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बोझ लगते ये बूढ़े....

Posted On: 25 Feb, 2011 Others में

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*-*-*-*-*-*- बुढ़ापा -*-*-*-*-*-
—————————————

बुढ़ापा किसी भी इंसान की सबसे दुखद अवस्था है ……… ये हर इंसान के जीवन में आता ही है…. और मेरी प्रभु से प्रार्थना भी है की ये हर किसी के जीवन में आये अर्थात कोई भी व्यक्ति बुढ़ापा देखे बिना इस दुनिया से विदा न हो………
हर नई पीढ़ी ने अपने समय में बूढों को कोसा ही है………… नयी पीढ़ी को हमेशा ये बूढ़े लोगों से शिकायत रही है………….. उनका मानना है की ये विकास व नए विचारों के क्रियान्वयन में बाधक बनते हैं……… इनका बार बार टोकना व हर विषय में अपनी राय प्रस्तुत करना युवाओं को खलता है………..
वो भूल जाते है की वो इस आधुनिक युग में बहुत देर से आये, लेकिन ये बूढ़े, इन के सामने तो ये युग शुरू ही हुआ है………. तो जो शुरू से इस युग को देख रहा है वो कैसे इस से अलग है………….
हर नयी पीढ़ी इस बूढी पीढ़ी से छुटकारा चाहती है………… छुटकारा का अर्थ इनका मौन रहना……… हम अक्सर अपने बुजुर्गों से ये कहते है की आपका समय और था और ये समय कुछ और है………….

क्यों नहीं हम इन बूढों के बारे में सोचते है……………….
हम बिलकुल नहीं सोचते की ये बूढ़े भी कभी युवा थे…… और हम भी कभी बूढ़े होंगे……… और ये ही वो बूढ़े हैं जो अपने युवा कन्धों पे इस नए युग को लेकर आये जिस पर हम इतरातें हैं………. अपने समय के हालातों को इन्होने बदल कर हमारे सामने इक नया दौर पेश किया और हम अब इन पर झुझलातें है. अब हम कहते है की आपका समय और था और हमारा समय कुछ और है…………………….
हम ये अक्सर कहतें हैं की ये आपके समय वालो का ही करा धरा है की देश को भ्रष्टाचार ने दीमग की तरह खोखला कर दिया है. ……. पर हम ये नहीं कहते के उस कागज़ कलम के दौर से आपने ही हमें सुचना प्रोद्योगिकी के इस अवसर से परिपूर्ण युग में पंहुचा दिया…….
न जाने उस दौर के कितने कवी, लेखक और विचारक अन्दर ही अन्दर ख़तम हो गए और उनके प्रयासों के कारण ही आज नयी पीढ़ी रोज ब्लॉग पर अपनी कविताएँ और विचार पोस्ट कर रही है……….

हम लोगो को उनसे आँख मिलाने में भी संकोच होना चाहिए……. की वो इस दौर में हमको अपनी राय दे रहें है और हम उनका अपमान कर रहे है………….. ये पूरी तरह ठीक है की आज उनके और हमारे बीच कोई तुलना हो ही नहीं सकती …………क्योकि वो उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहाँ वो शारीरिक रूप से हमसे तुलनात्मक रूप से कमजोर हो सकते हैं पर मानसिक रूप में वो हमसे कहीं आगे हो सकते हैं…………… बल्कि अगर ये कहा जाये की वे मानसिक तौर पर अक्सर आगे ही होते हैं……….. तो कोई अतिश्योक्ति नहीं है………

बुढ़ापे में अक्सर आदमी चिडचिडा हो जाता है, जैसे अक्सर बीमारी में हो जाता है….. इसका एक सीधा कारण ये है की बीमारी और बुढ़ापे में एक समानता है की दोनों अवस्थाओं में आदमी कमजोर हो जाता है और उसको अपने उन कामों के लिए जो उसके लिए बिलकुल साधारण हुआ करते थे. वे भी मुश्किल हो जाते है….

अपनी कमजोरी व दुसरे पर निर्भरता के चलते वो चिढ चिढ़े हो जाते है………. वो लोग जो जब छोटे छोटे थे और हर बात पर उसकी राय लिया करते थे… वो आज बड़े से बड़े पर फैसले लेने से पहले उसकी राय लेते नहीं हैं और यदि वो दे भी तो ये कह कर उसको ठुकरा देते हैं की ये आपके समय की बात नहीं है…… अब नया दौर है………….

इस तरह तिरस्कृत होकर बूढ़े अपनी इस अवस्था को कोसने लगते हैं…. वो अब एक प्रतीक बन कर रह गए……….. बूढ़े लोगो को बच्चों से विशेष लगाव रहता है……. क्योकि वो बिना तर्क किये उनकी राय मान लेते है……… उनकी उंगली पकड़ कर वो उस युग को भी पर कर जाते है जिस पर उसके माता- पिता चल रहे हैं……….

ये हमारा दुर्भाग्य है की हम बुजुर्गों के अनुभव और युवाओं के जोश का मिश्रण बनना नहीं जानते हैं. हो सकता है की इन पुराने लोगो की सभी बात सही न हों…….. मगर हम ये किसी कीमत पर नहीं कह सकते की ये पूरी तरह से गलत हैं…………………

तो सम्मान दे उन बुजुर्गों को जिन्होंने अपने आज में अपना सब कुछ झोंक कर हमें हमारा आज दिया है………………..

वर्ना मेरा एक लेख आगे की जली लकड़ी पीछे की और आती है……….. कुछ समझा सकती है………….

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28 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

chadndra kailash के द्वारा
May 25, 2011

सिंह साहब आपने जो अपनी ख्वाहिस बयां की वो इस ज़माने की समझ मैं न आयेगी , अपने समर्पण को जिस कदर बयां किया हैं उस से मेरे आंसू आने को बेताब हैं सब्द नैन हैं अहसास को बयां करने के लिया बस समर्पित होने को दिल करता हैं …………….

s.p.singh के द्वारा
April 22, 2011

फल नहीं दूंगा न सही, साया (छाँव) तो दूंगा तुझे मैं (पेड़) बूढ़ा ही सही, घर में लगा रहने दे मुझे फिर भी अगर नहीं मानता तू , इतना रहम करना मुझ पर जला लेना मेरी जड़ों को सर्दियों में आँगन में बैठ कर और करना भोजन मेरे तन से बने कुर्सी मेज पर

Rajkamal Sharma के द्वारा
March 20, 2011

पुज्यनीय पियूष जी ….. पैरीपैना ! लता दीदी की एक पैरौडी प्रस्तुत है :- तुम्हे और क्या दूँ मैं बधाई के “सिवाय” कि तुमको हमारी “नजर” लग जाए ….. इस राज्कम्लिया हरकत को सहन कर लीजियेगा कहीं गुस्से में डिलीट मत कर देना ….. होली कि पिचकारी भर -२ के सपरिवार शुभकामनाये बुरा मत मानो होली है , कागज कलम दवात से दोस्तों संग हमने खेली है बधाई व् धन्यवाद

दीपक पाण्डेय के द्वारा
March 11, 2011

पियूष जी, एक विचारणीय लेख.

nishamittal के द्वारा
September 25, 2010

वाह पीयूष जी,सच में सबको बूढा होना है,यदि हम बड़ी पीढी को यथोचित सम्मान देते हैं तभी आने वाली पीढी को शिक्षित,संस्कारित कर सकते हैं.अच्छी पोस्ट.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 25, 2010

    बिलकुल सही कहा आपने…………आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……..

div81 के द्वारा
September 25, 2010

मेरे पापा अकसर कहते है करेला का खाया बुजुर्ग का कहा हमेशा कड़वा लगता है मगर फल मीठा देता है और ये बात हम वक़्त रहते समझ नहीं पाते आच्छी पोस्ट पर बधाई

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 25, 2010

    अक्सर ये बातें हमें तब ही समझ आती हैं जब हम खुद इन हालातों का सामना करते हैं………… जहाँ हम बूढ़े हों और लोग हरारी बातों को पुरानी बात कहें…………..

Tufail A. Siddequi के द्वारा
September 25, 2010

अच्छी पोस्ट पर बधाई.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 25, 2010

    शुक्रिया Siddequi भाई……….

priyasingh के द्वारा
September 25, 2010

बिलकुल सही लिखा है आपने ये हर पीढ़ी के साथ होता आया है …… जो आज बुजुर्ग है वो जब जवान रहे होंगे तब वो भी अपने बुजुर्गो के साथ ऐसे ही रहे होंगे पर हाँ ये सच है की आज की पीढ़ी से मानवता ज्यादा ख़त्म होती जा रही है …….. ये सब अपने माता पिता से मिले संस्कारों और घर के वातावरण के कारण होता है उसका बहुत प्रभाव पड़ता है और अपने बडो के व्यहार को देखकर ही आजकल के बच्चे अपने बुजुर्गो के साथ पेश आते है………………. आपके लेख सब बहुत अच्छे होते है आप रोज़ लिख भी लेते है …….. इतने व्यस्त ज़िन्दगी में आपके लिखी लोककथाए पढ़ कर मन खुश हो जाता है…

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 25, 2010

    सही कहा आपने की ये सब चीज़े जैसे बड़ों का सम्मान करना पशुओं के प्रति हिंसा न करना ये सब बच्चा अपने घर से ही सीखता है……. वास्तव में मैं छुट्टी वाले दिनों में ही लिखता हूँ……… और उनको ही ड्राफ्ट में सेव कर लेता हूँ और बीच बीच में पोस्ट कर देता हूँ……………… आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…………..

abodhbaalak के द्वारा
September 25, 2010

पियूष जी, आपके बुजुर्गों के प्रति लेख ने दिल जीत लिया भाई, वास्तव में आपने जो लिखा है दिल को छू लेना वाला है, काश हम सब ये समझते की अगर हम में जो शक्ति है, उसके उर्जा सोत्र ये बूढ़े हैं जो हम में से किसी न किसी के माँ बाप है, और हमें भी एक दिन इनके जैसा ही होना है. बहुत बहुत बंधाई हो ऐसे सुन्दर लेख के लिए और व्यक्तिगत तौर पर मै आप के बड़ों के प्रति विचार से बहुत प्रभावित हुआ हूँ,ऐसे ही लिखते रहिये.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 25, 2010

    वास्तव में आप लोगों की प्रतिक्रिया व विचारों के आधार पर ही लेख का महत्व पता चलता है….. अभी कई लोग इस पर असहमत भी रहे…….. सहमत होने के लिए शुक्रिया नहीं कहूँगा………….. अपितु इन बूढों के प्रति सदभाव रखने के लिए शुक्रिया कहूँगा…………. शुक्रिया……………….

Ajay Pal के द्वारा
August 31, 2010

पियूष जी, बुजुर्गों के प्रति आपके नज़रिए ने मुझको प्रभावित किया है. वास्तव में ये लेख पूरी तरह प्रभाव छोड़ता है.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 25, 2010

    बस ये सोच लें की कभी आप भी उस पड़ाव पर पहुचेंगे तो फिर ये नजरिया खुद ब खुद आ जायेगा ….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………

Rakesh के द्वारा
August 28, 2010

क्या बात है. लिकिन ये लिख पर बूढों की क्या प्रतिक्रिया रही. और जवानों की क्या. बहुत नज़दीक से जान कर लिखा है. अति उत्तम.

    Piyush Pant के द्वारा
    August 29, 2010

    जिन आदरणीय बुजुर्गों के सम्मान करने पर ये पूरा लेख लिखा गया है…….. उसपर आपकी टिपण्णी केवल निराशा जगती है…………… हर जगह ये आवश्यक नहीं की ये आदरणीय बुजुर्ग कोई प्रतिक्रिया दें………… इन की राय जरूर हो सकती है……………… और इसके लिए आपको मुझसे पूछने की नहीं प्रतिक्रियों को पढने की जरूरत है………… शुक्रिया…………..

jalal के द्वारा
August 24, 2010

piyush ji aaj meine aapka yah lekh padha. aur badi hi kareeb se guzra ise dekhte hue. kal tak jo bachche han sunne par hoon kahte the ab wohi han sunkar bidak jate hain. jab maan baap bachchon ko palte hain poshte hain to unhen zara bhi ahsaas nahi rahta ki yeh kisi din aankh dikhayega. aaj boodhe maataa pitaa ke saath bachche aisa salook karte hain ki man baap sihar jaate hain, unhen yahan tak ahsaas kara dete hain apne harkaton se ki unke bachche hi unka ekmatra sahara hain, isliye chup rahen aur baat mane. aur aisa ahsaas dilane wale bachchon se main yahi kahoonga ki ek din tumhen bhi yahi din dekhna padega is liye abhi se sambhal jao. aap ke lekh ke liye shukriya

    Piyush Pant के द्वारा
    August 26, 2010

    जलाल जी , hamare पहाड़ों में एक कहावत प्रचलित है………. आगे की जली लकड़ी पीछे की और आती है…… यानि अगर आप अपने बड़े बूढों का सम्मान नहीं करेंगे तो आपके बच्चे आपको सम्मान नहीं देंगे……….. लेख को भाव से पढने के लिए शुक्रिया…………..

Dheeraj के द्वारा
August 24, 2010

इस उम्र में जैसा की आप फोटो में दिख रहे है. बूढों के प्रति आपकी सोच ने प्रभावित किया. वास्तव में ये सम्मान के हकदार है. त्रिस्कार के नहीं.

    Piyush Pant के द्वारा
    August 26, 2010

    धीरज भाई……..क्या किसी की सम्मान करने के लिए ये आवश्यक है की आप अपमानित हों .. तभी आप सम्मान का महत्व समझ समेंझे…….. नहीं ऐसा नहीं है…………….. प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………..

Pawan के द्वारा
August 21, 2010

पियुस जी मैं आपके इस लेख से पूरी तरह असहमत हूँ. बुदापे में सठियाना जैसे मुहावरे इन पर यूँ ही तो नहीं बने होंगे.

    Piyush Pant के द्वारा
    August 22, 2010

    शायद ये लेख आपकी समझ में आया ही नहीं………… आपकी आँखों में जवानी की वो पट्टी बंधी है जो आदमी को अँधा कर देती है और ये बूढ़े वास्तव में जब उस पट्टी को हटा कर वास्तविकता दिखने की कोशिश करते हैं तो उन पर बुदापे में सठियाना जैसे मुहावरे बनाने के अतिरिक्त कोइ अन्य उपाय नहीं रह जाता है……………….

आर.एन. शाही के द्वारा
August 20, 2010

पियूष आज आपके व्यक्तित्व का एक बिल्कुल विलक्षण स्वरूप आपकी लेखनी के माध्यम से देखने को मिला … साधुवाद । विचार वही अनुकरणीय है, जो हर पीढ़ी की भावनाओं को समझते हुए उनमें यथासम्भव सामन्जस्य का प्रयास करता हुआ दिखे ।

    Piyush Pant के द्वारा
    August 20, 2010

    शाही जी, इस लेख को पोस्ट करने से पहले में दुविधा में था की क्या ये पूरा हो गया है.. क्योकि ऑफिस से वापस आकर इतना समय नहीं होता की कुछ लिखा जाये… पर आपकी प्रतिक्रिया ने इस लेख पर से मेरे शक को दूर कर दिया है….. इस लेख में एक शेर डालना चाहता था जोकि दुष्यंत कुमार जी ने लिखा था…………. एक बूढ़ा आदमी है मुल्क़ में या यों कहो— इस अँधेरी कोठरी में एक रौशनदान है आपका बहुत धन्यवाद…………………

    आर.एन. शाही के द्वारा
    September 25, 2010

    आपने इसको शायद दोबारा पोस्ट किया है पियूष जी, बधाई ।

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 25, 2010

    परम आदरणीय शाही जी………… आपका कथन बिलकुल सही है…………. वास्तव में किसी ब्लागर मित्र जिसको मेरे कहानी पसंद आई पर वो उस तक पहुच नहीं पाया था ………का सुझाव आया की मैं उसको दुबारा पोस्ट करूँ और उसने तरीका भी बताया…….. पर जब मैंने अपने एक नए लेख पर उस तरीके को आजमाया तो वो हुआ ही नहीं……….. इस लिए मैंने इस लेख पर ये तरीका अपनाया और ये पोस्ट हो गया……….. और मुझे लगता है की बीच बीच में हमे अपने पुराने पोस्ट रिपीट करते रहने चाहिए…… ताकि यदि कोई किसी कारण नहीं पढ़ पाया तो वो पढ़ सके………..


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