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जागो जागरण जागो......

Posted On: 30 May, 2011 Others में

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मेरा ये लेख जागरण के उस वक्तव्य के खिलाफ है जिसमे जागरण हमेशा से ये एक तरफा घोषणा करता आया है की यहाँ पोस्ट की जाने वाली हर रचना जागरण के संपादक मण्डल द्वारा पढ़ी जाती है….. और तब किसी रचना को फीचर्ड किया जाता है…. यद्यपि इसके खिलाफ कई बार कई मित्रों ने सवाल उठाए…. जिनमे से राजकमल भाई प्रमुख रहे…..
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आज एक बार फिर जागरण की ये घोषणा मज़ाक बनती नज़र आ रही है….. मेरे द्वारा प्रकाशित रचना जोकि शायद 14 अगस्त को प्रथम बार नाम से प्रकाशित की गयी थी…. और फिर पुनः उसी रचना को मैंने नाम परिवर्तित करके कहानी एक मासूम की (एक मार्मिक कथा)……नाम से पुनः प्रकाशित किया…… यही रचना मासूम को सजा (एक मार्मिक कथा…) नाम से एक सज्जन से प्रकाशित की …… और आश्चर्य इस बात का की हर रचना को मूल्यांकन की दृष्टि से पढ़ने वाले संपादक मण्डल को ये कहानी फीचर्ड करने मे कोई परेशानी नहीं हुई…… जबकि एक प्रबुद्ध ब्लोगर प्रिया जी ने प्रतिक्रिया स्वरूप ये स्पष्ट कर दिया था की ये रचना उन्होने मेरे द्वारा प्रकाशित किए जाने पर पढ़ ली थी…….
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फिर आखिर संपादक मण्डल कैसे ये चोरी (?) नहीं पकड़ पाया…….. इन सज्जन के इस ब्लॉग पर मैंने प्रतिक्रिया स्वरूप लिखा की ………..
“धन्यवाद मनोज जी….. इस कहानी को एक बार से प्रस्तुत करने के लिए शुक्रिया……… पूर्व मे इसी नाम से मैं यही कहानी पेश कर चुका हूँ….. फिर उसका नाम बदल कर फिर दुबारा फिर दिया… आज आपने एक और बार इसे एक संदेश बना कर प्रस्तुत कर सराहनीय कार्य किया है……. http://piyushpantg.jagranjunction.com/2011/02/20/%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%B8%E0%A4%9C%E0%A4%BE/”
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तो ये सज्जन ने फिर एक नवीन ब्लॉग “दिल को लगा” की रचना की और कुछ ये लिखा……
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पीयूष जी इस पोस्ट को आप February,20 २०११ की अपना बता रहे है पाठक देखे http://manojjaiswalbly.blogspot.com/2010/10/blog-post_2232.htmlहमने इस पोस्ट को ०१/१०/२०१० में प्रकाशित की है पीयूष जी अपनी राय में इस पोस्ट को नक़ल करने की बात करते लग रहे है .
दिल को लगा
मर्यादा का पालन करे
मनोज जैसवाल
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अब इस पर प्रतिक्रिया स्वरूप मेरी प्रतिक्रिया
मनोज जी अगर आप ये कहना चाह रहे हैं की ये रचना आपकी अपनी है ….. तो भी आपके लिंक मे गड़बड़ी है…. आपका लिंक अक्टुबर माह का है जबकि मेरी ये रचना प्रथम बार अगस्त 2010 मे प्रकाशित हो चुकी थी….मेरे ब्लॉग मे प्रथम टिप्पणी ही 14 अगस्त 2010 की है…….
तो इस बात को प्रेम से स्वीकार करने की जगह आपका इस तरह से प्रतिकृया देना उल्टा चोर कोतवाल को डाटे सा प्रतीत होता है……..
और एक बार फिर ये सज्जन भड़क गए और एक नया ब्लॉग इस मंच पर टिप्पणी बदलना इतना आसान आया जिसमे ये लिखा था की………..
इन साहब की देखये टिप्पणी का समय बदल ही दिया . इस मंच पर मैने भी इस तरह टिप्पणी का समय बदल दिया है जरा इसका नमूना देखे
मनोज जी अगर आप ये कहना चाह रहे हैं की ये रचना आपकी अपनी है ….. तो भी आपके लिंक मे गड़बड़ी है…. आपका लिंक अक्टुबर माह का है जबकि मेरी ये रचना प्रथम बार अगस्त 2010 मे प्रकाशित हो चुकी थी….मेरे ब्लॉग मे प्रथम टिप्पणी ही 14 अगस्त 2010 की है……. तो इस बात को प्रेम से स्वीकार करने की जगह आपका इस तरह से प्रतिकृया देना उल्टा चोर कोतवाल को डाटे सा प्रतीत होता है….
इस मंच पर मेरी पहली पोस्ट May 24 ,२०११.की है .
तो पोस्ट पर टिप्पणी २०१० की डेट की ?
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अब यहाँ पर मैं जागरण जंक्शन संपादक मण्डल का हस्तक्षेप चाहता हूँ……. की वो निर्णय करें की मेरी ये रचना किस तारीख की है………..
और जहां तक इन सज्जन की सज्जनता का प्रश्न है तो वो इनके पुराने ब्लॉग पढ़ कर लग सकता है… आखिर अपने हर पुराने ब्लॉग मे वाक्य की समाप्ती पर ‘।’ का प्रयोग करने वाले ये सज्जन केवल इस रचना पर ही वाक्य की समाप्ती पर “.” का प्रयोग कर रहे हैं……..
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और अगर ये रचना इनकी ही है तो इसका मूल स्रोत स्पष्ट करें…….. की क्या ये कहानी इनकी स्वरचित है अथवा कहीं से प्रेरित होकर लिखी गयी…….. क्योकि मेरी कहानी एक इंग्लिश कहानी का अपने शब्दों मे लेखन है………..
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यहाँ पर जागरण जंक्शन से अनुरोध है की दोषी चाहे मैं हूँ……. या फिर ये सज्जन उसके खिलाफ कोई कदम उठाया जाए ताकि भविष्य मे कोई भी किसी की रचना को अपने नाम से प्रकाशित कर उस पर ही इस तरह का आक्षेप न लगाए ………… अन्यथा लगातार इस मंच से दूर होते जा रहे प्रबुद्ध ब्लोगेर्स को फिर से यहाँ जमा कर पाना कठिन हो जाएगा…………..
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उचित कार्यवाही की आशा मे …………

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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rahulpriyadarshi के द्वारा
August 11, 2011

यह तो सरासर प्रतिभा को हतोत्साहित करना हुआ…लेखन की चोरी को प्रश्रय देना कभी भी उचित नहीं कहा जा सकता,जागरण जुन्क्तिओन से यह अपेक्षित है की अपनी भूल को ध्यान में लाते हुए मौलिक लेखन से माफ़ी मांगे और चोरी करने वाले लेखक को कड़ी चेतावनी दे,ऐसी मनमानी इस मंच के गरिमा का ह्रास करने वाली है.

वाहिद काशीवासी के द्वारा
June 2, 2011

पीयूष भाई, विलम्ब से इधर दृष्टि पड़ी, क्षमाप्रार्थी हूँ| जागरण जंक्शन अभी तक अपने उत्तर से संतुष्ट नहीं कर पा रहा है| इस तरह से रचनाओं की चोरी की घटनाओं में वृद्धि होती जा रही है| राजकमल भाई जैसे सतर्क ब्लॉगर इन पर कड़ी नज़र रखते हैं पर जागरण का स्वयं कर्तव्य बनता है कि वे साईट पर कुछ ऐसे तकनीकी सुधार करें जिससे ऐसी घटनाओं के पुनरावृत्ति पर रोक लग सके| आभार सहित,

    Rope के द्वारा
    July 12, 2016

    This is a good posting, I was wonrideng if I could use this write-up on my website, I will link it back to your website though. If this is a problem please let me know and I will take it down right away

aditya के द्वारा
June 1, 2011

पीयूष भाई, आपकी पक्ष पूरी तरह मजबूत है, ये बात जागरण जक्शन संपादक समूह द्वारा सिद्ध कर दी गयी है. साहित्यिक चोरिया तो होती रहती हैं. किन्तु “चोरी और सीनाजोरी ठीक नहीं हैं”. हम यदि किसी की रचना का उपयोग करते हैं तो हमें उसके रचनाकार का नाम जरूर देना चाहिए, इतनी नैतिकता तो होनी ही चाहिए……. काफी दिनों बाद कोई प्रतिक्रिया कर रहा हूँ……… क्योंकि अब जागरण जंक्शन पर फालतू लोगो की भीड़ कुछ ज्यादा हो गयी है………….. इसलिए लिखने का मन ही नहीं करता हैं……….. खैर अपने पुराने ब्लोग्गर्स के ब्लॉग पढता जरूर हूँ………. आपका आदित्य..

JJ Blog के द्वारा
May 31, 2011

आदरणीय पीयूष पंत जी, जागरण जंक्शन मंच मूल रूप से लेखक के आलेख की गुणवत्ता के आधार पर उसे फीचर्ड ब्लॉग की श्रेणी प्रदान करता है और मंच के ब्लॉगर मनोज जायसवाल जी की उक्त रचना को भी इसी आधार पर फीचर ब्लॉग की श्रेणी प्रदान की गयी. मनोज जायसवाल जी ने अपने ब्लॉग स्पॉट पर इस ब्लॉग को अक्टूबर, 2010 में प्रकाशित किया था जबकि खोजबीन से पता चला है कि आपने इस रचना को जागरण जंक्शन मंच पर अगस्त 2010 में प्रकाशित किया था तो इससे पता चलता है कि उक्त रचना मूल रूप से आपकी है. आपको ज्ञात हो कि हालांकि किसी भी चुराई गयी रचना को फीचर की श्रेणी नहीं प्रदान की जाती किंतु मंच के लिए निश्चित रूप से ये एक चुनौती भरा काम होता है कि वह हर ब्लॉगर की पुरानी रचनाओं को याद रख कर नए आने वाले ब्लॉग को फीचर की श्रेणी प्रदान करे, इसलिए कभी-कभार ऐसी समस्या आ खड़ी होती है लेकिन जागरुक ब्लॉगरों से अपेक्षा की जाती है कि यदि ऐसी कोई अवांक्षित गतिविधि नजर आती है तो मंच को समय पर अवगत कराने की अवश्य कोशिश करें ताकि समस्या के निदान की दिशा में कार्यवाही की जा सके. साथ ही सभी अन्य पाठकों को भी ये संदेश जारी किया जाता है कि यदि आपको किसी लेखक की कोई रचना अच्छी लगती है और आप चाहते हैं कि उस रचना का लाभ अन्य लोग उठा सकें तो आप उसे अपने ब्लॉग में प्रकाशित करने के पूर्व लेखकीय धर्म का निर्वाह करते हुए मूल लेखक या मूल स्रोत का नाम अवश्य दें. जागरण जंक्शन मंच को समय पर सूचना भेजने के लिए आपका आभार धन्यवाद जागरण जंक्शन परिवार

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    May 31, 2011

    आपके इस समर्थन के लिए जागरण जंक्शन संपादक मंडल का हार्दिक धन्यवाद ……… ये घटना कोई बहुत बड़ी नहीं थी. किन्तु इस पर आदरणीय लेखक महोदय का रुख कुछ अनुचित था. मैंने स्वयं उस कहानी में एक प्रतिक्रिया में स्पष्ट किया था की आप इसे जहाँ चाहे प्रयोग करें …. ताकि लोग इसका लाभ उठाए ताकि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो.. पर इन सज्जन ने कुछ इस तरह का माहौल बनाया जैसे की मैंने इनकी रचना का प्रयोग किया हो…. किन्तु आपके इस स्पष्टीकरण ने कि “आपने इस रचना को जागरण जंक्शन मंच पर अगस्त 2010 में प्रकाशित किया था”… ने मेरा मनोबल बढाया.. यद्यपि इस समय अधिकाँश पूर्व ब्लोगर किसी न किसी कारन से इस मंच पर लेखन से दूर हैं पर अभी भी लोग लगातार एक दुसरे की रचनाये पढ़ते हैं.. भले प्रतिक्रिया न दे पायें… इस तरह के हालत उन ब्लोगर्स को वापस आने से रोक ने का काम करते हैं…. आपकी इस पहल ने सभी ब्लोगर्स का मनोबल अवश्य बढाया होगा….. आपका हार्दिक आभार….

nishamittal के द्वारा
May 31, 2011

पियूष जी,कई दिन से मेरा मंच पर आना कुछ अनियमित सा चल रहा है,अतः ये प्रकरण मैं नहीं देख सकी .हाँ इन सज्जन मनोज का ये आलेख मैंने पढ़ा था [परन्तु इसका संदर्भ प्रसंग मैं समझ नहीं सकी.रचना की चोरी और वो भी स्वयं रचनाकार पर आक्षेप बड़ी विचित्र स्थिति लगती है.विचारार्थ प्रस्तुत करने हेतु धन्यवाद.

RaJ के द्वारा
May 31, 2011

सभी ब्लॉग पर उपस्थित सज्जनों से विनम्र अनुरोध है की ब्लॉग को प्रतिस्पर्धा का केंद्र न बनाये तथा शुचिता का ध्यान रखते हुए कोई भी रचना जिसे आप प्रस्तुत कर रहे उसमे यह स्पष्ट कर दे कि इसका कोई अंश या सम्पूर्ण रचना यदि किसी और कि है उसे सही से उद्घृत करे व उसका स्रोत बताने कि कोशिश करे जैसे यदि अच्छा SMS भी आया है तो स्वीकार करें कि आपको पूरा पता नहीं है कि मूलतया इसका लेखक कौन है पर आपने किसी सज्जन के द्वारा भेजे SMS से इसे लिया है | कृपया फर्जी ID बनाकर ज्यादा कोमेंट न बढाएं . अपनी मन कि शांति के लिए लिखें व कोशिश रखें कि आपको वास्विक प्रशंशा मिले |

priyasingh के द्वारा
May 30, 2011

………..ये पढ़कर तो मै चकित हूँ ………….एक लेखक और रचनाकार होने के बावजूद ये ओछापन ……..आपके दोषी होने का तो सवाल ही नही पैदा होता ………जागरण वालो को कुछ कदम जरुर उठाना चाहिए ……

Aakash Tiwaari के द्वारा
May 30, 2011

श्री पियूष जी, ये समस्या तो है ही..साथ ही में मुझे एक समस्या और दिखी फीचर ब्लॉग की …मुझे किसी से कोई दिक्कत नहीं मगर मैंने देखा की आदरणीय श्री राम कृष्ण खुराना जी का ब्लॉग कुछ ज्यादा समय तक ही फ़ीचर था….पता नहीं क्या नियम क़ानून है… ********************* एक अकेला आकाश तिवारी **********************

Rajkamal Sharma के द्वारा
May 30, 2011

मासूम को सजा (एक मार्मिक कथा.) very nice post manoj ji इन सज्जन कम दुर्जन शख्स के बारे में इक चौंकाने वाली बात और बताना चाहता हूँ की यह अपनी खुद की ही पोस्ट पे खुद ही कमेन्ट करते है वोह भी कई नामो से इसी चक्कर में इनसे असावधानीवश इक महान भूल भी हो गई है ऊपर वाली टिप्पणी इन्होने अपने खुद के ही ब्लाग पर की है लेकिन भूलवश अपनी आई डी से ही खुद अपनी तारीफ ही कर बैठे अगर यह इतने ही सच्चे है तो अपने ब्लॉग पर आई हुई टिप्पणीकर्ता (फर्जी ) के इमेल आई डी बताए यह भी बताए की उन्होंने आज तक क्या -२ ब्लाग लिखे आपके बारे में न केवल मेरा बल्कि बाकि सभी का भी यह पूरा विश्वाश है की आप ही सच्चे है और आप ऐसा कोई भी काम कभी कर ही नहीं सकते है धन्यवाद (मैं आपके साथ हूँ )

    Baijnath Pandey के द्वारा
    May 31, 2011

    आदरणीय श्री पियूष जी + राजकमल जी सदार अभिवादन जागरण के लचर रवैये के कारण ऐसे शरारती तत्व उत्साहित होते रहते हैं | एक बार ऐसे लोंगो के पकड़ में आने पर उन्हें बैन कर देना चाहिए क्यों कि जिसके पास मर्यादा नहीं वह साहित्य की सेवा कैसे करेगा | अगर वो साहित्य का रचना भी करेगा तो कलुष से प्रेरित होकर …………….क्या फायदा है ऐसे लोंगो को बढ़ावा दे कर ? मेरा पूर्ण विश्वास है की इस मामले में पियूष जी शत प्रतिशत सत्य है ………….ऐसे चोर आँखों के सामने न होने का फायदा उठाते है वर्ना सारी चोरी ………………………….आगे क्या कहूं, इंटरनेट ने साहित्य का मजाक बना कर रख दिया है ……..एक ही रचना के अनेक रचनाकार नजर आते है इधर गब्बर सिंह का चरित्र फसबूक से होकर अंततः जागरण के प्रांगन में भी कई नामों से कई बार उपस्थित हुआ जिसे देखकर वो अनमोल कृति याद आ गयी ——–. कितनी नावों में कितनी बार | धन्यवाद एवं विदा |

Rajkamal Sharma के द्वारा
May 30, 2011

प्रिय पियूष भाई ….नमस्कार ! इस बात को इस मंच पर सभी भली भांति जानते है की मेरी इक तीसरी आँख भी है

roshni के द्वारा
May 30, 2011

पियूष जी अपने सही कहा जागरण द्वारा इस तरह की नीतियों के चलते ही यहाँ पर अब हमारे पुराने ब्लोग्गेर्स नहीं मिलते .. कुछ लिखे भी तो अब यहाँ लिखने का मन ही नहीं करता …… इस तरह बार बार पुरनी रचना के कॉपी करके आगे आने पर फिर उस featured करना गलत बात है ….


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