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कहानी एक मासूम की (एक मार्मिक कथा)......

Posted On: 20 Feb, 2011 Others में

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ये कहानी उन लोगो के लिए है जो रफ़्तार को शान समझते है. जो ड्राइविंग के नियमो का पालन करना कमजोर लोगो का काम समझते है.
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एक छोटा सा लड़का जिस की उम्र कोई 6 या 7 साल थी. एक खिलोने की दूकान पर खड़ा दुकानदार से कुछ बात कर रहा था, दुकानदार ने न जाने उससे क्या कहा की वो वह से थोडा सा दूर हट गया और वहां से खड़े खड़े वो कभी दुकान पर रखी एक सुन्दर सी गुडिया को देखता और कभी अपनी जेब में हाथ डालता. वो फिर आँख बंद करके कुछ सोचता और फिर दुबारा गुडिया को देखने और अपनी जेब टटोलने का क्रम दुहराने लगता.
.
वही कुछ दूर पर खड़ा एक आदमी बहुत देर से उसकी और देख रहा था. वो आदमी जैसे ही आगे को बढ़ा वो बच्चा दुकानदार के पास गया और कुछ बोला फिर दुकानदार की आवाज सुने पड़ी की नहीं तुम ये गुडिया नहीं खरीद सकते क्योकि तुम्हारे पास जो पैसे है वो काफी कम है.
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वो बच्चा उस आदमी की और मुड़ा और उसने उस आदमी से पूछा अंकल क्या आपको लगता है की मेरे पास वास्तव में कम पैसे है. उस आदमी ने पैसे गिने और बोला हां बेटा ये वास्तव में कम है. तुम इतने पैसो से वो गुडिया नहीं खरीद सकते. उस लड़के ने आह भरी और फिर उदास मन से उस गुडिया को घूरने लगा.
अब उस आदमी ने उस लड़के से पूछा ” तुम ये गुडिया ही क्यों लेना चाहते हो”. लड़के ने उत्तर दिया ये गुडिया मेरी बहिन को बहुत पसंद है. और में ये गुडिया उसको उसके जन्मदिन पर गिफ्ट करना चाहता हु. मुझे ये गुडिया अपनी माँ को देनी है, ताकि वो ये गुडिया मेरे बहिन को दे दें जब वो उसके पास जाये.
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उस आदमी ने पूछा कहा रहती है तुम्हारी बहिन. छोटा लड़का बोला मेरे बहिन भगवान के पास चली गयी है. और पापा कहते है जल्दी ही मेरी माँ भी उससे मिलने भगवान के पास जाने वाली है. और मै चाहता हु की मेरी माँ जब भगवान के पास जाये तो वो ये गुडिया मेरी बहीन के लिए ले जाये. उस आदमी की आखों से आंसू छलकने लगे थे. पर लड़का अभी बोल ही रहा था.
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वो कह रहा था की मै पापा से कहूँगा की वो माँ को कहे की कुछ और तक दिन भगवान के पास न जाये. ताकि मै कुछ और पैसे जमा कर लूँ और ये गुडिया ले कर अपनी बहिन के लिए भेज दू. फिर उसने अपनी एक फोटो जेब से निकली इस फोटो में वो हँसता हुआ बहुत सुन्दर दिख रहा था.
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फोटो दिखाकर वो बोला ये फोटो भी मै अपनी माँ को दे दूंगा, ताकि वो इसे भी मेरी बहिन को दे ताकि वो हमेशा मुझे याद रख सके…………. मै जानता हु की मेरी माँ इतनी जल्दी मुझे छोड़ कर मेरी बहिन से मिलने नहीं जाएगी. लेकिन पापा कहते है की वो 2 -1 दिन में चली जाएगी.
उस आदमी ने झट से अपनी जेब से पर्स निकला और उसमे से एक 100 रुपए का नोट निकल कर कहा……….. लाओ अपने पैसे दो मै दुकानदार से कहता हु शायद वो इतने पैसे में ही दे दे. और उसने उस लड़के के सामने रुपये गिनने का अभिनय किया और बोला…….. अरे तुम्हारे पास तो उस गुडिया की कीमत से अधिक पैसे है. उस लड़के ने आकाश की और देख कर कहा भगवान तेरा धन्यवाद….
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अब वो लड़का उस आदमी से बोला कल रात को मैंने भगवान से कहा था की हे भगवान मुझे इतने पैसे दे देना की मै वो गुडिया ले सकू. वैसे मै एक सफ़ेद गुलाब भी लेना चाहता था किन्तु भगवान से ज्यादा मांगना मुझे ठीक नहीं लगा. पर उसने मुझे खुद ही इतना दे दिया की मै गुडिया और गुलाब दोनों ले सकता हु. मेरी माँ को सफ़ेद गुलाब बहुत पसंद है.
.
उस आदमी की आँखों से आंसू नीचे गिरने लगे. फिर उसने उन्हें संभलते हुए उस लड़के से कहा ठीक है बच्चे अपना ख्याल रखना. और वो वहा से चला गया. रस्ते भर उस आदमी के दिमाग मै वो लड़का छाया रहा. फिर अचानक उसे 2 दिन पहले अख़बार मै छपी खबर याद आयी जिस में एक हादसा छपा था की किसी युवक ने शराब के नशे में एक दूसरी गाड़ी को टक्कर मार दी.
गाड़ी में सवार एक लडकी की मौके पर ही मौत हो गयी और महिला गंभीर रूप से घायल थी. अब उसके मन में सवाल आया कही ये उस लड़के की माँ और बहिन ही तो नहीं थे.

अगले दिन अख़बार में खबर आयी की उस महिला की भी मौत हो गयी है. वो आदमी उस महिला के घर सफ़ेद गुलाब के फूल ले कर गया. उस महिला की लाश आँगन में रखी थी. उसकी छाती पर वो सुन्दर सी गुडिया थी जो उस लड़के ने ली थी और उस महिला के एक हाथ में उस लड़के की वो फोटो थी और दुसरे में वो सफ़ेद गुलाब का फूल था.
.
वो आदमी रोता हुआ बाहर निकला. उसके मन मै एक ही बात थी एक शराब के नशे मै चूर एक युवक के कारन एक छोटा सा बच्चा अपनी माँ और बहिन से दूर हो गया जिन्हें वो बहुत प्यार करता था.
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इस कहानी को पढ़कर और इस समय लिखते हुए भी मेरे आँखों मै भी पानी है. और शायद आपकी आँखों में भी आ जाये मगर उस पानी को आँशु मत समझ लेना. वो पानी बेशक नमकीन हो सकता है जैसे आँशु होते है. पर वो आँशु नहीं होंगे.
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अगर ये कहानी पढने के बाद आपकी आँखों में आँशु आते है जो आपको बदलने को मजबूर कर दे तो ही उनको आँशु मानना नहीं तो वो पानी ही होगा.
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और अगर आपकी आँखों में वास्तव में आँशु है पानी नहीं तो प्रण करे की आजके बाद कभी न तो शराब पी कर गाड़ी चलाएंगे, न कानो में एयर फ़ोन लगा कर गाने सुनते हुए गाडी मोटर साइकिल या कोई वाहन चलाएंगे न गाड़ी चलते समय फ़ोन पे बात करेंगे ना ही कभी तेज़ रफ़्तार में गाड़ी चलाएंगे ………



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95 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

    Piyush Kumar Pant के द्वारा
    May 29, 2011

    मनोज जी अगर आप ये कहना चाह रहे हैं की ये रचना आपकी अपनी है ….. तो भी आपके लिंक मे गड़बड़ी है…. आपका लिंक अक्टुबर माह का है जबकि मेरी ये रचना प्रथम बार अगस्त 2010 मे प्रकाशित हो चुकी थी…. प्रथम टिप्पणी ही 14 अगस्त की है……. तो इस बात को प्रेम से स्वीकार करने की जगह आपका इस तरह से प्रतिकृया देना अनुचित है…..

दीपक पाण्डेय के द्वारा
March 11, 2011

पियूष जी, काफी दिनों के बाद आपको मंच पर पाया . और वो भी पुराणी पोस्ट के साथ. वैसे यह कहानी बहुत ही मार्मिक और दर्दनाक है . उमीद करते है अभी आप और कुछ अच्छे लेख और कहानिया बाटेंगे.

khalid.Bareilly के द्वारा
October 12, 2010

मेरी तड़पन मेरे दिल से , यारो अब तुम मत पूछो । जहाँ ले चली राहेँ मुझको , जाने दो तुम मत रोको।। पोछो मत तुम मेरे आँसू , इनको अब बह जाने दो । देखेगा जब कोई इनको , अपनी व्यथा सुनाने दो।।

raman jit singh के द्वारा
October 11, 2010

पंत साहेब, बहुत अच्छा व सिखाने वाला आलेख। जाने-अनजाने हम सभी कभी-कभी ऐसा करते हैं। सजग रहें तो बात बन जाए।

    October 29, 2010

    रमन जीत सिंह साहब…… कुछ बातें समझाना ही मेरा उद्देश्य था….. और लोग सजग हो जाये तो ये परिस्थिति कभी पैदा ही न हो………… प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………..

jai के द्वारा
October 11, 2010

बहुत अच्छी ……………….

rddixit के द्वारा
October 4, 2010

A lesson for those who drive vehicles after consuming liquor. They must change their habits. Drink at home.

    October 29, 2010

    नहीं दीक्षित जी………. कई बार बिना पिए भी लोग ऐसा कर जाते हैं………… यहाँ कई बार सोलह सत्रह साल के लड़के भी ऐसा ही कुछ कर चुके है……….. जिसने कई घरों में मातम का माहौल बना दिया……….

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
October 3, 2010

प्रिया पियूष जी, बहुत अच्‍छी एवं मार्मिक कहानी है, वाकई में भीगी आंखों से ही यह प्रतिक्रिया दे रहा हूं। और लोगों को भी ऐसा न करने के लिए सलाह दूंगा । http://deepakjoshi63.jagranjunction.com

    October 29, 2010

    आदरणीय दीपक जी …………आप जैसे लोगों की सलाह बेहतरीन तरीके से असर करेगी………… और शायद बदलाव भी हों………… प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………..

roshni के द्वारा
October 1, 2010

पन्त जी क्या कहे कहानी के बारे में अपने तो रुला दिया……..

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    October 1, 2010

    केवल रोने भर से काम नहीं होगा……… इस सन्देश को आप युवाओं तक फैलाएं की उनकी गलती किसी को कितना दुखी कर सकती है……. प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया …………

kanchan के द्वारा
October 1, 2010

इस मंच पर आने के बाद पहली बार आपको पढा, संवेदनशील लेख लिखने के लिए बधाई। वाकई, जो एक बार इस लेख को पढ लेगा वह इसे अपने लिये भी बतौर सीख हमेशा याद ाखेगा।

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    October 1, 2010

    कंचन जी …… आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…………… और मैं यही चाहता हूँ की लोग इन छोटी छोटी बातों से कुछ सीख लें……….

chaatak के द्वारा
September 30, 2010

संवेदनाओं को झकझोरने वाली कहानी मंच पर लाकर आपने कुछ लोगों को तो जरूर आत्ममंथन का अवसर प्रदान किया है आशा है कि वे इससे कुछ सबक लें और फिर किसी मासूम को अपनी माँ के हाथों अपनी बहन के लिए इस तरह गुडिया और गुलाब न भेजने पड़े| इससे ज्यादा शायद लिखने की हिम्मत मुझमे नहीं | कहानी को पढ़ते हुए लगा मैं अपनी सारी ऊर्जा खो चूका हूँ| नैतिकता पर चोट करती कहानी के लिए आपको बधाई! (इतना दर्द मत लिखा करो भाई, तलवारों और बंदूकों का सामना करना बहुत आसान है लेकिन एक बच्चे की इन बातों को पढ़ पाना भी बहुत मुश्किल|)

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    October 1, 2010

    चातक भाई साहब ………. यही मेरा प्रयास है की लोग सबक लें और फिर किसी मासूम को अपनी माँ के हाथों अपनी बहन के लिए इस तरह गुडिया और गुलाब न भेजने पड़े| और जैसा आपने कहा है की एक बच्चे की इन बातों को पढ़ पाना भी बहुत मुश्किल है | तो इस पर ये ही कहूँगा की जितना आपके लिए ये पढना मुश्किल है उस से कहीं ज्यादा मेरा इसको लिखना था….. पर हम दोनों से कहीं ज्यादा उस बच्चे का हाल रहा होगा……. या उस आदमी का हाल रहा होगा जो उस बच्चे से मिला……… आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……………

rita singh 'sarjana' के द्वारा
September 30, 2010

पियूष जी , हमेशा की तरह अच्छी कहानी l बधाई l

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    October 1, 2010

    रीता जी ……… आपकी प्रतिक्रिया के लिए फिर से शुक्रिया……………

Ramesh bajpai के द्वारा
September 30, 2010

पियूष जी बहुत ही मार्मिक कहानी . काश इस से सबक लेकर लोग  कुछ सीख ले

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    October 1, 2010

    आदरणीय बाजपाई जी…….. मेरा उद्देश्य यही है…………. की इस से कुछ सबक लोग लें……

kmmishra के द्वारा
September 30, 2010

पंत जी बेहद मार्मिक कहानी जो कहीं अंदर तक भेदती चली गयी और उसके साथ ही आपका वह संदेश भी पहुचा गया । निश्चित ही बहुतों पर इसका असर पड़ेगा । आभार ।

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    October 1, 2010

    मिश्र जी …….. इस पूरी कहानी के पीछे यही उद्देश्य था की इसका कुछ आसार हो…………… आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……………

Dharmesh Tiwari के द्वारा
September 30, 2010

नमस्कार पियूष जी,आदरनीय शाही जी के अकाट्य विचार से मै भी सहमत हूँ उन्होंने बिलकुल सही ही कहा है की ये वाली प्रस्तुती पहले वाली से ज्यादा मार्मिक है,धन्यवाद

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    October 1, 2010

    तिवारी जी……….. कुछ और कहानियां है जो मैं दिमाग में हैं पर उनको लिखने का साहस नहीं कर पा रहा हूँ……….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……………

आर.एन. शाही के द्वारा
September 30, 2010

पियूष जी यह आपकी पूर्व वाली मार्मिक कथा से भी मार्मिक है … बधाई ।

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    October 1, 2010

    आदरणीय शाही जी……… वास्तव में मैं इस कहानी को पूर्व में भी पोस्ट कर चूका था……… और इस बीच कुछ समय के लिए मैं बहुत व्यस्त हूँ….. तो मैंने अपनी कुछ पुरानी कहानियां दुबारा पोस्ट की है……. और जहाँ तक इसके मार्मिक होने की बात ये ………. जब मैंने ये कहानी पहली बार पोस्ट की थी तो इसको टाइप करते हुए मुझे आठ दस दिन लगे…….. और ये कहानी मैंने आज तक किसी को सुनाई नहीं है………. क्योकि मैं इसको पढ़ते पढ़ते ही भावुक हो जाता हूँ तो सुनाने में तो भावनाएं प्रकट होने का डर रहता है……….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……………

NIKHIL PANDEY के द्वारा
September 30, 2010

मार्मिक कथा है … आजकल रफ़्तार में हम सबकुछ भूल चुके है पियूष जी तो इंसानी जिंदगी और भावनाओ के लिए रुकने का समय ही नहीं मिलता इसलिए रफ़्तार में सबकुछ रौंदते चले जा रहे है ..

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    October 1, 2010

    वास्तव में हमें कोई हक नहीं है की अपनी जल्दी में हम किसी की ज़िन्दगी के साथ खिलवाड़ करें…………… आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……………

nishamittal के द्वारा
September 30, 2010

आकी इतनी मार्मिक,शिक्षाप्रद प्रस्तुति पर प्रथम प्रतिक्रिया देकर बहुत अच्छा लग रहा है.बच्चे कितने निष्पाप,निर्मल होते हैं और बड़े होते होते इतने विकार उसमें समाहित हो जाते हैं,निश्चित रूप से समाज और वातावरण इसके लिए दोषी है.काश!हम सुधर पाते.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    October 1, 2010

    आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……………

samta gupta kota के द्वारा
August 27, 2010

पन्त साहब,आपकी कहानी पढ़ी,मार्मिक लगी,लेकिन उस बच्चे की बहन और माँ छिनने का क्या कारन है ये भी आपने सोचा होगा,यह है हमारे देश का लचर कानून और कानून लागू करने के तरीके ,जो शक्ल और हैसियत देख कर न्याय करता है,इसी के कारण प्रतिहिंसा को भी बढ़ावा मिलता है,देश के कई हिस्सों खासकर बिहार और उत्तर-प्रदेश में भीड़ इसीलिए न्याय करती है कि उसे पुलिस [न्याय लागू करनेवाले] और न्याय-पालिका पर भरोसा नहीं है,

    Piyush Pant के द्वारा
    August 27, 2010

    समता जी , जैसा की आपने कहा है की …………भीड़ इसीलिए न्याय करती है कि उसे पुलिस [न्याय लागू करनेवाले] और न्याय-पालिका पर भरोसा नहीं है,……….. पर क्या भीड़ भी कभी न्याय कर सकती है………. भीड़ हमेशा हत्या करती है………. अब इस कहानी को कुछ और तरीके से पढ़ें की …… ये लड़के की माँ गाड़ी चला रही थी…… और अचानक ब्रेक फेल हो गए और एक आदमी को छूट लग गयी …………. और क्रुद्ध भीड़ ने उस गाड़ी को आग लगा दी पत्थर मार मार कर उसमे स्वर लोगों को मार दिया………………… हमारा कानून कमजोर नहीं है बस हम चाहते है की वो हमारे अनुसार चले…………. अगर मेरे भाई की शादी है तो D.J. बजने की अनुमति रात १२ बजे तक हो और दुसरे की हो तो रात 10 के बाद बंद…………. क्यों…………… आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद……….

Amit kr Gupta के द्वारा
August 26, 2010

पियूष जी नमस्कार ,पहली बार आपका लेख पढ़ा. निसंदेह अच्छी रचना .आगे भी लिखते रहे. मैंने कुछ ब्लॉग लिखे हैं यदि कभी फुर्सत मिले तो पढ़ कर अपने शिकायतों और सुझाव से मुझे अवगत करावे. http://www.amitkrgupta.jagranjunction.com

    Piyush Pant के द्वारा
    August 26, 2010

    अमित जी आपकी प्रतिक्रिया पढ़ कर अच्छा लगा………. उम्मीद है ऐसे ही अपनी राय देते रहेंगे….. धन्यवाद…..

brijdangayach के द्वारा
August 22, 2010

yeh kahani aapne nahi likhi ya kisi ke saath hua hai baat bahut marmik hai bahut se log gaadi chalteyCAR,MOTORCYCLE,heavy vichles)ho paidal chalney wale inssan ko bhul jaatey hain aur koi unki gaadi ke nichey ke aajaye unhey koi fark nahi kaun kin halat meie unkey dawara accident ka shikar ho jata hai woh log pakdey jaaney gaadiyon ki tankinki karan accident hona bacha kar bachna nikltey hain kanoon bhi unki iss bajahy ko mannta har per swal yeh hai ki kaisey inko akal aaye abhi kai badey filmistar bade gharon ke ladke/ladkiyan accident kardeytey hain aur unlogon ke maa-baap apne bachhon ko bachney lagtey hain accident meie marney waley aur ghyal ka kohi dookh unjholi meie nahi afoss karna bhi unhey aisey lageyga ki unohney koi gunaha kar diya aaj kal ke bachey kya bade kya vichles chaleytey waqt yeh nahin chotey ki ghar per unka koi intezar kar raha hai unki tej gati se gaadichalney aur per batth kar mobile se baateiney karney ka alg andaz hai koi samjha to kaisey bahut se ladke/ldkiyon ko khuleaam dekh saktey kaano meie ganney sunn rahey hain ya kisi se baat kar rahe hon unke upper koi fark nahin chhaye sadak paar kartey waqt accident bhaley ho jaye, per jab kisi garib ka accident ho jaye tab vastav meie dil ropadta hai per majboori hai kanoon ke pachodon meie kyun padajaye ab woh zamana nahi kr bhala ho bhala, bas haathpariono se jo bhala ho kardo uss baat ke andar jayada mat ghuso manvta ka nata matt jodo ,aakhir meie iss baat ka yehi nicod hai samjha jaya ja sakta varna jaya kahana bhisis ke aagey bin bajana hai bahut news iss prakar ki padta hoon aise dardnak dekhta bhi hoon aankho ke aansu nikltey hain apne hi rumal se uchh kar mann shant karna padata ki bhagwan vechiles chaleywale ko akal dey byddhi dey aur yeh kisi dhook jan payein itna inko dil dey

    rakesh के द्वारा
    August 22, 2010

    मैं brijdangayach जी की बात से सहमत हूँ. ये लोग जो बड़े घर के होते हैं वो पैसे के जोर पर निकल जाते हैं और फिर किसी और को मर देते हैं. क्योकि इन को पता है की इनके खिलाफ कोई कुछ नहीं कर सकता है.

    Piyush Pant के द्वारा
    August 22, 2010

    आपके बात मेरे कुछ पूरी तरह से समझ में नहीं आई है……. मैं आपकी इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ की ऐसा करने वाले लोग अक्सर बच कर निकल जाते हैं……… पर इसका सबसे बड़ा कारन ये है की हम मौन हैं ….. हम उस पीड़ित परिवार के साथ मिलकर उन लोगों के खिलाफ कुछ नहीं करते जो किसी को मौत के घाट उतर कर ऐसे चले जाते है…… जैसे कुछ नहीं हुआ हो…………

rinku के द्वारा
August 21, 2010

पियुस जी राज जी का सवाल बिलकुल सही लगता है. क्या इसका कोई हल है.

    Piyush Pant के द्वारा
    August 22, 2010

    जी हाँ……… सबसे पहले हमे अपने घर के बच्चों को बाइक चलने के तरीके बताने होंगे……. दूसरा यदि आपको पता है की वो स्पीड पर काबू नहीं करता है तो आपको उससे बाइक वापस लेने होगी……… हम को उस पीड़ित परिवार के साथ मिलकर उन लोगों के खिलाफ कुछ करना होगा जो किसी को मौत के घाट उतर कर ऐसे चले जाते है…… जैसे कुछ नहीं हुआ हो………… हमे नेताओं को ये बताना होगा की भले ये कितने बड़े लोगों के बच्चे क्यों न हों पर इनको पूरी सजा देनी होगी नहीं तो हम उन नेताओं को ये सजा देंगें की चुनावो में उनकी जमानतें भी नहीं बचने देंगे………….

Raj के द्वारा
August 21, 2010

पियूष जी क्या इन हालातों से बचने के लिए आपके पास कोई सुझाव है. क्योकि बिना सुझावों के ये केवल एक खोखली कहानी ही मानी जाएगी.

    Piyush Pant के द्वारा
    August 22, 2010

    जी हाँ……… आप मेरे द्वारा रिंकू जी को दिए उत्तर को पढ़ें ………….

Kaushal के द्वारा
August 21, 2010

आँखों से आंसू आ गए इसे पढ़ कर. आगे से किसी ऐसे आदमी के साथ कही नहीं जाऊंगा जो गाड़ी को तेज़ी से चलता हो.

    Piyush Pant के द्वारा
    August 22, 2010

    ये करना ही होगा…………. नहीं तो ऐसे हर दुर्घटना के लिए हम भी उतने ही जिम्मेदार होंगे………

Adnan के द्वारा
August 21, 2010

बहुत सलीके से पेश किया हे एक गंभीर हालत को.

    Piyush Pant के द्वारा
    August 22, 2010

    पर इस को जीवन में उतारना जरूरी हैं……….

Kailash के द्वारा
August 21, 2010

सुन्दर लेख. मार्मिक घटना का वर्णन . बधाई.

    Piyush Pant के द्वारा
    August 22, 2010

    धन्यवाद……………… उम्मीद है आप इसको जीवन में उतार लेंगे……

Harish Chandra के द्वारा
August 19, 2010

क्या ये कहानी आपने खुद लिखी है या ये किसी की आप बीती है हलाकि इस से कोई फर्क नहीं पड़ता पर जानना चाहता था. की अगर ये सत्य है तो उस आदमी की क्या दशा होगी जो वह खड़ा था.

    Piyush Pant के द्वारा
    August 20, 2010

    क्या इससे कोई फर्क पड़ता है….. वैसे मैंने ये कहानी नहीं लिखी…… ये मुझे किसी ने सुनाई और ये मुझे छू गयी ……….. मैंने कई लोगो को ये कहानी सुनाई पर किसी ने पूर्व में नहीं सुनी थी.. फिर मुझे लगा शायद ब्लॉग में ये लिखने से ये ज्यादा बेहतर तरीके से फ़ैल सकती है……… इसी लिए मैं निवेदन करता हूँ की आप इसे अपने सभी जानने वालो को जरूर सुनाएँ… ताकि वो लोग कोई ऐसे गलती न करे जिससे किसी आदमी को उस बच्चे का सामना करना पड़े…………

hallabol के द्वारा
August 19, 2010

दोस्त हम लोग भी इसी तरह सामाजिक मुद्दों को लोगों के बीच लेजाने का काम करते है. अब इस कहानी के माध्यम से हम बेलगाम बाइकर्स के खिलाफ इस कहानी को लोगों तक पहुचंगे.

    Piyush Pant के द्वारा
    August 20, 2010

    अगर आप बे लगाम बाइकर्स को कुछ समझ कर ऐसे हादसों को कम करसकते है…….. तो जरूर करने की कृपा करे…….

faheem के द्वारा
August 19, 2010

पियूष भाईजान, दिल खुश कर दिया इस कहानी ने.

    Piyush Pant के द्वारा
    August 20, 2010

    बहुत शुक्रिया फहीम भाई………

Dheeraj के द्वारा
August 19, 2010

भैया जी ये लेख अपने आप में कई सन्देश लाया है. आगे भी ऐसा लिखे .

    Piyush Pant के द्वारा
    August 20, 2010

    मेरी और से पूरी कोशिश रहेगी………… धन्यवाद

Dinesh के द्वारा
August 19, 2010

उत्तम लेख. हार्दिक बधाई.

    Piyush Pant के द्वारा
    August 20, 2010

    धन्यवाद दिनेश भाई……….

Ali के द्वारा
August 19, 2010

आपको आपके इस बेहतर कोशिश के लिए बधाई.

    Piyush Pant के द्वारा
    August 20, 2010

    धन्यवाद अली भाई……

Ajay Rathore के द्वारा
August 19, 2010

पियूष जी, आपने इस कहानी के माध्यम से जो सन्देश दिया है वो वास्तव में बेमिसाल है……….

    Piyush Pant के द्वारा
    August 20, 2010

    राठौर जी ये प्रयास तभी बेमिसाल होगा जब इसका कुछ असर लोगो पर पड़े…………

Pradeep के द्वारा
August 19, 2010

कोई चाहे कुछ भी कहे पर इस कहानी को आपको मानना ही पड़ेगा. क्योकि ये किसी के साथ नहीं होना चाहिए. कानून को भी कुछ करना होगा.

    Piyush Pant के द्वारा
    August 19, 2010

    प्रदीप भाई ये कहानी किसी पर थोपी नहीं जा रही है ! ये इंसान का विवेक है की वो इसको इस तरह से लेता हैं……….. समर्थन के लिए धन्यवाद………….

Gaurav के द्वारा
August 19, 2010

ये भूपेश जी का गलत आकलन है.. किसी के रोमांच से किसी की जान जाती हो तो वो रोमांच नहीं हत्या है….. इस सुंदर लेख के लिए पियूष जी आप बधाई व प्रसंसा के पात्र हैं…

    Piyush Pant के द्वारा
    August 19, 2010

    आपके समर्थन और प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद…………

bhupesh Chandra के द्वारा
August 19, 2010

पियूष जी जिसे आप इतने जोश में कह रहे हैं की ये लड़कों की लापरवाही है और उनको इस से बचना चाहिए.. तो ये जान ले ये रोमांच है जिसे लड़के इस उम्र में नहीं करेंगे तो फिर कब करेंगे………..

    Piyush Pant के द्वारा
    August 19, 2010

    भूपेश जी जिसे आप रोमांच कह रहे हैं उसको में हत्या कहता हूँ….. यदि युवाओं को रोमांच चाहिए तो उनको सेना में जाना चाहिए……. वहां रोमांच के साथ देश भक्ति हो जाएगी…. ये रोमांच का नहीं प्रदर्शन का खेल है…… और उससे बचना होगा…………….

    Piyush Pant के द्वारा
    August 19, 2010

    भूपेश जी एक और बात में आपसे कहना चाहता हूँ..की कोई भी चीज़ हमें तभी तक अच्छी लगती है जब तक उस से हमारा नुक्सान न हो……….. ये लड़के जिनका आप समर्थन कर रहे हैं ये कल आपको या आपके परिवार को भी उस स्थान पर खड़ा कर सकते हैं जहाँ पर वो लड़का खड़ा था……..

    Rakesh के द्वारा
    August 22, 2010

    भूपेश जी आपका कथन बिलकुल गलत है. आप जैसे लोग रोमांच के लिए दूसरों की जान ले लेते है.

Pawan Pant के द्वारा
August 19, 2010

पियूष पन्त जी नितिन जोशी की अपील पढ़ कर मैंने ये कहानी को पढ़ा .अद्भुद है ये. शायद कुछ असर लोगों पे करे..

    Piyush Pant के द्वारा
    August 19, 2010

    नितिन जोशी जी शायद उस आदमी की हालत समझ गए हैं जो उस लड़के के सामने खड़ा था………. तारीफ़ के लिए शुक्रिया………… न जाने ये कहानी किस की है और कब से चल रही है………………….. बस जरूरत है तो इसे सब तक पहुचने की…………………….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………………..

Nitin Joshi के द्वारा
August 19, 2010

सॉरी कुछ कहना भूल गया. मेरे सभी ब्लोगर्स से अपील है की इस कहानी को पढ़कर न केवल इस पर अपनी राय दे बल्कि इसको अपने छोटे भाई बहनों को भी सुनाये. सुक्रिया.

    Piyush Pant के द्वारा
    August 19, 2010

    नितिन जोशी जी आपकी राय से मैं पूरी तरह से सहमत हूँ सभी लोगों को ये कहानी अपने भाई बहनों को सुनानी चाहिए……….

Nitin Joshi के द्वारा
August 19, 2010

दोस्त इस कहानी को मैं मानता हुकी हर किसी को पढना चाहिए. इसमें उस लड़के का हर एक वाकया दिल को चुभता है. उसके लिए लिखे शब्दों के लिए बधाई.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    October 1, 2010

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……………

Neha के द्वारा
August 19, 2010

एक बहुत बड़ी लापरवाही को बहुत छोटी कहानी में समटने के लिए आप बधाई के हकदार हैं.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    October 1, 2010

    नेहा जी ………. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…………

Neha के द्वारा
August 19, 2010

बहुत सुन्दर कहानी है ये पियूष जी. दिल को अन्दर तक छु गयी आपकी कहानी.

Rashid के द्वारा
August 17, 2010

पियूष जी यह कहानी नहीं एक सीख है ,, राशिद http://rashid.jagranjunction.com

    Piyush Pant के द्वारा
    August 17, 2010

    ठीक कहा रशीद भाई क्योकि अक्सर कहानियाँ हम सुनकर भूल जाते है…… उम्मीद है हम सब इसका सबक याद रखेंगे ……… ताकि हमारे कारन किसी आदमी को उस जैसे किसी लड़के का सामना न करना पड़े…..

dinesharya के द्वारा
August 16, 2010

वास्तव में काफी मार्मिक है ये आपकी कहानी………

    Piyush Pant के द्वारा
    August 17, 2010

    उम्मीद है इस कहानी का मर्म आपने अपने जीवन में भी उतार लिया होगा….. ये कहानी कब को सुनाएँ ताकि लोग इस गलती को करने से बचें ……..

Sanjeev Kumar के द्वारा
August 15, 2010

पियूष जी काफी प्रेरक और आँखों को खोलने वाली कहानी है ये कहानी मगर अजय जी की तरह में भी भगवान् से प्रार्थना करूँगा की किसी को इन परिस्थितियों से दो चार न होना पड़े…………… इस आँखों को खोलने वाली कहानी के लिए शुक्रिया………..

    Piyush के द्वारा
    August 15, 2010

    वास्तव में हम लोग ही हर चीज़ की जल्दी करते है और तब ही ऐसी घटनाओं का जन्म होता है. सरकार को भी इस और ध्यान देना होगा की लाइसेंस जारी होने से पहले ड्राइविंग टेस्ट हो…… और हमको भी ईमानदारी दिखानी होगी की हम सारे नियमो को जाने बिना गाड़ी न चलायें…….. आपकी प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद ………………….

Rakesh Chandra के द्वारा
August 15, 2010

पियूष जी वास्तव में इस कहानी की हर रोज पृष्ठभूमि तैयार होती रहती है जब हम अपने छोटो को गाड़ियाँ चलने को दे देते है. हम सोचते ही नहीं की किसी घर आपकी लिखी कहानी घट सकती है.

    Pawan Pant के द्वारा
    August 15, 2010

    ये कहानी ये एक हादसा है, जो आपको याद दिलाने के लिए है की घर से बाहर भी आपकी कोई जिम्मेदारियां हैं. और आपकी थोड़ी सी भूल किसी के लिए कितनी बड़ी हो सकते है… वो छोटा सा लड़का कभी आपकी वजह से भी जन्म ले सकता है………. इसलिए अपनी और से सावधानी बरतें…………

    Piyush के द्वारा
    August 15, 2010

    पवन भाई अगर आप इसे कहानी समझकर पढेंगे तो केवल पढ़ कर चल देंगे. इसे महसूस करने की कोशिश करे. उस आदमी की नज़र से पढ़े जिसे वो लड़का मिला था…….. तो ही आपका पढ़ना सार्थक होगा…………

ajay verma के द्वारा
August 14, 2010

पियूष जी वास्तव में आपकी कहानी ने आखों में आंसू भर दिए.. मैं भगवान् से प्रार्थना करूँगा की किसी को इन परिस्थितियों से दो चार न होना पड़े…………… इस भावुक कहानी के लिए शुक्रिया………..

    Piyush के द्वारा
    August 15, 2010

    अजय जी इस कहानी को पढ़ कर आपकी आँखों में अगर आंसू थे तो ये बहुत बड़ी बात है पर ध्यान दीजियेगा कही वो पानी ही न हो जैसा मैंने कहानी में अंतर समझाया है…………

jalal के द्वारा
August 14, 2010

बड़ी साफ दिल से आपने एक लापरवाही से जन्में कितने दुखों को बतलाया है. वैसे भी हमारे देश में दुर्घटनाओं से मरनेवालों के संख्या दुसरे देशों से कहीं जयादा है. लेकिन मरनेवाले ही सिर्फ नहीं मरते बल्कि और भी बहुत सारी चीज़ें लूट जाती हैं जो भले ही बाहर से दिखाई न दे.

    Piyush के द्वारा
    August 14, 2010

    प्रिय मित्र जलाल जी, वास्तव में हमारे देश में दुर्घटनाओं को जन्म हम ही देते है. वो हम ही है जो कम उम्र में बाइक्स चलने लगते है और अपने छोटो को भी दे देते है. और जो हमारे लिए खतरनाक चीज़ है वो उनके लिए रोमांच है. और उस रोमांच का परिणाम किसी और को (जैसे इस कहानी में उस लड़के को भुगतना पड़ा) पड़ता है…


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