परिवर्तन की ओर.......

बदलें खुद को....... और समाज को.......

117 Posts

24194 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 1372 postid : 914

परिभाषा सुख ओर दुख की..........

Posted On: 17 May, 2011 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

सुख ओर दुख………. जीवन ओर मृत्यु ……….. लगभग एक से ही युग्म है……… दोनों युग्म विलोम शब्दों से बने है………… सुख का विलोम दुख ओर जीवन का मृत्यु………. पर क्या दोनों युग्मों को ठीक ठीक परिभाषित किया जा सकता है……… लगता है की हाँ पर नहीं ये संभव नहीं है……….. सुख ओर दुख पर कुछ हद तक सटीक लेख लिखा जा सकता है…….. क्योकि लोगों के इस संदर्भ मे अपने अपने कुछ अनुभव हैं……… जिनको कलमबद्ध किया जा सकता है…….

-

पर जीवन ओर मृत्यु मे केवल जीवन के संदर्भ मे ही कुछ कहा जा सकता है……… मृत्यु एक सत्य है पर मृत्यु के बाद क्या होता है ये सब केवल अनुमान हैं…… क्यूंकी जो जान चूके वो वापस नहीं आते ओर बिना मारे इसको जाना नहीं केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है……….  ये कुछ उसी तरह है की दो लोग समुद्र के किनारे खड़े हो कर उसकी गहराई का आकलन कर रहे हों…………. ओर जब एक उसकी गहराई नापने को कूदा तो उस असीम सागर मे ही खो गया………. ओर बाहर खड़े दूसरे व्यक्ति ने अनुमान लगाया की एक आदमी डूब कर मर जाए सागर इतना गहरा तो है ही……..

सुख दुख पर मैंने काफी कुछ पढ़ा पर कुछ निजी अनुभवों के कारण मैं कभी उनसे पूर्णत: सहमत नहीं हुआ…………

-

क्या है सुख ओर क्या है दुख ……… यदि कभी इस बात पर गंभीरता से विचार किया जाए तो पता चले की वास्तव मे दुख जैसी कोई चीज़ है ही नहीं…….. ये केवल मानसिक अवस्था है……….. जो हमें किसी घटना को दुख के रूप मे प्रकट करती है…… संभवतः कोई इस बात को माने नहीं पर सोच कर देखें तो………… एक बार आप अपने सभी वर्तमान के दुखों की एक सूची बनाएँ……… ओर फिर उसको एक कोने मे रख दे……… अब आप अपने पुराने दुखों की सूची बनाए……. अब आज तुलना करें की क्या वो दुख दुख थे…………..

-

मैं इसे उदहारण की सहायता से समझता हूँ………

जब भी हम उदास हों तो अपने पुराने दिनो को याद कर आनंदित होते है…….. पर क्या उन पुराने दिनो मे हम आनंदित थे ? नहीं……… बचपन को हम भविष्य के लिए खतम कर देते है ओर जब बड़े हो जाते हैं तो बचपन को याद करते हैं………… ओर जब बुढ़ापा आ जाता है तो हम जवानी के दिनो को याद करते हैं………… अब अगर बचपन मे दुख था तो जवानी मे बचपन की याद क्यों आई………. ओर जब जवानी मे दुख था तो बुढ़ापे मे जवानी की याद क्यों आती है………

-

बचपन मे हम जल्दी बड़ा होने की सोचते है……….. हमें बच्चा होने पर दुख है…. मुह मे सिगरेट के अंदाज़ मे बच्चे पेन या कागज़ मोड कर बदते है … क्योकि उनको लगता है की शायद सिगरेट पीना ही बड़ा होना है…. तो कभी शीशे के सामने खड़े होकर दाड़ी बनाने का अभिनय……. और जब जवान हो गए तो  जवानी मे वापस बच्चा होने को तैयार हैं……….. क्योकि आगे भयानक बुढ़ापा है…….. ऐसे ही सारी उम्र बीत जाती है ओर हम कहते है की सुख मिला ही नहीं कभी………..

-

एक साधारण आदमी के लिए सुख पैसे मे गाड़ी मे ओर सम्मान ओर प्रतिष्ठा मे है…….. पर जिसके पास ये सब है क्या वो सुखी है………. सुख साधन मे नहीं होता है…….. सुख सोच मे होता है……… निर्धन दुखी है पेट के लिए……… ओर सम्पन्न भी दुखी है पेट के लिए…………. एक खाली पेट के लिए है तो दूसरा फैलते हुए विशाल पेट के लिए………… निर्धन वस्त्र न होने के कारण दुखी है ओर सम्पन्न लोगों की निशानी ही अल्पवस्त्र बन गए है……….. गाड़ी वाला रोज पैदल चल रहा है क्योकि डॉक्टर ने इलाज बताया है की पैदल चलो……….. ओर पैदल चलने वाला गाड़ियों को देख कर पैदल चलने मे दुखी हो रहा है………….

-

एक आदमी के पास 1 करोड़ रुपये थे……….. किन्तु व्यापार मे घाटा होने के कारण उसके पास मात्र 75 लाख रुपये बचे…………. वही दूसरी ओर एक आदमी के पास 70 लाख रुपये थे जो की उसको व्यापार मे हुए लाभ के बाद 75 लाख हो गए…….. अब जिसे हानी हुई वो दुखी है ओर जिसे लाभ हुआ वो सुखी ………. पैसा दोनों के पास बराबर ही है…….. फिर भी एक खुश है ओर एक दुखी…………. इसका यही अर्थ है की सुख उस 75 लाख मे नहीं है………..

-

कुछ समय पूर्व कौन बनेगा करोड़पति मे एक सज्जन एक करोड़ रुपए जीत गए……. किन्तु उन्होने 5 करोड़ का सवाल लिया ओर हार कर गए…….. उनको 5 करोड़ के स्थान पर मात्र 3 लाख 20 हज़ार से संतोष करना पड़ा……….. अब उनकी ये छोटी सी गलती उनके जीवन भर के दुख का कारण बन सकती है……..

अगर वो ये सोचे की उनकी एक गलती ने उनको 1 करोड़ रूपये जोकि वो जीत चुके थे पाने से रोक दिया……….. पर इसी का एक पहलू ये भी है की वो यूं भी सोच सकते हैं की वो खाली हाथ आए थे ओर कुछ ही घंटो मे वो 3 लाख रूपये जीत गए………. वो तो फिर भी लाभ मे ही गए…….. पर नहीं शायद उनको उस धन के आने का की खुशी नहीं होगी जितना उस धन के जाने का गम होगा……..

पर क्या अगर कोई आदमी रात सपने मे किसी राज्य का राजा बन जाए ओर सुबह जब नीद खुले तो वापस वही आम आदमी हो जाए तो क्या उसको कोई दुख होगा……………… तो ये भी एक सपने जैसा ही था……… की आप बातों ही बातों मे 1 करोड़ रुपया जीते ओर फिर हार गए……..

यूं ही हम भी कुछ लेकर आए नहीं ओर न ही कुछ लेकर जाना है……… तो किस लिए किसी भी तरह के दुख को संचित करें………. वो भी अर्थहीन दुख…….. आज जो दुख है कल वो महान मूर्खता लगेगी………

-

10वी मे फेल मेरा मित्र जहर खाने को तैयार था…….  उसके लिए वो उसके जीवन का सबसे बड़ा दुख था……. फिर उसने अगले वर्ष सामान्य अंको से परीक्षा उत्तीर्ण की ………. आज वो एक सरकारी विभाग मे अच्छे पद पर है……… ओर साथ के कई उच्च अंक प्राप्त किये लड़के आज भी यूं ही साधारण जॉब कर रहे हैं…………. जोकि उनकी योग्यता के अनुरूप नहीं है……..

आज जब मेरा मित्र उस दिन को याद करता है तो उसको हंसी आ जाती है…… ओर मैं अक्सर उसको मज़ाक मे कहता हूँ की अगर उस दिन तू जहर खा लेता तो सरकार को एक महान भ्रष्ट कर्मचारी नहीं मिल पाता………….

-

बेरोजगार अपनी बेरोजगारी तो नौकरीपेशा अपनी नौकरी से परेशान है………… कोई अपनी जीत से दुखी है तो कोई अपनी हार से……….. जो लोग घर से दूर रह कर लाखों कमा रहे है वो अपने परिजनो से दूरी के दुख से परेशान है………. ओर जो उनके साथ रह कर कम कमा रहे हैं……. उस कमी से परेशान है ……… ये नहीं है की उनको कम मिल रहा है……. बात ये है की उन्हे अपने से ज्यादा भी किसी के पास दिख रहा है……….

-

कुवांरे शादी न होने से परेशान है ओर शादीशुदा…….. शादी के बाद………. आखिर ये गणित कैसा है……. लोगों को धन मे या सत्ता मे सुख नजर आता है पर वो भूल जाते हैं की धन या सत्ता मे अगर सुख होता तो सिकंदर सबसे सुखी व्यक्ति होता……… जबकि सिकंदर के संदर्भ मे मैंने सुना था की जब सिकंदर मरने वाला था तो उसने कहा था की जब मेरे जनाजे को ले जाया जाए तो मेरे दोनों हाथ बाहर को निकले हों………. ताकि लोगों को पता चले की सिकंदर भी अंत मे खाली हाथ जाते हैं………ओर गौतम बुद्ध ओर महावीर ने राजपाट ओर घर परिवार छोड़ कर सन्यास न लिया होता………. यदि इसमे सुख होता………. संतों के पास जाकर शांति की खोज लोग कई वर्षों से कर रहे है पर ये शांति उनके अंदर ही है…..जैसे कस्तुरी हिरण के नाभि मे कस्तुरी होती है ओर वो खोजता हर जगह है……….. उसी तरह शांति हमारे अंदर है है ओर हम वहीं नहीं खोज रहे हैं……………

-

तो आखिर हम किसको दुख कहते हैं………… क्या वास्तव मे दुख जैसी कोई भावना है…? या व्यर्थ की कामनाओ के लिए हम खुद ही दुख निर्मित कर रहे है……………..

फोटो खिचवाते समय कुछ सेकेंडो की मुस्कान से आपकी तस्वीर हमेशा के लिए खूबसूरत हो जाती है…….. तो क्यों नही हम इस मुस्कान को हमेशा के लिए अपने चेहरे  पर रख कर पूरे जीवन को सुंदर बना लें……….



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (15 votes, average: 4.87 out of 5)
Loading ... Loading ...

58 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nishamittal के द्वारा
May 19, 2011

पीयूष जी ,स्वागत आपका मंच पर.पूर्व प्रकाशित परन्तु बहुत उपयोगी लेख के साथ.सुख-दुःख मानव मन की अवस्थाएं हैं.सबके मापदंड अलग अलग ,सबकी आवश्यकताएं अलग,सोच अलग.हाँ एक छोटी सी बात और दुःख का अनुभव कर ही तो सुख का आनंन्द लिया जा सकता है.यदि संसार में दुःख न होता तो सुख की परिभाषा कैसे समझ में आती यदि श्याम वर्ण नहीं तो गौर वर्ण की उपयोगिता क्या?यदि कोई भी निर्धन नहीं तो धनवान स्वयं को ऊँचा कैसे समझेगा.छोटा नहीं तो लम्बे को लम्बा कैसे कहा जाय

Aakash Tiwaari के द्वारा
May 18, 2011

आदरणीय पियूष जी, सबको पढ़ाने योग्य एकबहुत ही ज्ञानवर्धक, सत्य लेख……… ***************************** एक अकेला आकाश तिवारी ******************************

Rajkamal Sharma के द्वारा
May 17, 2011

प्रिय पियूष भाई …..नमस्कार ! अच्छी तथा सच्ची बाते हमेशा ही असरकारक रहती है , वक्त चाहे कितना भी क्यों ना बदल जाए …. आपने खुद को सुन्दर बनाने की बात की है जोकि आज के अशांत माहौल में बहुत ही मुश्किल है ….. लेकिन हम अपने दिल पर पत्थर रख कर किसी दूसरे को हंसाने की कोशिश तो कर ही सकते है , फिर भले ही बाद में हमको इस प्रयास में खुद को ही संताप क्यों ना MILE …. DHANYVAAD V ABHAAR SAHIT SWAAGTM :) :( ;) :o 8-) :|

preetimishra के द्वारा
May 17, 2011

पियूषजी,यह जीवन की सच्चाई है सुख-दुख  केवल मानसिक अवस्था है. लेकिन यह संसार एक भ्रमजाल है जिसमें समय बीतने के साथ मनुष्य और उलझता जाता है. अच्छी रचना. बधाई.

syeds के द्वारा
May 17, 2011

पियूष जी, बेहतरीन लेख पर बधाईयाँ http://syeds.jagranjunction.com

narayani के द्वारा
May 17, 2011

नमस्कार पियूष जी मुस्कान को हमेशा चेहरे पर रख जीवन को सुंदर बनाले ये बात नही मानेंगे दुनिया वाले दुःख में दुःख पता नही चलता तो , सुख में दुःख ढूंढ़ते दुनिया वाले अच्छा लिखा आपने ,छोटी सी जिन्दगी को हंसते हुए जिया जाये . धन्यवाद नारायणी

priyasingh के द्वारा
May 17, 2011

बहुत दिनों बाद आपका कोई लेख पढने को मिला …………….पर ये लेख मैंने पहले भी पढ़ा था लेकिन फिर भी आपने इस लेख में इतनी अच्छी बाते लिखी है की उन्हें दोबारा पढ़कर अच्छा लगा……….. आपके आने से अब इस मंच पर और अच्छे लेख पढने को मिलेंगे……….

nikhil के द्वारा
May 17, 2011

पियूष जी, आपकी कलम से निकला एक और ओजमयी लेख बधाई.

manoranjanthakur के द्वारा
May 17, 2011

बहुत ही सुंदर चित्रण जिन्दगी को करीव से दिखलाने के लिय बधाई

Tufail A. Siddequi के द्वारा
May 17, 2011

पियूष जी अभिवादन, पुनः स्वागत है. निश्चित ही शांति हमारे अंदर है और हम वहीं नहीं खोज रहे हैं…………… . सुख दुःख के विश्लेषण से युक्त सुन्दर पोस्ट. बधाई. http://siddequi.jagranjunction.com

Rajkamal Sharma के द्वारा
May 17, 2011

वोह आये फिर से इस मंच पर यह इस मंच की अच्छी किस्मत है स्वागतम :) (:

विनोद पाराशर के द्वारा
January 9, 2011

पियूस जी, ’सुख ऒर दु:ख’ तथा’जीवन व मृत्यु’-ये दो ऎसे अहम सवाल हॆं-जिनका जवाब तलाश करने में-आदमी का पूरा जीवन निकल जाता हॆ,लेकिन जवाब नहीं मिल पाता.’सुख ऒर दु;ख’ जॆसे दार्शनिक विषय का-आपने बहुत ही साधारण भाषा में मनोवॆज्ञानिक ढंग से विश्लेश्न किया हॆ.वाकई दु:ख का कारण साधनों की अनुपलब्धता नहीं-हमारी नकारात्मक सोच हॆ.हमारे पास जो कुछ हॆ,उसका आनंद नहीं ले पा रहे,लेकिन जो नहीं हॆ-उसके लिए दुखी हो रहे हॆं-यही तो विडंबना हॆ.सुख ऒर द:ख’जॆसे विषय पर लगभग दो-तीन साल पहले ,मॆंने एक कविता लिखी थी-जिसकी कुछ पंक्तिया नीचे दे रहा हूं.पूरी कविता अपने ब्लाग’दोस्ती’पर शीघ्र ही पोस्ट करूंगा. हम- यह जानकर /बहुत सुखी हॆं कि-दुनिया के ज्यादतर लोग हमसे भी ज्यादा दु:खी हॆं.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    January 9, 2011

    विनोद जी…… आपकी इस कविता का इंतज़ार रहेगा……… चंद लाइनों मे ही बहुत कुछ कह दिया है आपने……… आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया….

वाहिद के द्वारा
December 22, 2010

सुन्दर दर्शन की अभिव्यक्ति पीयूष जी| यही सकारात्मक और नकारात्मक के बीच का सबसे बड़ा फ़र्क़ है| वाहिद http://kashiwasi.jagranjunction.com

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 23, 2010

    वाहिद भाई प्रतिकृया के लिए हार्दिक शुक्रिया…….

Rashid के द्वारा
December 21, 2010

पियूष भाई !! आजकल कहाँ है ,, कोई नया लेख नहीं आया बहुत दिनों से … राशिद http://rashid.jagranjunction.com

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 23, 2010

    राशिद भाई …… थोड़ा व्यस्त था ……. जल्द ही कुछ लिखुंगा……..

    rajkamal के द्वारा
    December 23, 2010

    यह क्या पियूष भाई आजकल हमारी पोस्टों वाली सुपर एक्सप्रेस  कमेण्ट वाली एक्सप्रेस बन गई है ….मैं भी राशिद जी की मांग दोहराता हूँ …उम्मीद की उम्मीद में धन्यवाद

Arunesh Mishra के द्वारा
December 20, 2010

पन्त जी, बहुत खूब परिभाषित किया है भावनाओ को. किसी ने सच ही कहा है कि “मन के हारे हार है मन के जीते जीत”..तो जीवन कि हर हार और जीत या कहे सुख और दुःख वैसे ही आप के लिए आता है जैसा कि आप का मन उसको लेना चाहता है.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 20, 2010

    अरुणेश जी……. आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…

aditya के द्वारा
December 20, 2010

पन्त जी, बहुत ही सुन्दर शब्दों में आपने सुख और दुःख के बारे में विस्तार से कह दिया है. वाकई सुख और दुःख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. बहुत ही सुन्दर आलेख है. वाकई यह आलेख कई निराशावादियों को एक आशा की किरण दिखायेगा. आदित्य http://www.aditya.jagranjunction.com

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 20, 2010

    ये सोच ही इस लिए है की निराशा जीवन से दूर हो………… आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…

rajkamal के द्वारा
December 18, 2010

प्रिय पियूष भाई …नमस्कार ! आप कि वापसी पर आपका स्वागत है ….. जो कुछ मैं बचपन में सोचा करता था और उसके बाद भी … वोह सभी कुछ आपने अपनी कलम से बयान कर दिया है …. पहले हम अपने पीता जी को कहते थे कि इनके कितने मज़े है …और एक हम है जिनको कि पढ़ना और लिखना तथा डांट खानी पड़ती है …. और अब कहते है कि बचपन के दिन कितने सुहाने थे …ना कोई फ़िक्र और ना ही कोई फाका …. सच ही कहा है आपने कि आजकल कोई भी सही मायने में पूरी तरह संतुष्ट नही कहा हजा सकता … सबके मन कि ही बात कह देने वाले लेख पर बहुत -२ बधाई

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 20, 2010

    ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो………… मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन …… वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी……… आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…

December 17, 2010

सही कहा आपने पीयूष जी, सुख और दुःख तभी महसूस किये जा सकते जब परिस्थितियों में परिवर्तन हो….. अर्थात दोनों बस तुलनात्मक आभास मात्र हैं. सुन्दर लेख. बधाई.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 20, 2010

    दीपक जी सत्य यही है की हम अगर तुलना करना समाप्त कर दें तो दुख या सुख का एहसास ही न हो॥ आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…

rddixit के द्वारा
December 7, 2010

Dear Sir, As you yourself accept that pleasure and agony are mental states. One man is unhappy for losing 25 lacs though the other is happy for gaining 5 lacs. We can lose only that which we have and may be sorry for it. On the contrary, we can be sorry for not having a thing. A man is miserable for having no issues, the other is so because he has many daughters. Indifference is a mental state. We can get it predominate over other feelings.In the Gita Lord Krishna says: Those bhaktas are dear to me who are alike for friends and foes, honour and dishonour.

roshni के द्वारा
December 1, 2010

पियुष जी, यही तो मानव मन है जो जानता ही नहीं की उसे वास्तव में चहिये क्या ? एक दिन खुश होना दुसरे दिन दुखी बस चाँद की तरह पल पल मन भी अलग अलग आकार लेता है ……. सुन्दर आलेख के लिए धन्यवाद

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 20, 2010

    मन की उपमा चाँद से बहुत खूब……… आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
December 1, 2010

प्रिय श्री पियुष जी, जिसके पास सब कुछ है वह मन से दुखी है कि ऐसा मैं सदैव कैसे रह सकता हूँ कहीं कुछ कम ना हो जाए जिसके पास कुछ नहीं है वह भी दुखी है कहीं से कुछ तो मिल जाएं । दुख ऐसी वस्‍तु है जिसे कोई छोड़ता नहीं है लेकिन सभी उसे भूलना चाहते हैं । सुंदर आलेख । अरविन्‍द पारीक

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 20, 2010

    सही कहा आपने सब परेशान है पर कोई उसको छोडने को तैयार भी नहीं है………. आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…

J. L. SINGH के द्वारा
December 1, 2010

मैं नहीं चाहता चिर सुख, मैं नहीं चाहता चिर दुःख. सुख दुःख की आंख मिचौली खोले जीवन अपना मुख. ये भी पन्त जी की ही पक्तियां हैं, संभवत. पियूष जी को याद होगा!

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 20, 2010

    सिंह साहब ……… जिन पंत जी की आप बात कर रहे हैं……… वो परिचय के मोहताज नहीं है………… ओर हम उनको इस लिए भी पहचान जाते है क्योकि कुछ तो हम मे एक समान है (सर नेम)……… आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…

Aakash Tiwaari के द्वारा
November 30, 2010

श्री पियूष जी, आपने बहुत ही वास्तविक बात बताई है…मगर फिर वही बात लोगों का दिमाग इन्ही फिजूल की बातों से घिस गया है…..जैसे पथ्थर पे रस्सी का निशान वैसे ही लोगों के विचार हो चुके है जो चाहकर भी नहीं बदले जा सकते चाहे वो आप हो या हम…… आकाश तिवारी

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 20, 2010

    आकाश जी पूरी तरह तो हम इनपर अमल नहीं कर सकते पर आंशिक तौर पर तो किया ही जा सकता है……. आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
November 29, 2010

प्रिय पीयूष जी, प्रणाम भई सुख एवं दुख अच्‍छा विषय चुना और श्रेष्‍ठ ही विशलेषण है । किन्‍तु आधुनिक मानव भौतिकता की दौड़ में केवल सुख को पाने की चाह में भटकता है चाहे वह उसे किसी भी कीमत पर प्राप्‍त हो और वह उस में आन्‍नद में इतना मशगुल हो जाता है पर जब उस पर दुख आता है तो वह घबडा जता है और उस के उपाय के लिए ईश्‍वर के द्वार खटखटाता है। इसी लिए किसी ने सही ही कहा है दुख में सुमिरन सब करें सुख में करें न कोई – जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहें को होई। पर भाई यह भी एक प्रकृति का नियम है एक चक्र है जो घुमता रहता है। अच्‍छे लेख के लिए बधाई। -दीपकजोशी63

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 20, 2010

    आदरणीय दीपक जी को सादर प्रणाम……. ये दुख मे ईश्वर को याद करने की आदत ही उसको सही निर्णय नहीं लेने देती…. आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…

Alkar Gupta के द्वारा
November 29, 2010

सुख और दुख मन के  ऐसे दो भाव हैं जिनमें एक दूसरे का अस्तित्व नीहित है और ये हर व्यक्ति के पास हैं अंतर केवल इतना है कि एक को हम ढूँढ़ने के ही फेर में  पड़े रहते हैं और अपना अमूल्य समय बर्बाद करते रहते हैंजबकि वह सर्वदा हमारे  साथ ही है और एक से दूर भागने का प्रयत्न करते हैं केवल अपनी अपनी सोच व समझ है।  सुख दुख से संबंधित एक श्रेष्ठ लेख ।हार्दिक बधाई, पियूष जी 

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 20, 2010

    वास्तव मे ये सोच सोच का ही फेर है………….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…

chaatak के द्वारा
November 29, 2010

“मैं दुखी था, मेरे पास जूते नहीं थे, राह में एक आदमी मिला, उसके पाँव नहीं थे|” सुख और दुःख दोनों सिर्फ भ्रम उत्पन्न करने वाली दो संवेदनाएं हैं जो हमें इंसान बने रहने के लिए मिली हैं| बस दोनों का सामान रूप से स्वागत करना ही जीवन है| मुझे इतना ही समझ में आता है| प्रिय पीयूष जी, सुख और दुःख का यह विश्लेषण मुझे बड़ा अच्छा लगा| बधाई!

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 20, 2010

    चातक जी…. आपने जिस समभाव की बात की है वही सच्चे सुख की ओर ले जा सकती है…….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया…

gaurav2911 के द्वारा
November 28, 2010

वाकई में एक साथर्क लेख सुख दुःख एक सिक्के के ही दो पहलु है और जैसे चंदा चांदनी से सूरज रौशनी से जुड़ा है ऐसे ही सुख दुःख एक साथ है I धन्यवाद वाकई में दिल को छु लेने वाला लेख I

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 20, 2010

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया… गौरव भाई….

NIKHIL PANDEY के द्वारा
November 28, 2010

पियूष जी काफी लम्बा मगर रोचक लेख था….. जहा तक मैंने समझा है…. सुख का वास्तविक अर्थ है संतुष्टि प्राप्त कर लेना… और संतुष्टि कभी अपने लिए या अपने स्वार्थो के लिए कार्य करके नहीं मिल सकती…. भौतिक साधनों से हमें सुख तो मिल सकता है पर वो क्षणिक ही होता है अतः हम जल्दी ही उब जाते है और की आशा में दुःख भोगते है ……. आप कभी स्वयं ये प्रयोग करे किसी भूखे को दो रोटी खिला कर उसके चेहरे पर बदले भाव देख कर आपको जो संतुष्टि प्राप्त हो जाएगी वही सच्चा सुख है……. ज्यादा ज्ञानी नहीं हु मगर मुझे यही लगता है स्वार्थ के बारे में सोचने के कारन ही हम निरंतर दुःख भोगते रहते है .

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 20, 2010

    जब आप अपने से ऊपर उठ कर सोचने लगें तो स्वयं को सुखी महसूस करने लगेंगे इसमे कोई दो राय नहीं है…….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……

abodhbaalak के द्वारा
November 28, 2010

निर्धन दुखी है पेट के लिए……… ओर सम्पन्न भी दुखी है पेट के लिए…………. एक खाली पेट के लिए है तो दूसरा फैलते हुए विशाल पेट के लिए………… पियूष जी, क्या शब्द है, बहुत ही पते की बात की है आपने, और क्या सुन्दर विश्लेषण किया है सुख और दुःख का, सच तो ये है की किसी का सुख किसी के लिए दुःख बन जाता है और किसी का दुःख …… सदा की भांति उच्च श्रेरनी की रचना, http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 20, 2010

    मित्र सही कहा आपने………… सच तो ये है की किसी का सुख किसी के लिए दुःख बन जाता है और किसी का दुःख …  आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……

Dharmesh Tiwari के द्वारा
November 28, 2010

भाई पियूष जी नमस्ते,वाक्य्यी इन शब्दों को परिभाषित करना हकीकत में आसन नही,सिर्फ इसके इर्द गिर्द अनुमान और अनुभव को ही एक दुसरे के सामने रखा जा सकता है…………………ऐसे विषय पर चर्चा करते देखा काफी प्रसंन्त्ता हुई,धन्यवाद!

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 20, 2010

    अनुभाव का नाम ही जीवन है…………..ओर ये बड़े दुख की बात है की हम जब दूसरे के अनुभव को समझते नहीं ओर खुद जब तक अनुभव होता है तो ये ही कहना पड़ता है की …………. जब तक मैंने जाना जीवन क्या है ….. जीवन बीत गया………….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……

आर.एन. शाही के द्वारा
November 28, 2010

पियूष जी, आप सुख-दुख और अध्यात्म पर भी इतना गहन विश्लेषण कर सकते हैं, यह एक सुखद आश्चर्य है मेरे लिये । दृष्टांतों के आधार पर तर्क़संगत और प्रामाणिक । बधाई ।

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 20, 2010

    आदरणीय शाही जी……. जब आप किसी ऐसी परिस्थिति से बाहर आते है की आपको लगता है की इससे बुरा कुछ हो ही नहीं सकता ओर फिर आप कुछ समय बाद किसी ओर घटना को ऐसा ही पाते हैं तो फिर आपको इसका आभास हो जाता है…………….. ओर मेरे साथ कई बार ऐसा हुआ……. इस लिए ये विश्लेषण सामने आया……….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……

nishamittal के द्वारा
November 28, 2010

बहुत अच्छी विवेचना सुख दुःख की पीयूष जी,मन के हारे हार है मन के जीते जीत.सही में सुख दुःख के पैमाने सबकेपृथक हैं.दुसरे शब्दों में आधा ग्लास खाली या आधा भरा वाली बात है..

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 20, 2010

    सही उदहारण दिया आपने…………. ये नजरिया ही है की हम ग्लास को आधा भरा या आधा खाली देखते है……. हम भूल जाते हैं की हमारी प्यास बुझाने के लिए शायद इतना ही काफी है……….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……

rita singh 'sarjana' के द्वारा
November 28, 2010

पियूष जी , आपकी इस कथन से मैं सहमत हूँ कि सुख या दुःख ये दोनों “केवल मानसिक अवस्था हैं l ” अच्छी पोस्ट बधाई l

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 20, 2010

    इस मानसिक अवस्था पर काबू कर इससे पार हुआ जा सकता है………आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……

s.p.singh के द्वारा
November 28, 2010

प्रिय पियूष जी, हर बार की तरह एक खूबशूरत कथा जो मन को छू ले —— तो आखिर हम किसको दुख कहते हैं………… क्या वास्तव मे दुख जैसी कोई भावना है…? या व्यर्थ की कामनाओ के लिए हम खुद ही दुख निर्मित कर रहे है…………सुख और दुःख केवल अतृप्त मन की अनूभूति होती है —–जैसे के किसी ने कहा है —-” मन के हारे हार है मन के जीते जीत ” बहुत बहुत धन्यवाद.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    December 20, 2010

    सिंह साहब स्वयम गौतम बुद्ध ने कहा है की दुख का कारण तृष्णा है……… आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक शुक्रिया……….


topic of the week



latest from jagran