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प्रेम मेरी नजर मे ...

Posted On: 13 Feb, 2012 Others में

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प्रेम वास्तव मे शर्तों से बंधनो से ओर शब्दों से परे का विषय है….. अक्सर प्रेम मे कई बातें कह दी जाती हैं पर वो झूठ ही निकलती है….ओर प्यार मौन मे ही फलीभूत हो जाता है…. प्रेम मे अक्सर शब्द झुठे हो जाते हैं….. प्रेम वाह्य उपाधि, पद, प्रतिष्ठा से नहीं अपितु भावों की अनुकूलता से होता है… शारीरिक प्रेम तभी तक जीवित रह पाता है जब तक की शरीर मे आकर्षण बना होता है…. किन्तु जब शरीर अपनी युवा अवस्था से आगे निकाल जाता है तो प्रेम समाप्त होने लगता हिय….
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वास्तव मे यही सत्य है….. किसी के रूप रंग से प्रेम क्षणिक होता है…………. क्योकि ये रूप रंग ही क्षणिक है………….. एक बच्चे को उसकी दादी नानी के पोपले गालों से कोई फर्क नहीं उसके भीतर प्रेम उनके द्वारा उसको मिलने वाले प्रेम का प्रतिफल है………
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अष्टावक्र ने जब राजा जनक की सभा मे प्रवेश किया तो सभी उसके अंग देख कर हसने लगे ……….. स्वयं राजा जनक भी ……… तभी अष्टावक्र भी ज़ोर से हसने लगे ……….. ओर जनक ने पूछा की इन लोगों के हसने का अर्थ मैं समझ सकता हूँ……… पर तुम क्यों इस तरह हस रहे हो……… तो अष्टावक्र ने उत्तर दिया ………… महाराज मैंने ये सोचा था की राजा जनक ने विद्वानो की सभा बुलाई है……….. किन्तु ये तो चमडी के व्यवसायियों की सभा है…… राजा जनक ने चौकते हुए कहा की बालक ये विद्वानो की सभा है……….. तो अष्टावक्र ने कहा की मेरी चमड़ी को देखकर मेरा मोल आँकने वाले इन लोगों को मैं विद्वान कैसे कह सकता हूँ……… ये तो चर्मकार ही हो सकते हैं………….
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क्या अष्टावक्र की माता को उससे प्रेम नहीं रहा होगा………….. क्या उसने अपने पुत्र की कुरूपता के कारण उसको त्याग दिया……… या उसका उफास किया….. नहीं क्योकि ये गुण मूल्यवान है चमड़ी नहीं………. इसलिए प्रेम चमड़ी से करने वाले चमडी के व्यवसायियों के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं…..प्यार भगवान की तरह है……. जिसको जानने का दावा सभी करते हैं…. पर इससे साक्षात्कार किसी बिरले को ही होते हैं……… प्यार का दावा करने वाले लोग उसी तरह के हैं जैसे किसी पत्थर की मूर्ति को देख कर ही कोई भगवान के दर्शन करने का दावा कर ले…. वो लोग जो मंदिर मे होकर आए है वो झूठ नहीं कह रहे की उन्होने भगवान देखे…… वो जो मूर्ति है वो भगवान ही हैं……. जिन लोगों के भीतर भाव था उन्होने उस मूर्ति से भी भगवान को पाया है…… उसी तरह आकर्षण भी प्रेम की प्रथम सीढी हो सकता है……… पर शुद्ध प्रेम नहीं …
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प्रेम गुड की तरह है….. जिसे खा कर ही उसका समझा जा सकता है……. यदि कोई शब्दों मे उसके स्वाद का वर्णन करे तो सुनने मे प्रीतिकर लग सकता है पर ज्यों ही गुड मुह मे रखा जाएगा तो उसके स्वाद मे कहे गए सारे ही शब्द झुठे लगने लगते हैं…… क्योकि शब्दों का कितना ही विस्तार कर दिया जाए उसको एहसास मे नहीं बदला जा सकता हैं……. ओर प्रेम एक खूबसूरत एहसास ही तो है……..गुंगे मानव के आस्वाद की तरह प्रेम का स्वरुप अनिर्वचनीय है……
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सच्चे प्रेम के लिए जान दे देना इतना मुश्किल नहीं है जितना मुश्किल है ऐसे सच्चे प्रेम को ढूँढ़ना जिस पर जान दी जा सके……….. क्योकि कई बार प्रेम शब्दों से शुरू होकर शब्दों में ही खत्म हो जाता है……. वो अपनी पूर्ण अवस्था को प्राप्त ही नहीं कर पाता जहां दो लोग अलग अलग न होकर एक से ही हो जाते हैं…….. जहां मतभेद ओर मन भेद जैसे शब्द समाप्त हो जाते है…….. जहां हर तरह का अहं समाप्त हो जाता है…… जहां तेरा-मेरा खत्म हो जाता है ….. कोई शिकवा शिकायत नहीं रहती …… जहां प्रेमी / प्रेमिका कभी एक दूसरे के स्वामी तो कभी दास से नजर आते हैं………..
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जिस तरह किसी बंधन का अपने मूल को छोडना मुश्किल है…….. वृक्ष के लिए उसकी जड़ को छोड़ना ……….. उसी तरह मनुष्य के लिए प्रेम को छोडना बहुत कठिन है……. प्रेम मनुष्य के भीतर ही है……. पर उसकी अवस्था सुसुप्त है……. उसको जगा कर ही प्रेम किया ओर पाया जा सकता है…… एक बार जब आदमी के भीतर प्रेम जागृत हो जाता है तो फिर वो जाति, धर्म, रूप-रंग, मनुष्य पशु सभी के लिए समान रूप से प्रेम वर्षा करता है…. बुद्ध के भीतर प्रेम जागा तो वो प्राणियों से लेकर अंगुलीमाल तक सबको समान रूप से मिला…..
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प्रेम में कुछ पाने का आकर्षण हो तो वह प्रेम नहीं रह जाता है। किसी रूपसी के रूप को पाने का………किसी धनवान का धन को पाने का ….. या किसी प्रभावशाली व्यक्ति के प्रभाव को प्राप्त अक्सर लोग प्रेम का दिखावा करते हैं पर उनके मन में लालच और लोभ भरा रहता है। लोग दूसरे का प्यार पाने के लिये चालाकियां करते हैं जो कि प्यार नहीं छल मात्र है।

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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

dineshaastik के द्वारा
February 16, 2012

पियूष जी नमस्कार, आपने प्रेम को बहुत ही सुन्दर ढ़ंग से परिभाषित किया है। अष्टावक्र का व्रतांत कुछ कुछ मलिक मुहम्मद जायसी से मिलता जुलता है।  जायसी जी का चेहरा विकृत तथा वह एक नैन थे। एक राजा के दरवार में जब राजा के साथ साथ दरवारी भी हँसने लगे तो उनके साथ जायसी भी हँसने लगे। राजा चकित होकर कारण पूँछा तो जायसी जी ने पद्य रूप में कहा कि तुम सब मुझपर हँस रहे हो यह मुझे बनाने वाले पर। यह सुनकर राजा और दरवारी बहुत शर्मिन्दा हुये। सराहनीय रचना के लिये बधाई…….. http://dineshaastik.jagranjunction.com/ नेता- कुत्ता और वेश्या (भाग-2) 

Rachna Varma के द्वारा
February 15, 2012

पियूष जी नमस्कार , एक बेहतरीन और सार्थक लेख धन्यवाद

yogi sarswat के द्वारा
February 15, 2012

शुद्ध और सात्विक प्रेम की कल्पना आज के दौर में करना बेकार है ! क्योंकि प्रेम को आज बाजारू वास्तु बना दिया गया है , और बाजारू वास्तु हमें आकर्षित तो करती है किन्तु मन नहीं मोह पाती ! बहुत सुन्दर लेख !पीयूष जी बधाई ! yogensaraswat.jagranjunction.com

    Jeanne के द्वारा
    July 12, 2016

    I had my first one a few weeks back and it was amziang! Going to also try out cooler showers, too. Meant to be great for the body and mind

अलीन के द्वारा
February 15, 2012

सादर नमस्कार, पियूष जी! प्रेम की सुन्दर अभिव्यक्ति……हार्दिक बधाई. मेरी सदा- एक अधूरी परन्तु सच्ची प्रेम कहानी जो १४ बरवारी, २०१२ को पोस्ट करने वाला था. कुछ कारण बस नहीं कर सका.लेकिन बहुत जल्द ही मेरी सदा- एक अधूरी परन्तु सच्ची प्रेम कहानी पोस्ट करने जा रहा हूँ. आपकी प्रतिक्रिया का विशेष आभार रहेगा.

minujha के द्वारा
February 15, 2012

प्रेम के प्रति बहुत अच्छा दृष्टिकोण  पीयूष जी काश आज का हर युवा इसी तरह सोचे

jlsingh के द्वारा
February 15, 2012

प्रेम में कुछ पाने का आकर्षण हो तो वह प्रेम नहीं रह जाता है। किसी रूपसी के रूप को पाने का………किसी धनवान का धन को पाने का ….. या किसी प्रभावशाली व्यक्ति के प्रभाव को प्राप्त अक्सर लोग प्रेम का दिखावा करते हैं पर उनके मन में लालच और लोभ भरा रहता है। लोग दूसरे का प्यार पाने के लिये चालाकियां करते हैं जो कि प्यार नहीं छल मात्र है। पीयूष जी, आपने शाश्वत प्रेम की बात की है, बहुत ही सुन्दर विचार हैं आपके. और आप तो जानते हैं ” प्रेम न बड़ी उपजै, प्रेम न हाट बिकाई…… सुन्दर पोस्ट!

abhishektripathi के द्वारा
February 14, 2012

सादर प्रणाम! मैं मतदाता अधिकार के लिए एक अभियान चला रहा हूँ! कृपया मेरा ब्लॉग abhishektripathi.jagranjunction.com ”अयोग्य प्रत्याशियों के खिलाफ मेंरा शपथ पत्र के माध्यम से मत!” पढ़कर मुझे समर्थन दें! मुझे आपके मूल्यवान समर्थन की जरुरत है!

Rajesh Dubey के द्वारा
February 14, 2012

प्रेम ब्रह्माण्ड के अमूल्य निधियों में से एक है.जो इसको पा गया उसकी दुनिया धन्य हो गई. प्रेम जाति बंधन से परे है. इसमे दुनिया की सुन्दरता का परिभाषा काम नहीं आता, अपना मन जिसको सुन्दर मानता है,वही सुन्दर होता है. चमड़ी और रंग रूप वाली सुन्दरता देख कर प्रेम करना वासना है.

akraktale के द्वारा
February 14, 2012

आदरणीय पियूष जी नमस्कार, बहुत सुन्दर आलेख किन्तु कई जगह असहमति रही, रंग रूप पर प्रेम क्षणिक हो सकता है क्योंकि जब वह रंग रूप ही नहीं तो फिर प्रेम किससे? किन्तु युवावस्था से प्रेम शारीरिक प्रेम ये आप क्या कह रहे हैं ये प्रेम नहीं वासना है और दोनों भिन्न हैं.क्या उम्र ढलने के साथ प्रेम कम हो जाता है?किसी बुजुर्ग से पूछो की उसका अपनी पत्नी से प्रेम उम्र की ढलान पर बढ़ा है या घटा है. पत्थर की मूर्ति में भगवान् देखनेवालों ने कभी अपने मन में ही झाँक कर देखा होता भगवान् वहीँ नजर आ जाता और गुड से प्रेम का उदाहरण देकर आपने प्रेम के भौतिक स्वरुप को भी मान्यता दी है.अन्य जगह तो आपने प्रेम के सुन्दरतम उदाहरण प्रस्तुत किये हैं. मैंने अपने विचार रखे हैं यदि द्र्श्तता लगे तो क्षमा करें.

    Piyush Kumar Pant के द्वारा
    February 14, 2012

    युवावस्था से प्रेम शारीरिक प्रेम नहीं वासना है ये बात सभी भली भांति जानते हैं….. पर यहाँ पर यह वाक्य उन लोगों के लिए प्रयुक्त किया गया है जो इसे ही प्रेम का नाम दे बैठे हैं। उनलोगों को केवल ये समझाने का प्रयास है की जो प्रेम वे रूप रंग व शारीरिक सौन्दर्य से कर रहे है वो प्रेम नहीं है अन्यथा वो इन अवस्थाओं के समाप्त होने पर समाप्त नहीं हो जाता। क्योकि प्रेम शाश्वत हैं…….. वो कभी समाप्त नहीं हो सकता॥ आपके विचार किसी भी दृष्टिकोण से धृष्टता नहीं कहे जा सकते है……. यहाँ सभी लोग अपने लेखों मे अपने विचार रखते हैं…… और आवश्यक नहीं की सभी उस विचार से सहमत हों….. पर उस विचार से असहमति व्यक्त कर हम न केवल अपनी बात रखते हैं॥ अपितु उस विचार को विस्तार देने मे सहायता करते हैं जिसे लिखने से लिखने वाला कहीं छुट गया।

alkargupta1 के द्वारा
February 14, 2012

पियूष जी , प्रेम के स्वरूप की अति सुन्दर व्याख्या… बहुत दिनों बाद मंच पर आपकी पोस्ट पढ़कर बहुत अच्छा लगा……

abodhbaalak के द्वारा
February 14, 2012

पियूष जी जिस तरह से आपने प्रेम को परिभाषित किया है और समझाया है काश ल……….. बहुत सुन्दर, मंच पर आपको फिर से एक्टिव देख कर बहुत अच्चा लग रहा है और आपसे रेकुएस्ट है की ऐसे ही मंच पर ……. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

shashibhushan1959 के द्वारा
February 13, 2012

आदरणीय पन्त जी, सादर ! प्रेम की अच्छी व्याख्या ! “”जिस तरह किसी बंधन का अपने मूल को छोडना मुश्किल है…….. वृक्ष के लिए उसकी जड़ को छोड़ना ……….. उसी तरह मनुष्य के लिए प्रेम को छोडना बहुत कठिन है…….”"” बहुत सटीक बात !

chaatak के द्वारा
February 13, 2012

स्नेही पीयूष जी, प्रेम का यह विश्लेषण काबिल-ए-तारीफ़ है, प्रेम का दावा तो सभी करते हैं लेकिन युगों में कोई एक ही पैदा होता है जो इसे नई ऊँचाइयाँ देता है और नए प्रतिमान स्थापित करता है| अच्छी पोस्ट पर हार्दिक बधाई!

mparveen के द्वारा
February 13, 2012

पियूष जी बहुत अछा स्वरुप दिया आपने प्रेम का … प्रेम पाने का नहीं देने का नाम है . सही बात है जब प्रेम में कुछ भी प्राप्त करने की इच्छा हो तो वह प्यार नहीं स्वार्थ बन जाता है . 9/10 पियूष जी आपकी रचना के लिए …

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
February 13, 2012

सुन्दर आलेख.प्रेम की गहन व्याख्या की है आपने.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
February 13, 2012

प्रेम में कुछ पाने का आकर्षण हो तो वह प्रेम नहीं रह जाता है। प्रिय पन्त जी , स्नेह. धन्यवाद, प्रेम मय हो संसार .


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