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हिंदी मतलब अशिक्षित.......??

Posted On: 14 Sep, 2011 Others में

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ये पोस्ट मेरे द्वारा गत वर्ष प्रकाशित किया जा चुका है….. किन्तु कुछ नया न होने के कारण एक बार फिर इसी को पुनः प्रकाशित कर रहा हूँ…..
.
हिंदी एक अदभुद भाषा है………. जितने शब्द इस भाषा में बोले जाते हैं उनसे हर भाषा के शब्द का उच्चारण हो सकता है……….. पर अब इस भाषा का प्रयोग करने का अर्थ ये लगाया जाने लगा है की आप कम पढ़े लिखे है……….
इस मानसिकता के लोग अब तेजी से पनपने लगे हैं…….. जो हिंदी को निम्न दर्जे के लोगों द्वारा बोले जाने वाली भाषा मानते हैं…….. इस मानसिकता के लोगों से रूबरू होने का मौका मुझे भी मिला…….

एक बार मैं एक बैंक में गया था, अपने अकाउंट में अपना नाम जो की आधा छपा था उसको बदलवाना था…….. वही रिशेप्शन पर एक लड़की बैठी थी ….. तभी एक सज्जन वहां पर आये और उस लड़की ने पूछा…………
हाउ कैन आई हेल्प यू….
वो सज्जन बोले की………. मैं अपना पता बदलवाना चाहता हूँ……… उसके लिए क्या करना होगा..
अब वो लड़की शुरू हो गयी ….. अंग्रेजी में लगभग 5 – 7 मिनट बोलने के बाद जब वो चुप हुई तो वो सज्जन बोले…… मैं कुछ समझा नहीं…… अच्छा हो आप हिंदी में बोलें………. अब लड़की का चेहरा देखने योग्य था……. उसके उन सज्जन को कुछ यूँ घूरा मानो वो बिना कपड़ों के खड़े हैं………… फिर वो बोली मैं हिंदी में नहीं समझा सकती………….

अब वो सज्जन बोले की तो कोई पढ़ा लिखा हो तो उसको बुला दें ……… मैं उससे पूछ लूँ….. अब वो लड़की झल्ला गयी और बोली आई डोंट नो…. वी ऑल आर इलिटरेट ….

हम बड़े खुश थे की यार एक ऐसा आदमी जिसको अंग्रेजी नहीं आती थी…….. उसने एक अच्छी खासी अंग्रेज लड़की का घमंड तोड़ दिया………अब वो सज्जन बैंक मैनेजर के पास गए……. अब उस लड़की के बाद हमारी बारी थी चौंकने की ……….

अन्दर जाते ही वो सज्जन फर्राटे से अंग्रेजी में बोलने लगे ……….. दरवाजे के पास जहा हम बैठे थे वहां तक आवाज़ आ रही थी……. और गौर से सुनने के लिए दरवाजे के पास खड़ा होना पड़ता…… जोकि मर्यादा सम्मत नहीं था……… तो हम ये तो नहीं सुन पाए की उस आदमी ने मैनेजर से क्या कहा….. पर जैसे ही वो आदमी केबिन से बाहर आया तो वो फिर उस लड़की के पास जाकर बोला ………..
इफ यू डोंट लाइक टू टाक इन हिंदी …….. यू शुड रिमूव दिस बोर्ड फ्रॉम हियर……
और फिर उसने एक बोर्ड की और इशारा किया जिस पर लिखा था ……… हिंदी हमारी राजभाषा है इसका प्रयोग करें…
अब भी लड़की के चेहरे पर कोई पश्चाताप के भाव नहीं थे…….. पर फिर वो सज्जन बोले मैं फ़ौज में कर्नल के पद पर रहा……. हमने हमेशा अंग्रेजी बोली क्योकि तब मज़बूरी थी…… पर वहां भी अनावश्यक नहीं बोली………… कोई पश्चाताप नहीं था………… क्योकि हम उसकी देश की खातिर लड़ रहे थे जहाँ की ये भाषा है…….

और तुम नए लोग इस भाषा को अपमानित कर इस भाषा को ख़तम करने का काम कर रहे हो…………….

न जाने कितनी बार फ़ौज और फौजियों के प्रति मैं नतमस्तक हुआ था……. उनके देश के प्रति किये कार्यों के कारण …………. पर हर बार बीच में उनकी वर्दी थी ……….. पर आज इस अवकाश प्राप्त कर्नल ने साबित कर दिया की फौजी मरते दम तक देश के लिए जीता है……..

और हिंदी बोलने के प्रति हमें और बल मिला………. अब कोई संकोच नहीं की सामने वाला क्या सोचे जब मैं हिंदी बोलूं………..

धन्यवाद …….
.
.# यह घटना और इससे जुड़े सभी पात्र काल्पनिक है……. यदि किसी का कोई सबंध किसी वास्तविक घटना से पाया जाता है तो उसे महज संयोग माना जाए… :-)
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41 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
November 19, 2011

पीयूष भाई, सादर अभिवादन! बहुत ही अच्छा लगा….. हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, इसे उचित सम्मान और आदर मिलना चाहिए.

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
November 13, 2011

प्रिय पीयूष भाई हिंदी के प्रति आप का ये जज्बा मन को छू जाता है बहुत ही सार्थक कहानी आप की अक्सर ये देखा जातः है थोड़ी अंग्रेजी जान या कुछ वाक्य रोजमर्रा के जान कुछ लोग अंग्रेज बन हिंडो वालों को नीचा दिखाना चाहते हैं लेकिन हमने कई बार ये देखा की बस उथले पानी हैं वो जब बात आती है धमाका देने की तो हम भी किसी से कम नहीं ..लेकिन हिंदी की खातिर इसके प्रचार प्रसार में हम कृत संकल्प हैं जहां तक मजबूरी हैं वहीँ बस अंग्रेजी में …. आभार आप का भ्रमर ५

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    November 13, 2011

    अंग्रेज बन हिंदी वालों को …पढ़ें कृपया

Amita Srivastava के द्वारा
October 29, 2011

पियूष भाई आप मंच से कहाँ गायब हो गये ? आप ने ही मेरी रचना पर प्रथम प्रतिक्रिया दी थी मंच पर आपकी अनुपस्तिथि क्यों ………

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    November 8, 2011

    आदरणीय अमिता जी ….सादर अभिवादन इस मंच पर आप अकेली नहीं बल्कि सैंकड़ो ब्लागर है जिनको की उस मंच पर प्रथम प्रतिकिर्या हमारे पियूष भाई ने दी है ….. मुबार्कबाद और मंगलकामनाये न्ये साल तक आने वाले सभी त्योहारों की बधाई :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/11/05/“भ्राता-राजकमल-की-शादी”/

Tufail A. Siddequi के द्वारा
September 15, 2011

पियूष भाई अभिवादन, हिंदी दिवस पर आईना दिखाती सार्थक और बहुत सुन्दर पोस्ट. बधाई. http://siddequi.jagranjunction.com

Vinita Shukla के द्वारा
September 15, 2011

पीयूष जी, एक अरसे के बाद आपकी रचना पढ़कर बहुत अच्छा लगा. यह कहानी भले ही काल्पनिक हो, पर अंग्रेजी के हिमायती लोगों के लिए सबक जरूर है. सच है, अँगरेज़ तो चले गए पर अपनी ‘अंग्रेजियत’ यहीं छोड़ गए.गुलाम मानसिकता पर करारा वार करती हुई सार्थक पोस्ट. बधाई.

Ramesh Bajpai के द्वारा
September 14, 2011

प्रिय श्री पियूष जी ” न जाने कितनी बार फ़ौज और फौजियों के प्रति मैं नतमस्तक हुआ था……. उनके देश के प्रति किये कार्यों के कारण …………. पर हर बार बीच में उनकी वर्दी थी ……….. पर आज इस अवकाश प्राप्त कर्नल ने साबित कर दिया की फौजी मरते दम तक देश के लिए जीता है……” बहुत कुछ कह रही है आपकी यह सुन्दर पोस्ट | बहुत बहुत बधाई |

वाहिद काशीवासी के द्वारा
September 14, 2011

पीयूष भाई, नमस्कार। हम स्वतंत्र तो हो गए मगर हमारी सोच आज भी दासता की बेड़ियों में जकड़ी है। हिंदी केवल राजभाषा नहीं, राष्ट्रभाषा भी है और मेरे लिए तो मातृभाषा भी है। आपकी कहानी के भाव अत्यंत ही सुन्दर हैं। इससे मुझे एक वाक़िया याद आ गया जब मेरा फ़ोन खो गया था और मैं शिक़ायत दर्ज़ कराने कंपनी के ऑफिस पहुंचा तो मुझे अंग्रेज़ी वार्तालाप से जूझना पड़ा। मैं हिंदी में ही बात करता रहा और जवाब अंग्रेज़ी में ही मिलते रहे। दुर्भाग्यवश अधिकतर उत्तर मुझे sorry के रूप में मिले अंततः जाते-जाते अंतिम उत्तर भी जब मुझे अंग्रेज़ी में sorry ही मिला तो विवश हो कर मैं उठ खड़ा हुआ और उन्हें अंग्रेज़ी का ही जवाब दिया कि Whatever I asked or enquired was answered as sorry but you should know that ‘a sorry doesn’t make a dead man alive.’ और इसके बाद उस लड़की का चेहरा देखने लायक था। अन्य मातृभाषाओं वालों को देखें वो जब भी कहीं मिल जाते हैं तो अपनी भाषा में ही बात करते हैं मगर हिंदी भाषी राज्यों में ये चलन नहीं है, बल्कि वे तो अंग्रेज़ी को स्टेटस सिम्बल या प्रतिष्ठा का प्रतीक मानते हैं। शर्म आनी चाहिए ऐसे लोगों को जो अपनी भाषा का तिरस्कार करते हैं बल्कि धिक्कार है उन पर। मैंने कई भाषाओँ का अध्ययन किया है मगर आज भी जब वक़्त होता है तो मैं हिंदी का ही प्रयोग करता हूँ। आपके इस लेख पर हार्दिक बधाई आपको।

nishamittal के द्वारा
September 14, 2011

पीयूष जी पिछले वर्ष जब आपने ये आलेख प्रकाशित किया थाताब भी पढ़ा था ये आलेख सदा प्रेरणादायी है.

naturecure के द्वारा
September 14, 2011

पियूष जी , हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ एक प्रेरणास्पद रचना के लिए बधाई |

Santosh Kumar के द्वारा
September 14, 2011

पियूष जी ,.सादर नमस्कार हिंदी के लिए यह सम्मान हर दिल में पैदा होगा तभी सार्थक बदलाव हो सकता है ,..कर्नल साहब का अभिनन्दन ,..मुझे भी कई बार सामने वाले से हिंदी में बात करने के लिए बोलना पड़ा ,…और मैंने उसे शरमाते हुए भी देखा है ,…भारतेंदु हरिश्चंद्र जी ने लिखा है ,….निज भाषा उन्नति अहै ..सब उन्नति को मूल … आज यह बात बहुत प्रासंगिक है ,…अत्यंत प्रेरक पोस्ट के लिए आपका हार्दिक आभार http://santo1979.jagranjunction.com/

VIKAS के द्वारा
September 14, 2011

हमारी युवा पीढ़ी हिन्दी को आउट ओफ़ फैशन समझने लगी हैं. अच्छा लेख

alkargupta1 के द्वारा
September 14, 2011

पियूष जी , हिंदी को राष्ट्र सम्मान देने वाले ऐसे महान व्यक्तित्त्व के प्रति गर्व से नतमस्तक हो जाती हूँ कभी-कभी ऐसा महसूस करती हूँ कि कहीं न कहीं अभी भी हिंदी को पूर्ण रूप से तो नहीं पर कुछ तो सम्मान मिल रहा है….हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं !

abodhbaalak के द्वारा
September 14, 2011

पियूष भाई सच कहा आपने, अब हिंदी बोलने वाले को हीन भावना के साथ ही देख जाता है और समाज में उसे ही सम्मान के साथ ………….. बहुत सुद्नर रचना, काश हमारी राष्ट्र भाषा को वो सम्मान मिलता जिसकी … http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

rita singh 'sarjana' के द्वारा
September 22, 2010

पियूष जी , देर से प्रतिक्रिया दे रही हूँ .क्षमा चाहती हु दरअसल में नेट की खराबी के कारण समय पर लिख नहीं पा रही हूँ l बहुत बढिया लेख प्रेषित किया है आपने बधाई l चाहे अंग्रेजी का व्यव्हार कही पर भी जरुरी हो पर जब एक व्यक्ति हिंदी बोल रहे हैं तो उनका निरादर नहीं होनी चाहिए l यह अलग बात होती अगर कोई अंग्रेज उस लड़की से मुखातिब हुआ होता l भगवान करे उसे अपने देश की भाषा पर गर्व होने की सुमति मिले l ऐसे कितने देश का उदाहरण हमारे सामने है जहाँ अपने जुबान की अहमियत पहले फिर दूसरी भाषा की है l बल्कि बाहर (विदेश ) जाने से पहले वहां की भाषा की ट्रेनिंग लेते भी देखा गया है l फिर क्यों हमारे देश में अपनी भाषा का निरादर होता है? यह कितनी शर्म की बात हैं l

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 22, 2010

    आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया………………

rajesh gupta advocate के द्वारा
September 21, 2010

हिंदी का विकास जब ही संभव हैं जब इसे रोजगार से जोड़ा जाये.सेंट्रल गवर्नमेंट तथा प्रदेश सर्कार के कम इंग्लिश में होते हैं.हाई कोर्ट की भाषा इंग्लिश हैंइंजिनीरिंग,मैनेजमेंट, मेडिकल जैसी पढाई इंग्लिश में ही होती हैं.यहाँ तक की प्राइवेट स्कूल्स में दसवी के बाद हिंदी अनिवार्य नहीं हैं कंप्यूटर, मोबाइल ने भी हिंदी को बेगाना कर दियां हैं.हिंदी को पोपुलर बनाने के लिए इसको सरल,thatha नए परिवेश में ढालना जरूरी हैं. हिंदी वालों को रोजगार मिलने लगेगा तो हिंदी पोपुलर हो ही जाएगी.बेचारी हिंदी आज फिल्म व टीवी के बल पर ही गैर हिंदी प्रदेशों में अपना दमन फैला रही हैं. इसमें सर्कार का कोई योगदान नहीं हैं.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 22, 2010

    आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……………………

rajesh gupta advocate के द्वारा
September 21, 2010

उत्तर प्रदेश की पहचान- सड़के कम गड्डे ज्यादा, जगह-जगह घूमते आवारा पशु,गोबर,कचरा पान की पीक, पॉवर कट्स,सरकारी institutes की बदहाली,सरकारी कार्यालयों में नुएनतम सुविधा.वाट के नाम पर जनता के पैसे की बर्बादी. आखिर हमें इससे कब निजत मिलेगी.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 21, 2010

    राजेश जी………….. इन सबके दोषी कही न कहीं हम सब है………. ये पशु पहले पाले हमने फिर जब उपयोगिता ख़त्म हुई तो छोड़ दिया… और इन सबसे निजात पाने के लिए हमसब को मिल जुलकर कुछ करना होगा……. क्योकि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता……….

navneet k srivastava के द्वारा
September 21, 2010

पीयूष जी आपने सही लिखा हिंदी अपनों के बीच ही परायी होती जा रही है..। अच्छे लेख के लिए बधाई..। 

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 21, 2010

    हौसलाफजाई के लिए शुक्रिया…………. आशा है आप और हम सब इसको पराया नहीं होने देंगे…………

Munis Dixit के द्वारा
September 21, 2010

हिंदी पर अच्छा लेख है पियूष जी बहुत बहुत बधाई

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 21, 2010

    हौसलाफजाई के लिए शुक्रिया……

div81 के द्वारा
September 21, 2010

पियूष जी, हिंदी दिवस के आते है हिंदी के नाम पर प्रतियोगिता शुरू कर दी जाती है वहीँ ऑफिस में सिर्फ कुछ दिनों के लिए हिंदी को महत्त्व दिया जाता है यही सोच बदलनी होगी अच्छा लेख बधाई

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 21, 2010

    जी सही कहा आपने……….. मुझे याद है… पिछली बार हमारे विभाग ने हिंदी पखवाडा मनाया था…… जहाँ कॉन्वेंट स्कूल के बच्चों को बुलाया गया था………… और हमारे कार्यालय में जहाँ ये कार्यक्रम था …… वहीँ टीचरें बच्चों को वो सारे नियम जो की हमारे मित्र व सहयोगी द्वारा समझा दिए गए थे उन्हें अंग्रेजी में समझाने लगीं………… आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……

siddequi के द्वारा
September 21, 2010

piyush ji badhai.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 21, 2010

    शुक्रिया Siddequi Ji ……

Sanowar के द्वारा
September 21, 2010

पियूष जी हिंदी पर अच्छा लेख है आप का और साथ में इन्शानियत के लिए दर्द का एह्शास

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 21, 2010

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया…… जो लोग इस समय तकलीफ में हैं उनको हम बाकी कुछ नहीं तो अपनी संवेदनाये तो दे ही सकते हैं………….आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……

rkpandey के द्वारा
September 21, 2010

पीयूष जी, बिलकुल सही और उत्प्रेरक संस्मरण लिखा आपने जिसके लिए आपको बधाई. हिंदी की रोटी खाने वाले भी इसका निरादर करते हैं तो वाकई इससे ज्यादा दुखद बात क्या होगी.

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 21, 2010

    सही कहा आपने की हिंदी की रोटी खाने वाले भी इसका निरादर करते हैं …………. वास्तव में ये भी गद्दारी से कम नहीं…………. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुर्क्रिया……….

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
September 21, 2010

आपको लेख पसंद आया तो मेरा लेख भी सार्थक रहा………… हार्दिक शुक्रिया…………

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
September 21, 2010

परम आदरणीय शाही जी………… सही कहा आपने……… सिक्के का दूसरा पहलु ये भी है…….. की कई बार ग्राहक कर्मचारी को अंगरेजी का रोब दिखा जाता है……….. इस सम्बन्ध में भी एक वाकया है……… कभी आपलोगों के साथ बाटूंगा……….. आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए शुर्क्रिया……….

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
September 21, 2010

चातक जी……….आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया……… आप जैसे कुछ लोगों की सकारात्मक प्रतिक्रियाएं लेख को सार्थक सिद्ध कर देती हैं……….. कई बार जब आपकी लोगों की ये प्रतिक्रियाएं नहीं आ पाती तो लगता है कुछ कमी रह गयी………. पर उसको खोजने की लिए जो नज़र पारखी नज़र चाहिए वो भी तो नहीं है…………. अन्यथा कोई त्रुटी ही न हो………..

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
September 21, 2010

आदरणीय बाजपाई जी………. हार्दिक शुक्रिया की आपने अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया दी……….

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
September 21, 2010

smma जी ये काश से नहीं प्रयास से ही हो सकेगा……… हौसलाफजाई के लिए शुक्रिया…

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
September 21, 2010

हौसलाफजाई के लिए शुक्रिया… बाढ़ पीढीतों के प्रति संवेदना प्रकट करने हेतु शुक्रिया……..

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
September 21, 2010

सही कहा आपने कई बार तो बच्चे को आम दिखा के पूछो की बेटा ये क्या है और वो कहता है मैंगो………. तो तीर से लगते है कलेजे में……………. की कैसे होगा हिंदी का भला…………. क्या हमारी पीढ़ी के साथ ही हिंदी ग्लोबलाईजेशन की भेंट चढ़ जाएगी……….


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