कह रहे हों कहीं वो ही सबसे अधिक मजबूर तो नहीं………… यहाँ बरसात में कई बार मजदूर पूरी तरह से बेरोजगार हो जाते हैं…………. साल भर कमर तोड़ मेहनत करने वाले ये लोग……. अपने घरों से दूर यहाँ काम करते है….. पर बरसात में ये क्या करें और अगर कभी भूख के मारे दो रोटी मांगे तो हम ये कह दें की हट्टे कट्टे हो कुछ काम करो…….. ये गलत है………. इसकी जगह हम दो रोटी तो दे सकते हैं…… पैसे की मदद में सोचना जरूरी है……. क्योकि इसका गलत इस्तेमाल हो सकता है पर रोटी और कपडा तो दिया जा सकता है……….. आपकी प्रतिक्रिया पर इतना लम्बा भाषण देने के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ…. प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………….

    div81 के द्वारा
    September 29, 2010

    जो मेहनत करना जानता है वो मज़बूरी में भी हाथ नहीं फैलता और अगर कोई ऐसा करता है तो उसे जब मेहनत करने के लिए कहेगे तो न तो वो गाली देगा न ही हंसी उडाएगा वो कोई भी मेहनत का काम करने के लिए राजी हो जायेगा और हाँ भाषण कैसा आप ने अपनी राय रक्खी है मैंने अपनी

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    October 1, 2010

    दिव्या जी………उम्मीद है आपके भावनाएं आहात नहीं हुए होंगी……… और आपने मेरे वक्तव्य को उतनी ही सजहता से लिया होगा ……….. जैसे आपने कहा है………. शुक्रिया..


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