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खत्म होती नैतिकता......

Posted On: 19 Nov, 2011 Others में

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इस मंच पर एक लंबे समय बाद कुछ लिख रहा हूँ.. कुछ वक्त की कमी और कुछ इस बात का रंज की यहाँ लिखने से भी कुछ नहीं होता… क्योकि कहीं न कहीं हम स्वकेंद्रित हो गए है… हम निंदक नियरे राखिए आँगन कुटी रमाय पढ़ते पढ़ाते तो हैं…… पर इसके भाव को नहीं पकड़ते हैं…. कबीर दास जी ने यहाँ निंदक की बड़ी सुंदर व्याख्या की थी उन्होने कहा था की निंदक की निंदा को सकारात्मक रूप मे लेकर हम अपनी कमियों को दूर कर सकते हैं…पर वास्तविक जीवन मे हम निंदक को सकारात्मक रूप मे लेने को तैयार ही नहीं है..
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यहाँ भी हम कुछ विशेष नहीं कर रहे…. साहित्य समाज का आईना होता है…. वो समाज का प्रहरी है…. उसके शब्द समाज को दिशा देने के योग्य होने चाहिए पर यहाँ हम राजनीति कर रहे हैं…… हम गलत देखकर भी मूक हैं क्योकि हम अपने वोट (कमेन्ट) नहीं काटना चाहते हैं….. पर याद रखें आपका अपना सच्चा हितैषी वही होता है जो आपको आईना दिखाता है….. आपकी हर बात पर प्रसंसा से आपको कमजोर बनाने वाले से कहीं बेहतर वो व्यक्ति है जो आपको उलाहना देकर आपको सक्षम बनाने की कोशिश करता है….
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इस मंच पर हमेशा से ही राजकमल जी ने हर छोटी बड़ी खामी के खिलाफ अपना पक्ष रखा है…. एक बार फिर यही देखने को मिला जब आदरणीय बाजपई जी को भी यहाँ कमेन्टों मे हो रही बदतमीजी के लिए लिखना पड़ा….. क्योकि हमने पहली बार जब इस तरह की घटना हुई तो उसे यूं ही जाने दिया होगा….
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फेसबुक पर एक शेर पढ़ा …….
दोस्तों से बिछड़ कर ये हकीकत खुली गालिब…
बेशक कमीने थे मगर रौनक उनही से थी……
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फिर मैंने अपने फेसबुक स्टेटस पर अपडेट किया …..
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दोस्ती पर दो पंक्तियाँ………
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जो दोस्त कमीने नहीं होते……..
वो कमीने दोस्त नहीं होते……..
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कई लोगों ने इसे लाइक किया और कई लोग अनदेखा कर गए….. पर विरोध किसी ने नहीं किया… हालांकि कुछ से मुझे बड़ी आशा थी की वो शायद इस पर मुझे कुछ कहें… पर कोई कुछ नहीं बोला….. क्योकि शायद उन्हे ये आशंका थी की कहीं मैं बुरा न मान जाऊँ…. पर किसी ने ये नहीं सोचा की इसका एक असर ये भी होगा की वो सभी लोग जो इसे मौन स्वीकृति मान लेंगे वो आगे इसका लगातार प्रयोग करेंगे……..
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कई लोगों ने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया क्योकि वास्तव मे हमने कमीने शब्द को इस तरह से अपनी बोलचाल की भाषा मे अपना लिया है की अब ये गाली सी लगती नहीं….. इस शब्द को लेकर फिल्म बना दी गई है….. और हमने उसे एक फिल्म की ही तरह देख कर ये पुष्टि की कि ये शीर्षक हमें स्वीकार है….. और उस एक स्वीकृति ने इसे एक हिन्दी शब्द की मान्यता दे दी…. और अब हालत ये है की आप किसी बच्चे को भी ये नहीं कह सकते की ये शब्द एक गाली है….
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कुछ ऐसा ही इस देश मे घट रहा है…. जिसे हम मौन स्वीकृति दे रहे हैं…और जिसके भयानक दूरगामी परिणाम होंगे…….. किसी चैनल पर एक शो प्रसारित किया जा रहा है बिग बॉस…. जिसके बारे मे कई अशोभनीय तथ्य अखबारों और अलग अलग लेखों पर प्रकाशित होते रहे पर कोई फर्क नहीं पड़ा….
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पहले राखी सावंत ने इसमे अश्लीलता का प्रारम्भ किया फिर कुछ और महिलाओं को इसमे शामिल किया गया… पर क्योंकि हम इसे यूं ही देखते रहे इस लिए अबकी बार इसमे पूनम पांडे को शामिल करने को लेकर चर्चा बनाई गई… पूनम पांडे जो की अपने अश्लील बयानो व चित्रों को लेकर चर्चा मे रहीं है…. को इसका हिस्सा बनाया जा रहा था… पर फिर किसी अन्य भारतीय मूल की विदेशी महिला को इसका हिस्सा बनाने का फैसला लिए जाने संबंधी खबर प्रकाश मे आई…… ये महिला कोई आम महिला नहीं है…. इन्हे अश्लील फिल्मों की स्टार का रुतबा हासिल है…
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अब मुख्य विषय ये है की क्या इस तरह टीआरपी बढ़ाने के नाम पर परोसी जा रही अश्लीलता को हम यूं ही स्वीकारते रहें…….. अगर हम इसे स्वीकार कर लेते हैं तो कल इस आधार पर हम अपनी भावी पीढ़ी को ये समझा पाएंगे की ये संस्कृति के विरुद्ध है..
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शालीनता नारी का आभूषण है ये बात कैसे उनके गले उतरेगी जब की हम अश्लीलता को स्वीकार कर रहे हैं….. इसी तरह हम सब कुछ यूं ही चुपचाप स्वीकार करते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब नग्नता नारी का आभूषण बन जाए….. इस से पहले की सीता, सती सावित्री, अपाला, गार्गी जैसी महिलाओं को आदर्श मानने वालों के देश मे राखी सावंत और पूनम पांडे जैसी महिलाओं का वर्चस्व हो जाए…. विरोध करना होगा..
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अगर आप किसी बात का खुल कर विरोध नहीं करते हैं तो इसका एक मात्र अर्थ ये है की आप उसे स्वीकार करते हैं…. आप ये कहकर बच नहीं सकते की मैंने कभी इसके समर्थन मे कुछ नहीं कहा….. क्योकि अगर आप मौन रहे तो इसका सीधा सा अर्थ है की आप समाज के भय से इसका खुल कर समर्थन नहीं कर पाये….
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आशा है नकली दोस्त बनने के स्थान पर सच्चे हितैषी बनकर सही राय दें……
ताकि आवश्यकतानुसार अपने विचारों को बदला जाए……

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19 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

अलीन के द्वारा
February 6, 2012

पीयूष जी, बहुत अच्छा लगता जब कोई उपासना से उठकर नैतिकता और अध्यात्म की बात करता है. पर काश हम सभी इसका अनुकरण भी उसी भाव से करते तो ये दुनिया कितनी खुबसूरत हो जाती,…है न

Tamanna के द्वारा
November 21, 2011

पियूष जी, दोस्तों के बिना जीवन बिलकुल निरस हो जाता है. अच्छे दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं. लेकिन अगर मिल जाएं तो उन्हें सहेज कर रखना हमारा दायित्व बन जाता है. मौन रहना स्वीकृति का संकेतक हैं, इससे हम यह प्रमाणित करते हैं कि हमे इसमें कोई आपत्ति नहीं हैं. क्योंकि आपत्ति होती तो इसे जाहिर अवश्य किया जाता है.

November 21, 2011

पीयूष जी ! बधाई हो सुंदर विश्लेषण के लिए। आज के दौर मे लोग दूरगामी विकास एवं उन्नति की बात करना भी पसंद नहीं करते। बस सफल, संतुष्ट हो जाये चाहे वो क्षणिक ही क्यूँ न हो बस जल्दी पड़ी है हर इंसान को ॥पर पता नहीं कहाँ जाना है और क्या उद्देश्य है। अगर आप किसी की कमी बताओगे तो फिर तो उसे उस क्षणिक सुख से वंचित करोगे जो वो हरगिज नहीं चाहेगा…और फिर कौन निंदक रख के कमी दूर करवाए…उसे तो बस झूँठ ही सही बस कोई प्यार कर ले वाला फलसफा पसंद है..बस कमेंट कर दो चाहे कुछ हो या न हो …ईश्वर रक्षा करे !!

alkargupta1 के द्वारा
November 20, 2011

पियूष जी , बहुत दिनों बाद आपका अर्थपूर्ण और विचारणीय आलेख पढने को मिला जो हमारी संस्कृति के विरुद्ध है अनैतिकता जिसमे है विरोध तो अवश्य ही होना चाहिए पर सीमित दायरे में नियंत्रित भाषा में…..यहाँ मौन कदापि स्वीकार्य नहीं है…..!

Paarth Dixit के द्वारा
November 20, 2011

आदरणीय पियुष जी, नमस्कार.. आपके द्वारा गए मुद्दे का मै भी समर्थन करता हूँ..आखिर कब तक हम लोग गलत को गलत कहने से डरेंगे..बिलकुल सही कहा आपने समाज से नैतिकता तो खत्म ही होती जा रही है..हमारा सेंसर बोर्ड अंधा हो चुका है तभी तो दिल्ली बेली और इस जैसी फिल्मो को गालियाँ होने के बावजूद पास कर देता है..हर टीवी चैनल अश्लीलता परोस के टी आर पी और पैसा कमाने में लगा हुआ है..एक अच्छा लेख…सोचने पर मजबूर करता लेख…हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाए..

sumandubey के द्वारा
November 20, 2011

पीयुश जी नमस्कार, बहुत सही कहा आपने अब मौन तोड़ना होगा और शालीनता से बुराइयों का मुखर विरोध करना होगा।

shashibhushan1959 के द्वारा
November 20, 2011

मान्यवर पन्त जी, सादर. “”शालीनता नारी का आभूषण है ये बात कैसे उनके गले उतरेगी जब की हम अश्लीलता को स्वीकार कर रहे हैं….. इसी तरह हम सब कुछ यूं ही चुपचाप स्वीकार करते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब नग्नता नारी का आभूषण बन जाए…………”" लेकिन आज के वर्तमान समय में जब नारी ही इसे अपनी स्वतन्त्रता की पहचान बना ले तो …………… नारी की आजादी का उपरोक्त अर्थ ही ज्यादा प्रचलित हो गया है. स्थिति बहुत विकट है, और समाधान पहुँच से दूर.

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
November 20, 2011

पियूष पन्त जी बहुत अच्छा विषय आप का निम्न पंक्तियों में बड़ा दम है …जब लोग अपने निजी स्तर पर ..खुद से ..खुद को ..आस पास उपचार इसका करना शुरू करें तो क्यों नहीं हो सकता सब संभव है …लेकिन सब चुप रह जीवन काट ले जाते हैं ..और अश्लीलता पैसा कमाने का जरिया बनती जा रही है ….भ्रमर ५ इसी तरह हम सब कुछ यूं ही चुपचाप स्वीकार करते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब नग्नता नारी का आभूषण बन जाए….. इस से पहले की सीता, सती सावित्री, अपाला, गार्गी जैसी महिलाओं को आदर्श मानने वालों के देश मे राखी सावंत और पूनम पांडे जैसी महिलाओं का वर्चस्व हो जाए…. विरोध करना होगा..

vinitashukla के द्वारा
November 20, 2011

आपका कहना बिलकुल सही है. समाज में रहकर, अपने नैतिक दायित्वों से कन्नी काट लेना, अपने आपमें अनैतिक आचरण ही है. एक तरफ तो हम समाज को बदलने वाली बातें कहते है पर दूसरे ओर सामाजिक विद्रूपों को देख चुप्पी साध लेते है. यदि सही अर्थों में बदलाव लाना है तो अपने नैतिक दायित्वों का निर्वाह करना ही होगा.

Ramesh Bajpai के द्वारा
November 20, 2011

प्रिय श्री पियूष जी आप इस मंच के प्रतिष्ठित व बहुत सजग लेखक है | आप ने नैतिकता , सुचिता व मर्यादा को सदा जीवंत रखा है तथा इनको क्षति पहुचने वाले तत्वों का विरोध किया है | सामाजिक जीवन में नैतिक मूल्यों का समावेश व मानवीय मूल्यों का सतत प्रवाह होना चाहिए | हम सब को आप पर गर्व है | जागरूकता की यह मशाल जलती रहेगी तो कारवा चलता रहेगा | बहुत बहुत बधाई ,शुभकामनाये |

Rajkamal Sharma के द्वारा
November 19, 2011

प्रिय पियूष भाई ……आदाब ! आप मेरे किसी लेख पर अपना कमेन्ट चाहे न दे लेकिन इसी तरह से अपने लेखो में मेरा नाम शामिल करते हुए मेरी भूख को मिटाते रहे -यही आशा +अपेक्षा और कामना है ….. आपने जो बात कही है उससे हम दोनों ही भली भांति परिचित है ….. क्योंकि स्वामी रामदेव जी के बारे में मत भिन्नता होने के बावजूद हममे सार्थक संवाद हुआ था ….. आदरणीय वाजपेई जी ने ही इस मंच पर पहली बार इस मुद्दे को उठाया है और जागरण द्वारा इसकी रोकथाम के लिए कदम उठाने की बात कहने के साथ वाजपेई जी हम सभी को पीछे छोड़ कर इस मंच मर्यादित की मर्यादा और गरिमा को फिर से स्थापित करके पहले भी कहीं ज्यादा सम्माननीय +इस मंच के इतिहास पुरुष बन गए है -उनको नमन …… इस विचारोतेजक +विचारणीय लेख पर मुबारकबाद

nishamittal के द्वारा
November 19, 2011

पियूष जी बहुत समय बाद आपका विचारपूर्ण आलेख अच्छा लगा.निंदक नियरे राखिये बहुत श्रेयस्कर है,परन्तु निंदा के लिए निंदा करना या स्वार्थ पूर्ती हेतु कुछ भी कहना मेरे विचार से पर उपदेश कुशल बहुतेरे को चरितार्थ करता है.निंदा सकारात्मक हो ठोस बिन्दुओं पर हो और निंदक स्वयं निंदा करने वाले विषयों में लिप्त न हो,तभी निंदा का औचित्य है.मंच की गरिमा जैसा कि आदरनीय बाजपेयीजी ने लिखा है,बनाये रखनी आवश्यक है.अमर्यादित भाषा का प्रयोग चाहे प्रतिक्रिया के रूप में हो या फिर किसी भी आलेख के रूप में सर्वथा अनुचित.स्वयं शराब पीने वाला यदि मदिरापान से बचने या जुआरी जुआ न खेलने का उपदेश दे तो न्यायोचित कैसे हो सकता है

omdikshit के द्वारा
November 19, 2011

पन्त जी , नमस्कार. सीता,सती सावित्री और गार्गी अब किताबों तक सीमित रह गई हैं.नारी-मुक्ति का मतलब नग्नता और फूहड़पन होने से मान लिया गया है . इसे जनता की मांग बता कर सारी हदें पार की जा रही है.हम आप के विचारों से सहमत हैं.

Santosh Kumar के द्वारा
November 19, 2011

पियूष जी ,.सादर नमस्कार आपने बहुत सही मुद्दा उठाया है,..हम सब अब पलायनवादी होते जा रहे हैं,.. विरोध की आवश्यकता समझने से ज्यादा हम उसके परिणाम से होने वाले अपने संभावित नुक्सान पर ध्यान केन्द्रित कर देते हैं ,.फलतः गन्दगी को गुणांक में बढ़ने का अवसर सहज ही मिल जाता है,…विरोध दर्ज ना करना मौन स्वीकृति ही है ,..तो हम सब गन्दगी बढाने में अपनी भागीदारी से इनकार नहीं कर सकते ,..सोच में परिवर्तन होना समाज के लिए आवश्यक है ,…..महत्वपूर्ण बात को सपाट लहजे में प्रस्तुत करने के लिए अभिनन्दन आपका

    akraktale के द्वारा
    November 19, 2011

    पियूष जी मै संतोष जी की बात से सहमत हूँ की हम पलायनवादी हो गए हैं.हम अपने हित से अधिक कुछ नहीं सोचते हाँ चार लोग मिल जाएँ तो कुछ चर्चा समाज में फ़ैल रही गंदगी पर भी कर लेते हैं और फिर भूल जाते है. अब हमको इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता. इसके लिए हमने पहले घर के आँगन को समेटा और अब दरवाजे खिड़कियाँ भी बंद करली अब हमारी दुनिया इसके अन्दर ही है. सार्थक आलेख मगर बहुत अपेक्षा ना करें. धन्यवाद.

krishnashri के द्वारा
November 19, 2011

महोदय , आपने सही मुद्दा उठाया है /आपके ब्लाग पर जाकर मैंने आपकी अन्य रचनाएँ पढ़ी / मन प्रशन्न हुआ / आज जिस गन्दगी की बात हो रही है उसे कमोवेश फैलाने में हम भी जिम्मेदार हैं / प्रत्येक इकाई यदि अपनी जिम्मेदारी समझे तो बात बड़े ही नहीं ,परन्तु हम तो अंधी दौड़ में केवल आगे निकलना ही चाहते हैं /सही मुद्दे के लिए धन्यवाद /

jlsingh के द्वारा
November 19, 2011

पीयूष जी, नमस्कार! आपने बहुत ही सशक्त विषय को उठाया है. आपके विचारों से मैं पूरीतरह से सहमत हूँ. कलर चैनेल पहले महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचारों का पुरजोर विरोध करता हुआ कुछ सिरिअल दिखलाता था बाद में टी. आर. पी. या विज्ञापनों के द्वारा हो रही कमाई के चक्कर में सब कुछ भूल गया. स्वामी अग्निवेश का यह कहना कि ‘बिग बॉस के सदस्य सांसदों से अच्छे हैं —’ यह बात किसी सांसद को बुरी नहीं लगी, नहीं संसद की अवमानना हुई…. अंधेर नगरी ….. और क्या कहा जाय! पर विरोध होना जरूरी है….

वाहिद काशीवासी के द्वारा
November 19, 2011

पीयूष भाई, सच कहा आपने। आज नैतिकता का ह्रास तो हो ही चुका है साथ ही आत्मबल का भी पतन होता जा रहा है। ग़लत को ग़लत कहने से लोग डरते हैं क्यूंकि इसमें कहीं उनका निज स्वार्थ छुपा होता है। व्यक्तिगत स्तर से उठ कर समूह और समाज के स्तर पर समर्थन या विरोध निश्चय ही अनेक अन्य लोगों को भी ऐसा करने को प्रेरित करेगा। सबकी अपनी बाध्यताएं है फिर भी। आज ऐसे लोगों की कमी नहीं जो सामूहिक गौरव को व्यक्तिगत जताते हैं और व्यक्तिगत पतन को समूह का पतन कह कर बरी हो लेते हैं। एक सार्थक लेख के लिए आपको हार्दिक बधाई। आभार सहित,

allrounder के द्वारा
November 19, 2011

पियूष जी, नमस्कार आपके इस धाराप्रवाह लेख मैं काफी कुछ कड़बी मगर अच्छी सच्चाइयाँ छिपी हैं, जिनका अनुसरण करके हम कम से कम इस वैचारिक मंच पर कुछ सार्थक पहल कर सकते हैं, मगर इसके लिए जरुरी होगा अपने विचार रखना और ये तभी होगा जब आप थोडा समय निकाल कर अपने विचार मंच पर रखें, आशा है निरंतरता बनाये रखेंगे ….!


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