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लोकतंत्र में थप्पड़....

Posted On: 24 Nov, 2011 Others में

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केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को आज महंगाई पर जनता के गुस्‍से का हिंसक अंदाज देखना पड़ा। महंगाई से नाराज एक युवक ने उन्‍हें जोरदार थप्‍पड़ जड़ दिया।
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देश भर मे इस घटना पर लोग हर्ष प्रकट कर रहे हैं …
कई लोगों का कहना है की ये सरकार के प्रति जनता का आक्रोश है… और वो लोग इसे उचित भी ठहरा रहे हैं……
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पर वास्तव मे ये एक गंभीर मुद्दा है…..
सभी भारतवासियों को इसकी निंदा करनी चाहिए….. क्योकि हम सभी केवल सतह पर प्रहार कर रहे हैं….. जड़ पर नहीं…
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हम अपना वोट यूं ही जाति, धर्म या फिर किसी अन्य लोभ शराब या फिर नोट के बदले बेच रहे हैं…… जब तक ये चलेगा तब तक हमें इन नेताओं के दुश्चरित्र को झेलना ही होगा…
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और अगर एक बार हम इसे आक्रोश की संज्ञा देकर शांत हो गए तो ये एक परंपरा बन जाएगी… और नेताओं से होकर ये आम जनता को भी झेलनी पड़ेगी……. जब बात बात पर लोग आक्रोशित होकर एक दूसरे पर प्रहार करेंगे…..
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केवल आक्रोश कह कर किसी गलत बात को सही नहीं कहा जा सकता …. यदि आक्रोश की पारिणीती इस तरह की हिंसा को बना दिया जाए… वो भी तब जब की इसका उपाय जनता के ही पास है तो फिर आप उस बच्चे को कैसे समझाएँगे जो सक्षम होने पर अपने पिता पर ही प्रहार कर दे…… क्योकि वो बचपन से अपने पिता की मार व डांट से आक्रोश से भरा था….. और जनता की तरह उसके पास तो 5 साल बाद अपने बाप को वोट न देकर सबक सीखने का कोई अवसर भी न था….
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एक बार अगर आक्रोश के नाम पर इस तरह की हिंसा को न्यायोचित ठहराया जाने लगा तो वो दिन दूर नहीं की जब आप भी कभी भी किसी के आक्रोश का शिकार बन सकते हैं……. क्योकि आक्रोश की कोई व्याख्या नहीं है……. न सकारात्मक न नकारात्मक ….
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एक विद्यार्थी के भीतर अपने शिक्षक के प्रति आक्रोश होता है….. क्योकि वो नहीं समझता की उसका शिक्षक उसकी भलाई के लिए उसको दंडित करता है…. तब क्या होगा शिक्षक का…..
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इस परंपरा को बढ्ने दिया तो वो दिन दूर नहीं जब सरकारी संपत्ति केवल आक्रोश के नाम पर जला दी जाएगी….. जब आक्रोश के नाम पर हर रोज हिंसा आम हो जाएगी……
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हमें आवश्यकता है की हम अपने वोट की ताकत को समझें …. और उसका सही प्रयोग करें… हम इन नेताओं की नौटंकी को अपने वोट की ताकत से जवाब दें…..

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36 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

abodhbaalak के द्वारा
November 29, 2011

पियूष जी जनता में गुस्सा तो बहुत है, देश में बढती हुई समस्याओं को लेकर आम आदमी पर आपने सच कहा है की ये रास्ता ………….., वैसे भी पता नहीं ऐसा क्यों लगा मुझे की इसमें बदनाम हुए तो क्या नाम का ………. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Ramesh Bajpai के द्वारा
November 27, 2011

प्रिय श्री पियूष जी उद्देश्य जो भी रहा हो यह कृत्य उन असफल नीतियों का दुष्परिणाम है जो जनता को सिर्फ स्वार्थ के लिए प्रयुक्त करना चाहते है | इसके विरोध में भी जो हो रहा है दुखद है | यहाँ मिडिया को भी सयम दिखाना चाहिए |

aadi guru के द्वारा
November 26, 2011

भारत मे थप्पड़ और जूता आम जनता के विरोध का माध्यम तेजी से बनता जा रहा है / मुख्य चिंता यह है की राजनेतिक व्यवस्था के खिलाफ आम जनता मे जो रोष है उसका असर हमारे सेना के जवानों खासकर जो नेताओ की सुरक्षा मे है पर नहीं होना चाहिए / महंगाई , जन आंदलनो , भ्रस्टाचार, अन्य देशो मे तख्ता पलट आदि के कारण सब बिन्दुओं पर सतरकता जरूरी है /

November 26, 2011

आपके लेख पर ऊपर लिखी हुई सब बातों से सहमत हूँ. पर उत्तरार्ध में..मुझे कुछ अटपटा लगा, की आज के राजनेता, और जन-सामान्य के सम्बन्ध की पिता-पुत्र से तुलना की गयी.. नेता पिता जैसा होता, तो उसे सम्मान अवश्य दिया जाता.. पर, अगर नहीं है, तो.. वो सम्मान के योग्य कहाँ है..! थप्पड़ कोई समाधान नहीं है, लेकिन चुप्पी भी क्या ही कर पायी है? फिर भी, विचारणीय विषय है.. अच्छा लगा, की इसकी दिशा पर वैचारिक-मंथन प्रबल रीति से हो रहा है.

    पीयूष पंत के द्वारा
    November 27, 2011

    पिता पुत्र और गुरु शिष्य की तुलना नेता से नहीं की गई है…….. तुलना आक्रोश की है….. आप आक्रोश के नाम पर गलत को सही नहीं ठहरा सकते इसके लिए ये उदाहरण लिए गए है…….. क्योकि आज गुरु शिष्य के सम्बन्धों मे जो कटुता दिखाई देती है उसका मूल भी छात्रों का आक्रोश ही बताया जाता है….. बूढ़े माँ बाप को त्याग करने वाले लोग उनके प्रति अपने पूर्व आक्रोश को ही कारण बताते हैं….. अन्य किसी बात मे तुलना नहीं है पर आक्रोश को अलग अलग नहीं किया जा सकता है…. आप अपने को इस परिस्थिति मे रख कर देखेँ आपको भी स्पष्ट हो जाएगा की आक्रोश आपके प्रति भी कई लोगों मे है…….. नाथुराम गोडसे को गलत ठहराने वाले ये भूल जाते हैं की उसके भीतर भी गांधी का पाकिस्तान के प्रति प्रेम आक्रोश का कारण बना था….. ये नेता या जन प्रतिनिधि हमारे लोकतन्त्र के प्रमुख हैं….. और इन्हें इनके कृत्यों का सबक सीखाने के लिए चुनावों की व्यवस्था है….. आप अपना क्रोध वोट से भी दिखा सकते हैं…… तो फिर चोट की क्या आवश्यकता है…. हम यहाँ पर बैठ कर कुछ भी लिख लेते हैं……. पर उस व्यक्ति के आक्रोश की कल्पना भी नहीं कर सकते….. जो की हाड़ कपकपाने वाली ठंड मे बार्डर मे हथियार लिए खड़ा है…. दुश्मन की किसी भी हरकत से निपटने के लिए उसे इन कमजोर नेताओं के आदेश की आवश्यकता है……

sumandubey के द्वारा
November 26, 2011

पियूष जी नमस्कार, मै आपसे सहमत हूं ये सच है जनता परेशान है पर इसे भी जायज नहि कह जा सकता क्यो कि हम ही कभी धर्म के नाम पर कभी जाति के नाम पर चुनाव मे वोट देते है तो भुगतने के लिये भी हमे तैयार रहना पड़ेगा।

s.p.singh के द्वारा
November 26, 2011

प्रिय पियूष जी आपका लेख मति-भ्रष्ट लोगों की आँखे खोलने के लिए काफी है परन्तु, चले हुए कारतूसों के समान सत्ता से दूर हुए यशवंत सिन्हा जैसे नेताओं को क्या कहा जाए जो यह आह्वान करने से बाज नहीं आते कि महंगाई और बेरोजगारी से परेशां लोग हिंसा पर उतर आयंगे क्या किसी नेता को ऐसा आह्वान करना शोभा देता है – दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मंदिर में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है हमारा सबसे बड़ा हथियार हमारा “मत” या “वोट” कह लीजिये वही है लेकिन जनता को उनकी असली ताकत से रूबरू कराने के स्थान पर नेतागण अपने थोड़े से स्वार्थ के कारण जनता को हिंसा में ही झोकना चाहते है यह खतरनाक एवं आत्मघाती कदम जैसा है — देश में महंगाई बेरोजगारी होने के बावजूद भी देश क्यों विकास की ओर अग्रसर है नेताओं को इस बात पर भी ध्यान देने की जरूरत होनी ही चाहिए – जब की यह सर्वविदित है की आज दुनिया में जनसँख्या के अनुसार सबसे अधिक युवा भारत में ही हैं फिर भी सरकार और विपक्ष के नेता लोग उनका सार्थक उपयोग करने के स्थान पर उनके हाथ में केवल खाली कटोरा थमाने और भीख मांगने लिए लालायित कर रहे है – और जहाँ तक सिन्हा जैसे राज नेताओं के आह्वान की बात है उनको इस बात पर ध्यान देना होगा की देश के कई हिस्सों में आधुनिकता से दूर और व्यस्था से नाराज कुछ लोग नक्सलवाद के नाम से जो हिंसा फैला रहे है उन पर तो आज तक काबू नहीं पाया गया है — और अगर शहरी पढ़ा लिखा युवा वर्ग हाथों में हथियार लेकर मैदान में आ गया तो क्या स्तिथि होगी क्या कोई नेता इसकी कल्पना कर सकता है ?

manojjohny के द्वारा
November 25, 2011

पीयूष जी आपको बहुत बहुत बधाई, सही बात सामने को रखने के लिए। मुझे तो इस लेख पर लोगों की प्रतिक्रियाये पढ़कर बहुत आश्चर्य हुआ की अपने को बुद्धिजीवी कहने वाला मीडिया और युवा वर्ग केवल नाक के आगे ही देखता है। हिमांशु भट्ट जी को भी बहुत साधुवाद, जो उन्होने विस्तृत तरीके से आपकी बात को रखा है। कल कोई कांग्रेसी, अन्ना की बातों से आक्रोशित होकर, उन्हें थप्पड़ मारेगा तो क्या कहेंगे? अरबिन्द केजरीवाल के चप्पल या प्रशांत भूषण के थप्पड़ खाने को कैसे हम गलत ठहराएँगे? थप्पड़काण्ड के बीच, जारी मानसून सत्र में रिटेल क्षेत्र में 100% एफ डी आई का बिल पास हो गया। 5 दिनों के सत्र में लोकपाल और महंगाई, पेट्रोल के दाम पर कोई चर्चा तक नहीं हुई। लेकिन जनता खुश। क्या हम सिर्फ नेताओं को दुखी या परेशान करके अपने सारे मुद्दे भूलना चाहते हैं? ये तो नेताओं के हित की बात हुई। जनता का हित कहाँ है? सभी लगभग इस बात पर सहमत हैं की नेता भ्रष्ट हैं, और जनता निर्दोष, दयनीय। क्या नेता मंगल गृह से आए हैं? वो भी इसी समाज का हिस्सा हैं। सच्चाई ये है की हमारा समाज ही भ्रष्ट है। अपने भ्रष्टाचार को मजबूरी, रिवाज, धर्म आदि नामों से सही सिद्ध करता है। केवल नेता को भ्रष्ट, गद्दार दिखाकर अपने को सही साबित करने की कोशिश करता है। आज हर शादी में औसतन लाख रुपया दहेज लिया जाता है, रिवाज या धर्म के नाम पर। कन्या भ्रूण हत्या और दहेज हत्या हो रही है, रिवाज और धर्म की आड़ में। करोड़ों करोड़ों के बेनामी चढ़ावे धर्म के नाम पर क्या खून पसीने से कमाई करने वाला चढ़ा सकता है? पर वो धर्म है। क्या ये सब सिर्फ नेता कर रहे हैं। नेताओं के नाम पर घड़ियाली आँसू बहाने से पहले, निर्दोष, निरीह, धार्मिक, ईमानदार जनता अपने गिरेबान में झांक ले। हम सुधर गए तो देश सुधर जाएगा। लेकिन हम नहीं सुधरेंगे, सिर्फ नेताओं को सुधरेंगे। हम तो निरीह हैं……..

Amita Srivastava के द्वारा
November 25, 2011

पियूष जी नमस्कार देखा जाय तो आज जनता वाकई बहुत त्रस्त है और ये नेताओ के कान मे जूं नही रेंगती | ये विद्रोह अगर सही नही तो बहुत गलत भी नही है | जैसा की एक न्यूज चैंनल पर आ रहा था अन्ना जी की प्रतिक्रिया -एक थप्पड़ बस…..

    akraktale के द्वारा
    November 26, 2011

    आदरणीय पियूष जी, मै अमिता जी की बात से बिलकुल सहमत हूँ.अगर नेता नहीं सुधरे तो विद्रोह तो होना ही है.हम मोटी मोटी बाते करके, की मास्टरजी ने थप्पड़ मारा और पिताजी ने लप्पड़ मारा जिन बातों का इससे दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है, कुछ साबित नहीं कर पायेंगे. खुद को एक थप्पड़ पडा तो लोकतंत्र याद आ गया, देश की करोड़ों जनता की आवाज को कुचलने के लिए संसद सर्वोच्च हो जाता है. एक थप्पड़ पर सारे सांसद एक हो जाते हैं घडियाली आंसू बहाते हैं.मगर कोई ये नहीं कहता की अपना चरित्र सुधार लो. एक थप्पड़ की तिलमिलाहट में नेताजी कहते हैं मै कौन होता हूँ माफ़ करने वाला.पिछले वर्ष को आप क्या भूल गए जब सारे टीवी चेनल बार बार कह रहे थे नेताजी चुप हो जाओ आपके बोलने से ही महंगाई बढ़ रही है तब भी लाकुआग्रस्त जबान खामोश नहीं रह पायी तो फिर जनता से माफ़ी की उम्मीद भी कैसे कर सकते हो? आज सारे विदेशों में क्रान्ति का बिगुल बज रहा है.मगर तब भी हमारा देश खामोश है क्योंकि हमारे यहाँ यही नेता बार बार कहते हैं कि हमारे यहाँ तो लोकतंत्र है. हमारी परिस्थितियाँ तो उनसे भिन्न है. मगर क्या वाकई भिन्न है? अपने आप को जन प्रतिनिधि कहलाने वाले क्या वाकई जन प्रतिनिधि हैं? कहीं तानाशाह तो नहीं है? विचार करें, सुर में सुर मिला देने से कुछ नहीं होने वाला.

    पीयूष पंत के द्वारा
    November 26, 2011

    पर आम आदमी खुद कहाँ सुधार रहा है… इस थप्पड़ प्रकरण के बाद संसद मे लोकपाल पर चर्चा नहीं हुई और केंद्र सरकार ने रीटेल कारोबार में एफडीआई को अनुमति भी दे दी है……… पर जनता चाटे से ऊपर नहीं उठ पाई है….. किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा की देश मे क्या क्या हो रहा है सभी चांटे पर अपनी प्रतिक्रिया देने मे व्यस्त हैं…… कसाब को सरकारी खर्च पर पलते हुए आज 3 साल का समय हो गया पर मुद्दा आज चांटे का ही है… कोई भी सरकार की अक्षमता पर प्रश्न नहीं उठा रहा है…… बस चांटे ही पर प्रश्न और उत्तर चल रहे हैं……. आखिर किस तरह एक चांटा देश के लिए इतना महत्वपूर्ण हो गया…… आखिर आक्रोश का अर्थ क्या है…… ये कोई 4 दिन से भूखा व्यक्ति नहीं था जो अपनी लाचारी और सरकार के निकम्मेपन पर आक्रोशित था…… फिर इस व्यक्ति के आक्रोश का क्या अर्थ है…….. ये सस्ती लोकप्रियता मात्र है…… और जिस तरह से इसे इनता समर्थन मिला है तो शायद इसे परंपरा बनने मे अब देर न लगे……

mparveen के द्वारा
November 25, 2011

पियूष जी नमस्कार, काश ! ऐसा हो पाता. हम वोट से अच्छा नेता तो चुन ले पर उसके लिए अच्छा नेता होना तो चाहिए . यहाँ तो सभी चोर हैं जो सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए नेता बनते हैं और बन्ने के बाद देश को निम्बू की तरह निचोड़ के पी जाते हैं . और अध्यापक और नेता में काफी फर्क है . अध्यापक देश के लिए भावी नागरिक बनाने के लिए दण्डित करता है पर ये नेता क्या करते हैं ये सिर्फ अपना भविष्य बनाने के लिए लोगो के खून तक पी जाते हैं ….. ये राज नीति है इसमें जो चला गया एक बार तो उसको गंदगी का सामना तो करना ही पड़ेगा कोई एक अच्छा नेता हो तो वोट देने के लिए ………

surendra के द्वारा
November 25, 2011

अरे यार…वो थप्पड़ कहाँ था….वो तो ‘लकवा ग्रस्त’ गाल को सीधा करने के लिए एक ‘पंजा-थेरेपी’ थी……

vinitashukla के द्वारा
November 25, 2011

सनसनी फ़ैलाने या शोहरत पाने के लिए – जिस भी कारण से उस युवक ने कृषि मंत्री पर हाथ उठाया वह एक बात है, पर जिस तरह से उसे जनता का समर्थन मिल रहा है; यह बात ख़ास तौर पर विचारणीय है. लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं होना चाहिए पर पानी सर से निकल जाए- ऐसी स्थिति इन ‘माननीय’ नेताओं को भी तो उत्पन्न नहीं करनी चाहिए.

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
November 25, 2011

प्रिय पीयूष जी ..सार्थक लेख विचार करने को प्रेरित करते हुए इसे जायज तो नहीं ठहराना– विरोध का अंदाज अलग होता है लोग यत्र तत्र कर रहे हैं –लेकिन इस तरह के जन आक्रोश को हमारी सरकार को भी नजर अंदाज नहीं करना चाहिए … भ्रमर ५ वो भी तब जब की इसका उपाय जनता के ही पास है तो फिर आप उस बच्चे को कैसे समझाएँगे जो सक्षम होने पर अपने पिता पर ही प्रहार कर दे…… क्योकि वो बचपन से अपने पिता की मार व डांट से आक्रोश से भरा था….. और जनता की तरह उसके पास तो 5 साल बाद अपने बाप को वोट न देकर सबक सीखने का कोई अवसर भी न था….

November 25, 2011

पीयूष जी सुंदर लेख के लिए आप को कोटि कोटि बधाई !बिलकुल सही कहा है आपने कि “हमें आवश्यकता है की हम अपने वोट की ताकत को समझें …. और उसका सही प्रयोग करें… हम इन नेताओं की नौटंकी को अपने वोट की ताकत से जवाब दें…”…वास्तव मे लोकतन्त्र मे हिंसा कि कोई जगह ही नहीं है। अच्छी सोच के साथ अच्छा विश्लेषण और प्रस्तुतिकरण !!

वाहिद काशीवासी के द्वारा
November 25, 2011

पीयूष भाई, इसे आक्रोश कहें या क्षणिक भावावेश इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। बहुतों ने इस घटना की निंदा की और बहुतों ने इसे सराहा भी। ये उस युवक की प्रसिद्धि पाने की अदम्य अभिलाषा या लालसा भी हो सकती है। फिर भी अगर हम इन नेताओं को सबक़ सिखाना ही चाहते हैं तो उसका उपाय आपने सही सुझाया है इन्हें सत्ता और संसद दोनों से ही बाहर का रास्ता दिखाने का। साभार,

HIMANSHU BHATT के द्वारा
November 25, 2011

शरद पवार पर थप्पड़ मारे जाने की घटना को मीडिया और कुछ राजनीतिक दलों ने महंगाई से जोड़ दिया। यह एक तरह से इस घटना का औचित्य साबित करने की कोशिश है। अन्ना हजारे भी इस पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करने से खुद को नहीं रोक पाए और बोले ,‘‘ बस!एक थप्पड!!’’ गोया उन्हे उम्मीद रही हो कि शरद पवार पर और थप्पड़ मारे जाने थे। टीम अन्ना ने भी राजनीतिक लाभ उठाने की नीयत से इसे नेताओं की साख की ओर मोड़ दिया। किरन बेदी और कुमार विश्वास की प्रसन्नतायें भी इसी कारण उनके ट्वीट से बाहर छलक रहीं थी। इस पूरे वाकये पर समझदारी और परिपक्वता की जो अपेक्षा मीडिया और राजनेताओं से थी वे पूरी नहीृ हुई। लेकिन गुस्से की इन व्यक्तिगत अभिव्यक्तियों को यदि इनके विस्तार और संक्रामक रुप में देखें तो समझ में आ जाएगा कि भविष्य में एक गैर जिम्मेदार और सनसनी प्रिय मीडिया, साख खोए नेता और अन्ना हजारे जैसे गैर जिम्मेदार आंदोलनकारी देश के लिए कितनी आफत खड़ी कर सकते हैं। इस देश में बड़ी संख्या में लोग मीडिया से नाराज है।। क्या मीडिया पत्रकारों पर होने वाले हमलों का औचित्य इस आधार पर साबित करेगा कि मीडिया की रिपोर्टिंग सही नहीं हो रही है? क्या उन डाॅक्टरों,इंजीनियरों, वकीलों व्यापारियों और उद्योगपतियों पर थप्पड़ नहीं मारे जाने चाहिए जिन्होने आम लोगों का जीवन नर्क बना दिया है? क्या सरकारी अफसरों,एनजीओ के संचालकों को थप्पड़ नहीं मारे जाने चाहिए? अन्ना हजारे शरद पवार की पिटाई पर खुश हो रहे हैं तक प्रशांत भूषण और अन्ना समर्थकों की पिटाई करने का भी तो एक औचित्य भगत सिंह सेना के लोगों के पास है और उन्हे अपने औचित्य पर यकीन रखने का हक है।आप पीटे जांय तो लोकतंत्र को खतरा और दुश्मन पिटे तो लोगों का गुस्सा? यह कैसा कुतर्क है। यदि हरविदर के थप्पड़ का औचित्य है तो माओवादियों की हिंसा का औचित्य क्यों नहीं है? सरकारों ने करोड़ों लोगों का जीवन दूभर कर दिया है तो वे क्यों नहीं हथियार उठायें? एक विचारहीन थप्पड़ का औचित्य साबित करने में मीडिया के दिग्गजों से लेकर राजनीति और समाजशास्त्र,अर्थशास्त्र के सारे दिग्गज 12 घंटे तक न्यूज चैनलों पर जुटे रहे पर इसी दिन अपनी विचारधारा के कारण आदिवासियों के लिए हथियार उठाने वाले किशनजी की प्रतिहिंसा का औचित्य साबित करने के लिए एक भी आगे नहीं आया। क्या मीडिया और विपक्ष को विचारहीन अराजक हिंसा पसंद है और विचारधारा की हिंसा नापसंद है?किशनजी यदि मानते हैं कि क्रांतिकारी बदलाव के लिए हिंसा जरुरी है या राज्य की हिंसा का जवाब हिंसा ही है तो उसका भी औचित्य है। क्रांति का सपना देखने और उसे बंदूक के दम पर हासिल करने का सपना देखने का भी तो औचित्य है। क्या उनके औचित्य पर चर्चा करने से कारपोरेट मीडिया,संसदीय दल और टीम अन्ना इसलिए डरते हैं कि माओवादी उनकी राजनीति के लिए भी खतरनाक हैं? जबकि हरविंदर से शरद पवार के अलावा किसी को भी खतरा नहीं है। इसलिए सभी एक विचारहीन हिंसा का औचित्य साबित करने मंें जुटे हैं। दरअसल टीम अन्ना और भारतीय मीडिया थप्पड़ को जिस तरह से महिमामंडित कर रही है और जिस चालाकी से उसे जनभावनाओं का प्रगटीकरण बता रही है वह एक खतरनाक खेल है। बाबरी ध्वंस को भी इसी तरह अटल विहारी वाजपेयी ने जनभावनाओं का प्रगटीकरण बताया था। इस देश में हर हिंसक घटना का एक औचित्य है। हर वो वर्ग जिसे साथ अन्याय हो रहा है उसे हिंसा के जरिये अपना गुस्सा अभिव्यक्त करने का औचित्य प्रदान करने का मतलब देश को एक अराजकता की ओर धकेलना हैं। ऐसे में तो मतदाता चुनावों में वोट के जरिये अपना गुस्सा व्यक्त करने के बजाय अपने विधायकों और सांसदों पर जूते फेंकेगा और थप्पड़ो उनकी पिटाई करेगा। भारत में एक भी ऐसा राजनेता नहीं है जिस पर लोगों को भरोसा हो,एक भी नेता ऐसा नहीं है जिस पर लोगों को यह यकीन हो कि वह उनकी नियति बदल सकता है। कांग्रेस-भाजपा से लेकर कम्युनिस्ट पार्टियों तक दलों का नेतृत्व कुलीन और कान्वेंटी नेताओं ने हाईजैक कर लिया है। तीन बड़ी राजनीतिक धाराओं में कोई मास लीडर ही नहीं है। भारतीय राजनीति जब इतनी दरिद्रता से गुजर रही है तब जनता में गुस्सा,मोहभंग और क्षोभ भी होगा।यह लगभग वैसे ही हालात हैं जैसे हिटलर के उदय के समय जर्मनी में थे। नाकारा नेताओं के खिलाफ फैली अराजकता के ज्वार पर ही चढ़कर हिटलर आया था। क्या मीडिया से लेकर टीम अन्ना तक नेताओं को गलियाने वाले सारे लोग हिटलर के लिए ही रास्ता तैयार नहीं कर रहे हैं? क्या यह याद नहीं रखा जाना चाहिए कि तानाशाह सिर्फ सैनिक विद्रोहों के चोर दरवाजों से ही नहीं आए हैं बल्कि वे लोकतंत्र के राजमार्ग से भी गाजे-बाजे और गले में फूलमालाओं के साथ भी दाखिल हुए हैं।चैरीचैरा की हिंसा के बाद सत्याग्रह वापस लेने वाले गांधी मूर्ख नहीं थे।वह जानते थे कि भारत जैसे विशाल देश में लोगों को अपनी मर्जी से हिंसक होने की आजादी देना का मतलब अंग्रेजों देश में सैनिक तानाशाही थोपने का अवसर देना होगा। क्या हम नहीं जानते कि हर असहमति यदि थप्पड़ मारने का यह सिलसिला चल पड़ा तो यह तमाचा किसी दिन पत्रकारों के गाल पर भी पड़ेगा तो किसी दिन अन्ना या किरन बेदी के गाल पर भी। इसे बदलाव और संगठित प्रतिरोध की सकारात्मक ऊर्जा में बदलने के बजाय एक अराजक और विचारहीनता की नकारात्मक ऊर्जा की वकालत करना खतरनाक औा सस्ती लोकप्रियता से प्रेरित प्रवृत्ति है। आज जब देश में किसी में इतना नैतिक बल नही है कि राज्य की हिंसा समेत हर हिंसा का विरोध कर सके तब हममें से हर एक को किसी न किसी के हाथ से तमाचा खाने को तैयार रहना होगा। आपके लेख के लिए बधाई .

allrounder के द्वारा
November 25, 2011

बहुत ही गंभीर विषय होता जा रहा है ये आजकल पियूष जी, जिसकी मैं निंदा भले ही न कर पा रहा हूँ क्योंकि लोग परेशान हैं झुंझलाहट मैं हैं और अपनी हर परेशानी का कारण वे आज के नेता को मानते हैं ! लेकिन आपने अपने लेख के माध्यम से जो तथ्य सामने रखे हैं उनसे मैं सहमत हूँ और इस प्रकार की हिंसा की प्रशंशा भी नहीं कर सकता ! दूसरी एक और चीज मुझे चिंतित कर रही है की अभी तक जिस किसी भी राजनेता पर हमला हुआ उसमे प्रहार करने वाले के अतिरिक किसी और पर प्रभाव नहीं पड़ा ! किन्तु शरद पवार के केस मैं देखने मैं आ रहा है की उनके समर्थकों ने सड़कों पर उतर कर हिंसक विरोध शुरू कर दिया है, जिसका खामियाजा भी आम जनता को ही भोगना पड़ रहा है ! और यदि ये परम्परा शुरू हो गई तो शायद ये हमारे देश के लिए और भी खतरनाक होगा !

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    November 25, 2011

    नमस्कार दिवेदी जी, आपकी बात से मै सहमत हूँ.

munish के द्वारा
November 25, 2011

पियूष जी, थप्पड़ वाले प्रसंग को समय…….और परिस्थिति…….., के हिसाब से देखा जाए तो शिक्षक और विद्यार्थी वाला उदाहरण गलत है, और दोनों परिस्थितियों को एक सा नहीं माना जा सकता. रही बात थप्पड़ बनने की तो आप चिंता न करें……. ऐसा नहीं होने वाला……. भगत सिंह आदि को देखने के बाद देश पर बलिदान होने की परंपरा आज तक नहीं पड़ी है हाँ अहिंसा की परंपरा पद चुकी है……… मेरा मानना है जब किसी व्यक्ति की समझ में अहिंसा की बात न आ रही हो तो उसकी नाक पर कसके घूँसा जमा दो अहिंसा का महत्त्व अपने आप समझ में आ जाएगा …….. और ये थप्पड़ जो मंत्री जी के गाल पर पड़ा है वाही अहिंसा का महत्त्व समझाने के लिए ही पड़ा है…… अब समझ जाएँ तो ठीक नहीं तो ………..! http://munish.jagranjunction.com/2011/11/25/%e0%a4%a5%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a5%9c-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a5%82%e0%a4%81%e0%a4%9c/

    Piyush Kumar Pant के द्वारा
    November 25, 2011

    मुनीश जी…. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद…. भगत सिंह आदि को देखने के बाद देश पर बलिदान होने की परंपरा आज तक नहीं पड़ी है हाँ अहिंसा की परंपरा पद चुकी है…… कृपया इस तरह की हरकतें करने वालों को भगत सिंह से तुलना न करें.. उस बौद्धिक स्तर पर जहाँ भगत सिंह थे आज बड़े बड़े नेता कभी नहीं पहुँच सकते………. पर आप वर्तमान घटनाओं पर नज़र डालें तो पता चले की वास्तव में ये आक्रोश के नाम पर सस्ती लोकप्रियता पाने का हथकंडा बनता जा रहा है…. और इस लोकप्रियता के नाम पर अरविन्द केजरीवाल को भी निशाना बनाया जा चूका है… जबकि उनके खिलाफ आक्रोश जैसी कोई बात समझ नहीं आती…. जहाँ तक विद्यार्थी वाले उदहारण की बात है तो वो भी आवश्यक है क्योंकि आज भी कई शिक्षक छात्रों के आक्रोश का शिकार बन रहे हैं…. इस लिए उस आक्रोश की बात भी जरुरी थी………. क्योंकि आक्रोश तो सिर्फ आक्रोश ही है….

shashibhushan1959 के द्वारा
November 25, 2011

मान्यवर पियूष जी, सादर. मैं आदरणीय तमन्ना जी की बातों से शत-प्रतिशत या कोई इससे भी अधिक का आंकड़ा हो तो उतने प्रतिशत तक सहमत हूँ. आपने कहा- “”अगर एक बार हम इसे आक्रोश की संज्ञा देकर शांत हो गए तो ये एक परंपरा बन जाएगी…”" मान्यवर, अगर भ्रष्टाचार और घोटाले परम्परा बनेंगे, अगर इन नेताओं का अपने वादे से पलटना परम्परा बनेगा, जनता को लूटना-खसोटना परम्परा बनेगा, भ्रस्टाचारियों को बचाना परंपरा बनेगा, आम जनता को महंगाई की चक्की में पिसते हुए और कराहते हुए देखकर भी असमर्थता जाहिर करना परम्परा बनेगा तो, जनमानस भी तो कोई एक परंपरा बनाएगा. इसपर इतना विवाद क्यों ? एक्शन के प्रतिकूल रि-एक्शन तो होता ही है. सधन्यवाद.

    Piyush Kumar Pant के द्वारा
    November 25, 2011

    जहां तक वर्तमान परिदृश्य की तुलना अँग्रेजी साम्राज्य से करने की है….. तू ये सर्वथा अनुचित है…. तब हमारे पास कोई अधिकार नहीं थे…. पर लोकतन्त्र मे वोट नाम का हथियार आपके पास है…. पहले हम ही किसी को भी अपना मत जाति, धर्म, क्षेत्र, परिवार या किसी दल विशेष के प्रति निष्ठा के चलते व्यर्थ कर देते हैं…. और फिर जब जाति, धर्म, क्षेत्र, परिवार की राजनीति करने वालों के द्वारा छले जाते है तो यही सब करते हैं जो कल हुआ…. एक दिन सारा देश अन्ना के पीछे खड़ा हो जाता है…. और लगता है की कुछ परिवर्तन देश की जनता की सोच मे हुआ है….. फिर ये नेता अन्ना पर ही उंगली उठाते हैं…. और वही सारी भीड़ मिलकर उनपर उंगली उठाने लगती है…. इस सोच के साथ विकास किस अर्थ मे होगा… हम मुद्दों को समझे बिना ही अपनी राय कायम करने के आदि हो गए है… यदि हाथापाई से ही कीमतें घटने बढ्ने लग जाएँ तो फिर सांसदों को संसद मे ही ये सब करने को कहा जाए…. और वहीं से महंगाई कम हो जाए…. अक्सर सही करने वालों के भी कई विरोधी हो जाते है…. आप एक दिन नियम के अनुरूप चल कर देखें और आप पाएंगे की उसी दिन आपके कई विरोधी पैदा हो गए…. और यदि ये आपके खिलाफ हिंसा करते हैं तो एक बड़ा वर्ग उसे आपके विरुद्ध आक्रोश की संज्ञा का नाम देकर इतिश्री कर लेंगे…. जहां आपको अपना आक्रोश प्रकट करना है उस दिन क्यों आप वोट देने से दूर हट जाते है…….

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    November 25, 2011

    लेकिन गलत होने पर हम भी गलत कदम उठा लें यह बात कहाँ तक सही है. शशि भूषण जी कुतर्कों से कोई बात सही साबित नहीं होती है.

    shashibhushan1959 के द्वारा
    November 27, 2011

    आदरणीय भट्ट जी, मैंने तर्कपूर्ण उत्तर देने का प्रयास किया है.

Santosh Kumar के द्वारा
November 25, 2011

पियूष जी ,.सादर अभिवादन आपके लेख से मैं थोडा सहमत हूँ ,…थप्पड़ मरने की बजाय वोट की ताकत दिखाना बहुत बेहतर विकल्प है .. मुझे नहीं लगता थप्पड़ परंपरा बन सकता है ,…..हिन्दुस्तान की जनता बहुत ही सहनशील है ,.हम आखिरी तक प्रयास करते हैं ,…लेकिन अब पानी सर के ऊपर से गुजर रहा है ,..ये देश के सौदेबाज नेता आखिर कब तक हमारी सहनशीलता की परीक्षा लेंगे ,. ..अमूल बेबी के चमचे देश के मंत्री जब काले झंडे दिखाने वाले को अपने गुलाम होने का सबूत देने के साथ गाँधी जी को आखिरी कांग्रेसी श्रद्धांजलि दे रहे थे तब हमारी बुद्धिजीविता को क्या हो जाता है ?……..और इसे पता नहीं कितने उदहारण हैं ,..जब इन्ही नेताओं ने लोकतंत्र को तार तार किया है ….. यह थप्पड़ केवल एक व्यक्ति का एक नेता को थप्पड़ नहीं मानना चाहिए ,…यह आम जनता का नेताओं की व्यवस्था को एक तमाचा है….इस व्यवस्था को बदलना ही होगा………..सुन्दर विवेकशील लेख के लिए हार्दिक आभार ….आपका प्रतिक्रिया का जबाब न देना अखरता है ,…संभव हो तो कृपया दो चार शब्द लिख दिया करें ,.. आशीर्वाद समझ ग्रहण करेंगे …पुनः आभार

    Piyush Kumar Pant के द्वारा
    November 25, 2011

    सवाल ये है की आखिर समाधान क्या है…. हम अन्ना की निष्ठा पर प्रश्न चिन्ह लगते हैं… जबकि अन्ना का लोकपाल का मुद्दा अन्ना के लिए नहीं है.. …. हम बाबा रामदेव को जब लाठी पड़ती है तो हम आक्रोशित नहीं होते…. जबकि काला धन बाबा का मुद्दा नहीं है…. फिर हम क्यों यूँ ही उनको अकेला छोड़ देते हैं.. हम उनका साथ नहीं देते और नेताओं से हिंसा करते हैं…. अरविन्द केजरीवाल पर चप्पल फेंकने वाला भी खुद को आक्रोशित ही बता रहा है… तो आर्कोश का अर्थ आक्रोश ही होता है….. इसको अलग अलग नहीं किया जा सकता…..

    Santosh Kumar के द्वारा
    November 25, 2011

    जहाँ तक मेरी समझ है ,..यह आक्रोश उन सभी घटनाओं से जुड़ा होगा ….अब बाबा और अन्ना की दशा देख जनता ज्यादा आक्रोशित है ,…लोकतंत्र में अंतिम समाधान तो वोट से ही मिलेगा …लेकिन उससे पहले बहुत सवाल हैं ,…देश भ्रमित सा लग रहा है ….इस भ्रम का फायदा किसे होगा कह पाना मुश्किल है …….बाबा रामदेव पूरी तरह से अपने अभियान में लगे हैं ,..देर सबेर अवश्य परिणाम मिलेंगे ,..अन्ना जी की टीम उनको कमजोर बना रही है …साभार

    Piyush Kumar Pant के द्वारा
    November 25, 2011

    सवाल यही है की अन्ना की टीम की निष्ठा पर सवाल उठाने का अर्थ क्या है…. आखिर ये बात हम क्यों नहीं समझ रहे हैं की लोकपाल टीम अन्ना की सुरक्षा के लिए नहीं है…. तो चलने दें … बस समर्थन करें हर उस व्यक्ति का जो अन्ना के साथ है…. आखिर क्यों दिग्विजय के प्रति कोई आक्रोश नहीं है.. राहुल के प्रति कोई आक्रोश नहीं है… सोनिया के प्रति कोई आक्रोश नहीं है….. मनमोहन के प्रति नहीं……

    Santosh Kumar के द्वारा
    November 25, 2011

    अन्ना की टीम पर सवाल उठाने से कांग्रेस लूट संस के प्रति आक्रोश में कोई कमी नहीं आती है ,….यह थप्पड़ उसी आक्रोश का प्रतिबिम्ब मात्र है ,..अन्ना के हर व्यक्ति का समर्थन आँख बंद कर करना घातक हो सकता है ..धन्यवाद

Tamanna के द्वारा
November 25, 2011

पियूष जी, यह राजनीति नहीं आम आदमी की पीड़ा है. अंग्रेजी शासन में भी तो सरकार से त्रस्त होकर हम जैसे लोगों ने ही तो उन्हें खदेड़ने की पहल की थी. जिसका परिणाम प्रशंसनीय और सराहनीय रहा. अगर आज कोई फिर यहीं काम कर रहा है तो इसकी निंदा नहीं की जानी चाहिए. क्या आप परेशान नहीं हैं भ्रष्टाचार और बढ़ती महंगाई से? इतिहास गवाह है कि कुर्सी पर बैठना वाला कभी भी आम जन को नहीं समझ पाया. चाहे फिर कोई तानाशाह हो, औपनिवेशिक ताकत या फिर लोकतंत्र . उन्हें इसी प्रकार जगाया जाता है. हां अगर आत्म-सम्मान और शर्म बाकी रह ही नहीं गई तो कोई कुछ नहीं कर सकता.

    Piyush Kumar Pant के द्वारा
    November 25, 2011

    मैं ही नहीं लगभग सभी परेशां हैं भ्रष्टाचार और बढ़ती महंगाई से……. पर मेरे अनुसार इसके लिए हिंसा की कोई आवश्यकता नहीं.. मैं हर उस शक्श को समर्थन करता हूँ जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाता है… पर अफ़सोस इस तरह के आक्रोशित लोग उन लोगों को भी निशाना बना लेते हैं…. जो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे है….. अरविन्द केजरीवाल इसका उदहारण है….. आपने कहा की ……. इतिहास गवाह है कि कुर्सी पर बैठना वाला कभी भी आम जन को नहीं समझ पाया. चाहे फिर कोई तानाशाह हो….. आप जिस इतिहास का उल्लेख कर रहे हैं.. वो शायद मैंने नहीं पढ़ा …….. चन्द्रगुप्त मौर्या से लेकर ……… अकबर तक कई शासक आये जिन्होंने जनता के लिए उल्लेखनीय कार्य किये……. अल्लाउद्दीन खिलजी की बाज़ार व्यवस्था आम जन के कल्याण के लिए ही बनाई गई थी…..

nishamittal के द्वारा
November 25, 2011

पीयूष जी,आक्रोश के चलते थप्पड़ मारा गया या फिर ये भी कोई राजनीति है ये तो नहीं कहा जा सकता क्योंकि राजनीति में कुछ भी संभव है.परन्तु पत्थर मारना या जूता फेंकना कोई हल नहीं इसी प्रकार देश की सम्पत्ति को आक्रोश के नाम पर क्षति पहुँचाने के विरुद्ध हूँ में परन्तु नेताओं को सबक सिखाना ही है तो इनकी जमानत जब्त कराएँ परन्तु दुर्भाग्य हमारा कि ये ज्ञान रखने वाले मतदान नहीं करते और जो करते हैं उनको ये काले धंधों में लिप्त नेतागण बोतल औए साडी कम्बल से खरीद लेते हैं.

Rajkamal Sharma के द्वारा
November 24, 2011

प्रिय पियूष भाई …… सप्रेम नमस्कारम ! आप नोजवान क्रांतिदल के बारे में क्या कहेंगे जोकि हरविन्द्र सिंह को सन्मानित करते हुए ग्यारह हजार का भी [पुरस्कार भीदेने जा रहा है …. मैं खुद भी इस तरह के किसी भी “दोधारी तलवार” वाले वार के खिलाफ हूँ ….. जिस तरह जुल्म की तलवार दोधारी होती है ठीक उसी प्रकार इस प्रकार के कुक्र्त्यो को प्रोत्साहित करने वाले भी इसकी चपेट में आने से बच नहीं सकते है …. :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    HIMANSHU BHATT के द्वारा
    November 25, 2011

    राजकमल जी आपका कथन बिलकुल सत्य है कि इस प्रकार के कुक्र्त्यो को प्रोत्साहित करने वाले भी इसकी चपेट में आने से बच नहीं सकते है.


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